इन दिनों वर्ष 1975 में भारत में लगाए गए आपातकाल की बहुत चर्चा है जिसे असंवैधानिक भी कहा जा रहा है। आपको याद दिलाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि इसका प्रावधान संविधान के भाग 18 में
किया गया है। भारत के राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल और प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर आपातकाल की घोषणा संपूर्ण भारत अथवा किसी एक राज्य के लिए कर सकते हैं ।अगर केंद्रीय मंत्रिमंडल को यह विश्वास हो जाए कि भारत की एकता, अखंडता को किसी भी बाहरी शक्तियों से खतरा है या सैनिक क्रांति की आशंका है तो आपातकाल लगाया जा सकता है।
आपातकाल में जहां तक सवाल नागरिक अधिकारों के निलंबन का आता है इस बारे में जो लोग वर्ष 1975 में भारत में रह रहे थे उन्हें ठीक से मालूम होगा कि आम नागरिकों को आपातकाल के दौरान कितनी सहूलियत प्राप्त हुई थी। आपातकाल के दौरान कोई भी अधिकारी , कर्मचारी अपने कार्य पर समय से पहुंचने के लिए बाध्य था, कोई भी रेल अथवा सरकारी सेवा तनिक भी देर नहीं कर सकती थी, कार्यालय में कार्य नियमित और समयबद्ध तरीके से हो रहा था, कानून और पुलिस नागरिकों की शांति और सुरक्षा के लिए बहुत कड़ाई से मुस्तैद थे। उस दौरान अपराध, दंगे लड़ाई- झगड़ा चोरी, डकैती आदि पूरी तरह से बंद थी। इस प्रकार नागरिकों को तो कोई तकलीफ नहीं हुई थी। आपातकाल में केवल राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगाई जाती है। जिस पर तत्कालीन आपातकाल के दौरान भी रोक लगाई गई थी। इसे सही या गलत नजरिए से देखने की यदि आवश्यकता महसूस होगी तो उसका मूल्यांकन समय काल और परिस्थितियों के हिसाब से किया जाएगा। आज 2024 में जब इस बात की चर्चा की जा रही है तो इस समय इमरजेंसी या आपातकाल लागू नहीं है लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी, मानवाधिकार तथा राजनीतिक आजादी के हिमायती इस बात का स्वयं मूल्यांकन करें कि उन्हें कितनी आजादी प्राप्त है?
यदि नहीं प्राप्त है तो क्या आपातकाल लागू है ? यदि आपातकाल लागू नहीं है फिर भी अधिकारों का हनन हुआ है तो यह व्यवस्था असंवैधानिक है या वर्ष 1975 में लागू की गई व्यवस्था असंवैधानिक थी ?
विचार करके देखिएगा।