दोस्तों नमस्कार,
फेयरफ्लिक्स इंटरटेनमेंट के फिल्मी बातों में आज हम आपको एक विशिष्ट गीतकार महेंद्र मिसिर के बारे में जानकारियां देंगे। महेंदर मिसिर भोजपुरी बोली के वो गीतकार हैं जिन्होंने बीसवीं और 21वीं सदी को अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रभावित किया है। तत्कालीन समाज की विसंगतियों के अलावा प्रेम उनका मुख्य विषय रहा जिसमें मिलन और विरह पर आधारित उनके गीत सीधे लोगों के दिलों में प्रवेश कर जाते हैं।
'पूर्वी सम्राट' और 'पुरबिया उस्ताद' की उपाधि से विभूषित, भोजपुरी लोक रास-रंग के चितेरे महेंद्र मिसिर पूर्वांचल के नामचीन शख्सियत हैं जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे। वो सिर्फ कलाकार ही नहीं बल्कि अंग्रेजों के विरुद्ध कड़ा युद्ध छेड़ने वाले एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाजसेवी और भविष्य दृष्टा कवि भी थे। भोजपुरी लोकगीतों की कहानी बिना महेंद्र मिसिर का नाम लिए पूरी नहीं होती। बॉलीवुड के शुरुआती दिनों में फिल्मों का निर्माण करते समय हिंदी या भोजपुरी का कोई बंटवारा नहीं था। उस समय फिल्म बनाने के समय जिस प्रकार की कहानी और टीम होती थी उस तरह से फिल्म बन जाती थी। यही कारण है कि उन दिनों भोजपुरी फिल्मों में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, और तलत महमूद जैसे दिग्गज कलाकारों ने अपनी आवाज दिया तो वहीं शैलेंद्र, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे बड़े गीतकारों ने गीत लिखे तो वहीं रवीन्द्र जैन और चित्रगुप्त जैसे संगीतकारों ने भोजपुरी फिल्मों में संगीत भी दिया। फिल्मों में महेंदर मिसिर और भिखारी ठाकुर के लिखे गीतों को आधार बनाकर कहानियां लिखी गई और उन गीतों को शामिल किया गया।
बताया जाता है कि वर्ष 1958 के फिल्म समारोह में तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों को भोजपुरी में भी फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया था। उनके प्रस्ताव पर काम हुआ और वर्ष 1963 में पहली फिल्म जो भोजपुरी में बनी उसका नाम था "गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो"। भिखारी ठाकुर के नाटक विदेशिया पर आधारित इसी नाम से बनी फिल्म भी 1963 में बनी। बता दें कि भोजपुरी में कई नाटक और गीतों सहित कई पुस्तकों के लेखक भिखारी ठाकुर महेंदर मिसिर के समकालीन थे और उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है। गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो और विदेशिया के बाद तो भोजपुरी फिल्मों की लाइन लग गई और एक से बढ़कर एक फिल्में बनी। एक से बढ़कर एक कलाकार भोजपुरी फिल्मों में आए और उसे अपनी कला से समृद्ध किया। उन दिनों बनी फिल्मों में बिदेसिया, गंगा जइसन भौजी हमार, गंगा किनारे मोरा गांव, नदियां के पार जैसी बहुत सी फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं। तब से लेकर आज तक बनने वाली फिल्मों को और भोजपुरी के मशहूर गानों की सूची बनाई जाए तो यह पता चलता है कि भोजपुरी का बॉलीवुड में बहुत बड़ा दखल है।
हमारी आज की बातचीत का विषय महेंद्र मिसिर हैं ।महेंद्र मिसिर के लिखे बहुत सारे गाने बॉलीवुड में स्टार गायकों ने गाया और बड़े संगीत कारों ने अपने संगीत से भोजपुरी बोलों में झंकार पैदा की।
महेंद्र मिसिर का नाम आते ही भोजपुरी लोक रंग में प्रेम विरह, श्रृंगार वियोग और लालित्य जैसे कल्पनाओं का एक संसार बनता है। जहां संगीत , साज और रस का संगम दिखाई पड़ता है। बॉलीवुड के अलावा महेंद्र मिसिर के लिखे गीत गाने वाले भोजपुरी के सभी प्रमुख कलाकार शामिल हैं। उनके गाए गीतों की प्रसिद्धि महेंद्र मिसिर के नाम को लेकर आगे बढ़ रही है। महेंद्र मिसिर का जन्म 16 मार्च 1886 को बिहार के सारण जिले के मिश्रौलिया गांव में हुआ था। 26 अक्टूबर 1946 में उनका देहांत हुआ। इस प्रकार 60 वर्ष की उम्र तक वह भोजपुरी लोक साहित्य लोक संगीत और लोक परंपरा का संरक्षण और संवर्धन करते रहे। उन्हें "पूर्वी सम्राट" और "पुरबिया उस्ताद" की उपाधि दी गई थी। महेंद्र मिसिर के जीवन के विषय में लिखित जानकारी बहुत अधिक नहीं मिलती फिर भी भोजपुरी लेखक कपिल पांडे के उपन्यास "फुलसुंघी" और रामनाथ पांडे के उपन्यास "महेंद्र मिसिर" में उनके बारे में जानकारी मिलती है।
ऐसा माना जाता है कि महेंद्र मिसिर कविता, संगीत, एथलेटिक्स और समाज सेवा सहित अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाले संघर्ष में भी जी जान से लगे हुए थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे लेकिन भोजपुरी की सेवा में अपने आप को बराबर लगाए रखा।
जैसा कि मैंने कहा कि उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती लेकिन देखा जाए तो उनके गीतों में ही उनकी विरासत बिखरी हुई मिलती है।
तो दोस्तों यह थी भोजपुरी गीतों के रचयिता महेंद्र मिसिर के बारे में कुछ रोचक जानकारियां। हमें उम्मीद है कि आपको यह जानकारियां अच्छी लगी होंगी। अगर अच्छी लगी हैं तो हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब कर लीजिए और अब अपनी दोस्त सीमा शाही को इजाजत दीजिए।
नमस्कार।