मैं साल में तीन चार बार अपनी बुआ के घर जाया करता था। इस बार इंटर की परीक्षा देकर उनके गांव गया। जब मैं वापस आने की बात करता तो मुझे रोकने के बुआ के पास बहुत से बहाने होते थे। पहले कहती ,' अच्छा कल चले जाना '।
कल कहती,' खाना खा लो तब जाओ'।
खाना खा कर जाने की कहते तब कहतीं,'अरे, अब तो धूप बहुत तेज हो गई है, शाम को चले जाना '।
मुझे भी पता होता था कि मुझे वापस आने के लिए इतना सब करना ही होगा ।
इस बार एक नई बात जुड़ गई। जब मैंनै बुआ से कहा कि 'अब बहुत हो गया बुआ अब जाने दीजिए। तब बुआ ने कहा, 'बउआ, इस बार आम खूब आए हैं, कुछ दिन रुक जाओ, आम खा लो तब जाओ। मन भर के आम खा लो, अब तुम पता नहीं कब आओगे । आम तो साल भर के लिए चला जाएगा।' मैं जानता था कि मुझे रुकना तो होगा ही तो मैंने कुछ दिन और रुकने का इरादा कर लिया था। इस बीच मैंने देखा कि बुआ के पड़ोस में रहने वाली एक लड़की जो अक्सर बुआ के पास आती थी, इस बार बहाने - बहाने से बुआ के घर में ही बनी रही और अक्सर मुझसे भी तरह-तरह की बातें करती थी। वो स्कूल नहीं गई थी इसलिए उसे स्कूल कॉलेज, पढ़ाई लिखाई के बारे में कुछ न कुछ जानने की इच्छा रहती थी और इसी से जुड़े कुछ सवाल वह करती रहती थी। उसकी नज़र में पढ़ने वाला लड़का होने के कारण मेरी कुछ अलग अहमियत थी।
एक शाम उसने आकर बताया कि उसकी मां ननिहाल गई है , उसके घर के सब लोग पास के गांव में नौटंकी देखने गए हुए हैं और आज रात को घर में वो अकेली है। इसलिए उसने बुआ से कहा कि वो मुझे उसके घर सोने के लिए भेज दें। बुआ ने उसकी बात मान भी लिया और उन्होंने मुझे उसके घर जाने के लिए कह भी दिया। मैं ना चाहते हुए भी उसके घर गया क्योंकि मुझे उसके हाव-भाव से थोड़ा संदेह सा लग रहा था। मेरा संदेह भी सच निकला। वह रात भर मुझसे तरह-तरह की बातें करती रही। गांव में चलने वाली ऐसी ऐसी कहानियां सुनाती रही जिसमें लड़के लड़कियों के मिलने से क्या-क्या हो जाता है। कुछ इस तरह की कहानियां भी शामिल थी जो उसने लड़के लड़कियों के बारे में सुन रखा था। जो गलत धारणाएं गांव में प्रचलित होती थी और जिनके निराकरण गांव की लड़कियों को खासतौर से कभी नहीं मिल पाया करते थे और वह उन्हीं गलतफहमियों में जीते जीते अपनी जिंदगी गुजार दिया करती हैं।
लेकिन स्त्री सुलभ मर्यादाओं को उसने बराबर बरकरार भी रखा और उसने मुझे किसी असमंजस की स्थिति में नहीं डाला । मैं भी इंटर के विद्यार्थी की उम्र में प्रेम के यूटोपियन अस्तित्व का प्रशंसक होने के कारण उसके प्रति किसी भी तरह का गलत भाव मन में नहीं ला सका। इस प्रकार बातों बातों में सुबह हो गई और अगले दिन मैं अपने घर वापस आ गया।
मैं घर आ तो गया लेकिन इस बार मेरा मन वहीं रह गया। अब मेरा बार-बार मन करता कि मैं बुआ के घर फिर से चला जाऊं। लेकिन कॉलेज के बाद विश्वविद्यालय में एडमिशन की व्यस्तता के बाद , बी ए की पढ़ाई शुरू हो गई थी । इस कारण बुआ के घर जाना नहीं हो पाया। देखते-देखते दिवाली का त्योहार आ गया। दिवाली की छुट्टियों में मैं एक दिन के लिए भाग कर बुआ के घर चला ही गया। बुआ ने मेरी बहुत आव-भगत की क्योंकि बुआ मुझे बहुत प्यार करती थी और उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं दिवाली पर उनके घर आऊंगा। उनकी तमाम आव-भगत में मैं आसपास नजरे दौड़ता रहा। मेरी नजरें पूरे समय लाली को ढूंढती रही। जब शाम हो गई लाली कहीं दिखाई नहीं पड़ी तब मैंने बुआ से पूछ ही लिया । बुआ, वो आपकी प्यारी भतीजी नहीं दिखाई पड़ रही है, कहीं गई है क्या? सुनकर बुआ उदास हो गई। उनके चुप होते ही मुझे किसी अनहोनी की आशंका हो आई क्योंकि जब कभी बहुत अच्छे की अपेक्षा रहती है तो सबसे बुरा होने का डर भी उतना ही बना रहता है। इस बार फिर मेरा डर सच हो गया। बुआ ने बताया, 'लाली अब नहीं रही'। मेरा मन स्तब्ध हो गया! मैंने पूछा , ' क्या हो गया था उसको?' बुआ ने बताया,' धान की लगौनी के समय तेज धूप में काम करते समय उसकी तबीयत खराब हो गई थी। घर लाने पर उसे कॉलरा हो गया और वो नहीं रही'।
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
इस बात को बीते पच्चास वर्ष हो चुके हैं लेकिन मेरी जिंदगी के वो कुछ घंटे अब भी मेरे ज़ेहन में उभरते हैं तो आंखों में नमी तैर जाती है।