बचपन में
जिम्मेदारियों का बोझ था
उन दिनों में
दादी की सूनी उदास आंखों ने
जब अपने लिए मुझमें
उम्मीद की किरण देखा,
मुझमें वो समझ न थी ।
अब जब वो सूनी आंखों के चित्र ज़ेहन में उभरते हैं
एक हूक सी उठती है ।
कुछ कर न सकने का दुख तो अपनी जगह है ,
दादी की उम्मीद भरी आंखों से आंखें नहीं मिला पाता
इस दुख का क्या करूं ?
कम समझ
या ना समझी में
जिम्मेदारियों का पूरा
न हो पाना
जब खटकता है,
खटकती हैं वो बातें
जब दोस्तों की नेकियों के बदले
अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके थे,
सोचता हूं कि ईश्वर
तुमने इतनी समझ तो दी होती ।
और अब जब समय बीत गया है,
खाली समय ही समय है
तो ये सभी चित्र
बारी बारी से आते हैं
और अपना हिसाब मांगते हैं ,
रीते हाथ हजारों सवाल
पीछा करते हैं ,
मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है!
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