याद ए माज़ी में मोहम्मद रफी शामिल है किस तरह! दिल के उन्हीं कोनों को टटोलने की कोशिश करेंगे । हिंदी, पंजाबी, उर्दू सहित कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में 28000से अधिक और अकेले हिंदी में 7000 से अधिक गाने रिकॉर्ड करने वाले अज़ीम शख्सियत के मालिक मोहम्मद रफी एक सामान्य इंसान तो नहीं थे । भारत की किस्मत में हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग जब ईश्वर ने लिखा था तब उन्होंने इसे पूरा करने के लिए मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, मुकेश आशा भोसले ,मन्ना डे, सुरेश वाडकर और महेंद्र कपूर जैसे गायक कलाकारों को भी भेजा। गीतकार और संगीतकारों की जोड़ियां भी धरती पर आई और यह बात आकस्मिक नहीं लगती कि इस समय सारे चोटी के गायक गीत लिखने वाले संगीत संयोजन करने वाले एक साथ मौजूद थे। हम में से जो लोग 50 से 60 के दशक तक जन्मे हैं उन्होंने मोहम्मद रफी को अपनी जिंदगी में अपनी धड़कनों में महसूस भी किया है।उन्होंने उनको गानों को रिकॉर्ड करते हुए सुना है। फिर उन्होंने उन्हें यह भी कहते हुए सुना है कि "तुम मुझे यूं भुला न पाओगे"... और तब क्या वो जानते थे कि इस तरह अपनी यादों को देकर ये महान गायक 31 जुलाई 1980 को चुपचाप हमें अलविदा कर जाएगा! भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लोग 31 जुलाई 1980 के दिन उनके जाने की मनहूस खबर सुनकर सन्न रह गए थे। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि इतने खूबसूरत गाने अभी तो शुरू ही हुए थे, इन्हें किसी मुकाम तक जाना था, यह अभी कैसे खत्म हो सकते हैं? यह सही हो सकता है कि हम अपनी उम्मीद से ज्यादा पाने की हसरत रखते हैं लेकिन देने वाले के लिए यही मोहम्मद रफी का मुकाम था। यही मुकाम था हमारी हसरतों का! क्योंकि हसरतें तो कभी खत्म नहीं होती। जो हम जानते तो क्या मोहम्मद रफी को यूं ही जाने देते! जो हमारे वश में होता तो क्या हम मोहम्मद रफी को यूं ही अपने से जुदा होने देते!
बहरहाल आज दिन है उनकी यादों को फिर से स्मरण करने का, तो हम उनके सफर की शुरुआत से अपनी बात शुरू करेंगे। मोहम्मद रफी ने हिंदी फिल्मों का जो सबसे पहला गाना गया था वह था "अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी" । यह समय वर्ष 1945 था और फिल्म का नाम था गांव की गोरी । यहां से शुरू होकर हिंदी फिल्मों के गानों के उनके सफर में बहुत से मुकाम आए और जो गाने उन्होंने गाए वह सब एक से बढ़कर एक रहे हैं। भाषा भाव और सीन की जरूरत और कलाकार के नाम के हिसाब से जिस तरह उन्होंने गाने गए वह सुनने में और परदे पर देखने में दोनों ही स्तरों पर मन को बांध लेते हैं। उनके द्वारा गाये भजन "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" सुनने से ऐसा लगता है कि इस भजन को गाने के लिए ही मोहम्मद रफी की आवाज बनी थी। सोच कर देखें कि यह गाना कोई और गाता तो कैसा होता! ज़ेहन में नहीं समाता कि ये गाना कोई और गा सकता था। इसी से ऐसा लगता है कि नियति ने गायकों गीतकारों और संगीतकारों की जोड़ी को भारत में हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग का सृजन करने के लिए ही भेजा था। यह जरूर है कि उस समय की पीढ़ी ने इसको अपने सामने घटित होते हुए देखा था लेकिन विज्ञान और तकनीक ने इसे हर पीढ़ी के लिए उपलब्ध बना दिया। हम सब का सौभाग्य ही है कि हवाओं के रास्ते हमारी इंद्रियों को स्पर्श करके हमारी आत्मा में उतर जाने वाले गीतों के गायक मोहम्मद रफी बहुत से मायनों में सबसे अलग हैं। मोहम्मद रफी 55 वर्ष तक जीवित रहे इस दौरान उन्होंने अपने समय के सभी कलाकारों के साथ काम किया और सभी से उनके रिश्ते बहुत अच्छे ही रहे। मोहम्मद रफी सादा जीवन जीते हुए बेहद संजीदा इंसान थे । एक बेहतरीन कलाकार के रूप में जो उनकी पहचान है वह उनके गाये गानों की खूबसूरती से मिलकर उनकी जो इमेज हमारे मानस पटेल पर बनाती है वह अमिट है। उनकी गायकी में कुछ ऐसे पड़ाव भी है जो चीजों बातों और लोगों को एक अलग प्रभाव दे जाते हैं। अमर अकबर एंथोनी जो कि लगभग वर्ष 1977 के आसपास बनी थी इस फिल्म में एक गाना है "हमको तुमसे हो गया है प्यार" इस गाने में मोहम्मद रफी के साथ किशोर कुमार लता मंगेशकर और मुकेश ने एक साथ गाया और हम सभी जानते हैं कि यह तीनो शख्सियतें अपने आप में बॉलीवुड की सबसे महान गायक गायिका हैं और जब ये तीनों एक साथ मिले तब वह गाना रिकॉर्ड हुआ जो अमर अकबर एंथोनी फिल्म का यादगार गाना बन गया। ऐसा माना जाता है कि यह एकमात्र ऐसा मौका था जब इन सभी महान कलाकारों ने मिलकर कोई एक गाना रिकॉर्ड किया। मोहम्मद
रफ़ी दो फ़िल्मों में परदे पर भी नजर आए थे। वो फ़िल्में थी लैला मजनू जो वर्ष 1945 में बनी और गाना था "तेरा जलवा जिस ने देखा वह तेरा हो गया" और दूसरी फिल्म थी जुगनू जो वर्ष 1946 में बनी और गाना था "वो अपनी याद दिलाने को"।
वर्ष 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद हुस्नलाल भगतराम-राजेंद्र कृष्ण-रफ़ी की टीम ने रातों-रात "सुनो सुनो ऐ दुनियावालों, बापूजी की अमर कहानी" गीत तैयार किया था। उन्हें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने घर पर गाने के लिए आमंत्रित किया था। 1948 में, मो रफ़ी को भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर जवाहरलाल नेहरू ने रजत पदक देकर सम्मानित किया।
उन्हें छह फिल्मफेयर पुरस्कार और एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला । 1967 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया 2013 में, रफ़ी को सीएनएन - आईबीएन के सर्वेक्षण में हिंदी सिनेमा में सबसे महान आवाज़ के लिए वोट दिया गया था।
उन्होंने एक हज़ार से ज़्यादा हिंदी फ़िल्मों और कई भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कुछ विदेशी भाषाओं में भी गाने रिकॉर्ड किए।
मोहम्मद रफी ने
नौशाद, एसडी बर्मन, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, ओपी नैय्यर लक्ष्मीकांत ,प्यारेलाल और कल्याण जी आनंद जी सहित उस समय के सभी सिद्ध हस्त और मशहूर संगीतकारों के साथ उनके संगीत निर्देशन में गाने गए।
उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मी गानों की रॉयल्टी में गायक कलाकारों के हिस्से की बात चली थी। जिसे मोहम्मद रफी ने अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि फिल्म का प्रोड्यूसर अपने पैसे लगाता है और रिस्क लेकर काम करता है। फिल्म के चलने पर उसे पैसे मिलते हैं और अगर फिल्म नहीं चलती तो उसके पैसे भी डूब जाते हैं तब उसे कौन सहायता करता है ? व्यावसायिक दुनिया में भी उनके इस मानवतावादी विचारों के लिए हम उन्हें याद करते हुए सलाम करते हैं।1970 के दशक में, मो रफ़ी लंबे समय तक गले के संक्रमण से पीड़ित रहे। हालांकि इस अवधि मैं उन्होंने अपेक्षाकृत कम गाने गाए फिर भी अपने कुछ बेहतरीन और सबसे लोकप्रिय गाने भी इसी दौरान गाए, जैसे "ये दुनिया ये महफिल", "गुलाबी आंखें", "झिलमिल सितारों का आंगन होगा","तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे", "रे मामा रे मामा रे", "नफरत की दुनिया को", "ये जो चिलमन है", "कुछ कहता है ये"। सावन'', ''कितना प्यारा वादा'', ''चलो दिलदार चलो'', ''आज मौसम बड़ा बे-ईमान है'', ''चुरा लिया है तुमने'', आदि ।
बाद के वर्षों में
1970 के दशक के मध्य में रफ़ी ने एक प्रमुख गायक के रूप में वापसी की। वर्ष 1974 में बनी फिल्म हवस में उन्होंने उषा खन्ना द्वारा रचित गीत "तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद" के लिए फिल्म वर्ल्ड पत्रिका में सर्वश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार जीता ।
वर्ष 1976 में, रफ़ी ने ब्लॉकबस्टर फिल्म लैला मजनू में ऋषि कपूर के लिए सभी गाने गाए । रफ़ी ने बाद की हिट फिल्मों में ऋषि कपूर के लिए कई और गाने गाए, जिनमें हम किसी से कम नहीं और अमर अकबर एंथनी शामिल हैं। १९७७ में, उन्होंने आरडी बर्मन द्वारा रचित फिल्म हम किसी से कम नहीं के गीत "क्या हुआ तेरा वादा" के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कार दोनों जीते। अमर अकबर एंथनी की कव्वाली " पर्दा है पर्दा " के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ गायक के रूप में नामित किया गया था।
रफ़ी ने 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक के आरम्भ में कई सफल फ़िल्मों के लिए गाया जिनमें से कई हिट गीत 1970 के दशक के अंत में विविध भारती, बिनाका गीतमाला और रेडियो सीलोन जैसे रेडियो कार्यक्रमों के चार्ट पर छाये रहे। 1978 में, रफ़ी ने रॉयल अल्बर्ट हॉल में एक प्रदर्शन दिया और 1980 में उन्होंने वेम्बली सम्मेलन केंद्र में प्रदर्शन किया। 1970 से अपनी मृत्यु तक उन्होंने बड़े पैमाने पर दुनिया भर का दौरा किया और खचाखच भरे हॉलों में संगीत कार्यक्रम पेश किये।मोहम्मद रफ़ी का 31 जुलाई 1980 को रात 10:25 बजे दिल का दौरा पड़ने से 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। रफ़ी द्वारा गाया गया अंतिम गीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म आस पास के लिए था । जानकारों का कहना है कि यह "शाम फिर क्यों उदास है दोस्त/तू कहीं आस पास है दोस्त" था, जो उनकी मृत्यु से कुछ घंटे पहले रिकॉर्ड किया गया था।
बातें तो बहुत है कहने को लेकिन समय की एक सीमा है । इस लिए आज इन्हीं बातों के साथ सदी के महान गायक मोहम्मद रफी की यादों को संजोते हुए उन्हें सलाम करते हैं।