Wednesday 10 2025

महुआ के फूल

 महुआ के फूल 

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महुआ के फूल उत्तर प्रदेश के एक आम गांव की कहानी है। जिस प्रकार हर गांव में भोले भाले लोग बसते हैं , इस गांव में भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाकर उनका शोषण करने वाले लोग भी यहीं रहते हैं। इन्हीं लोगों के कारण गांव की जिंदगी नर्क से भी बदतर होती जा रही है और भारी संख्या में लोग गांव से निकलकर शहरों की तरफ जा रहे हैं। महुआ के फूल कहानी की शुरुआत एक शासकीय सेवक के रिटायर होकर गांव में आ कर बसने पर वह क्या-क्या अपनी नजर से देखते हैं यही से शुरुआत होती है। इनका नाम है सतीश वर्मा। सतीश वर्मा रोज की तरह सुबह टहलने जाया करते हैं। इधर गांव में आकर जब उन्होंने अपनी दिनचर्या शुरू की तो पहले दिन ही उनका साक्षात्कार एक घटना से हुआ। मिस्टर वर्मा टहलने के लिए एक बाग से होकर निकलते हैं जहां शालू नाम की एक लड़की सुबह-सुबह महुआ बीनने के लिए आई हुई थी। उससे वह थोड़ी सी बातचीत करके आगे चले जाते हैं लेकिन जब वापस आते हैं तो उस महुआ के पेड़ के नीचे बड़ा उपद्रव हो चुका होता है। आसपास बिखरे महुआ के फूल और उसकी डलिया उसके वहां हो चुके

 उपद्रव की कहानी कह रहे थे। मिस्टर वर्मा गांव में फोन लगाकर अनहोनी की खबर देते हैं जिस पर गांव के लोग इकट्ठा होते हैं । आसपास तलाश की जाती है तो लड़की की मां बगल के खेत में बेहोश मिल जाती है जबकि लड़की का कहीं अता पता नहीं चलता। उसकी मां होश में आने पर गांव के प्रदीप और सुरेंद्र का नाम लेती है और बताती है कि रामबरन और लल्लन ने उसके सिर पर चोट किया था जिससे वह बेहोश हो गई इस प्रकार चारों के खिलाफ नाम जद रिपोर्ट दर्ज होती है लेकिन पुलिस की ढीला ढाली में कुछ हासिल नहीं होता। इसी बीच मिस्टर वर्मा को पता लगता है कि गांव के प्रदीप कुमार और

उसके साथी गांव के बाहर बने फार्म हाउस में छिपे हुए हैं। इस में पुलिस भी मिली हुई है। इस पर वर्मा जी को गुस्सा आ जाता है और वर्मा जी अपने हिसाब से इन लोगों को सबक सिखाना चाहते हैं। उन्होंने शहर से अपने एक वकील मित्र की मदद से इन लड़कों को फार्म हाउस से उठवा लिया । उनको शहर में गुप्त स्थान पर रखा और 5 दिन तक भूखा प्यासा रखकर , चेतावनी देकर गांव के सरहद पर छुड़वा दिया। यह दोनों लड़के बेहोश हालत में गांव वालों को सुबह दिखाई पड़ते हैं। इनका इलाज होने पर ठीक होते हैं तब ये अपना बयान देते हैं लेकिन डर के मारे किसी का नाम नहीं लेते। इस मामले में कोर्ट की कार्यवाही भी आरंभ होती है। तब यह लोग पिछली यातना को भूलकर फिर से गवाहों को धमकाने और दबाने में लग जाते हैं। इसी बीच होली का पर्व पड़ता है तो होली के पर्व पर यह लोग आपसी रंजिश में गांव के एक व्यक्ति को मार कर अधमरा कर देते हैं। इस मामले में भी इनका नाम पुलिस के पास जाता है लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती। यह लोग जमानत पर छूट कर यहां उत्पात मचाते रहते हैं।

यह लोग पिछले दरवाजे से रंजिश निकालने के लिए शादी में भी विघ्न डालने की कोशिश करते हैं।  इसका भी खुलासा हो जाता है तो इन्हें गांव के लोग इनको बहुत बुरी तरह मारते हैं और पुलिस के ऊपर कार्रवाई करने का दबाव बन जाता है लेकिन वो लोग टाल मटोल करते रहते हैं।

अब पुलिस के द्वारा उस मारपीट पर भी कोई कार्यवाही नहीं करने पर मिस्टर वर्मा पुलिस से बात करते हैं जिस पर पुलिस का रुख सहयोगात्मक नहीं रहता और वह सलाह देते हैं कि आप सेवानिवृत्ति के बाद शांति से घर में बैठिए। गांव के पचड़े में क्यों फंस रहे हैं। इस बात पर मिस्टर वर्मा के बच्चे भी आपत्ति करते हैं और कहते हैं कि आप शहर वापस चले जाइए। लेकिन मिस्टर वर्मा अपनी जिद पर अड़ गए और उन्होंने कहा कि यह मेरा गांव है और मैं यहां पर होने वाले हर प्रकार के अन्यान्य का प्रतीकार करूंगा और यही रहूंगा। इस प्रकार मिस्टर वर्मा गांव में रहकर उन लड़कों के खिलाफ कार्यवाही कराते हैं। उन लोगों की जमानत कैंसिल हो जाती है और वह वापस जेल चले जाते हैं। गांव में अमन चैन कायम हो जाता है लेकिन यह अनिश्चय फिर भी बना रहता है कि वो लोग छूट कर आएंगे तो गांव में फिर से उत्पात मचाएंगे। मिस्टर वर्मा इस बात से भी नहीं घबराते और वह गांव के लोगों को बुलाकर उन्हें समझाते हैं कि

 शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करने से ही उन्नति हो सकती है और अशांति से उन्नति की बजाय जीवन में अवनति का प्रवेश हो जाता है और हमारी सुख शांति नष्ट हो जाती है। इस बात पर गांव के लोग मिस्टर वर्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि आपने एक बार इस गांव के प्रति अपना फर्ज पूरा करके बता दिया कि आप इस गांव के एक लायक सुपुत्र हैं।

Saturday 06 2025

शब्द ब्रह्म है।

 शब्द ब्रह्म है। 

क्यों? 

क्योंकि जिस प्रकार ब्रह्मा की पूजा नहीं होती उसी प्रकार शब्द की भी पूजा नहीं होती। शब्द और ब्रह्म दोनों पूजा और प्रार्थना से ऊपर होते हैं। हम मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं लेकिन शब्दों में प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह स्वयं ब्रह्म है, सर्वशक्तिमान है । कभी फूलों को सजाने के लिए दूसरे फूल नहीं लगाए जाते क्योंकि हर फूल ईश्वर की शक्ति से संपन्न अपने रंग, रूप और महक के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अन्य फू। इसी प्रकार शब्द की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अन्य शब्दों की जरूरत नहीं होती क्योंकि हर शब्द की अपनी एक ध्वनि है, सुगंध है, शक्ति है। यह ब्रह्म की तरह सर्वशक्तिमान, कालातीत और सर्वव्यापी है। शब्द शक्ति है। शब्द से ही मंत्र बनते हैं। मंत्र से ईश्वर की पूजा, मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा, दीर्घायु की कामना और दुनियावी जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रार्थना और मोक्ष के लिए साधना की जाती है। शब्द हमें गौरव प्रदान करते हैं। शब्द से ही ज्ञान है । ज्ञान से ही मुक्ति है। शब्दों का प्रयोग हमें मनुष्यों में सिरमौर बनता है वहीं अगर शब्द गलत बोले जाएं तो उनका दुष्प्रभाव भी हमें झेलना पड़ता है। इसलिए शब्द का प्रयोग बहुत ही सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। शब्द प्रार्थना और दुआ के लिए होते हैं । शब्द ही अपशब्द बनते हैं और अपशब्द से अघट की संभावना बनती है । शब्द से ही अप्रिय और अनवांछित परिस्थितियां बनती हैं जो हमारे लिए कहीं भी स्वीकार्य नहीं हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम कल्याणकारी शब्दों का अपनी भाषा में समावेश करें। ऐसे शब्दों का प्रयोग ही ना करें जिनके दुष्प्रभाव किसी के जीवन में पड़ सकें। एक बात तो तय है कि जो शब्द किसी अन्य के जीवन में अप्रिय स्थिति पैदा कर सकते हैं उसका प्रभाव हमारे ऊपर भी पड़ना निश्चित है क्योंकि वो शब्द हमारे द्वारा ही बोले जाते हैं । शब्द की शक्ति को समझना और उसे उसी के अनुरूप व्यवहार करने की सलाह शास्त्र सम्मत है। शब्द से ही ज्ञान है, विज्ञान है, जीत है हार है, गीत है संगीत है, कल्याण है, सुख है, संपत्ति है, शांति है, जीवन है और सुख शांति में जीवन है। जीवन मे ईश्वर का वास होता है । हम जानते हैं कि ईश्वर सर्वशक्ति संपन्न सर्व कल्याणकारी शांत सुरम्य और सुरीला होता है। किसी भी प्रकार की साधना में चाहे कोई अन्य उपकरण हो या ना हो सच्चे मन से भावपूर्ण होकर बोले गए शब्द हमें ईश्वर के नजदीक ले जाते हैं। प्रकृति के सानिध्य में ले जाते हैं। प्रकृति ईश्वर और शब्द इन तीनों के मेल से जीवन में सौंदर्य की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शिव, सत्य और सुंदर होता है। हम जानते हैं कि प्रकृति और ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती। उनके पास कोई शब्द भी नहीं होते। ना वह संस्कृत पढ़ते हैं ,ना हिंदी जानते हैं, ना ही उर्दू अंग्रेजी और फारसी की व्याकरण समझते हैं। मनुष्य ईश्वर ही है। बस क्षिति, जल, पावक गगन और समीर को अलग कर दिया जाए तो वह ईश्वर में ही समाहित हो जाता है । जब तक इन पांच बंधनों में आत्मा का वास होता है तब तक उसे शब्द की आवश्यकता होती है। जीवन काल में ही जो लोग अपने को इन पांच बंधनों से मुक्त कर प्रकृति और ब्रह्म की शक्ति के प्रवाह से जुड़ जाते हैं उन्हें शब्दों के प्रयोग की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि जो अध्यात्म में उतरते जाते हैं उनके शब्द कम होते चले जाते हैं। शब्दों का कम होते चले जाना, शांत होते चले जाना आध्यात्म को उपलब्ध होने के संकेत देता है। इसलिए शब्द अध्यात्म की पहली सीढ़ी है और शब्दों की सीढ़ियां चढ़कर अध्यात्म तक पहुंचने के बाद शब्द पीछे छूट जाते हैं। रह जाता है आत्मा, प्रकृति और ईश्वर का एकात्म। इसीलिए कहा जाता है कि ईश्वर एक है और उसी से विघटित होकर शब्द और शब्द से दुनियावी जीवन की उत्पत्ति होती है। दूसरी सीढ़ी ब्रह्म से प्रकृति की ओर जाती है जिसमें शब्द का कोई स्थान नहीं होता। प्रकृति ईश्वर से बिना किसी शब्द के अपने भावों से संवाद करती है और मनुष्य प्रकृति से शब्दों के माध्यम से जुड़ता है। ईश्वर प्रकृति और मनुष्य के इसी तारतम्य को आध्यात्म माना जाएगा। प्रकृति के बहाव के विरुद्ध खड़े होना इन्हीं अर्थों में ईश्वर के विधान को तोड़ने की तरह होता है। जब-जब प्रकृति से मनुष्य का खिलवाड़ बढ़ जाता है तब तब धरती पर विप्लव होता है। ये विप्लव छोटे-छोटे होते हैं जो हम दुनिया में रोज ही घटित होते हुए देखते हैं। भूस्खलन, बाढ़ का प्रकोप, सूखा, भयंकर तूफान और चक्रवात जैसे प्रकृति के विप्लव मनुष्य का प्रकृति के खिलाफ जाने के कारण है जिसका जिम्मेदार स्वयं मनुष्य है।

सनातन संस्कृति के मूल में महाप्रलय का उल्लेख मिलता है । इस महाप्रलय की जड़ में सभ्यता के उच्चतम स्तर तक पहुंच जाने के बाद मनुष्य के उत्पात से क्रुद्ध होकर धरती पर महा प्रलय हुआ था। उसी महाप्रलय के पश्चात एकमात्र पुरुष बच गए थे मनु । मनु के गंधर्व कन्या श्रद्धा से मिलन के परिणाम स्वरूप कुमार का जन्म हुआ । कुमार से ही सनातन संस्कृति के उत्पन्न होकर अपने चरम पर पहुंचने की गाथा आरंभ होती है। इसी गाथा की पूर्णता का परिणाम है आज की सभ्यता और संस्कृति। लेकिन इन सब बातों को जानने के बाद भी मनुष्य फिर से प्रकृति के अविरल प्रवाह में बाधक बनने की गलतियां कर रहा है जो उसे कभी भी मुश्किल में डाल सकती है। अभी समय है कि हम संभल जाएं और शब्द से चलकर प्रकृति के मार्ग से ईश्वर की सानिध्य में जाने के मार्ग का अनुसरण करते रहें। इसी में हमारा कल्याण है निहित।

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...