Sunday 16 2026

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं 

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वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है 

मैं उसी पल की बात करता हूं,

मैं तुम्हारी हमारी जिंदगी की बात करता हूं।।

खुदाया आज की रात रुक जा, न जा, फना हो जाऊंगा

हाथ छूटेगा जिस पल मैं उस पल की बात करता हूं।।

एक पल की जिंदगी क्या होती है तुम क्या जानो 

 एक नज़र पे वार दी जां जिसने, मैं उसकी बात करता हूं।

वो सब में रहता है, सभी जानिब है भी लेकिन 

जो ये नहीं मानते मैं उनकी बात करता हूं।।

चलो मान लो ये दुनिया भी नहीं ये आसमान जमीं भी नहीं 

फिर वो कौन है जो होता है मैं उसकी बात करता हूं।।

Monday 06 2026

रात रात भर जाग जाग कर

 यूं रात रात भर 

जाग जाग कर 

करवटें बदल बदल कर 

जाने क्या बिसूरते रहते हो

कभी मुझसे कहो

मैं घर हूं तुम्हारा

अपनी छत और दीवारों में 

खिड़कियों पर्दों में 

तुम्हारे लिए 

मैंने बचा के रखी हैं

सब से गहरी नींदें

चैन- ओ- सुकून 

तुम सब ले लो और 

सो जाओ 

एक गहरी नींद 

जिसमें सपनों को भी 

आने की इजाज़त न हो

मैं तुम्हें ऐसे अपने पहलू में

देखना चाहता हूं 

आराम की नींद 

सोते हुए 

मैं घर हूं तुम्हारा 

 यूं रात रात भर 

जाग जाग कर 

करवटें बदल बदल कर 

जाने क्या बिसूरते रहते हो

मुझे अच्छा नहीं लगता 

मैं घर हूं तुम्हारा 

कभी मुझसे भी बातें करो

यूं तो मैं बहुत खुश हूं 

तुम्हारे बच्चो की किलकारियों में 

तुम्हारी पत्नी की छनकती पायलों में 

उनके हाथ से बने

पकवानों में 

मैं दिन भर के किस्से 

तुम्हारे बच्चो के खेल, 

शैतानियां,

तुम्हारी मालकिन की

प्यार भरी डांट डपट

मनुहार और प्यार 

बहुत कुछ तुमसे 

बताना चाहता हूं 

तुम कभी मेरी तरफ

देखो, मुझसे बातें करो

तुम्हें मैं बहुत कुछ बताना चाहता हूं 

मेरे पास तुम्हारे लिए 

बहुत सी मुस्कान और 

ठहाके हैं 

तुम्हारी ही अमानत हैं 

तुम्हें ही लौटाना चाहता हूं 

कभी तुम मुझे एक नजर 

देख लिया करो 

मेरे जिस्म के कोने कोने में 

दर्ज हैं तुम्हारे बच्चों की

बदमाशियां 

तुम्हारी पत्नी के हाथों के

कोमल स्पर्श 

मैं वो सब भी तुम्हें देना चाहता हूं 

मैं घर हूं तुम्हारा 

तुम्हारे लिए मैंने 

बचाकर रखी हैं 

निरापद सुरक्षा 

कभी मेरी तरफ देखो

मुझसे बातें करो

तुम्हें मैं अपने आगोश 

में ले कर 

तुम्हारा सब कुछ तुम्हें लौटाना चाहता हूं 

मैं घर हूं तुम्हारा!

मन

 मन

दुनिया की मुश्किलों से हारा

एक बेचैन परिंदा है 

जिसे सुख कहते हैं 

उसे ढूंढता 

हर शय में उसे ही देखता 

ये नहीं, वो नहीं 

नहीं नहीं इनमें से 

कोई नहीं 

कल ही अच्छा था 

अब आजकल तो 

कुछ भी अच्छा नहीं लगता 

हां, हो सकता है 

आने वाले दिन अच्छे हों

इन्हीं जोड़ जुगत में 

सब से सुनहरा आज का

दिन भी हाथों से 

ये फिसला, वो गया

वो आज के सूरज की पहली पहली किरण 

सोना बरसाती हुई निकल गई 

हवाएं महका कर चली गई पूरी कायनात 

पंछियों ने उसका स्तुतिगान गाया

सबने अपने अपने हिस्से का सुख पाया 

एक हमारा मन

दुनिया की मुश्किलों से हारा

एक बेचैन परिंदा है 

ढूंढता ही रहा उसे

सुख कहते हैं जिसे

वो कहीं न मिला

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बचपन में

 बचपन में 

जिम्मेदारियों का बोझ था 

उन दिनों में 

दादी की सूनी उदास आंखों ने

जब अपने लिए मुझमें 

उम्मीद की किरण देखा,

मुझमें वो समझ न थी ।

अब जब वो सूनी आंखों के चित्र ज़ेहन में उभरते हैं 

एक हूक सी उठती है ।

कुछ कर न सकने का दुख तो अपनी जगह है ,

दादी की उम्मीद भरी आंखों से आंखें नहीं मिला पाता  

इस दुख का क्या करूं ?

 कम समझ

या ना समझी में 

जिम्मेदारियों का पूरा 

न हो पाना

जब खटकता है,

खटकती हैं वो बातें 

जब दोस्तों की नेकियों के बदले

अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके थे,

सोचता हूं कि ईश्वर 

तुमने इतनी समझ तो दी होती ।

और अब जब समय बीत गया है, 

खाली समय ही समय है 

तो ये सभी चित्र 

बारी बारी से आते हैं 

और अपना हिसाब मांगते हैं ,

रीते हाथ हजारों सवाल 

पीछा करते हैं ,

मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है!

लड़कियों

 लड़कियों 

खुले आकाश में अगर 

उड़ना चाहती हो

चाहती हो असीमित आसमान, तो -

अपने पिता को भरोसा दो

मां को दो विश्वास 

भाई को आश्वस्ति दो

कि तुम अपने स्वत्व को

स्वाभिमान को

और पारिवारिक मूल्यों को 

लेकर घर से बाहर 

जा तो रही हो

इसे ऐसे ही वापस लाओगी 

तुम आधी अधूरी नहीं 

अपनी संपूर्णता के साथ 

बाबा के घर की दहलीज के अंदर आओगी

तुम नहीं जानती कि

नारी की आजादी के

गुमराह करने वाले 

नारों में लंपटों की साज़िशें शामिल हो जाती हैं धीरे से 

तुम्हारे साथ छल कर के

निकल जाती हैं

शादी, नौकरी, धन दौलत के झांसे

शराफ़त के चोले 

मासूमियत भरे चेहरे 

कई रूपों में 

तुमको मिलेंगे 

तुम भ्रमित न होना

लालच लिए भेड़िए भी 

मिलेंगे 

तुम इन सब से बचते 

बचाते अपने लिए 

उस आकाश की तलाश से डिगना नहीं 

वरना, करे चाहे कोई भी इल्जाम तुम पर ही आएगा 

इसलिए -

लड़कियों तुम 

सावधान रहना!

लोकगीत

 [27/08/2025, 12:01] mohandhanraj1509: मोरा सईंयां अनारी अब का करी

हाय दिल की बीमारी अब का करी

सोने के थारी में जेवना परोसा

जीमैं ना अनारी अब का करी 

मोरा सईंयां अनारी अब का करी

बार बार हमसे पानी मंगावै

घूंटै ना अनारी अब का करी 

सेजिया पर चंपा की चादर बिछाया 

सोवै ना अनारी अब का करी 

लौंगा इलायची का वीरा लगाया 

चाबै ना अनारी अब का करी 

मोरा सैया अनारी अब का करी

लगी दिल की बीमारी अब का करी।।

[27/08/2025, 12:35] mohandhanraj1509: ई सौतन जिउ के जवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया

रोज-रोज आवे का वादा करत है

हमसे मिलै का इरादा करत है

 नहीं आने का कोई सवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया

रहिया तकत मोरी सूनी नजरिया 

 गुलरी के फुलवा भए सैया संवरिया 

सौतन कै नगरिया गुलजार हो 

मोरी सूनी सेजरिया

हमरी सेजरिया में कांटा लगत है

सौतन कै सेजरिया बवाल हो

 मोरी सूनी सेजरिया

ई सौतन जिउ के जवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया।

जब कोई बद हवासी में जीता है

 कविता: जब कोई बद हवासी में जीता है 

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जब कोई बद हवासी में जीता है 

जिंदगी जो कि अमृत है 

बना के जहर 

 घूंट घूंट पीता है

जब कोई बदहवासी में जीता है ।

ये दुनिया एक सराय है हम सभी मुसाफिर हैं वह इसे घर समझता है जो छूटे तो वही 

जार जार होता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।

 यह रेल का सफर 

मुसल सल है

 हम सभी मुसाफिर हैं हर मुसाफिर को समझकर अपना 

लिपट लिपट के रोता है जब कोई बदहवासी में जीता है ।।

जिंदगी के लिए सब जरुरी है 

इसलिए सब ले आए फिर सबसे ऊब गए छोड़ आए

 हर बार कुछ छोड़ा कुछ रीता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।

बहुत जिद्दी था

 जन्म से पहले मैं बहुत जिद्दी था।

जब ब्रह्मा ने मुझसे कहा 

तुम्हें धरती पर जाना है,

मैंने तुरंत एक शर्त लगा दी,

मैंने कहा मैं धरती पर तभी जाऊंगा जब आप मुझे, ये धरती और पूरा ब्रह्मांड सौ साल की लीज पर दे देंगे!

उन्होंने मुझे आश्चर्य से देखा और पूछा - 

"इन सौ वर्षों का तू क्या करेगा रे?"

मैंने कह दिया 

ये जो आप ने धरती पर 

इतने व्यूह रचा रखें हैं 

मुझे उन सारे तिलिस्मों को तोड़ना है!

वो हंसे और बोले

"तू इतनी सी जान 

कैसे कर पाएगा ऐसे काम?"

मैंने कहा जब आप कहते हैं कि"तू मेरा ही अंश है, तो नन्हीं सी जान मैं कैसे हुआ? 

मैं तो आप की छवि हूं, मैं ब्रह्म हूं!"

और जब आप की शक्ति से सब कुछ है तो, 

मैं वो सब करूंगा जो आप करते हैं।

तब उन्होंने कहा -

"मेरे तिलिस्मों को तोड़ने वाले बहुत मार खाते हैं "

मैंने कहा 

वो भी कर के देख लीजिए 

उन्होंने हंस कर कहा "चल ये भी सही, 

तू कर मैं देखता हूं"

मैंने भी कह दिया मंजूर है 

तब ब्रह्मा बोले

"जा, तुझे ये धरती आकाश और पूरा ब्रह्मांड सौ साल के पट्टे पर दिया !"

तब मैं अपनी जन्मदात्री के गर्भ में समाया

और अब धरती पर मैं वो सब उपद्रव करता हूं, जिसको मैंने मिटाने का वादा किया था,

मैं मनुष्य हूं ,

मुझे धरती पर भेज कर अब ब्रह्मा भी परेशान हैं!!

गंगा में नहाने आए हैं

 गंगा में नहाने आए हैं 

मैया के दीवाने आए हैं 

दिल में हैं उमंगे बड़ी बड़ी

धूप दीपक जलाने आए हैं 

तीरथ पावन है प्रयागराज 

गंगा यमुना सरस्वती के 

संगम में हम 

डुबकी लगाने आए हैं 

एक हररियाली एक धवल धार 

गंगा यमुना सरस्वती को

हम दुग्ध पुष्प और दीपदान कर 

अपना जीवन बनाने आए हैं 

तीरथ प्रयाग के कोतवाल

गंगा मैया पखारे जिनके चरण 

बड़े बजरंगबली के पावन चरणों में

हम माथा झुकाने आए हैं

ये काया है माया

 बचपन में रुई के से फाये से बनी पूरी कलात्मक दुनिया मां-बाप के प्यार से लबालब उफनाती हुई सी, फूलों और तितलियों के पीछे भागते कब की फुर्र से निकल गई ! किशोर वह उससे भी कोमल और थोड़ा-थोड़ा संवेदनशील लेकिन अपने आप को लेकर काफी सजग और उत्साहित! जिंदगी के इंद्रधनुषी रंग इसे बेहद खूबसूरत बना रहे थे। लुका छुपी करते, कभी कोई अच्छा लगने लगता तो उसको आते जाते हुए देखना ही भला लगने लगा था लेकिन कुछ समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। ऐसे ही कुछ सपने देखने के संदेश देकर वह उम्र भी चली गई। जवानी में कदम रखे तो ऐसा लगता था कि पैर जमीन पर और हाथ आसमान में कोई भी तारे कभी भी तोड़ लेंगे ! जल्दी भी क्या है अभी नहीं तो कभी भी !!

इस बहुत खूबसूरत सी जिंदगी में आईने के सामने खड़े होकर अपने आप को टकटकी लगाए देखना, कभी दाहिने से कभी बाएं से , कभी ऊपर से नीचे तक कभी कॉलर टाइट करना, कभी बेल्ट ठीक करना ! क्या गजब जमाना था और हेयर स्टाइल का तो कहना ही क्या! ऐसे झटको कि जुल्फें पीछे की और आकर करीना से लग जाए ! हां, हमारे बड़े बूढ़े यही तो कहते थे कि यह क्या जुल्फी रख लिया है आवारा बनना है क्या ? इसे कटवा क्यों नहीं देते ? वो हमारे सबसे बड़े दुश्मन दिखाई पड़ते थे और अपने को यह कायनात और यह अपना शरीर कुदरत का करिश्मा लगता था।

अब ऐसे ही अचानक एक अजीब सी बात हुई और किसी डॉक्टर ने कहा कि अपने शरीर का सीने का एक्सरे करा कर ले आओ। एक्सरे कराया जब , तो उसमें देखा सीने में पसलियां, दो फेफड़े श्वास नली भोजन नली! यह तो पहचान में आ रही थी इसको देखकर कुछ अच्छा नहीं लगा । ऐसा लगा कि यह शरीर जिससे इतनी मोहब्बत हम करते हैं यह है क्या! मशीनी पुर्जों की तरह से असेंबलिंग की गई एक मशीन ही तो है। बड़ा अच्छा था जब हमने नहीं देखा था कि ये शरीर अंदर से ऐसा होता है । तब ऐसे लगता था जैसे शक्ति, सौंदर्य और बुद्धिमत्ता के साथ बना हुआ यह शरीर दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना है। ऐसा लगा जैसे एक पल के लिए कोई बहुत बड़ा तिलिस्म था जो टूट गया! हो सकता है ऊपर वाले ने हमें इस लायक समझा हो कि अब हम वास्तविकता को समझने के काबिल हो रहे हैं इसलिए इस समय एक्सरे कराने का आदेश दिया। उसके बाद तो फिर धीरे-धीरे शरीर के अंदर फिट किए गए कल पुर्जों की पूरी कहानी देखने और समझने को मिलने लगी। हां कुछ दिन के लिए मन सोच में पड़ गया कि काश यह शरीर ऐसे अंगों पुर्जों की असेंबलिंग ना होती! बस यह जिस्म होता ये कायनात होती , हम होते और हमारी सुंदर कल्पनाएं । लेकिन समय के साथ-साथ परिपक्वता के आने पर अब अत्यंत बुद्धिमानी के साथ संपूर्णता के स्तर तक जाकर बनाए गए इस कल पुर्जे को देख और समझ कर इस बात का एहसास हुआ है कि ये कुदरत का करिश्मा ही तो है ! हर हाल में यही हमारे सपनों की दुनिया देखने का जरिया है, यही हमें कायनात से ईश्वर तक ले जाने का भी माध्यम है।

हां,ऐसा हो सकता है

 हां,ऐसा हो सकता है 

क्यों नहीं हो सकता?

ये ब्रह्माण्ड 

कभी नहीं बना 

ये ना तो कहीं से आरंभ होता है 

ना कहीं खत्म

इसके लिए समय शब्द अर्थहीन है 

क्यों कि इसपर समय 

कोई छाप नहीं छोड़ता 

इसका ना कोई कर्ता है 

ना ही ये किसी की कृति है 

ये अनंत सर्वकालिक सर्वव्यापी है अथाह और अपरिमित 

ऊर्जा का श्रोत जिससे 

सबकुछ संचालित है 

ब्रह्माण्ड में अनंत ग्रह, नक्षत्र, तारे 

आकाश गंगाएं 

इस धरती जैसी कितनी धरती 

उन पर ऐसे ही कितने जीवन 

पलते होंगे जैसे -

इस धरती पर

जिसपर हम रहते हैं ।

हां, ऐसा हो सकता है 

क्यों नहीं हो सकता?

ये अनंत अथाह और अपरिमित 

ब्रह्माण्ड एक धरती 

एक आसमान एक सूरज एक चांद एक धरती पर कुछ लोग वनस्पतियां और ये सौंदर्य की रचना करके , क्या रुक गया होगा? 

मनुष्य का मन मस्तिष्क और उसकी शक्तियां इतनी कैसे हो सकती है जो 

इस तिलिस्म को समझ जाए?

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...