शब्द ब्रह्म है।
क्यों?
क्योंकि जिस प्रकार ब्रह्मा की पूजा नहीं होती उसी प्रकार शब्द की भी पूजा नहीं होती। शब्द और ब्रह्म दोनों पूजा और प्रार्थना से ऊपर होते हैं। हम मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं लेकिन शब्दों में प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह स्वयं ब्रह्म है, सर्वशक्तिमान है । कभी फूलों को सजाने के लिए दूसरे फूल नहीं लगाए जाते क्योंकि हर फूल ईश्वर की शक्ति से संपन्न अपने रंग, रूप और महक के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अन्य फू। इसी प्रकार शब्द की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अन्य शब्दों की जरूरत नहीं होती क्योंकि हर शब्द की अपनी एक ध्वनि है, सुगंध है, शक्ति है। यह ब्रह्म की तरह सर्वशक्तिमान, कालातीत और सर्वव्यापी है। शब्द शक्ति है। शब्द से ही मंत्र बनते हैं। मंत्र से ईश्वर की पूजा, मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा, दीर्घायु की कामना और दुनियावी जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रार्थना और मोक्ष के लिए साधना की जाती है। शब्द हमें गौरव प्रदान करते हैं। शब्द से ही ज्ञान है । ज्ञान से ही मुक्ति है। शब्दों का प्रयोग हमें मनुष्यों में सिरमौर बनता है वहीं अगर शब्द गलत बोले जाएं तो उनका दुष्प्रभाव भी हमें झेलना पड़ता है। इसलिए शब्द का प्रयोग बहुत ही सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। शब्द प्रार्थना और दुआ के लिए होते हैं । शब्द ही अपशब्द बनते हैं और अपशब्द से अघट की संभावना बनती है । शब्द से ही अप्रिय और अनवांछित परिस्थितियां बनती हैं जो हमारे लिए कहीं भी स्वीकार्य नहीं हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम कल्याणकारी शब्दों का अपनी भाषा में समावेश करें। ऐसे शब्दों का प्रयोग ही ना करें जिनके दुष्प्रभाव किसी के जीवन में पड़ सकें। एक बात तो तय है कि जो शब्द किसी अन्य के जीवन में अप्रिय स्थिति पैदा कर सकते हैं उसका प्रभाव हमारे ऊपर भी पड़ना निश्चित है क्योंकि वो शब्द हमारे द्वारा ही बोले जाते हैं । शब्द की शक्ति को समझना और उसे उसी के अनुरूप व्यवहार करने की सलाह शास्त्र सम्मत है। शब्द से ही ज्ञान है, विज्ञान है, जीत है हार है, गीत है संगीत है, कल्याण है, सुख है, संपत्ति है, शांति है, जीवन है और सुख शांति में जीवन है। जीवन मे ईश्वर का वास होता है । हम जानते हैं कि ईश्वर सर्वशक्ति संपन्न सर्व कल्याणकारी शांत सुरम्य और सुरीला होता है। किसी भी प्रकार की साधना में चाहे कोई अन्य उपकरण हो या ना हो सच्चे मन से भावपूर्ण होकर बोले गए शब्द हमें ईश्वर के नजदीक ले जाते हैं। प्रकृति के सानिध्य में ले जाते हैं। प्रकृति ईश्वर और शब्द इन तीनों के मेल से जीवन में सौंदर्य की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शिव, सत्य और सुंदर होता है। हम जानते हैं कि प्रकृति और ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती। उनके पास कोई शब्द भी नहीं होते। ना वह संस्कृत पढ़ते हैं ,ना हिंदी जानते हैं, ना ही उर्दू अंग्रेजी और फारसी की व्याकरण समझते हैं। मनुष्य ईश्वर ही है। बस क्षिति, जल, पावक गगन और समीर को अलग कर दिया जाए तो वह ईश्वर में ही समाहित हो जाता है । जब तक इन पांच बंधनों में आत्मा का वास होता है तब तक उसे शब्द की आवश्यकता होती है। जीवन काल में ही जो लोग अपने को इन पांच बंधनों से मुक्त कर प्रकृति और ब्रह्म की शक्ति के प्रवाह से जुड़ जाते हैं उन्हें शब्दों के प्रयोग की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि जो अध्यात्म में उतरते जाते हैं उनके शब्द कम होते चले जाते हैं। शब्दों का कम होते चले जाना, शांत होते चले जाना आध्यात्म को उपलब्ध होने के संकेत देता है। इसलिए शब्द अध्यात्म की पहली सीढ़ी है और शब्दों की सीढ़ियां चढ़कर अध्यात्म तक पहुंचने के बाद शब्द पीछे छूट जाते हैं। रह जाता है आत्मा, प्रकृति और ईश्वर का एकात्म। इसीलिए कहा जाता है कि ईश्वर एक है और उसी से विघटित होकर शब्द और शब्द से दुनियावी जीवन की उत्पत्ति होती है। दूसरी सीढ़ी ब्रह्म से प्रकृति की ओर जाती है जिसमें शब्द का कोई स्थान नहीं होता। प्रकृति ईश्वर से बिना किसी शब्द के अपने भावों से संवाद करती है और मनुष्य प्रकृति से शब्दों के माध्यम से जुड़ता है। ईश्वर प्रकृति और मनुष्य के इसी तारतम्य को आध्यात्म माना जाएगा। प्रकृति के बहाव के विरुद्ध खड़े होना इन्हीं अर्थों में ईश्वर के विधान को तोड़ने की तरह होता है। जब-जब प्रकृति से मनुष्य का खिलवाड़ बढ़ जाता है तब तब धरती पर विप्लव होता है। ये विप्लव छोटे-छोटे होते हैं जो हम दुनिया में रोज ही घटित होते हुए देखते हैं। भूस्खलन, बाढ़ का प्रकोप, सूखा, भयंकर तूफान और चक्रवात जैसे प्रकृति के विप्लव मनुष्य का प्रकृति के खिलाफ जाने के कारण है जिसका जिम्मेदार स्वयं मनुष्य है।
सनातन संस्कृति के मूल में महाप्रलय का उल्लेख मिलता है । इस महाप्रलय की जड़ में सभ्यता के उच्चतम स्तर तक पहुंच जाने के बाद मनुष्य के उत्पात से क्रुद्ध होकर धरती पर महा प्रलय हुआ था। उसी महाप्रलय के पश्चात एकमात्र पुरुष बच गए थे मनु । मनु के गंधर्व कन्या श्रद्धा से मिलन के परिणाम स्वरूप कुमार का जन्म हुआ । कुमार से ही सनातन संस्कृति के उत्पन्न होकर अपने चरम पर पहुंचने की गाथा आरंभ होती है। इसी गाथा की पूर्णता का परिणाम है आज की सभ्यता और संस्कृति। लेकिन इन सब बातों को जानने के बाद भी मनुष्य फिर से प्रकृति के अविरल प्रवाह में बाधक बनने की गलतियां कर रहा है जो उसे कभी भी मुश्किल में डाल सकती है। अभी समय है कि हम संभल जाएं और शब्द से चलकर प्रकृति के मार्ग से ईश्वर की सानिध्य में जाने के मार्ग का अनुसरण करते रहें। इसी में हमारा कल्याण है निहित।
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