Sunday 27 2023

कविता -उसकी रहमतें

 हर इंसान हैरत में है कि

 जिंदगी  बदल सकती है

कितने रूप कितने रंग

 कभी यह आती है 

अपने पूरे जमाल से

 रोशन करती है सारी कायनात कभी-कभी यू लगता है कि

 यह क्या हो गया

 गाते-गाते सारे गीत बेसुरे हो गए 

कभी अंधेरों मे राहें

 कभी राहों में अंधेरा

 कभी हर दुआ कुबूल,

 तो कभी कांटे ही कांटे

 खुदा की रहमतें

 डूबती सी नजर आती है 

और मैं तन्हा अकेला रह जाता 

क्या पता किसकी राह तकता 

यूं खड़ा होकर 

सोचता हूं जिंदगी कभी बहुत खूबसूरत

 तो कभी 

दुश्वारियां ही दुश्वारियां

 फिर भी यह सच है कि

 दुनिया की कोई भी मुश्किल  बड़ी ना हुई

उसकी रहमतों के आगे 

खड़ी ना हुई।

Thursday 24 2023

कविता - ग़म ए दिल

 वह उदास रहता है आजकल ऐसे

 गम ए दिल दे के कोई चला जाए जैसे।

 उसके उदास चेहरे पर शाम  आ के ढली

सारी उम्मीदों का दिया बुझ गया हो जैसे।

 कभी देखे थे आंखों में सब्जबाग कई

बहारों में यकायक खिजा आ गई  जैसे।

 चाहत क्या होती है मोहब्बत क्या होती है

उसने सब कुछ जिंदगी में जिया हो जैसे।

 उम्मीद से रोशन उन चमकती आंखों में

इक जिंदगी का सूरज डूब मरा हो जैसे।

Monday 21 2023

कविता -एक आसमान का तारा था

 एक आसमान का तारा था

उसे मुझसे कोई निस्बत थी

ये जताने के लिए वो अक्सर

मेरे पास से होकर गुजरता था

ये बहुत पहले की बात है।

शायद पिछले जन्म की ?

वो मुझसे हंस हंस कर बतियाता था

अक्सर मेरे पास घंटों बैठकर

कुछ भी कहता था 

मैं भी- वो भी, कभी किसी बात पर

खूब हंसते थे

उसे मुझसे कोई निस्बत थी

उसने मुझसे बस यही बात नहीं कही।

औरों से उसने अक्सर ये कह दिया कि

उसको मुझसे मोहब्बत है!!!

इस बात पर

उसको पिता से देसनिकाला मिला!

ये बात भी उसने मुझसे ना कहा

बात सितारे की थी,

मैं कैसे समझ भी पाता कि

उसको मुझसे ही कोई निस्बत है!

उसने पिता का आदेश स्वीकार कर

अपने हिस्से के आसमां में

कहीं गुम हो गई।

ये बहुत पहले की बात है

शायद पिछले जन्म की

या इसी जन्म की 

ठीक से याद नहीं आता

उसको गए इतने बरसों बाद

ये बात जब किसी ने मुझसे बताया

तब मुझे यह मालूम हुआ कि

 वो आसमान का एक सितारा था

उसे मुझसे ही कोई निस्बत थी

ये जताने के लिए वो अक्सर

मेरे पास से होकर गुजरता था।

ये बहुत पहले की बात है

शायद पिछले जन्म की,

शायद इसी जन्म की  ?

ठीक से याद नहीं आता ......।

Sunday 20 2023

राजीव गांधी: एक सादगी युक्त राजनेता

 पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी भारत की राजनीति के वो चमकते सितारे हैं जिनसे कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। राजनीति में निस्पृह जीवन जीते हुए उन्होंने भारत के विकास की एक ऐसी राह तैयार की जिस पर चलते हुए आज भारत सूचना क्रांति के क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवा चुका है। गरीब से गरीब व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है जिससे हर किसी को अपने काम की बात जानने का एक औजार मिला है और उसका प्रयोग करके वह अपने जीवन को बदलने में काफी हद तक सक्षम भी हुआ है । राजीव गांधी का राजनीति में प्रवेश सुनियोजित नहीं था , एक दुर्घटना थी , एक इत्तेफाक था । लेकिन कुशल योद्धा को अपने रण कौशल से हर युद्ध में विजय मिलती है । पायलट की नौकरी छोड़कर जब अचानक उन्हें भारत के प्रधानमंत्री के पद की शपथ दिलाई गई तो उन्होंने अचानक बदली इस भूमिका को भारी मन से स्वीकार किया। राजीव गांधी एक राजनीतिक परिवार के वारिस थे । कहा जा सकता है कि राजनीति के बारे में उन्होंने अपनी मां स्वर्गीय इंदिरा गांधी और नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू से कुछ तो सुना ही रहा होगा। किंतु राजनीति में व्यक्तिगत रुचि न होने के कारण यह भी कह सकते हैं कि उन्हें प्रत्यक्ष जानकारी की कमी जरूर रही होगी। किंतु उनके कल्पनाशील व्यक्तित्व ने भारत के लिए क्या बेहतर हो सकता है यह समझने में कोई गलती नहीं की। शासन में  आते ही नई सूचना तकनीक की नींव रखी, पंचायती राज अधिनियम लागू करवाया, नई शिक्षा नीति 1986 बनाया और उसे लागू कराया। इसके अलावा उन्होंने विकास के नए नए आयाम गढ़े। लेकिन भारत के युवाओं को लेकर वह सर्वाधिक संजीदा थे । आने वाली पीढ़ियों को बेहतर से बेहतर शिक्षा और प्रशिक्षण देने के इरादे से उन्होंने नवोदय विद्यालय के विचार को रखा और उसे क्रियान्वित किया ।भारत की राजनीति में देश की आबादी के लिए हरदम चिंता व्यक्त की जाती रही है और यह कहा जाता रहा की बढ़ती हुई आबादी के कारण विकास नहीं हो रहा है। स्वर्गीय राजीव गांधी ने पहली बार बढ़ती हुई आबादी पर जनता को आश्वस्त करते हुए कहा कि हमारी आबादी हमारी समस्या नहीं हमारी पूंजी है, जनशक्ति है । इसे काम पर लगा कर हम अधिक से अधिक परिणाम पा सकते हैं। बढ़ती हुई आबादी के लिए यह एक आश्वस्ति थी तो वही लोगों के मन में विकास के प्रति एक नजरिया पैदा होने से आशा का संचार भी हुआ था। राजनीति के दुर्भाग्य ने अचानक भ्रष्टाचार का बवंडर खड़ा करके सत्ता परिवर्तन किया।  वह बवंडर जो उठने के इतने वर्षों बाद भी आज तक कुछ भी साबित नहीं हो पाया और एक बेदाग इंसान को भारत की जनता ने प्रधानमंत्री के रूप में पाकर भी खोया। किंतु उनके द्वारा जनता के विकास के लिए जमीनी स्तर पर किए गए देश की नीतियों में मजबूत हस्तक्षेप को ऐतिहासिक रूप से उसी तरह याद किया जाता रहेगा  जिस प्रकार उनकी जयंती 20 अगस्त भारत के इतिहास में याद की जाती रहेगी।

                     उनकी स्मृतियों को शत शत नमन।

Saturday 19 2023

मजदूरों का हितचिंतन और मजदूर दिवस

 2 मई को मजदूर दिवस आता है तब हमें मजदूर की याद आती है। हम मजदूर दिवस मनाते हैं लेकिन यह हमारे दोहरे चरित्र का प्रदर्शन ही होता है। मेरा स्पष्ट रुप से मानना यह है कि इस देश में श्रम की महत्ता को आदिकाल से नकारा गया है । हमारे किन्ही ग्रंथों में भी मजदूर के सम्मान की गाथा दिखाई नहीं पड़ती बल्कि उसे सेवा करने के लिए ईश्वर के द्वारा अभिशप्त होकर धरती पर आना बताया जाता है । इस प्रकार श्रम की महत्ता को हम कैसे समझ सकते हैं जब श्रम करने वाले स्वयं ईश्वर से ही अभिशाप लेकर आए हो।  होना तो यह चाहिए था कि जिन मजदूरों ने ताजमहल को बनाया था उन मजदूरों  के हाथ चूम लेते तब हम मानते कि हमारे देश में श्रम का आदिकाल से महत्व रहा है । इतिहास में तो नहीं मिलता लेकिन यह कहा जाता है कि जिन कारीगरों ने ताजमहल बनाया था या यै हो सकता है कि जिस कारीगर  ने  ताजमहल बनाया था शाहजहां ने उसके हाथ कटवा दिए थे ताकि वह उस तरह का कोई दूसरा महल तामीर न कर दे जिससे कि ताजमहल की महत्ता घट जाए या उसके समानांतर कोई और इमारत खड़ी हो जाए। इसी प्रकार मुंशी प्रेमचंद का साहित्य मजदूरों की व्यथा कथा का दस्तावेज है जो यह बताता है कि स्वतंत्रता के पूर्व भारत में मजदूरों की क्या स्थिति रही है ।मजदूरों की स्थिति को  सुधारने के लिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने लंबा संघर्ष किया और ब्रिटिश काउंसिल में लेबर मेंबर के रूप में उन्होंने भारत में मजदूरों के काम के घंटे तय किए। उनके लिए वेतन, चिकित्सा ,आवास ,काम करने की बेहतर स्थितियों की वकालत की और बतौर कानून मंत्री अपने उन सुधारों को भारत के कानून में भी शामिल करवाया जिससे कि मजदूरों का काफी सम्मान भी बड़ा और उनकी स्थितियां बेहतर हुई। विगत कुछ वर्षों में देश में श्रम की महत्ता का निर्धारण करने के लिए और उनके कल्याण के लिए संगठित और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की पहचान करके उन्हें अलग से आवश्यकतानुसार सरकार ने सहायता करने और उनकी सुरक्षा करने का प्रावधान किया जो सराहनीय है । किंतु विगत वर्षों में नए श्रम कानून आए जो इस पूरी की पूरी सुधार की प्रक्रिया को वापस ले जाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें मजदूरों के अधिकारों का संरक्षण होता हुआ दिखाई नहीं देता ।अब श्रमिक मजदूर केवल फैक्ट्रियों और ईट भट्ठा या खेतिहर मजदूर ही नहीं होते। अब संगठित और असंगठित भी खत्म हो गया है । अब कार्यालयों में पढ़े लिखे स्किल्ड और क्वालिफाइड मजदूर होते हैं जो ठेके पर रखे जाते हैं और ठेकेदार उनको उनकी मजदूरी देता है दिहाड़ी के हिसाब से। उनके लिए वेतन, बोनस, अवकाश, भोजन या कार्य की सुविधाओं का कोई उल्लेख नहीं है और यह क्वालिफाइड मजदूर अगर महिला है तो उनके लिए कोई प्रसूति अवकाश या बच्चों के पालन के लिए अलग से अवकाश की कोई सुविधा नहीं है।  इस प्रकार पिछले 100 वर्षों का लेखा-जोखा देखा जाए तो इतने में ही बाजी पलट गई है और मजदूर पूजी के हाथों दोबारा हार चुका है।

Friday 18 2023

पुस्तक समीक्षा: बनारसी घाट का जिद्दी इश्क

 बनारसी घाट का जिद्दी इश्क पढ़ा और पढ़कर मन इस प्रकार आनंदित हुआ कि जैसे अध्यात्म की नदिया में गोता लगाकर चले आए। बनारस प्राचीनतम जीवित आध्यात्मिक नगरी के रूप में  जानी जाती रही है और इसको महादेव का आशीर्वाद और उनका स्थान माना जाता रहा है ।ज्ञान की त्रिवेणी यहां सदियों से बहती रही है। ज्ञान में अध्यात्म का मेल हो तो बात ही कुछ और है। यहां घाटों पर अगर आरती शंख और ढोल नगाड़े के साथ मां गंगा की आरती, भोले बाबा का सुमिरन होता है तो वही यहां जवां दिलों की धड़कने नई नई कहानियां लिखती रही है। बनारस में अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट के साथ-साथ मणिकर्णिका घाट को कैसे भूल सकते हैं जहां जाकर आत्मा को परमात्मा से मिलते हुए महसूस करते हैं। यही भाव बनारस में वह मस्ती लेकर आता है जिसमें मृत्यु पर भी शोक नहीं जश्न मनाए जाते हैं । इस अर्थ में ऐसा प्रतीत होता है कि बनारस का रहने वाला जीवन और मृत्यु के अर्थ को अपने जीवन में एक साथ जीता है । इसीलिए उसकी मस्ती बेजोड़ है और बेजोड़ है बनारस के घाटों का जिद्दी इश्क । 

इश्क वैसे तो परमात्मा से मिलन का साधन है ही ऊपर से अगर यह जिद्दी हो जाए तो सोने में सुहागा। क्योंकि जब तक मनुष्य कोई भी काम करने में जिद नहीं करता, जिद नहीं उठाता तब तक कामयाबी नहीं मिलती और अगर इश्क में जिद ना हो तो फिर वो इश्क कैसा ? बनारसी घाट का जिद्दी इश्क तो बस बनारस में ही हो सकता है कहीं और नहीं। इस पुस्तक के लेखक विजय विनीत जी को बहुत-बहुत बधाई इसलिए भी दी जानी चाहिए उन्होंने बनारस के घाटों, बनारस की संस्कृति ,यहां की जीवन शैली और बनारस के मानस को इतना ठीक से समझा है कि अपने आप में उनकी समझ  एक पैमाना बन जाती है ।  पुस्तक का शीर्षक ही है बनारसी घाटों का जिद्दी इश्क । इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि इससे अच्छा नाम इस पुस्तक का हो भी नहीं सकता था जो अपने नाम को पूरी तरह से सार्थक करता हो। पुस्तक में संग्रहीत कहानियां अपने आप में बनारस के एक युवा की ही कई कहानियां लगती है जिसमें वह युवा अपने बनारसी पन को, बनारसी ठसक को अपने जीवन में जीता है और अपने इश्क में भी अपने जिद्दी पन को पकड़ कर के ही रखता है । जिसमें  इश्क में अध्यात्म मिलता है ,जहां प्रेम मिलता है, अध्यात्म मिलता है। इस इश्क में वासना नहीं मिलती। यही बनारसी घाटों के जिद्दी इश्क की खूबसूरती है। आमतौर पर इश्क और प्रेम पर इसीलिए लोग लिखने से संकोच कर जाते हैं कि कहीं उनकी बात को गलत न समझ लिया जाए। लेकिन इन तमाम खतरों को उठाते हुए भी विजय विनीत जी ने जिस युवा की कहानी को उठाया है उसकी कहानी के मर्म में कहीं भी वासना नहीं आई और कहीं भी इश्क की गहराई में कमी भी देखने को महसूस करने को नहीं मिली। लगभग सभी कहानियों का नायक लेखक या पत्रकार है जो बनारस का रहने वाला है और अपनी नायिका की साथ की मुलाकातों का लेखा-जोखा बयान करता है । जो घटनाक्रम इस बीच पेश आते हैं वह इतने स्वाभाविक है कि उस पर सहज ही पाठक कन्विंस होता है । वो यह मानता है कि बिल्कुल ठीक ऐसा ही हुआ होगा । यह कोई कल्पना नहीं है । यह कहानी भी नहीं है । एक सच्चाई है जिसे एक नायक ने अपनी जिंदगी में जिया है। आरंभ से ही अगर देखें तो सभी कहानियों में बनारस की गंगा जमुनी तहजीब बहुत ही साफगोई के साथ सामने प्रस्तुत होती है और कहीं ना कहीं बनारसी होने के  गर्व का अहसास करा जाती है। संकलन की पहली कहानी इश्क ए बनारस की नायिका पंक्ति जब नायक को झन्नाटेदार चाटा जड़ती है तो पाठक को लगता है कि यह चाटा उसके गाल पर लगा है । यही इस कहानी की खूबसूरती है कि यह कहीं से भी कहानी नहीं लगती और हर कोई पाठक इसमें स्वयं नायक बन जाता है । इसी प्रकार आगे की कहानियों में भी जो भी नायिकाएं आई है वह भले ही खूबसूरत हैं मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत भी हैं। सभी कहानियों का नायक मानवीय कमजोरियों और खूबियों को अपने साथ समेटे हुए हैं लेकिन उसकी जिद, उसका जिद्दी इश्क कहीं भी अपनी मर्यादा को तोड़कर वासना की तरफ बढ़ने से पहले एक आदर्श रास्ता निकाल लेता है जहां हम कह सकते हैं कि- " वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन , उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा"। संग्रह में संकलित अन्य कहानियां रुक जाओ ना ,काश, कशमकश ,सफर के हमसफ़र ,सुबह हो गई ,नैना ,आखिरी खत, एक थी अदीबा और आखिरी इश्क सभी कहानियां पाठकों को अपनी रंगीन जादुई दुनिया में ले जाती है और प्रेम, श्रृंगार ,मिलन और बिछोह के भाव से ओतप्रोत करके छोड़ देती है। हर कहानी को पढ़ने के बाद पाठक ठगा सा खड़ा कुछ देखता था कुछ सोचता था रह जाता है। लगभग सारी कहानियों का लय कहीं टूटता नहीं ।भाषा का सौंदर्य कहीं विद्रूप नहीं होता ,अशिष्ट शब्दों का कोई प्रयोग नहीं होता ।जो आज साहित्य रचा जा रहा है उसकी तुलना में बनारसी घाटों का जिद्दी इश्क कहानी संग्रह अपने आप में अपनी पहचान को बनाकर रखता है और कागज काला करने वाले लेखकों की भीड़ से अलग  अपनी पहचान के साथ खड़ा दिखाई देता है । क्योंकि यह भी उसकी जिद ही है जो उसे बाजारू भाषा में बिकाऊ साहित्य लिखने से रोकती है। साहित्य की मर्यादा को कायम रखते हुए भाषा के सौंदर्य बोध को बढ़ाती है । कुल मिलाकर कहानी पाठकों के द्वारा हाथों हाथ उठा ली जाएगी और तमाम सारी बधाइयां लेखक को मिल रही होंगी । उसी क्रम में मैं भी अपनी बधाई प्रेषित करते हुए इस उम्मीद में हूं की विजय विनीत का कोई और कहानी संग्रह आएगा तो हम पुन: एक बार भाषा और साहित्य के संगम में स्नान करेंगे।

Thursday 17 2023

बेचैनी


चलते चलते इंकलाब के नारे 

हवाओं से दूर,

 बहुत दूर निकल गए जब से 

तभी से गांव से शहर ,

शहर से राजधानियों की सड़कों के सीने 

आंदोलनकारियों के बूटों की धमक 

सुनने को तरसती है ।

बच्चों के हाथ में झंडियां,

 युवाओं के हाथ में झंडे और 

इंकलाब का नारा जब से 

हवाओं में  ठिठक गया है

ऐसा लगता है कि 

देश का युवा स़ो रहा है

धरती युवाओं के पसीने का स्वाद

 भूल गई है ।

युवाओं के हाथ में अब

कलम और फावड़ा नहीं दिखते 

जवानों के हाथ संगीन यह कह के आई है कि बस चार बरस का साथ 

मेरा और तुम्हारा ,

मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करूंगी फिर भी दुश्मन की गोलियां 

तुम तक अगर आ गई तो तुम्हारा मौला मालिक है

सरकार की पेंशन तुम्हारे बच्चों के लिए अब कुछ नहीं ला सकती!

कारीगरों के हाथ अब मांगते हैं औजार पाते हैं दुत्कार 

अब बहुत कुछ वैसा नहीं है 

जैसा होना चाहिए था !

इस बात से हवाओं में भी बेचैनी है फिजाओं में भी खामोश सवाल है 

युवाओं के दिल सूने है 

घरों के ठण्डे चूल्हे  है

 स्कूली बच्चों की किलकारियां और शोर अब गांव की गलियों में 

नहीं सुनाई देते

 बुजुर्ग सोचते हैं

 मेरे देश के खून को 

उबाल क्यों नहीं आता 

मेरे देश के युवा के दिल में सवाल

 क्यों नहीं आता ?

देश की मांग पर देश के लिए 

इंकलाब के झंडे लेकर

 सड़क पर उतर जाना 

युवाओं के जवां होने की पहली शर्त है

 देश की फिजाओं में एक ही सवाल है

 किसी कोने से किसी आंदोलनकारियों की बूटों की धमक के साथ

 इंकलाब का स्वर क्यों नहीं आता?

क्या युवाओं में राग रंग घुल गया है?

या किसी आतताई राजा का भय है?

 जो भी हो उनके सीने में 

क्या डर सिल गया है?

कुछ पता नहीं चलता 

इन घनघोर अंधेरों के बीच

 कई वर्षों से यह सवाल 

देश की फिजाओं में आवारा  हैं।

ये सवाल अब इस बात से परेशान है कि

 किसी नौजवान के मन में ये  सवाल

 अब क्यों नहीं आता ?

Tuesday 15 2023

भारत में शासकीय सेवकों की स्थितियों में सुधार

 भारत की आजादी के बाद संवैधानिक प्रावधानों के अनुरुप देश को चलाने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न विभागों का गठन किया गया था। इन विभागों के संचालन के लिए आवश्यक अधिकारियों कर्मचारियों की गणना करके उनके पदों का सृजन किया गया था। उसी अनुसार कर्मचारियों और अधिकारियों की पदस्थापना करके विभागों का संचालन आरंभ हुआ। कालांतर में वर्ष 1990 के बाद कार्यालय में कंप्यूटर का प्रवेश हुआ जिससे ऐसा लगने लगा था की अब कार्यों के संचालन के लिए कर्मचारियों की संख्या कम हो जाएगी। लेकिन तब तक देश की आबादी लगभग दो गुनी हो चुकी थी इसलिए सरकारी विभागों से जनता की अपेक्षाएं बदल कर बढ़ चुकी थी। इसलिए कर्मचारियों की संख्या कोई समस्या नहीं थी। सरकार ने कंप्यूटराइजेशन के बाद ठीक ढंग से आवश्यक गणना का कोई प्रयास नहीं किया और जो लोग सेवा निवृत्त होते चले गए उनकी जगह नहीं भरी गई और यह कह कर के कम को आगे बढ़ा दिया गया कि कंप्यूटर के कारण अब कर्मचारियों की आवश्यकता है लेकिन बाद में इसका परिणाम इस रूप में देखने को आ रहा है की सरकारी विभागों में बिना निस्तारण के लाखों की संख्या में मामले और फाइलें रुकी हुई है और लोगों के काम प्रभावित हो रहे हैं। सरकार के द्वारा इसका कोई विकल्प अब तक नहीं ढूंढा गया। यह भी देखना आवश्यक है कि सरकार के विभागों मे रिक्त पदों पर भर्तियां नहीं होने से बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित प्रशिक्षित युवक और युवतियां रोजगार की अपेक्षा में खाली पड़े निराश हो रहे हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए नौकरियों के रास्ते पूरी तरह से बंद हो गए हैं जो देश के युवाओं को बेरोजगारी की तरफ तेजी से ले जा रहे हैं। अतः समय की मांग है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के अधीन आने वाले विभिन्न विभागों मैं बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप कर्मचारियों की आवश्यकता की गणना करके नए पद सृजित कर उन पर भर्तियां तुरंत करने की कार्यवाही की जाए। 

इस बारे में आपको याद दिलाना है कि विगत कई दशकों से सरकारी विभागों में भर्तियां बंद है और इसके कारण पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा आंदोलन के रास्ते पर निकलने को बाध्य है। यह स्थिति देश के लिए बहुत चिंताजनक है। इस समस्या की जड़ में जाते हैं तो यह समझ में आता है कि विभिन्न प्रकार के विभागों जैसे दूरसंचार, रेलवे, डाक एवं तार, सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन आने वाले विभिन्न विभाग ,भारतीय सेना, सेना की रक्षा इकाईयां और नवरत्न कंपनियां, बैंक, अस्पताल, तथा बीमा सेक्टर के विभिन्न विभाग तथा अन्य छोटे-मोटे कारखाने जिनका या तो निजीकरण किया गया है या निगमीकरण किया गया है। यही रोजगार की समस्या को पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। आप स्वयं अवगत है कि सबसे अधिक नौकरियां यही विभाग युवाओं को दिया करते थे और इनके निगमीकरण और निजी करण के उपरांत इनके पास नौकरिया नहीं रहीं और यह लाभ के लिए काम करने के कारण नौकरी से बहुत सारे युवाओं की छटनी कर दिए और बहुत से युवाओं को नौकरी देने  के रास्ते बंद कर दिए।  भारत के संविधान के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक तत्वों के अनुपालन में देश को एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा गया था। किंतु भारत में पूंजीवाद की व्यवस्था ने राजनीतिक और प्रशासन में घुसपैठ करके उनसे मनमाना काम करवा कर अपने लाभ के लिए सरकार के बड़े-बड़े उपक्रमों को हथिया लिया। इसका सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को हुआ तो उससे भी बड़ा नुकसान सरकार को हो रहा है क्योंकि ऐसी कंपनियां जो लाभ कमाती थी वह सरकार के खाते में जाता था और देश के विकास में काम आता था साथ ही युवाओं को रोजगार भी मिलता था ।जब से यह नई व्यवस्था आई है तब से सरकार के राजस्व में भी कमी हुई हुई है और युवाओं को रोजगार भी नहीं मिल पा रहा है। 

 कंपनियां अपने लाभ के लिए काम करती हैं और लाभांश में से आयकर में छूट के लिए विभिन्न प्रकार के बहाने बनाकर कम से कम आयकर देकर अधिक से अधिक पूंजी अपने पास एकत्रित करती है जिससे भारत का राजस्व कम होता चला जा रहा है। 

 भारत में अनुसूचित जाति अनु सूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए शासकीय नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था इन वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए गई थी। लेकिन  आजादी के बाद से आज तक यह व्यस्था पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई जिसके कारण केंद्र और राज्य सरकार के अधीन आने वाले विभागों  मंत्रालयों, राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री सचिवालय, लोकसभा सचिवालय, राज्यसभा सचिवालय जैसे विभागों में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व अभी तक नहीं हो पाया है। इन मंत्रालयों में खाली पड़े पदों पर भर्तियों का कोई कार्यक्रम किसी भी सरकार द्वारा नहीं किया गया और  

  शासकीय सेवा के प्रत्येक ग्रुप में रोस्टर के आधार पर आरक्षण प्रदान किया जाए ताकि सभी सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व हो सके। ज्ञातव्य है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के अधीन आने वाले ग्रुप ए की सेवाओं में खास तौर पर मंत्रालय में सचिव, उप सचिव  और संयुक्त सचिव जैसे पदों पर ,विश्वविद्यालयों में वॉइस चांसलर विभागाध्यक्ष जैसे पदों पर तथा उच्चतर न्यायिक सेवा में माननीय नयायाधीश के पदों पर आज भी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग नहीं पहुंच सके हैं । उन्हें जानबूझकर  रोका गया है और आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था की अनदेखी की गई है जो कि संविधान विरुद्ध कार्य  है। एक आंकड़े के अनुसार सेंट्रल गवर्नमेंट पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज में ग्रुप ए के पदों में ओबीसी कर्मचारियों की संख्या 16. 79% ग्रुप बी में 17. 79% ग्रुप सी में 19.85 और ग्रुप डी में 25. 40%  है जिससे पता चलता है कि उनके प्रतिनिधित्व की स्थिति बहुत कमजोर है। उदाहरण के लिए डिपार्टमेंट ऑफ फर्टिलाइजर में ग्रुप सी के कुल स्वीकृत 3615 पदों के सापेक्ष sc के 683 STके 208 और ओबीसी के 925 पद ही भरे गए हैं ।इसी प्रकार मिनिस्ट्री ऑफ स्टील में 21636 ग्रुप ए के पदों में SC के 3452 पद ST के 1540 पद के भरे हुए हैं जबकि ओबीसी के पद पर 3434 लोग कार्य कर रहे हैं।

मिनिस्ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट में कुल स्वीकृत ग्रुप ए के 72 पद हैं जिसके समानांतर SC, ST और ओबीसी के सारे पद रिक्त है और उनकी संख्या शून्य है। अतः इस विभाग में मंत्रालय में SC, ST और ओबीसी का प्रतिनिधित्व शून्य है।

इस प्रकार प्रतिनिधित्व की स्थिति का आकलन करके समस्त विभागों के सभी पदों पर SC,ST और ओबीसी के समस्त पदों पर उचित प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता है। ग्रुप ए की सेवाओं में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए भी होना आवश्यक है कि नीति निर्माता विभागों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का प्रतिनिधित्व होने से ही उनके लिए कल्याणकारी नीतियां बनाई जा सकती है। इसके लिए सरकार का संवैधानिक दायित्व है की वह

 बैकलाग वैकेंसी निकाल कर सारे खाली पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरे तभी यह माना जा सकेगा कि शासकीय नौकरियों में सरकार ने सभी वर्गों के साथ न्याय किया है अन्यथा की स्थिति में यह स्पष्ट रूप से एक बड़ी आबादी की उपेक्षा और अन्याय का उदाहरण है।

इस संबंध में अभी हाल में आए माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आलोक में यह कहना है कि माननीय न्यायालय ने यह माना है कि प्रतिनिधित्व के आधार पर आरक्षण देना राज्यों पर निर्भर है ।

  सरकार के द्वारा आरक्षण के क्षेत्र में संविधान की मूल भावना का आदर करते हुए की गई न्याय संगत  व्यवस्था देश में समानता की भावना कायम कर सकेगी।

 इस विषय में आप का ध्यान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 /चार (क) एवं (ख) का उल्लेख करना आवश्यक है जिसमें व्यवस्था दी गई है कि सरकार के  अधीन किसी विभाग में आरक्षित वर्ग के लिए विशेष भर्ती एवं प्रोन्नति के लिए व्यवस्था करने  हेतु सरकार पर कोई रोक नहीं होगी।

इस प्रकार संवैधानिक व्यवस्था   के अनुसार कार्य कर के इन वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था पर अविलंब कार्रवाई करने के लिए सभी विभागों एवं राज्य सरकारों को केन्द्र सरकार द्वारा निर्देश देने की आवश्यकता है ताकि देश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों का आर्थिक और सामाजिक उत्थान हो सके और उन्हें भी देश में समानता का अधिकार मिल सके । 

इस विषय में  सरकार के द्वारा उठाए गए कदम हमारे लिए स्वागत योग्य होंगे और इससे देश में राजनैतिक और आर्थिक समानता कायम करने में मदद मिलेगी।

 इसी प्रकार सफाई कर्मचारियों की समस्या बहुत ही चिंताजनक है। इस कार्य के लिए लगे हुए सरकारी कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है इस कारण यह कार्य ठेकेदारी द्वारा कराया जा रहा है । इस व्यवस्था में सफाई कर्मचारियों की स्थिति शोषण की दर्दनाक कहानियों से भरी पड़ी है। इस मामले में यह भी देखा गया है कि इनसे सीवर लाइन के अंदर घुस कर और अमानवीय ढंग से मानव मल को उठाने और साफ करने कराने का कार्य किया जाता है जो आज के इस विकसित युग में मानवता के लिए एक कलंक  है । कहीं-कहीं पर सिर पर मैला रखकर ढोने की भी प्रथा है।  नगरपालिका या कस्बा के स्थानीय प्रशासन के पास बजट नहीं होता इस बात का तर्क दिया जाता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी की मांग है कि इन श्रमिकों  के वेतन में वृद्धि की जाए ताकि इनका जीवन स्तर सुधर सके।  एक राजनीतिक दल के रूप में भारत के कल्याणकारी राज्य के अंतर्गत ऐसी व्यवस्था के पक्षधर हम नहीं हो सकते। इसलिए एक राजनीतिक दल के रूप में जनता की आवाज सरकार के पास तक पहुंचाते हुए सरकार से यह अपेक्षा करते हैं कि इस मामले का त्वरित संज्ञान लेकर सभी संबंधित पक्षों को सख्त निर्देश दे।श्रमिकों की नियुक्ति सरकारी कर्मचारी की तरह से की जाए। उन्हें वेतन समय से मिले वेतन के साथ साथ आवास चिकित्सा उनके बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था भी अन्य शासकीय कर्मचारियों की तरह से ही की जाए । इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि सफाई कर्मचारियों को ठेकेदारों के हवाले न किया जाए और इस विभाग से ठेकेदारी की प्रथा को अविलंब समाप्त किया जाए ताकि समाज को साफ सुथरा रखने वाले इन महत्वपूर्ण कर्मचारियों की जीवन चर्या में बदलाव हो सके। माननीय प्रधानमंत्री जी का भी यह संकल्प है कि भारत को स्वच्छ बनाना है। ऐसे में इस महती कार्य को करने वाले लोगों के कल्याण को नकारना और उपेक्षा करना  सही नहीं है।

 सरकारी सेवाओं में एक बहुत बड़ी समस्या यह है की किसी कारणवश सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध निलंबन अथवा विभागीय जांच  के मामले हैं तो इनमें  ऐसा देखा गया है कि सरकारी कर्मचारियो के अनुशासनिक मामलों में अनावश्यक विलम्ब किया जाता है।कभी तो निलाम्बन के पश्चात कई महीनों तक chagesheet नही दी जाती और यदि chargesheet दे दी गयी तो IO /PO नियुक्त करने मे अनावश्यक विलम्ब किया जाता है।यह भी देखा गया है की IO /pO भी अपनी जांच में बहुत विलम्ब करते है और कई मामलों में यह 10 वर्ष या उससे अधिक का समय लगा देते हैं।  जिस कारण कर्मचारियों का भविष्य लंबे समय तक अनावश्यक रूप से अनिश्चय में रहता है और उनका असहनीय उतपीड़न होता है।  अतः आवश्यक है कि सरकार यह सुनिश्चित करें कि जो भी अधिकारी जांच में संलग्न हैं उन्हें समय से जांच  की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए समय बद्ध तरीके से काम करने का निर्देश दें। और जो अधिकारी ऐसा नहीं करते उनके ही खिलाफ जांच बैठा कर उनके विरुद्ध कर्तव्य में लापरवाही के लिए कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। ताकि निलंबित अधिकारी को न्याय मिल सके और सरकार का काम सुगमता पूर्वक संचालित हो सके।

Monday 14 2023

अपनी मां की पहचान हूं मैं

 सूरज ने मुझे जन्म लेने से अबतक

अपनी आभा के स्वर्ण से तपा तपा कर

ऐसे निखारा है कि मुझे पारस बना दिया

पिता की तरह 

हवाओं ने अपने आंचल से

मुझे छू कर ये जताया है कि मां यहीं है

मेरे आसपास 

जब से मैंने ये जाना है

उनको पहचाना है

मुझको मेरी जिंदगी आसान लगने लगी है बचपन की तरह

मेरा बचपन फिर से लौट आया है।

मैं कहीं भी जाता हूं

कोई छाया मेरे साथ साथ चलती है

जिंदगी खुद गिर कर संभलती है

रात तारों भरी हो या चांद से रौशन 

कोई प्यार की रोशनी है जो

हर हाल मे मेरी हमसफ़र है हमक़दम है।

मेरी जिंदगी का काफिला

रुखसत है अपनी मंजिल की जानिब

ये क्या है कौन है मेरा हौसला बनकर 

मेरे कानों में गीतों की मिसरी घोलता है

मेरा लल्ला है तू मेरा प्यारा है तू

कुछ ऐसा ही वो मुझसे बोलता है।

अजेय है, अजातशत्रु है तू

भूल कर भी हार ना जाना

तुम्हारे नाम की ख्वाहिश है इस दुनिया को

लिखना है तुम्हें अभी आसमां पे

अपना नाम और पहचान अपनी

क्योंकि तू सूरज है चांद है

दुनिया में एक तू ही तो है जो

मेरी पहचान है।

न्यायालय परिसरों में महिलाओं के लिए सुलभ शौचालय की व्यवस्था

 भारत में सार्वजनिक स्थलों पर शौचालयों की आवश्यकता पर सबसे पहले इस देश के महान नागरिक श्री विंधेश्वरी पाठक द्वारा सोच विचार किया गया और सुलभ कंपलेक्स की अवधारणा का विकास हुआ। श्री पाठक ने केवल अवधारणा ही नहीं दी बल्कि उन्होंने अपने एनजीओ के माध्यम से बहुत सारे कंपलेक्स बनवाए भी । इसके उपरांत इसे सरकार ने अपने एजेंडे में शामिल किया और सार्वजनिक स्थानों पर पूरे देश में सुलभ कंपलेक्स नजर आने लगे। सुलभ कंपलेक्स के आने से एक तरफ आम नागरिकों का जीवन आसान हुआ तो दूसरी तरफ जगह जगह गंदगी और मानव मल मूत्र की दुर्गंध से मुक्ति मिली । फिर भी यह कार्य अभी भी बहुत जगहों पर किया जाना शेष है।  अतएव नागरिक जब सफर करके अपनी मंजिल पर पहुंचते थे तभी वह  दैनिक क्रिया कर सकते थे। वह तकलीफदेह दिन बहुत दुखदाई थे और सफर करने वालों को खासतौर से बहुत कष्ट होता था। ऐसे में महिलाओं की स्थिति और भी खराब होती थी। उन्हें जिस यातना और शर्मिंदगी से गुजरना पड़ता था यह बात कल्पना से परे है । इसलिए श्री बिंदेश्वरी पाठक के द्वारा किया गया यह योगदान भारत के लिए एक अमूल्य और अनमोल   है। उनके द्वारा इसका क्रियान्वयन किया जाना उन्हें आम नागरिकों से ऊपर का दर्जा भी देता है इसीलिए उनकी सेवाओं की पहचान करके भारत सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया । वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा इस विषय पर बहुत प्रशंसनीय कार्य किया गया और सरकारी धन खर्च करके  गांव-गांव घर-घर व्यक्तिगत शौचालय और सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण से गंदगी को नियंत्रित करने में एक तरफ जो सहायता मिली वह तो प्रशंसनीय है ही इसके अलावा इससे आम नागरिकों को जो सुविधा मिली है वह भी बहुत बड़ी बात है। इसके ना होने की स्थिति में बारिश के दिनों में रात्रि कालीन समय में दैनिक क्रिया करने में जिस परेशानी का सामना उठाना पड़ता था वह बहुत बड़ी समस्या थी । यहीं पर यह भी कहना आवश्यक है कि हमारे देश की आधी आबादी की समस्याएं कुछ अलग तरह की है । हमारी सामाजिक व्यवस्था में महिलाएं अपने संस्कारों के कारण खुले में शौच जैसी समस्या से बहुत अधिक परेशान रही है। इसी के कारण कई बार उनके साथ ज्यादतियां और बर्बरतायें करने वालों को अवसर मिल जाता रहा है जिससे उनका घर से बाहर निकलना सुरक्षा का भी एक प्रश्न था।  जिस को हल करने में काफी मदद मिली है ।लेकिन अभी भी एक बात बहुत ही विचारणीय है की ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत घरों और सार्वजनिक शौचालय में निर्माण कार्य की गुणवत्ता बहुत खराब है और बहुत सी स्थितियों में बनाए गए शौचालय उपयोग के योग्य नहीं है । कारण यह है कि यह पूरी तरह बन नहीं सकते हैं । ग्रामीणों से बातचीत से यह पता चलता है की शौचालय बनवाने के मद में जो पैसा दिया जाता है वो इतना कम होता है कि इतने में शौचालय पूरा बन नहीं पाता। नागरिक अपने पास से इस मद में पैसा खर्च नहीं कर पाते जिसके कारण एक ढांचा बनकर खड़ा हो जाता है लेकिन उस ढांचे का कोई उपयोग नहीं होता ।अगर निष्पक्ष रूप से जांच की जाए तो बहुत से ऐसे शौचालय मिलेंगे जिनमें टायलेट सीट नहीं बैठी ,या दरवाजा नहीं लगा, या टैंक नहीं बना या छत नहीं डली। सरकार ने नारा दिया कि दरवाजा बंद तो बीमारी बंद। लेकिन यह नारा निरर्थक ही रहा क्योंकि ना दरवाजा बंद हो सका ना बीमारी बंद हो सकी। अब इस बात पर सरकार अपनी पीठ ठोक सकती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और  है । इन्हीं कारणों से यह उपयोग के लायक नहीं है। इसकी वजह है कि इस मद में जितना पैसा दिया जाना चाहिए उससे कम पैसा ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को दिया जाता है। किसान गेहूं बेचकर टॉयलेट बनाएगा जो गेहूं उसके पास पैदा ही नहीं होता बल्कि सरकार उसे 5 किलो प्रति माह की दर से खाने के लिए ही आवंटन करती है। यह तो रही व्यक्तिगत और घरेलू समस्याएं सरकारी कार्यालयों में भी समस्या इससे अलग नहीं है। बहुत सी ऐसी जगह हैं जहां बड़ी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति होती है और वहां पर पुरुष और महिला के लिए अलग-अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं की गई है।  जैसे जिला न्यायालय परिसर एवं और भी सरकारी परिसरों का नाम लिया जा सकता है जहां सरकार का ध्यान अभी तक नहीं गया है । यह बात सामान्य विकास कार्यक्रमों के स्तर तक नहीं देखी जा सकती।  क्योंकि यह जिला न्यायालय में आने वाली महिलाओं के लिए प्रति मिनट समस्या का सबब है।  सरकार को प्राथमिकता के आधार पर इस कार्य को किया जाना चाहिए था। लेकिन इसका मूल्यांकन करने वाले लोगों से कहीं भूल हुई है जिसके कारण यह जिला न्यायालय परिसर इस योजना से छूट गया है। इसी प्रकार के जिन अन्य विभागों में इस तरह की कमियां बच गई है उसे शीघ्र पहचान करके वहां पर महिलाओं के लिए भी शौचालय की  व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि पुरुषों की स्थिति इस मामले में थोड़ी अलग है। समस्या होने पर वह इसका  समाधान कर लेते हैं क्योंकि उनके लिए कहीं भी यह कार्य कर लेना मुश्किल नहीं होता । लेकिन जैसा कि ऊपर की पंक्तियों में कहा गया है कि महिलाओं की स्थिति भारत में अलग प्रकार की है जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। एक सर्वे के अनुसार यह पाया गया कि  कई जिला न्यायालय परिसर में तो यह व्यवस्था नहीं मिलने से उपजी चिंता के कारण यह बात प्रकाश में लाई जा रही है और यह उम्मीद है कि केंद्र सरकार शीघ्र ही इस पर कार्यवाही करेगी ।


मोहन धनराज

महिलाओं की सुरक्षा: चुनौतियां क्या हैं ? ---------------------_--------_------__-__----

 

महिलाओं के ऊपर घरेलू हिंसा , सामाजिक प्रताड़ना की जड़े यहां की संस्कृति और  इतिहास में पैबस्त है। बाल विवाह, बेमेल विवाह ,सती प्रथा ,जौहर शिक्षा के अधिकार से वंचित ,सामाजिक बराबरी से वंचित , पर्दा प्रथा से युक्त, महिलाओं की दयनीय दशा का इतिहास बहुत पुराना है। बाल विवाह के पश्चात यदि बेमेल विवाह भी हो ऐसी स्थिति में बालिकाओं की शारीरिक स्थिति का जो चित्र समझ में आता है वह मानवों के बर्बर व्यवहार की कहानी कहता है ।इनकी बर्बरता की कहानी यहीं नहीं रुकती। जिस जमाने में मनुष्य की भारत में सामान्य जीवित रहने की उम्र 45 साल हुआ करती थी उस जमाने में महिलाओं के पतियों के मर जाने के पश्चात उन्हें सती प्रथा के लिए विवश कर दिया जाता था और जबरदस्ती चिता पर बैठाया जाता था। जिन सामाजिक परिवारों में सती प्रथा नहीं थी वहां पर भी महिलाओं को सिर मुड़ा कर सफेद वस्त्र पहनना , किसी भी प्रकार का शौक श्रृंगार नहीं करना, जमीन पर सोना, एक समय खाना और हंसना मुस्कुराना बंद।  वह किसी मांगलिक कार्य में भाग नहीं ले सकती थी। यह स्थिति भारत में बहुत लंबे समय तक चलने के उपरांत महाराज हर्षवर्धन ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई। उनके पश्चात कुछ वर्षों तक कुछ भी नहीं बदला। फिर 18वीं शताब्दी आते-आते राजा राममोहन राय ने इस पर काम करना शुरू किया ।लेकिन भारत में कोई भी बदलाव बिना कानून के नहीं हो सकता क्योंकि यहां के लोगों की आस्थाओं की जड़ें बहुत गहरी हैं ।19वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने कानून बनाकर जब बाल विवाह, सती प्रथा और जौहर जैसी कुरीतियों को असंवैधानिक करार दिया उसके बाद भारत में बदलाव का आरंभ होता है। महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से भी पूर्ण वंचित किया गया था जिसके कारण वह अपने प्रति होने वाले इस प्रकार के अत्याचारों का प्रतिकार नहीं कर सकती थी।  19वीं सदी में सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिबा फुले ने महिलाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए बालिकाओं को शिक्षा के लिए स्कूल खोला और उनकी पढ़ाई के रास्ते खुलने लगे। लेकिन इसके लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा । भारत की आजादी से कुछ पहले अंग्रेजों ने  महिलाओं की स्थिति को बेहतर करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में उनके लिए रास्ते खोलने का कार्य किया था।  लेकिन महिलाओं के कल्याणकारी कार्यों की वास्तविक शुरुआत भारतीय संविधान लागू होने के पश्चात 26 जनवरी 1950 से आरंभ होती है । भारत के संविधान में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और संविधान समिति के अन्य सदस्यों के उदारता पूर्वक चिंतन से महिलाओं के लिए समान नागरिक संहिता, वोट का अधिकार, शिक्षा का संपूर्ण अधिकार, कार्य करने के लिए पुरुषों के बराबर सम्मान अधिकार, समान वेतन, और अन्य सुविधाएं, प्रसूति अवकाश अपने लिए वर चुनने की आजादी, तलाक लेने का अधिकार ,संपत्ति में अधिकार नौकरी करने का अधिकार जैसे अधिकारों को शामिल करके उनकी स्थिति को एक आधार दे दिया। तब से लेकर आज तक महिलाएं अपने विकास पथ पर अग्रसर है और उन्होंने ऊंचाई की हर बुलंदियों को छुआ है। फिर भी जैसा कि ऊपर की पंक्तियों में कहा गया है कि महिलाओं के प्रति अमानवीय आचरण की जड़े इतिहास में पैबस्त हैं , अतः यह बातें इतनी आसानी से जा भी नहीं सकती। क्योंकि हमारे देश का जो सामाजिक ढांचा है वह पुरुष प्रधान है। दूसरी वजह यह है कि समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व के कारण घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं की संख्या काफी कम होती है। ऐसी स्थिति में जब कभी भी अत्याचार की घटनाएं घटी हैं तो उन्हें रोक लगाने वाले लोगों की कमी होती है। ऐसा संभव नहीं है कि हर जगह पुलिस मौजूद ही रहे । अतः जहां कहीं भी महिलाएं अकेली अथवा कमजोर स्थिति में होती है उनके साथ अप्रिय घटनाएं घट जाती है। इसे   रोक पाने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। बस प्रश्न है कि यह पुरुष समाज महिलाओं को क्यों कमजोर पाकर उनके प्रति बर्बर हो जाता है। इस पर चिंता करने की आवश्यकता है। वैसे तो घरेलू हिंसा भी कम नहीं होती और घरेलू हिंसा के मामलों का अध्ययन किया जाए तो इस प्रकार की हिंसा करने कराने में महिलाओं का भी योगदान कम नहीं होता। किंतु समाज में जब स्त्रियों के प्रति अत्याचार होते हैं तो उसमें पुरुषवादी मानसिकता का ही योगदान अधिक होता है और इस प्रकार के अत्याचारों में जब अपराधियों को सही ढंग से सजा नहीं मिल पाती तब उनके हौसले और भी बुलंद होते हैं और उनके देखा देखी कुछ अन्य दुष्ट मानसिकता के लोग प्रेरित भी होते हैं।

 अतः इस विषय पर बहुत चिंतन मनन के पश्चात राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी ने यह बात अपने राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल किया है कि महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों के प्रति हमारी सरकार का रुख जीरो टॉलरेंस का होगा। केवल महिलाएं ही नहीं बालक, बालिकाएं और बुजुर्ग को भी इस दायरे में रखते हुए हमारी पार्टी इन पर होने वाले किसी भी अत्याचार को एक भी मिनट के लिए सहन नहीं करेगी और अपराधियों की त्वरित गिरफ्तारी के साथ-साथ उन्हें लगातार चलने वाले ट्रायल के उपरांत 30 दिन से 45 दिन के अंदर उपयुक्त धाराओं में जेल भेज कर उन्हें दंडित करेगी ताकि महिलाओं के प्रति अत्याचार करने वाले लोगों को एक उदाहरण देखने को मिले और जिससे कि वह भविष्य में इस प्रकार की किसी घटना को अंजाम देने से पहले कई बार सोचे। इसके साथ ही साथ यह भी आवश्यक है कि हमारे समाज को महिलाओं के प्रति किए जाने वाले व्यवहार के प्रति सजग और संवेदनशील होना पड़ेगा । इसकी शिक्षा घर परिवार और स्कूल से बराबर बच्चों को दी जानी चाहिए। इसके लिए भी सरकार प्रयत्न करेगी और हम सामाजिक रूप से पूरे समाज का भी आह्वान करते हैं कि हमें अपनी बालिकाओं के सुरक्षित जीवन और संरक्षित भविष्य के लिए हर प्रयास में कंधे से कंधा मिला कर चलने की आवश्यकता है।

Sunday 13 2023

The Earth hour

 Every moment is Earth hour. Every work of humans depending upon artificial means based on energy tempers the flow of nature. The period of lockdown has given this lesson very evidently . The rivers became clean without our efforts, atmosphere, air and sound pollution was minimal. In this forced nature friendly behaviour of humans gave many human friendly results. Many rare birds and animals came out when they found suitable atmosphere for them. But as the life started coming on track, the things started reversing. Hence, the nature has told us what it wants . Now it is upto humans to choose their way of life.The World wide fund for nature had taken an initiative years back as earth hour which is very likely to what nature told us during lockdown period. Let us understand it in a bird's eye view.The initiative of Earth hour by world wide fund for nature is very appreciable  and the entire world should stand behind this call .The last observed Earth  hour were partially successful but it needs much attention of people entire world to understand the the need of earth hour and observe it  very honestly as a gesture  of  regard to the mother nature. The quantum of multi-faceted pollution has become so dangerous that the climate has taken a drastic change all around the world. The melting glaciers are alarming. Air has become so polluted that it is causing so many diseases to humans and other organisms on the planet which is very e difficult to to cope with. The water borne diseases have increased and they have created so many problems to humans. It has been observed during last several years that so many changes have occurred in the nature which is difficult to understand . The world is is passing through the menace of coronavirus  and we are still much far away from making any  medicine to protect the the people from this disease. Bed  worse is the fact that in place of coming in to control it is is taking mutations and gradually becoming an unsolvable puzzle for scientists. Above all the situation of of pollution is very  alarming so we must take a serious note of it and do our best to bring change in our life style so that it may bring such changes in nature which are noticeable and become favourable to the planet. The serene nature and its pure cool breez and clean water flowing in rivers and fountains create such a beautiful music which is is a loving experience to the eyes and ears.If you want to observe the nature in its full Glory you have to enter into remote forest where no  voice or noise of human habitat , transport ,industries , and other man created sound you will be able to listen the sound of of stillness and serenity. The flowing river, the chirping Bird and blowing wind   create the beauty of nature and make you realise what you have lost in the search of development and new style of living . It is important to note that in this scenario the initiative of world wide fund for nature is very  timely initiative that we all must extend a warm welcome and co-operate and associate with the entire world. The last Earth hours and their results have been very encouraging and  motivating. It is worth to think it again with a new vision and move forward stepwise in planned manner to make it a grand success for the mother earth .If we  want to go ahead we must have plan to stop the entire world for 1 hour  in such a manner that everything is  still and stagnant between 8:30 to 9 .30 in the night of 26th March 2022. let us start it from today itself that we shall not put our vehicles on the road on  that night,  we shall not switch on any electrical appliances during that stipulated date and time, we shall keep off from the road and inside our homes, shut the markets , shops and every activities to observe the earth hour. It is very difficult to do so as the life today is very complex and not easy  to stop everything suddenly but when there is a question of life and death as we have seen during the pandemic of covid-19 the entire world had been bound to stop . It happened as we had no option except to stop everything. Similarly when there is a question of betterment of the earth it must be taken as the ultimate without thinking for any  option. To make it a grand success we have to plan it from today itself and ensure that everything goes stand still on that  Earth hour day . Not only this but we have to be observant to monitor the results it gives to the world . How does it  appear to our ears when there is no artificial sound in the  atmosphere and how does the  earth behaves during this time! You will be astonished to see the the behaviour pattern of the  atmosphere if you observe the earth hour with this sincerity. We have not to  stop here only but it should be made a practice that the time duration of earth hour may be extended gradually and be brought to a time span of 24 hour in a year and then we shall be able to see how beautiful  the universe was  100 years ago!!

This agenda can be taken up by the entire world and plan its movement accordingly so that nobody is bound  to come out from his home and operate any  electrical appliances, drive vehicles and switch on lights. The world wide fund for nature should ud take the initiative and give guidelines to the entire world to follow the pattern sincerely. All the governments in various Nations should issue guidelines to the natives to follow the guidelines strictly so that proper result can be obtained. It can become a grand success if every citizen and every nation takes it as a call to protect the earth , the mother nature and stop climate change.


Mohan Dhanraj

IBPS, ASSTT DIRECTOR (Retd.)

Doordarshan Lucknow.

हर मुश्किल से लड़ना सीखो

 हर मुश्किल से लडना सीखो,

सर उठा के जीना सीखो

मुश्किल चाहे कितनी ही हो

हंसते हंसते लड़ना सीखो

जुल्म के आगे झुकना मत

ज़ुल्मत के हाथ तोड़ना सीखो

कमजोरों पर ज़ुल्म हुए हैं

ये इतिहास पुराना है

बदलो ये इतिहास पुराना

जुल्म के हाथ मरोड़ना सीखो 

जीना है अस्मिता के लिए

आनपे मरना मिटना सीखो

बहू बेटियों की लाज से खेले

खेत या बाग तुम्हारे ले ले

हस्ती उसकी मिटा के रख दो

ये तरकीब लगाना सीखो

पढ़ना और पढ़ाना सीखो

सब को गले लगाना सीखो

मेहनत करना सीखो तुम

जीवन अच्छा जीना सीखो

दारू और शराब छोड़ कर

घर को धन से भरना सीखो

सब कलंक मिट जाएंगे

छूआछूत भी मिट जाएगा

आगे बढ़ो गांठ बांध लो

जीने के लिए भी मरना सीखो।

मोहन धनराज

IBPS,Asstt. Director (Retired)

DDK, Lucknow,

Saturday 12 2023

कविता - मेरे पहलू में कोई आग है

 मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद  सुलगता है,

जलता है 

उसकी सेंक से मैं नहीं

 मेरी रुह हर वक्त 

कतरा कतरा जलती है

एक कशमकश होती है

क्या करूं किधर जाऊं

जिधर भी जाऊं

एक जलता साया सा है

मेरे भीतर जलता है 

उसकी सेंक से मेरा वजूद

 जलता है पिघलता है।

मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद सुलगता है

जलता है ।

वो मेरी हमराह है

छोड़ती नहीं मुझको तन्हा

मेरे भीतर एक आग है

जो मेरे साथ हर रोज हमबिस्तर है

नींद की परछाइयां भी 

मुझ तक नहीं आती

मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद  सुलगता है

जलता है ।

वो मेरा बचपन था जब मैं

बेसाख्ता हंसता था

दौड़ता था तितलियों के पीछे

हर शय मुस्कुराती थी मेरी जानिब

जवां होकर हंसी मुझसे रूठ गई

तितलियां अब ना रहीं 

ना बचपन का ज़माना रहा

बस एक आग है जो हर सू मेरे

दहकती है जलती है 

मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद  सुलगता है,

जलता है ।



मोहन धनराज

आईबीपीएस 

सहायक निदेशक (सेवानिवृत्त )दूरदर्शन लखनऊ

Ganga Tera Pani Amrit.

 गंगा का पानी अमृत है। हम इसे गंगाजल कहते हैं। गंगा में नहाने से पवित्रता आती है । गंगा को हम गंगा माता भी कहते हैं। गंगा माता धरती पर जीवो के लिए वरदान है । गंगा नदी हिमालय से निकलकर मैदानों पर होते हुए हिंद महासागर में मिल जाती है । गंगा के रास्ते में बड़े-बड़े मेले लगते हैं। इन मेलों में बहुत सारे देवताओं के मंदिर बने होते हैं । यहां लोग दर्शन करने आते हैं और मेले में लगने वाली दुकानों में बच्चों के लिए खाने पीने की अच्छी अच्छी चीजें और खिलौने बिकते हैं। खिलौनों के अलावा मेले में तरह-तरह के झूले और खेलने की जगह बनाई जाती है। ।लेकिन गंगा नदी के प्रदूषण से इसके सामने खतरा पैदा हो गया है। गंगा नदी  का जल अब इतना प्रदूषित हो गया है कि नदी के जीव जंतु का जीवन खतरे में पड़ गया है। इसके जल में विभिन्न प्रकार की जहरीली चीजें पड़कर गंगाजल को स्वास्थ्य के लिए नुकसान देवी बना दिया है। शहरों के नाले का पानी सीधे नदी में गिरने लगा है जिसके कारण बहुत सारे केमिकल गंगाजल में मिलने लगे हैं। फैक्ट्रियों का गंदा पानी भी नदी में गिरता है । फैक्ट्रियों के पानी में भी खतरनाक केमिकल होते हैं। इनकी वजह से पानी खराब होता जा रहा है ।पहले कभी गंगा नदी का जल एकदम साफ होता था अब यह जल गंदला हो चला है ।देखने में आता है कि अक्सर लोग अपने घरों से पूजा आदि करके बची हुई सामग्री को गंगा नदी में बहा देते हैं। इसके अलावा कुछ लोग मनुष्यों के शव भी लाकर नदी में बहते हैं जिससे गंगा नदी का पानी अत्यधिक प्रदूषित होता जा रहा है। गंगा नदी में हर साल लगने वाले मेलों में बड़ी संख्या में लाखों लोग प्रतिदिन गंगा में नहाते हैं। यदि गंगाजल इसी प्रकार प्रदूषित होता रहा तो गंगा में स्नान करना मुश्किल हो जाएगा इसके अलावा इसकी प्राकृतिक सुंदरता भी नष्ट हो जाएगी। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है । परिस्थितियों को अभी ठीक किया जा सकता है । आज भी अगर आप जाकर देखें तो गंगा नदी में प्रसिद्ध साइबेरियन पक्षी जाड़े के मौसम में देखने को मिलते हैं। हजारों किलोमीटर दूर से चलकर साइबेरियन पक्षी हर साल प्रयाग में आते हैं और गंगा माता की गोद में खेलते  हैं ।इस दौरान गंगा में नाव में बैठे तीर्थयात्री पक्षियों के साथ बहुत आनंद मनाते हैं। कुंभ के मेले में पूरे भारत से संत महात्मा आते हैं और अपने अपने प्रवचन से लोगों को ज्ञान का पाठ पढ़ाते हैं। ज्ञान से हमको अच्छा जीवन जीने में सहायता मिलती है। इस प्रकार गंगा में शरीर की शुद्धता के साथ-साथ मन की शुद्धता की भी बात कही जाती है। प्रयागराज में गंगा यमुना और सरस्वती का संगम है। संगम में स्नान करने से पुण्य मिलता है ।यहीं पर बड़े हनुमान जी का मंदिर है और पास में ही इलाहाबाद का किला है जिसे अकबर ने बनवाया था। इस किले में भी बहुत से मंदिर हैं जिन्हें देखने के लिए यात्री रोज पहुंचते हैं ।गंगा के पूर्वी किनारे पर झूसी स्थित है। इसको पुराणों में प्रतिष्ठान पुरी के नाम से जाना जाता है। गंगा नदी पर दो रेल पुल मेले के बीच में है और दो सड़क पुल भी हैं। इस प्रकार गंगा नदी के पूर्वी किनारे से आने वाले लोगों को इस पुल से गंगा के किनारे आने में मदद मिलती है ।कुंभ मेला के दौरान पूरे विश्व से हर धर्मों के मानने वाले और हर धर्मों के पुजारी धर्मगुरु अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने आते हैं। यहां बहुत सी पुस्तके भी बिकती हैं ।इन पुस्तकों में तमाम तरह के धार्मिक कथानक और ज्ञान की बातें लिखी होती है । कुल मिलाकर गंगा नदी शारीरिक स्वास्थ्य और मनकी पवित्रता का संगम है। हमें गंगा को प्रदूषित होने से बचाना है । सरकार का भी ऐसा मानना है कि गंगा नदी में शवों को बहाना और गंदे पानी को डालना गलत है। गंगा में गंदगी के बजाय पाप को धोया जाए तभी गंगा का कल्याण होगा। तभी मनुष्यों का कल्याण हो सकेगा। पुराणों में कहा गया है-" गंगे तब दर्शनार्थ मुक्ति:।

मोहन धनराज

 आईबीपीएस 

सहायक निदेशक (सेवानिवृत्त)

दूरदर्शन लखनऊ


उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...