स्त्री मन अथाह
नापना चाहा,
कई बार गुजरा
उसके पास से दूर से
आर-पार भी हुआ
ईमानदारी से बेईमानी से भी
मगर
वहां कब कौन सी भंवर आएगी
कौन सा तूफान उठेगा
वो कब समंदर बन जाएगी
कब लहर, झरना, और
नदी,पर्वत जंगल
या फिर सुबह का सूरज
तपती दुपहरी
पूनम या शरद की चांदनी बन जाएगी
कुछ समझ नहीं पाया ।
एक बार तो लगा कि जैसे बहुत कुछ समझ गया
फिर तभी मौसम बदला
मोगरे की तरह हंसी के फूटते झरने
खिज़ाओं के दरख्त बन गए
जहां बहार के नामों निशान नहीं ,
तब मैं फिर से कहता हूं
स्त्री मन अथाह
पुरुष बनकर कभी नहीं
समझ सकते!
नहीं, ईश्वर को समझ नहीं सकते
हां, भक्ति से उसको
पाया जा सकता है जैसे -
वैसे ही
नाम, रूप में आकर
बहन, बेटी मां बनकर
जब वो एक भाव में आ जाती है तब
उसे समझ सकते हैं ।
स्त्री - हमारे जीवन में
ममता, प्रेम लालित्य
और सौंदर्य का भंडार है
आशा, विश्वास और
ममता की ठंडी छांव है
शक्ति, सामर्थ्य और
हिम्मत का पहाड़ है
तब मैं फिर से कहता हूं
स्त्री मन अथाह
पुरुष बनकर कभी नहीं
समझ सकते!
भ्राता, पिता, पुत्र या पति की तरह देखो
जिंदगी आसान हो जाएगी।
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