Friday 31 2024

कहानी: अभिसारिका भाग-II ---------------------

 कहानी: अभिसारिका भाग-II

---------------------


   यूं तो प्रायः लोग जीवन में मिलते हैं और बिछड़ते हैं ये एक आम बात है लेकिन जब कोई मिलना और बिछड़ना किसी के जीवन के बनने और बिगड़ने से संबंधित हो तो वह महत्वपूर्ण हो जाता है । इस अर्थ में कंचन का उस दिन मुझसे मिलने नहीं आना मेरे अपने हिसाब से दुर्भाग्यपूर्ण रहा क्योंकि उसके लिए मेरे मन में कुछ योजनाएं बनी थी जो सिरे चढ़ने से रह गई। बहरहाल यूं तो रोज ही सुबह और शाम आती है। इसे एक दिन का आना-जाना कहें तो एक बात है और इसी को जब हम जीवन के उत्सव के रूप में देखते हैं तब हमें दिखाई देता है कि हमारे सामने रोज एक चमत्कार घटित होता है। एक मेला लगता है। प्रकृति का एक मनमोहन आयोजन होता है जिसमें सूरज, चांद, सितारे चिड़िया, पंछी और हवाएं धरती और आसमान सभी मिलकर नाचते हैं और जश्न मनाते हैं। इस खूबसूरत से उत्सव को हम अगर कह दें कि "सुबह होती है शाम होती है,

 उम्र यूं ही तमाम होती है,"

 उस शायर को गलत नहीं कहा जा सकता  जिसने ऐसा कहा था। लेकिन यह भी सही है कि जिसने जिनको जितना देखा उसने उसको उतना जाना। जिस नजर से आप प्रकृति को, स्वयं को अथवा जीव जगत को देखते हैं वह वैसा ही हो जाता है। इस बारे में मेरा दृष्टिकोण तो आपके सामने स्पष्ट है कि मेरे लिए हर सुबह का आना प्रकृति मन मोहिनी के लास्य का प्रतीक है, उसके आयोजन का हिस्सा है, और ऊर्जा, सौंदर्य तथा सृजन का प्रतिनिधि है। इसी के मेल से धरती पर जीव जगत का होना चलायमान है। इसी विचार से हम भी अपनी जीवनचर्या में चलते रहते हैं। 

तो इस प्रकार अगली सुबह जब मैं प्रातः भ्रमण के लिए निकला तो वापस आते समय मुझे कंचन उस जगह पर नहीं मिली इसका जिक्र में कहानी के भाग एक में कर चुका हूं। मेरा सुबह का टहलने का क्रम जारी रहा। धीरे-धीरे वह घटना मेरे मन मस्तिष्क से गायब हो गई फिर भी इतना जरूर होता था कि उस जगह पर जहां वह मुझे मिलने के लिए कह कर गई थी वहां पहुंचने पर अनायास ही उसकी स्मृतियां मस्तिष्क में कौंध  जाती थी लेकिन मैं उसे एक घटना समझ कर आगे बढ़ जाता था।  कभी-कभी उसका विचार मेरा पीछा करते थे और यह सवाल उठता था कि जब उसके सामने एक रास्ता दिख रहा था तो उसे भरोसा करना चाहिए था । हालांकि भरोसा करना चाहिए था ऐसा मैं कह सकता हूं लेकिन वह भरोसा कर ही ले इसके लिए उसके पास कोई खास वजह नहीं रही होगी। मेरा कहना ही एक साक्ष्य था जिसे उसने संभवत: सत्य नहीं माना रहा हो। उसके प्रति मेरे मन में वह विश्वास नहीं पैदा हो सका  हो जो मैं समझता था। इन्हीं  बातों के इर्द-गिर्द सोचते हुए मैं आगे निकल जाता था।

पिछले माघ मेले के दौरान बसंत पंचमी स्नान पर्व का दिन था। मैं बसंत पंचमी का स्नान करके मेला घूम कर बाहर निकल आया था और एक पान की दुकान देखकर उस ओर बढ़ गया। पनवाड़ी से मैंने पान लगाने को कहा और अपनी बारी का इंतजार करने लगा। तब तक पास में खड़ी एक काले रंग की स्कॉर्पियो की खिड़की से मेरी तरफ देखती हुई दो आंखें  दिखाई पड़ी। ऐसा लगा कि वह मुझे ही एक टक देख रही थी। अपने मन का संदेह दूर करने के लिए जब मैने दोबारा उधर देखा तो उसने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया। जब मैं उसके पास गया तो मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि वह कंचन थी। उसने मुझे बड़े अदब से नमस्ते किया और बोली बाबूजी अब मैं कंचन हूं सिर्फ कंचन। ऐसा करते हुए उसका चेहरा गर्व और लज्जा भाव से एकदम लाल पड़ गया। मैं कुछ बोल पाता इसके पहले एक मोटा थुल थुल श्याम वर्ण व्यक्ति मेरे पास आ गया। तब तक कंचन ने ही परिचय कराया। "सुनिए अभिषेक, यही वह बाबूजी है जिनके बारे में मैंने आपको बताया था।" मेरे मन में सवाल तुरंत ही आया कि इसने पता नहीं क्या क्या उससे कहा होगा। लेकिन जब उस व्यक्ति ने बड़े ही आदर भाव से मुझे नमस्कार किया तो मुझे यह इत्मीनान हुआ कि संभवत: उसने मेरे बारे में कोई अच्छी बातें ही उसको बताया होगा, वरना अगर उसने यह बताया होता कि मैं उसको भागने के लिए बात कर रहा था तो शायद वह आदमी मेरा  खून ही कर देता। मेरे मन में इस विचार से एक हंसी का फव्वारा छूटा पेट में एक गुदगुदी सी हुई लेकिन मैं उस समय स्थिर लेकिन मन से खुश उन लोगों को देख रहा था। अभिषेक भी मुझसे बहुत अदब से बात कर रहा था। उसने मुझे अपने घर पर आमंत्रित किया और विनय पूर्वक बोला कि आप अगर आएंगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। मैं भी उसके घर आने के लिए स्वीकृति दे दी फिर उसने कहा कि आप किसी भी रविवार को मेरे घर आईए, बल्कि आप इसी रविवार को मेरे घर आईए। हम लोग आपके साथ बैठकर बहुत आनंद  महसूस करेंगे।

अगले रविवार को मैं उसके घर चला ही गया। यूं तो ऐसे किसी के घर यूं ही जाना मेरा स्वभाव नहीं है लेकिन मुझे उसके जीवन में आए इस प्रकार के सार्थक बदलाव को समझने के लिए जो उत्कंठा हुई थी उसी ने मुझे उसके घर जाने के लिए प्रेरित किया। सामान्य औपचारिकताओं के बाद हम लोग आपस में घुल मिल गए और बातचीत होने लगी। अभिषेक ने ही बताया कि वह भी अपने मां-बाप का अकेला है और उसके मां-बाप गाजीपुर में रहते हैं । कुछ कारणों से वह यहां नहीं आ सकते थे । यहां मुझे रोटी पानी की तुरंत आवश्यकता थी इसलिए कंचन से उपयुक्त कोई ग्रहणी मुझे मिलती हुई दिखाई नहीं पड़ी, या यूं कहिए कि कंचन में मुझे सब कुछ मिल गया इसलिए मैंने इसे स्वीकार कर लिया और इसने मेरा साथ स्वीकार कर लिया।  हम विवाह के बंधन में बंध गए। इस बात को हुए 2 साल हो गए और अब तो हमारा एक 6 महीने का बच्चा भी है। 

हम बात कर ही रहे थे कि तभी अभिषेक का फोन बजा और वह एक किनारे में जाकर फोन पर बात करने लगा।

बातें करते-करते अभिषेक सामने वाले पर चिल्ला चिल्ला कर बोलने लगा। बीच-बीच में उसके मुंह से अपशब्द भी सुनाई पड़ जाते थे और थोड़ी ही देर में वह बातें गाली गलौज तक पहुंच गई। तब कंचन ने जाकर उसे थोड़ा चुप कराने की कोशिश की। उसने कंचन को भी झिड़क दिया। इस बात पर मुझे बड़ी उलझन होने लगी। जब वह फोन पर बात कर चुका तो मैंने चलने की इच्छा जाहिर की। उसने अपने आप को संयत करते हुए मुझे सॉरी कहा और चाय पीने का आग्रह करने लगा । मैंने भी स्वीकार कर लिया। अगले 1 घंटे में चाय पीकर में उसके घर से निकल आया।

इस बात को हुए लगभग एक साल बीत गए । एक दिन मैं अपने ऑफिस में बैठा था तभी चपरासी ने आकर बताया कि कोई आपसे मिलने आया है। मैंने उसे अंदर बुला लिया। देखा तो वह कंचन थी । उसे आकस्मिक रूप से वहां देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। उसका हाल और हुलिया देखकर लग रहा था कि वह बहुत परेशान है। साथ में उसका बच्चा भी था जो शरीर से काफी कमजोर लग रहा था। कंचन की भी स्थिति बीमारों जैसी दिख रही थी। मैंने उससे पूछा क्या हुआ और यह हालात कैसे बना रखी है? उसने अपने दुख भरी कहानी सुनाई उसने बताया कि "पिछले वर्ष अभिषेक ने बातों बातों में झगड़ा लड़ाई करके उसे घर से निकाल दिया" उसने बताया कि "वैसे तो छोटी-छोटी बातों पर अक्सर झगड़े होते थे लेकिन ऐसा लगता था कि यह बातें कभी ना कभी ठीक हो जाएंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि उसकी परिणति कुछ इस तरह हुई कि मुझे घर से निकल जाना पड़ा। और अब वही यायावरी और वही फाकाकशी चल रही है जिसके कारण स्थितियां बहुत बदतर हो गई हैं"। मैंने उसे अपने ऑफिस में रुक कर काम करने के लिए कहा। उसके पास कोई विकल्प नहीं था इसलिए उसने मेरे ऑफिस में रह कर काम करना स्वीकार कर लिया।

मैंने उसको धीरे-धीरे आफिस का काम करने का पूरा सलीका सिखाया। वैसे वह खुद काफी समझदार थी और उसने मेरी बताई गई बातों को बहुत तेजी से समझना शुरू किया। धीरे-धीरे वह घर के कामों में पारंगत हो गई। उसके बाद उसकी पढ़ाई शुरू हुई। मैंने उसे हिंदी और अंग्रेजी के अल्फाबेट्स और उन्हें जोड़कर पढ़ना लिखना सिखाया। उसे गणित की भी थोड़ी बहुत जानकारी हो गई तब उसको दो साल के बाद ओपन स्कूल से दसवीं का इम्तिहान दिलवाया जो वह आराम से सेकंड डिवीजन में पास कर गई। हमारा ऑफिस हमारे अपने बिजनेस का हिस्सा था जिसमें स्टाफ को रखना मेरे ही हाथ में था इसलिए उसकी योग्यता को देखते हुए मैंने उसको अपने यहां परिचारिका के रूप में नियुक्त कर दिया। उन दिनों मेरे ऑफिस में एक नियमित कर्मचारी की जरूरत थी जो ऑफिस के सारे कार्य करें और आने जाने वालों के लिए खाने-पीने और चाय पानी की व्यवस्था देखें। कंचन के अंदर यह सब गुण बहुत निखर कर भरे हुए थे इसलिए उसने बहुत आसानी से कार्य संभाल लिया। इस प्रकार वह हमारे बिजनेस परिवार का हिस्सा बन गई और आज हमारे कार्यालय में सभी उसकी मेहनत ईमानदारी और सेवा भाव की सराहना करते हैं। मुझे पहला दिन याद आता है जब मैं उसको सुबह-सुबह एक घर से निकल कर जाते हुए देखा था और अपने मन में उसको अभिसारिका समझकर उसकी हंसी उड़ाया था। लेकिन मेरा मन संजीदा था और मैं समझ रहा था कि कोई भी व्यक्ति  स्वेच्छा से ऐसे कार्य नहीं करता । हर किसी की कोई न कोई मजबूरी जरूर होती है। इसी बात की तफ्तीश के लिए मैंने उससे बातचीत  करने का रिस्क लिया था और मेरा संदेह सही निकला। उसकी मजबूरियां मेरे सामने साफ निकल कर आई और थोड़े से प्रयासों से उसकी जिंदगी पटरी पर लौट आई। इस प्रकार सारिका सदा सदा के लिए विदा हो गई और आज वह कंचन के रूप में हमारे स्टाफ का एक अनमोल हीरा है। हीरा इसलिए है क्योंकि आज के विसंगतियां भरे जीवन में कोई ऐसा नहीं मिलता जिसके अंदर लोभ लालच, धोखा ना हो और वह कृतज्ञता भाव से सब की सेवा में ही अपना जीवन तलाश करता हो!   हमारी कंचन एक ऐसी कृतज्ञ और कर्तव्य परायण महिला थी।

Thursday 30 2024

कहानी: अभिसारिका ------------

 कहानी: अभिसारिका

------------

प्रकृति सुंदरी की चिरयौवना पुत्री उषा से मेरे अभिसार का समय था । आज कुछ देर  हो गई थी क्योंकि अंधेरे में कुहासे का धीरे-धीरे छंटते चले जाना प्रकाश को आमंत्रित कर रहा था। ऐसे में जब मैं उषा से अभिसार के लिए निकला तो ऐसा लगा कि जैसे आज मुझसे पहले कोई उससे मिलकर चला गया। बात यह है कि मैं मुंह अंधेरे उठकर सुबह-सुबह जब टहलने जाता हूं तब रास्ते में अंधेरा, कुहासा, चिड़िया हवाएं , उषा और में यही होते हैं । ऐसे में उषा से मेरे अभिसार का बेहद खूबसूरत चित्र होता है जिसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है देखा नहीं जा सकता। सबसे पहले आईए आपको उषा से परिचय करा देता हूं। उषा प्रकृति सुंदरी की चिरयौवना बेटी सूर्य देव के आने से पहले आसमान से धरती तक हर जड़ और चेतन जीव जगत  को अपनी शीतलता, सुगंध , संगीत और स्पर्श से सब के जीवन को आह्लादित करती है । सबको दिन भर के लिए खुशी और ऊर्जा देकर सूरज की बांह पकड़े आसमान की सीढ़ियां चढ़कर उसी की उंगलियां थामे आसमान से सीढ़ी दर सीढ़ी उतरकर शाम की गोद में विश्राम करती है और रात्रि के आंचल में मुंह ढक कर सो जाती है। सुबह मुझसे मिलने का उसका क्रम जारी रहता है ।यही उषा की दिनचर्या है और यही मेरे रोज के उससे अभिसार का हर सुबह का प्रकृति नटी का आयोजन है।

        उस दिन थोड़ी सी देर हो जाने के कारण सुबह हो गई थी इसलिए ऐसा लगा कि उषा से मिलकर अभी-अभी कोई चला गया हो!  अब उषा सुंदरी  अभिसारिका अपने घर की तरफ चल पड़ी थी और रास्ते में मुझे मिली तो उसने मुझसे पूछ ही लिया "क्या समय हुआ है ? "   जब मैंने वक्त बताया तो वह मुस्कुरा कर आगे बढ़ गई। मैंने पीछे से आवाज लगाई "कौन हो तुम ?" उसने हंसकर जवाब दिया "अभिसारिका 'और फिर चल पड़ी।  उस दिन मैं सुबह देर से उठा था।आगे जाने का  औचित्य नहीं लगा फिर भी मैं चला चला गया क्योंकि उषा मेरी अभिसारिका चाहे ना भी मिली हो फिर भी मुझे टहलने तो जाना ही था। मैं चला गया और सोचता रहा अभिसारिका के बारे में!  अगले दिन सुबह वही अभिसारिका जब मुझे फिर से मिली तब मैंने जाना कि यह अभिसारिका उषा नहीं कोई और है। वह कुछ उदास सी लग रही थी। मैंने पूछा "तुम्हारा नाम क्या है?" उसने फिर से कहा "अभिसारिका। मैंने कल ही तो तुमको बताया था ।" मैंने पूछा "यह नाम तुम्हारे माता-पिता ने रखा है?" उसने कहा "नहीं मेरा नाम तो कंचन है। लोग मुझे अभिसारिका कहते हैं । अब जो लोग कहते हैं उसी नाम को मैंने भी स्वीकार कर लिया है । तब से मैं अपना परिचय अभिसारिका ही बताती हूं ।" फिर मैंने सवाल किया " फिर तुम उदास क्यों हो?"उसने कहा "यह  काम मेरे ऊपर एक अनदेखे दबाव का हिस्सा है। मेरे घर परिवार की मजबूरी की उपज है। कौन चाहता है कि वह रातों की नींद को त्याग कर सड़कों पर यूं डोलता रहे । दिन भर काम की थकान और रात में अभिसार का यह थकाऊ काम मैं नहीं करना चाहती लेकिन क्या करूं? मजबूरी है । घर में कोई नहीं है इसलिए घर की जिम्मेदारियां उठाने के लिए मैं यही करती हूं।" मुझे उसकी कहानी पर कुछ तकलीफ हुई थी । यह मैंने तो सुन रखा था कि बहुत सी अभिसारिकायें  होती हैं। कोई मजबूरी वाली कोई शौक वाली। लेकिन शौक वाली अभिसारिका होती होगी यह बात मेरे लिए बेमानी सी लगने लगी जब मैंने उससे बातें किया। यूं सड़क पर अकेली जा रही किसी लड़की से मुंह अंधेरे बात करना मुझे थोड़ा असहज सा लग रहा था इसलिए मैंने उससे कल  इसी समय मिलने के लिए वादा लिया और घर आ गया । घर में पूरे समय उसका मुरझाया हुआ चेहरा घूमता मेरे मन में कई तरह के सवाल उठाता रहा । जवाब ढूंढने की कोशिश मैं करता रहा लेकिन मेरे पास हर बात का जवाब होने के बावजूद मजबूरी के दबाव का कोई जवाब नहीं था । प्रश्नों की ऊहापोह में दिन बीता रात बीती । अगले दिन सुबह दिए गए समय पर मैं उसे फिर से मिला। उषा से मिलने के बाद   जब मैं वापस लौटा तो अभिसारिका  मेरा इंतजार करते हुए वहीं पर खड़ी मिल गई। मैंने उससे पूछा  "अभिसारिका मेरा मतलब  कंचन , तुम यह काम करती क्यों हो?उसने कहा "यह सवाल आप मुझसे क्यों करते हैं? मैंने तो बताया था कि मेरी मजबूरियां है इसलिए मैं अभिसारिका हूं ।" मैं थोड़ी देर के लिए चुप रहने के बाद उससे पूछता हूं ।"बताओ तुम, तुम्हारा घर कहां है? माता-पिता कहां है? क्या कोई भाई भी है? अगर है तो वो क्या करते हैं और अगर वह कुछ करते हैं तो फिर तुम यह क्यों करती हो जिसने तुम्हें कंचन से अभिसारिका बना दिया है ? मैं देखता हूं कि इस काम से तुम खुश भी नहीं हो ।" उसने बताया-

"कश्मीर की हसीन वादियों में मेरा गांव था। मेरे पिता परमानंद गांव के चौधरी थे। गांव के ही कुछ युवकों ने हमारी जमीन और घर हड़पने के लिए मेरे पिता से दुश्मनी ठान ली। एक वक्त ऐसा आया जब उन लोगों ने मेरे पिता की हत्या कर दी और इसी सदमें में मेरी माता भी चल बसी। उन लोगों ने मुझे बंधक बना लिया और मुझे बहुत तकलीफें देकर छोड़ दिया। मैं वहां से भाग कर सीधे रेल पकड़कर दिल्ली आ गई। दिल्ली से पता नहीं कहां से कहां होते हुए अब मैं कहां हूं मुझे कुछ पता नहीं। पता होगा भी तो जानकर क्या करूंगी । मेरे पिता मेरे जन्म की कहानी बताते थे- "उन दिनों कश्मीर की वादियों में रह रह कर बम के  सुनाई दे जाते धमाकों के बीच किसी के रोने, चीखने चिल्लाने की आवाजों के बीच आटोमेटिक रायफलों की गोलियां दनदनाती फिर सब कुछ शांत हो जाता। इस भयानक विध्वंस के बीच उसका प्रथम रुदन प्रकृति के सृजन की विजय का जय घोष था।

परिचरी ने नवजात को तौलिए से पोंछ कर सुंदर सी नई गुलाबी नैपकिन में लपेट कर मां के बगल में लिटाया तो कन्या मां के बदन की हरारत से जीवन पा गई। उसके सुकोमल गुलाबी पंखुड़ियों जैसे होंठो पर उसकी जीभ ने कुछ ढूंढने का प्रयास किया। तब तक सद्य: प्रसूता मां प्रसव पीड़ा से मुक्त बेटी को अमृतमय बूंदों से तृप्त करने को आतुर हो गई थी। ज्यों ही बच्ची ने मां का पहला दूध चखा मां तृप्ति के भाव से भर मुस्कुरा उठी और उसकी मुस्कान में प्रकृति एक बार फिर विजयी मुस्कान बिखेर रही थी। ये प्रभात की बेला थी। शीतल मन्द बयार सुगंध से भर गई। पंछियों ने प्रभाती गाया और प्रकृति सुंदरी नाच उठी। सूर्य की पहली किरण ने जब बच्ची का प्रकाशाभिषेक किया तो चारों ओर उजाला ही उजाला फैल गया।

यह उजाला पिता, दादा

और कन्या को जन्म देने वाली माता के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था ।

एक सूर्य माता के चेहरे पर ,एक सूर्य पिता के चेहरे पर एक सूर्य दादा के चेहरे पर प्रसन्नता का उजाला फैला रहे थे।

 दादी के चेहरे पर उदासी की रेखाएं साफ दिख रही थी क्योंकि उन्हें वंश को चलाने वाला वारिस चाहिए था जिसकी जगह पर कन्या ने जन्म ले लिया था इसलिए दादी के चेहरे पर खुशियों की चमक आते-आते लौट गई। दिन चढ़ते चढ़ते किन्नरों की टोली आ धमकी।  उन्होंने तालियां बजा बजा कर

 "हाय दादा के घर लल्ला भयों हम बधाई गाएंगे"

 गाते हुए पूरे अस्पताल  को सर पर उठा लिया। दादा और पिता ने उन्हें बक्शीश देकर जब विदा किया तो समस्त किन्नर वृंद ने बेटी को गोद में लेकर नाचते गाते आशीशों से उसका दामन भर दिया और बेटी को मां के हाथों सौंप कर आशीर्वाद देते हुए चले गए। उनके जाने के बाद माहौल शांत हुआ तब लड्डू बांटने की तैयारी शुरू हुई । इस प्रकार पूरे अस्पताल का माहौल एक परिवार में आई खुशियों की तरह फैल गया । सबको बख्शीशें मिली और कन्या अपनी माता के साथ अपने घर को रवाना हुई। दादी भारी कदमों से चलते हुए घर पहुंची तो आसपास की महिलाओं ने दादी को थोड़ा ढाढस दिया तो थोड़ा उकसाया भी ।धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा। इस तरह परमानंद के आंगन में एक पुष्प के पौधे का रोपण हुआ जो धीरे-धीरे चंद्रमा की कलाओं की तरह बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा का चांद बनने की ओर अग्रसर हुआ।

बाबा परमानंद प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति थे। बेटी के बाद घर के लोगों ने बहुत चाहा था कि एक बेटा भी होना चाहिए लेकिन बाबा ने कहा कि बेटी होगी तो बेटा ले आएगी या बेटा होगा तो बहू ले आएगा। दोनों हालत में घर में एक बेटा एक बेटी हो ही जाएंगे ऐसे में दूसरी संतान का कोई मतलब नहीं है। इस प्रकार एक संतान होगी तो  उसकी अच्छी तरह देखभाल हो सकेगी और आज के महंगाई के जमाने में उसकी पढ़ाई लिखाई ठीक ढंग से हो पाएगी। इसलिए बाबा अपनी बात में अडिग रहे और मैं अपने मां बाबा की अकेली संतान उनकी छत्रछाया में बढ़ने लगी। बाबा मुझे पढ़ाकर डॉक्टर बनाना चाहते थे। वो अक्सर कहते कि हमारी कंचन जब डॉक्टर का ड्रेस पहन कर गांव आएगी तो लोग उसके नाम से मुझको पहचानेंगे। बाबा ने मुझे डॉक्टर बनाने के लिए मेरी प्राइमरी पढ़ाई पर बहुत कड़ाई से ध्यान रखा और मेरे स्कूल से आने जाने पर मेरे साथ बैठकर मेरी पूरी दिन भर की पढ़ाई की जांच किया करते थे । मैं  दसवीं की परीक्षा देकर गर्मी की छुट्टियों में घर में ही रहकर मां बाबा का हाथ बंटा रही थी उन्हीं दिनों मेरे घर में कुछ बहुत अद्भुत सा चल रहा था जिसे सच कहूं तो मेरे बाबा अम्मा और मेरे खिलाफ एक बड़ी साजिश थी। मेरे दोनों चाचा चाहते थे कि  कंचन की पढ़ाई लिखाई आगे ना बढ़े । वह ऐसा इसलिए चाहते थे कि बाद में मेरे मां-बाप को खत्म करके और मुझे भी या तो खत्म कर देते या मुझे घर से भगाकर जमीन और घर पर कब्जा कर लेते । हमारे मम्मी और बाबा को या मुझको किसी को इस बात की भनक नहीं लगी। वैसे भी उन दिनों मैं इतनी छोटी थी की इन बातों का मतलब भी नहीं समझ सकती थी। उन्हीं दिनों एक दिन मेरे चाचा ने मेरे बाबा से आकर कहा  "बड़े भैया अगर आप कहें तो इस पुराने जर्जर भवन को गिराकर नया घर बना लिया जाए क्योंकि पहाड़ों पर कभी-कभी पुराने भवन टूट जाते हैं और वैसे भी हमारा पुश्तैनी घर बहुत पुराना हो चुका है"। बाबा ने भी इस बात में कोई बुराई ना देखते हुए सहमति दे दिया । फिर घर का काम चालू हुआ ।आधा घर पहले बना कर उसमें रहने का इंतजाम करके तब बाद में आधे घर को गिरानेऔर बनाने का कार्य किया जाना था। इस प्रकार जब आधा घर बन गया तब रहने वाला सारा समान उस वाले घर में डाल दिया गया और पुराने भवन को गिराने की कवायद होने लगी । इसी में एक दिन एक दीवार को खोदने का काम चल रहा था तभी मेरे चाचा जी ने मेरी मम्मी से कहा कि भाभी जी एक गिलास पानी पिला दीजिए। मम्मी ने मुझे पानी लाने के लिए इशारा किया। मैं पानी लेने चली गई तब तक वह दीवार गिराई जा चुकी थी। दीवार गिरते ही बड़ी तेज से लोगों के चिल्लाने रोने की आवाज़ें आने लगी और यह आवाजें सुनकर मैं भी पानी घर में ही छोड़कर बेतहाशा भागते हुए बाहर आई। मैंने देखा कि लोग चिल्ला रहे थे और गिरी हुई दीवार के मलबे को हटा रहे थे। मुझे तुरंत समझ में आ गया कि कोई इस मलबे के नीचे दब गया है। तब तक मेरी मम्मी बेहोश होकर गिर पड़ी। बदकिस्मती की बात है कि मेरे बाबा ही उस दीवार के नीचे दब गए थे। ये देखकर मेरी माता जी बेहोश होकर गिर पड़ी । उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनके बेहोश रहते रहते ही मेरे बाबा का अंतिम संस्कार कर दिया गया। तीन चार दिन के इलाज के बाद मेरी माता जी को होश आया । थोड़ी देर में वह फिर बेहोश हो गई ।दो-तीन दिन यही स्थिति चलती रही एक दिन उनकी तबीयत थोड़ी ठीक हुई तो उन्होंने मुझे अपने पास बुला लिया। मुझे पकड़ कर रोती रही रोती रही।  मैंने उन्हें बहुत धीरज बंधाया तब मम्मी ने मुझे बताया कि दीवार के गिरते समय मझले चाचा ने बाबा को गिरती दीवार के सामने धक्का देकर गिरा दिया था नहीं तो बाबा दीवार से दूर खड़े थे और उन्हें दीवार के गिरने से  कोई खतरा नहीं था ।  ये बताते - बताते  मम्मी के चेहरे पर भय और घबराहट के निशान मैं साफ देख पा रही थी लेकिन मैं इस बात का भरोसा भी कैसे कर सकती थी कि जिस चाचा जी को मेरे पिताजी ने पढ़ाया लिखाया बड़ा किया वही चाचा मेरे पिताजी के साथ ऐसा कृत्य कैसे कर सकते हैं ? मुझे इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था ।  मम्मी ने मुझे बताया कि "मैंने अपनी आंखों से देखा है तुम्हारे मझले चाचा ने तुम्हारे बाबा को धक्का दे कर दीवार के नीचे गिरा दिया। तुम्हारे बाबा ने संभलने की कोशिश की पर संभल नहीं पाए थे"। यह बातें बताने के बाद उन्होंने मुझसे यह वचन लिया था कि मैं यह बात किसी से नहीं कहूंगी और फिर मम्मी धीरे-धीरे ठीक होने लगी। लेकिन एक दिन अचानक उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई और बेहोशी में कुछ इधर-उधर की बातें करने लगी फिर बोलते बोलते  कोमा में चली गई और इस बार उनका कोमा में जाना फिर से ना आने के लिए था।

   मम्मी कोमा से बाहर नहीं आई और इस प्रकार सारा राज मुझे देकर वह स्वयं भगवान के पास चली गई। मम्मी के जाने के बाद मेरे पास घर में रहने की न कोई वजह थी ना कोई जगह। मुझे अपनी मृत्यु सामने दिखाई देने लगी थी।   घर के बाकी  सदस्यों की आपस में होने वाली बातचीत में मुझे मेरी मौत ही मौत दिखाई पड़ने लगी। इस प्रकार के डर के माहौल में रहते रहते मैं अर्धविक्षिप्त होने की अवस्था में चली जा रही थी। मेरी चाची मुझसे घर का बहुत सारा काम करवाते थे और फिर भी ताने देना और मेरी माता-पिता की मृत्यु के लिए मुझे जिम्मेदार बताना यही रोज-रोज की कहानी हो गई थी। वह यहां तक कहते थे कि मेरे भाग्य इतने खराब हैं कि मैं जहां रहूंगी उसी जगह पर कभी बरकत नहीं होगी। इस तरह वह दबे- छुपे मुझे यह कहना चाहते थे कि मैं घर छोड़कर कहीं और चली जाऊं। उन लोगों का यही मकसद था इसी मकसद के लिए उन लोगों ने मेरे पिता चौधरी परमानंद की हत्या तक कर डाली थी। मेरे पास घर छोड़कर भाग जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इसलिए मैं रात की गाड़ी से एक दिन अचानक भाग कर दिल्ली चली आई और फिर दिल्ली से यहां आ गई।

कंचन के परिवार में अपने ही जनों के द्वारा उसके पिता के इस प्रकार हत्या किए जाने की बात सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। मैंने कहा "तुम्हारे चाचा तुम्हारे पिता से इस तरह की रंजिश क्यों रखते थे?" उसने बताया कि "मेरे चाचा को मेरे पिताजी की मान मर्यादा और शोहरत से बहुत उन्हें बहुत ईर्ष्या होती थी। ऐसा करके उन लोगों ने अपनी ईर्ष्या और द्वेष का बदला तो लिया ही साथ में उनकी नजर पिताजी की पैतृक संपत्ति पर भी थी। वह जानते थे कि उनके पास कोई बेटा तो है नहीं और शादी करने के बाद संपत्ति बेटी को दे देंगे तो पैतृक संपत्ति में बंटवारा हो जाएगा। इसलिए   पूरी संपत्ति को हड़पने की मंशा से उन लोगों ने मेरे पिताजी को इस तरह निर्ममता पूर्वक मार डाला ।" कह कर वह रोने लगी। मैंने उसे ढांढस बंधाया फिर मैंने उससे पूछा कि "तुमने यहां आने के बाद अपना जीवन कैसे शुरू किया?" उसने बताया कि "शुरू-शुरू में एक तो भाषा की भी समस्या थी। लोग मेरी बात को देर से समझते थे और मैं भी लोगों की बात देर से समझ पाती थी क्योंकि मुझे हिंदी नहीं आती थी और ज्यादा देर तक लोगों से बात करने पर उनका अनुमान हो जाता था कि मैं अकेली हूं और लोग तरह-तरह से मुझे भटकाने की कोशिश करते रहते थे। इस प्रकार कई बार मुझे लोगों ने धोखा देकर मेरे साथ गलत काम किया और बाद में यही मेरी मजबूरी बन गई।  वह लोग समझ चुके थे कि मेरे आगे पीछे कोई नहीं है। इस प्रकार की असुरक्षा के बीच मेरा जीवन नरक बन गया था।  इसी दौरान एक ठेकेदार से मेरा संपर्क हुआ । उसने अपने साथ मुझे लेबर का काम करने के लिए रख लिया और उसके दबाव के कारण दूसरे लोग मुझसे दूरी बनाने लगे। इस तरह मेरे उस ठेकेदार के  साथ आने से मेरे जीवन में थोड़ा सा आराम आया।  आज जब मैं आपसे यहां मिल रही हूं तो मैं उसी के डेरे में गई थी। वह ठेकेदार कभी-कभी रात में शराब के नशे में मुझे बुला लेता था और मेरे जिस्म के साथ खेलता था । लेकिन इससे इतना तो हुआ कि मुझे केवल उसी को संभालना रहता था तो मेरे मन और शरीर पर पड़ा हुआ बोझ थोड़ा कम तो हुआ लेकिन यह अपराध तो मैं बार-बार कर रही थी या मेरी मजबूरियां मुझसे करा रही थी।"

 मुझे उसकी यह बातें सुनकर आश्चर्य तो नहीं हो रहा था, हां दुख जरूर हुआ। फिर भी मेरे पास उसके लिए कुछ करने के लिए दिखाई नहीं पड़ रहा था और ना ही मेरे मन में कोई उपयुक्त सवाल पैदा हो रहा था। फिर भी मैं ना चाहते हुए भी उससे पूछा कि "क्या यह जिंदगी तुम्हें किसी तरह रास आ रही है?" उसने चिढ़ कर कहा "बाबूजी कैसी बात करते हैं? यह जिंदगी भी कोई जिंदगी है! मुझे मृत्यु नहीं आती इसी बात का अफसोस है वरना इस नरक जैसे जीवन में माता-पिता की मृत्यु का बोझ लेकर जीना मेरे लिए किस तरह का जीना है समझ में नहीं आता! अपने आप से सवाल करती हूं कि आखिर मैं जीवित क्यों हूं! मैं मर क्यों नहीं जाती?"

 कह कर वह सिसक सिसक  कर रोने लगी। मैंने उसे किसी तरह चुप कराया। मैंने पूछा " तुमने कहां तक पढ़ाई किया है"? उसने बताया कि मैं दसवीं पास नहीं हो पाई थी तभी यह सब हो गया। मैंने उससे पूछा तुम पढ़ना लिखना जानती हो ?उसने कहा "हां मुझे अपने यहां की भाषा और अंग्रेजी का कुछ-कुछ पढ़ना लिखना आता है।" मुझे उसके अंग्रेजी जानने की बात पर आश्चर्य हुआ। मैंने कहा "तुम्हें अंग्रेजी कितना आती है?" वह बोली "बस थोड़ा बहुत जोड़-तोड़ कर पढ़ लेती हूं । ज्यादा कुछ समझ में नहीं आता" मैंने कुछ सोच विचार किया फिर मैंने उससे कहा कि "तुम क्या मेरे घर में मेरे साथ रह सकती हो? वहां तुम्हें सिर्फ मेरा छोटा-मोटा काम करना होगा। तुम्हें खाना पीना कपड़ा और सारी सुविधा मिलेगी और मैं तुम्हें थोड़ा बहुत पढ़ाऊंगा जिससे तुम्हें आने वाले समय में कोई काम मिल जाएगा। हो सकता है मेरे ऑफिस में ही तुम्हें कोई काम मिल जाए तो मैं वहां तुम्हारा इंतजाम कर सकता हूं। मेरे घर में मेरे साथ कोई और नहीं रहता। मेरा परिवार कानपुर में है। मैं यहां अकेला रहकर बिजनेस करता हूं । उसने डरते हुए हां कर दिया लेकिन उसका डर साफ था और मैं समझ रहा था कि वह ठेकेदार से बहुत डरती है । उसने पूछ ही लिया कि "अगर ठेकेदार ने मुझे देख लिया तो वह आपसे भी दुश्मनी ठान लेगा । बहुत टेढ़ा आदमी है वह!" मैंने कहा तुम उसकी चिंता ना करो। उसको पता ही नहीं चलेगा कि तुम कहां हो और हां तुम जहां भी रहती हो वहां से कोई सामान लेकर नहीं आना। केवल अपना बहुत जरूरी सामान ही लेना और वही सामान लेकर मुझे तुम कल इसी जगह पर इसी समय मिलना। हमारे साथ तुम हमारे घर चलना और फिर तुम्हें वही रहना होगा। कहीं आने-जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस प्रकार किसी को पता नहीं चलेगा और तुम वहां आराम से रह लोगी। वह इस बात के लिए तैयार हो गई और फिर जैसी की योजना थी अगली सुबह जब मैं प्रातः भ्रमण के लिए निकला तो वापस आते समय मुझे कंचन उसी जगह पर मिली जहां पर हमारी मुलाकात होती थी। उसको लेकर मैं अपने घर आ गया। मैंने उसको धीरे-धीरे घर का काम करने का पूरा सलीका सिखाया। वैसे वह खुद काफी समझदार थी और उसने मेरी बताई गई बातों को बहुत तेजी से समझना शुरू किया। धीरे-धीरे वह घर के कामों में पारंगत हो गई। उसके बाद उसकी पढ़ाई शुरू हुई। मैंने उसे हिंदी और अंग्रेजी के अल्फाबेट्स और उन्हें जोड़कर पढ़ना लिखना सिखाया। उसे गणित की भी थोड़ी बहुत जानकारी हो गई तब उसको दो साल के बाद ओपन स्कूल से दसवीं का इम्तिहान दिलवाया जो वह आराम से सेकंड डिवीजन में पास कर गई। हमारा ऑफिस हमारे अपने बिजनेस का हिस्सा था जिसमें स्टाफ को रखना मेरे ही हाथ में था इसलिए उसकी योग्यता को देखते हुए मैंने उसको अपने यहां परिचारिका के रूप में नियुक्त कर दिया। उन दिनों मेरे ऑफिस में एक नियमित कर्मचारी की जरूरत थी जो ऑफिस के सारे कार्य करें और आने जाने वालों के लिए खाने-पीने और चाय पानी की व्यवस्था देखें। कंचन के अंदर यह सब गुण बहुत निखर कर भरे हुए थे इसलिए उसने बहुत आसानी से कार्य संभाल लिया। इस प्रकार वह हमारे बिजनेस परिवार का हिस्सा बन गई और आज हमारे कार्यालय में सभी उसकी मेहनत ईमानदारी और सेवा भाव की सराहना करते हैं। मुझे पहला दिन याद आता है जब मैं उसको सुबह-सुबह एक घर से निकल कर जाते हुए देखा था और अपने मन में उसको अभिसारिका समझकर उसकी हंसी उड़ाया था। लेकिन मेरा मन संजीदा था और मैं समझ रहा था कि कोई भी व्यक्ति  स्वेच्छा से ऐसे कार्य नहीं करता । हर किसी की कोई न कोई मजबूरी जरूर होती है। इसी बात की तफ्तीश के लिए मैंने उससे बातचीत  करने का रिस्क लिया था और मेरा संदेह सही निकला। उसकी मजबूरियां मेरे सामने साफ निकल कर आई और थोड़े से प्रयासों से उसकी जिंदगी पटरी पर लौट आई। इस प्रकार सारिका सदा सदा के लिए विदा हो गई और आज वह कंचन के रूप में हमारे स्टाफ का एक अनमोल हीरा है। हीरा इसलिए है क्योंकि आज के विसंगतियां भरे जीवन में कोई ऐसा नहीं मिलता जिसके अंदर लोभ लालच, धोखा ना हो और वह कृतज्ञता भाव से सब की सेवा में ही अपना जीवन तलाश करता हो!   हमारी कंचन एक ऐसी कृतज्ञ और कर्तव्य परायण महिला थी।

Saturday 11 2024

बुद्धम् शरणं गच्छामि

 बुद्धम् शरणं गच्छामि 

गौतम बुद्ध ईसा पूर्व 563  में भारत की भूमि पर अवतरित हुए थे । लंबी तपस्या के बाद उन्होंने भारत को अष्टांगिक मार्गों का विचार दिया जिसके आधार पर संसार सागर से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। उनके इस सिद्धांत को इतनी स्वीकृति मिली कि यह धर्म बन गया और जैसा कि हम जानते हैं कि धारयति इति धर्म:, इस प्रकार इसमें धारण करने की क्षमता थी, उन विचारों की शक्ति थी और भारतीय जनमानस 

ने उन विचारों को स्वीकृति दी जिसके बल पर यह चमत्कार भारत में घटित हुआ। ईसा पूर्व 364 ईश्वी में कालिंग की लड़ाई के उपरांत सम्राट अशोक ने बुद्ध धर्म को स्वीकार किया। सम्राट ने अपनी तलवार रख दी और अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को श्रीलंका और मालाया  देशों में धर्म  प्रचार प्रसार के लिए नियुक्त किया । बुद्ध के  अन्य अनुयाई भारत की सीमाओं से लगे देशों में जाकर उनके सिद्धांतों के बारे में प्रचार प्रसार करने लगे। इस प्रकार बुद्ध का धम्म चीन, जापान कोरिया, मलेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड, जैसे देशों तक पहुंच चुका था ।यह वही समय था जब भारत में चारों ओर मानवता भाईचारा शांति और समरसता का विचार प्रवाहित हो रहा था। इस दौरान भारत के अपने भूभाग के अंदर शिक्षा का इस कदर विस्तार हुआ जिसमें विक्रमशिला तक्षशिला, बोधगया काशी जैसे स्थान शिक्षा के बड़े केंद्रों के रूप में उभरे और देश-विदेश से लोग यहां आकर इस भूमि की भाषा का अध्ययन करके यहां के धम्म और समाज को  समझ कर अपने देश गए और वहां पर पुन: धर्म का प्रचार किया। जिससे भारत के बाहर बुद्ध धर्म की जड़े गहरी होती चली गई ।यह यह वही समय था जब भारत में अन्न और दूध की नदियां बहती थी। व्यापार और व्यवसाय चरम पर था और भारत सोने की चिड़िया के नाम से दुनिया के अन्य देशों में मशहूर हो चुका था। बुद्ध का धर्म भारत माता के शरीर की अस्थि मज्जा में समाकर उसके दिल में प्राण बनकर हृदय का स्पंदन बन चुका था। भारत की इसी ख्याति ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी  ओर आकर्षित किया। पांचवीं - छठी शताब्दी में भारत में भगवान श्री आदि शंकराचार्य के उदय से लंबे समय से सुषुप्ति के कगार पर पहुंच रहे हिंदू धर्म एवं दर्शन के

पुनर्जागरण की आंधी चल पड़ी। भगवान श्री आदि शंकराचार्य के अथक प्रयासों से भारत में हिंदू धर्म का विकास होना आरंभ हुआ। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि तब तक बुद्ध धर्म के संघारों में बुद्ध के धर्म गुरुओं में वैचारिक मतभेद और संघर्ष चलने लगे थे। आपस में फूट भी पढ़ने लगी थी। जिसके कारण धीरे-धीरे बुद्ध धर्म का प्रभाव आम जनमानस में कम होता चला गया । इस संपूर्ण विवरण पर संदर्भ   विद्वत जनों के विचार, शोध पत्र और बातचीत तथा अन्य तथ्यों को देखा जा सकता है।  भारत में उस अमन चैन के युग में जब यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था तब यहां के धर्म प्राण हुक्मरानों,  बुद्ध के अनुयायियों और हुनरमंद कारीगरों ने इस भूमि पर कई आश्चर्यजनक निर्माण कर डाले जिसमें बुद्ध धर्म के पहचान चिन्हों जैसे स्तूप, संघार जिन्हें  हम पूजा घर के नाम से समझ सकते हैं और उनके अनुयायियों को रहने के लिए बड़े-बड़े धर्म स्थलों का कलात्मक विकास किया गया जो तत्कालीन उपलब्ध वास्तुशिल्प की जानकारी के आधार पर बनाया गया था । यह ध्यान देने की बात है कि निर्माण कार्यों को बाद में आक्रांताओं के द्वारा ध्वस्त करने के बहुत से प्रयास किए गए जिसके कारण उनका स्वरूप बिगड़ गया लेकिन फिर भी यह बात चौंकाने वाली है कि जहां भी उन ढांचों के अवशेष अथवा  ढांचे पूर्ण रूप से सुरक्षित है उनकी स्थिति अब भी उतनी ही अच्छी है और वो उतने ही मजबूत है जिससे यह पता चलता है कि उनका निर्माण उत्कृष्ट कारीगरी का नमूना रहा है और उनकी जगह पर खड़े होकर अगर उनकी कल्पनाओं को साकार रूप मैं देखने का प्रयत्न किया  जाए तो उसके सौंदर्य को निहारने से आंखों को सुकून मिलेगा। धर्म के प्रति आस्था और उन जगहों से जहां बुद्ध ने जाकर भारत में उपदेश दिए थे उन जगहों को देखने के लिए निहारने के लिए हाथों से छूने के लिए बुद्ध को एक मोमबत्ती जलाकर अप्पदीपोभव का संदेश दुनिया में जीवित रखने के लिए पूरे विश्व  के अलग-अलग कोने से लाखों की संख्या में अनुयाई भारत आते हैं और वह सारनाथ, बोधगया, कौशांबी सहित अन्य स्थानों पर जाकर भगवान बुद्ध के चरणों से स्पर्श की गई भूमि की धूल को अपने माथे से लगते हैं। 

बुद्धम् शरणं गच्छामि 

संघम् शरणं गच्छामि 

धम्मम् शरणं गच्छामि।।।

Sunday 14 2024

समझना क्या,समझाना क्या!

 लोगों का जीवन से चले जाना 

बहुत सारे अर्थों के साथ 

एक अर्थ यह भी रखता है कि 

जिंदगी के बहुत से दरवाजे

 जो उनसे निस्बत रखते थे

 वो भी बंद होते चले जाते हैं ।

किसी का पता चलता है , 

किसी का पता नहीं भी चलता 

किसी का पता वक्त आने पर चलता है 

माता-पिता का जाना सबसे बड़ा जाना है

 दुनिया के कई दरवाजे

कैसे पिता के जाने के बाद

 बंद हो जाते हैं

 कितने दरवाजे मां जाने के बाद 

बंद हो जाते हैं ।

उन दरवाजों की चाबियां 

जाने वालों के साथ चली जाती है ।

 कहते हैं दुनिया बहुत बड़ी है , लेकिन

इस तरह अपनों के जिंदगी से 

चले जाने के बाद दुनिया 

छोटी होने लगती है।

 छोटी होते होते दुनिया

 इतनी छोटी हो जाती है कि

 आदमी के जीवन से आनंद 

गायब ही हो जाता है।

चला जाता है

हां, यह अलग बात है कि 

ये दुनिया आनी जानी है 

सभी जानते हैं 

सभी एक दूसरे को ढांढस भी देते हैं लेकिन यह मन ही तो है 

मानता कहां है ,

किसकी सुनता है !

सही बात तो ये है कि

बहुत खूबसूरत सी इस दुनिया की सुंदरता 

उन अपनों से ही तो होती है 

जिनके होने से सुबह में चमक 

सूरज में आग , चांद में चांदनी और शीतलता होती है ,

हवाओं में संगीत होता है ,

आदमी के मन में हर्ष होता है और -

बाजुओं में ताकत !

जब सूरज से तपिश और चमक चले जाएं

 रातों से चांद अपनी चांदनी लेकर 

चला जाए 

सुरमई रातें स्याह और डरावनी होने लगें 

तब क्या सीखना सिखाना क्या ?

समझना क्या , समझाना क्या?

दिल के दर्पण टूटे

 रातें कुछ अंधेरी हो गई थी जिन दिनों 

चारों तरफ डर था

डर का आलम था

मेरे हाथों में कुछ अवांछित चीजें 

चिपक गई थी 

जिसके साथ रहने को अभिशप्त, मैने 

अपने दोस्तों के दरवाजे पर दस्तक दिया कुछ इस तरह कि

 उनके दिल के दर्पण दरक गए, और 

हर दर्पण में मेरी तस्वीर

 खंडित होती रही

इस तरह, हुआ कुछ यूं कि

मेरा चेहरा नहीं रहा अब 

वहां अब टूटे हुए आईने की कुछ किरचें हैं

 उनमें कुछ धुंधली सी परछाइयां हैं मेरी

मेरे दोस्तों को गम है कि 

उनके दिल के शीशे टूटे

 गम मुझको भी है कि मेरा अक्स

अब वहां नहीं होता।

मुबारक हो मेरे दोस्तों तुम्हें तुम्हारा गम

मुबारक हो मुझे भी गम मेरा 

सलामत रहो तुम यह दुआ है मेरी

 तुम दुआ करो कि मैं भी सलामत रहूं

 मिले जब कहीं तुम हम

तो आंखों में कुछ और रहे ना रहे 

बस एक चाहत रहे

मुस्कुराहट रहे।

Friday 12 2024

मैं ईश्वर हूं

 एकोब्रह्म विश्वरूपम्

-------------------------


मैं ईश्वर हूं

अहम् ब्रह्मस्मि 

जो मुझमें है

ब्रह्माण्ड में भी वही है

यत्पिंडे तद्ब्रहमांडे

ये संपूर्ण ब्रह्मांड एक है

धरती के हर कोने पर हर रोज

उसी एक का जन्म और मरण होता है

वहीं उदित और अस्त होता है

धरती पर सजे रूप,रस, गंध पुष्प और फल

वही भोग लगाता है

हवाएं उसी के बदन को प्रेम पूर्ण स्पर्श से

रिझाती हैं

धूप में दग्ध होती है उसी की देह

मेंह में वही बरसता वही भीजता है

समंदर में बादल में हवाओं में

 वही चलता गोते लगाता है

पुष्प बन स्वयं वहीं अपना श्रृंगार करता है

सुख में प्रफुल्लित वहीं है

तो दुःख के दाह में दग्ध भी वही है

वो एक मानव देह है

उसमें अस्सी बिलियन न्यूरान्स की तरह

दुनिया के हर अवयव 

न्यूरोट्रांसमीटर के जैसे हैं

मानव, पशु, पक्षी 

हर जीव जन्तु पादप पल्लव 

कीट, पतंगें, तितली ,भौंरे 

विज्ञान, अध्यात्म और सच्चाई के धरातल पर सच एक ही है

ओम्

ओम् पूर्णमस्ति

 पूर्णात पूर्णमादाय

 पूर्णमेवावशिष्यते 

ईश्वर एक है

ये संपूर्ण ब्रह्मांड एक है

पूर्ण, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वगुणसंपन्न

वो एक ही हैं

तुम, मैं,ये,वो, पूरी दुनिया

हम उसी एक के हाथ पांव हैं

एक विराट के रुप,उसी केअंग प्रत्यंग हैं

ब्रह्माण्डीय रसायन (कास्मिक रसायन) के अनुसार

समस्त ब्रह्माण्ड एक इकाई है 

तुम ईश्वर हो

मैं ईश्वर हूं

हम सब ईश्वर ही हैं।

-----मोहन धनराज

 मायापुरी कॉलोनी

 झूसी प्रयागराज

पिन- 211019

मेरे राम

 अपने राम को मैं जानता हूं

---------------------------------


अपने राम को मैं जानता हूं

 मेरी उनकी जन्म-जन्मांतर की पहचान है

मेरे राम मुझ में रहते हैं

 रिश्ता मेरा उनका आदि अनंत कल से 

अयोध्या नरेश दशरथ नंदन 

राम होने से पहले भी

 वो मेरे राम है

दशरथ के घर जब बजी बधाई

 नामकरण की बेला आई 

तब तुमने ही मेरे राम का नाम उन्हें दिया वो दशरथ नंदन कहलाए

 मेरा उनका रिश्ता जनम जनम का

पंचमहाभूत से निर्मित इस काया में जब-जब राम समाये

तब तब तुमने खींची मर्यादाओं की रेखा

मर्यादा ही कह कर तुमने 

सीता माता को वनवास कराया

सीता के बिना राम रहे

जैसे देह निष्प्राण रहे

ऐसी कितनी मर्यादाएं कितने बंधन बांधे

लिया राम का नाम, अपने स्वारथ साधे

पिछले कई जन्म पहले की बात है 

तब मैं ईसा, सरमद,सुकरात हुआ,

तब मैं हुआ कबीर 

ये सिलसिला अनंत है 

आगे भी चलता रहेगा 

यूं ही हम जन्मते रहेंगे 

उनका मेरा साथ जन्म-जन्मांतर का है जन्म-जन्मांतर से वो मेरे साथ आते रहे हैं आते रहेंगे 

मेरे राम मेरे हैं 

मैं उन्हें जानता हूं पहचानता हूं।

ख्वाब की रात

 ख्वाब की रात 

-----------------

उसने कहा

हम सूरज की तरह उगेंगे

इस उम्मीद पर मैं

सूरज की तरफ चलता रहा तमाम रात

राह में गांवों की पगडंडियां, पर्वत

नदी, जंगल नज़र आते रहे

फूलों की वादियां भी मिली

रंग-बिरंगे फूलों से सजी

हवाओं को सुवासित करती हुई

भोर का तारा मिला

उसे भी किसी का इंतजार था

कुछ दूर तक मेरे माथे का तिलक हुआ

भोर के आने के साथ

तुम्हारे आने की महक आने लगी

फिर सूरज का रथ निकला

सात घोड़ों की वल्गाएं 

हाथों में पकड़े सूरज के चेहरे में

तुम मुस्कुरा उठीं

कुछ इस तरह बसर हुई आज की रात

कुछ इस तरह सहर हुई ख्वाब की रात

समद्रृष्टि

 सूरज की किरणों के सात रंग 

यह क्या कमाल है कि

 उन किरणों में कौन सा रंग 

कहां है आप पहचान नहीं सकते 

सूरज की किरणें धरती पर पड़ती है 

धरती पर पड़ी हर वस्तु के रंग अलग-अलग हैं

 यह क्या कमाल है कि हर वस्तु

 अपने ही रंग में दिखती है 

सूरज अपने रंगों को किसी पर

 नहीं थोपा देता

 यह क्या कमाल है कि

 धरती पर पड़ी हर वस्तु 

अपने रंगों में निखर निखर जाती है

 चमक चमक जाती है!

यही है प्रकृति की समदृष्टि!!

रिश्तों को नींद में चलने की बीमारी है

 रिश्तों को नींद में चलने की बीमारी है

तुम हो या मैं बचा कोई नहीं अब जैसे

इन हवाओं ही में अजब सी खुमारी है

रिश्तों को नींद में चलने की बीमारी है....

रोज मिलते हैं बात होती है

प्यार होता है रार होती है 

फिर याद कुछ नहीं रहता 

कोई अजब सी बेकरारी है

रिश्तों को नींद में चलने की बीमारी है...

हमसफ़र के संग हम सफर में रहे

चलते फिरते या अपने घर में रहे

हमारे बीच कोई अजनबी भी रहा

दिल मिल न सके ये कैसी यारी है

रिश्तों को नींद में चलने की बीमारी है...

हम तो तनहा हैं दिल भी तनहा हैं 

जिस्म तन्हा है रूह भी तनहा हैं 

शजर कोई हो दिल कहीं नहीं लगता

दिन में सुकून न मिले बेचैन रात सारी है

रिश्तों को नींद में चलने की बीमारी है..…

(चित्र साभार फेसबुक)

किस्मत की बात

 ये किस्मत की बात थी -

उस जंगल के सनसनाते 

नि: शब्द अंधेरे में

एक दिव्य प्रकाश हुआ

एक मधुर संगीत बज उठा

राजा ने रानी को 

रानी ने राजा को देखा

और किसी ने किसी को नहीं देखा

तब मैंने कहा - "ये कैसे ?"

तब तुमने समझाया

जैसे तुम हो मैं हूं वैसे ही 

फिर जैसे मैं अपनी तन्हाईयों में

तुम से मिली

और मैंने तुमसे मिलकर अपने आप को

आबाद किया,

अपने वजूद को तुममें बिखेर कर

स्वयं से मुक्त हो गई

वैसे ही वो दोनों अपने आप से

 मुक्त हो गए

ऐसा कह कर तुम चली गई।

मैं रात के दो बजे 

अपने कमरे के अंधेरे से

अपने वजूद केअंधेरे में उतर गया

मैंने देखा

वहां एक परिपूर्ण स्त्री रहतीं हैं

उसके अस्तित्व के साथ

 मैं भी पूरा हो जाता हूं

मैं अकेला कभी पूर्ण पुरुष

कभी पूरी स्त्री हो जाता हूं

कोई तस्कीन सा दिला जाता है

एक सुकून भरा अंधेरा उजाला

मेरे आस-पास रहता है

सड़क पर चलती गाड़ियों के स्वर में

बारिश की टपकती बूदों में 

एक संगीत सा उभरता है

मैं अब सोचता हूं

तो देखता हूं कि कैसा विचित्र सपना है

सपना है या हकीकत है

समझ में कुछ नहीं आता 

एक सुकून सा होता है

तुम यहीं मेरे साथ साथ रहती हो

इक यकीन सा होता है!

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...