महुआ के फूल
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महुआ के फूल उत्तर प्रदेश के एक आम गांव की कहानी है। जिस प्रकार हर गांव में भोले भाले लोग बसते हैं , इस गांव में भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाकर उनका शोषण करने वाले लोग भी यहीं रहते हैं। इन्हीं लोगों के कारण गांव की जिंदगी नर्क से भी बदतर होती जा रही है और भारी संख्या में लोग गांव से निकलकर शहरों की तरफ जा रहे हैं। महुआ के फूल कहानी की शुरुआत एक शासकीय सेवक के रिटायर होकर गांव में आ कर बसने पर वह क्या-क्या अपनी नजर से देखते हैं यही से शुरुआत होती है। इनका नाम है सतीश वर्मा। सतीश वर्मा रोज की तरह सुबह टहलने जाया करते हैं। इधर गांव में आकर जब उन्होंने अपनी दिनचर्या शुरू की तो पहले दिन ही उनका साक्षात्कार एक घटना से हुआ। मिस्टर वर्मा टहलने के लिए एक बाग से होकर निकलते हैं जहां शालू नाम की एक लड़की सुबह-सुबह महुआ बीनने के लिए आई हुई थी। उससे वह थोड़ी सी बातचीत करके आगे चले जाते हैं लेकिन जब वापस आते हैं तो उस महुआ के पेड़ के नीचे बड़ा उपद्रव हो चुका होता है। आसपास बिखरे महुआ के फूल और उसकी डलिया उसके वहां हो चुके
उपद्रव की कहानी कह रहे थे। मिस्टर वर्मा गांव में फोन लगाकर अनहोनी की खबर देते हैं जिस पर गांव के लोग इकट्ठा होते हैं । आसपास तलाश की जाती है तो लड़की की मां बगल के खेत में बेहोश मिल जाती है जबकि लड़की का कहीं अता पता नहीं चलता। उसकी मां होश में आने पर गांव के प्रदीप और सुरेंद्र का नाम लेती है और बताती है कि रामबरन और लल्लन ने उसके सिर पर चोट किया था जिससे वह बेहोश हो गई इस प्रकार चारों के खिलाफ नाम जद रिपोर्ट दर्ज होती है लेकिन पुलिस की ढीला ढाली में कुछ हासिल नहीं होता। इसी बीच मिस्टर वर्मा को पता लगता है कि गांव के प्रदीप कुमार और
उसके साथी गांव के बाहर बने फार्म हाउस में छिपे हुए हैं। इस में पुलिस भी मिली हुई है। इस पर वर्मा जी को गुस्सा आ जाता है और वर्मा जी अपने हिसाब से इन लोगों को सबक सिखाना चाहते हैं। उन्होंने शहर से अपने एक वकील मित्र की मदद से इन लड़कों को फार्म हाउस से उठवा लिया । उनको शहर में गुप्त स्थान पर रखा और 5 दिन तक भूखा प्यासा रखकर , चेतावनी देकर गांव के सरहद पर छुड़वा दिया। यह दोनों लड़के बेहोश हालत में गांव वालों को सुबह दिखाई पड़ते हैं। इनका इलाज होने पर ठीक होते हैं तब ये अपना बयान देते हैं लेकिन डर के मारे किसी का नाम नहीं लेते। इस मामले में कोर्ट की कार्यवाही भी आरंभ होती है। तब यह लोग पिछली यातना को भूलकर फिर से गवाहों को धमकाने और दबाने में लग जाते हैं। इसी बीच होली का पर्व पड़ता है तो होली के पर्व पर यह लोग आपसी रंजिश में गांव के एक व्यक्ति को मार कर अधमरा कर देते हैं। इस मामले में भी इनका नाम पुलिस के पास जाता है लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती। यह लोग जमानत पर छूट कर यहां उत्पात मचाते रहते हैं।
यह लोग पिछले दरवाजे से रंजिश निकालने के लिए शादी में भी विघ्न डालने की कोशिश करते हैं। इसका भी खुलासा हो जाता है तो इन्हें गांव के लोग इनको बहुत बुरी तरह मारते हैं और पुलिस के ऊपर कार्रवाई करने का दबाव बन जाता है लेकिन वो लोग टाल मटोल करते रहते हैं।
अब पुलिस के द्वारा उस मारपीट पर भी कोई कार्यवाही नहीं करने पर मिस्टर वर्मा पुलिस से बात करते हैं जिस पर पुलिस का रुख सहयोगात्मक नहीं रहता और वह सलाह देते हैं कि आप सेवानिवृत्ति के बाद शांति से घर में बैठिए। गांव के पचड़े में क्यों फंस रहे हैं। इस बात पर मिस्टर वर्मा के बच्चे भी आपत्ति करते हैं और कहते हैं कि आप शहर वापस चले जाइए। लेकिन मिस्टर वर्मा अपनी जिद पर अड़ गए और उन्होंने कहा कि यह मेरा गांव है और मैं यहां पर होने वाले हर प्रकार के अन्यान्य का प्रतीकार करूंगा और यही रहूंगा। इस प्रकार मिस्टर वर्मा गांव में रहकर उन लड़कों के खिलाफ कार्यवाही कराते हैं। उन लोगों की जमानत कैंसिल हो जाती है और वह वापस जेल चले जाते हैं। गांव में अमन चैन कायम हो जाता है लेकिन यह अनिश्चय फिर भी बना रहता है कि वो लोग छूट कर आएंगे तो गांव में फिर से उत्पात मचाएंगे। मिस्टर वर्मा इस बात से भी नहीं घबराते और वह गांव के लोगों को बुलाकर उन्हें समझाते हैं कि
शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करने से ही उन्नति हो सकती है और अशांति से उन्नति की बजाय जीवन में अवनति का प्रवेश हो जाता है और हमारी सुख शांति नष्ट हो जाती है। इस बात पर गांव के लोग मिस्टर वर्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि आपने एक बार इस गांव के प्रति अपना फर्ज पूरा करके बता दिया कि आप इस गांव के एक लायक सुपुत्र हैं।
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