Monday 28 2025

लड़कियों

 लड़कियों 

खुले आकाश में अगर 

उड़ना चाहती हो

चाहती हो असीमित आसमान, तो -

अपने पिता को भरोसा दो

मां को दो विश्वास 

भाई को आश्वस्ति दो

कि तुम अपने स्वत्व को

स्वाभिमान को

और पारिवारिक मूल्यों को 

लेकर घर से बाहर 

जा तो रही हो

इसे ऐसे ही वापस लाओगी 

तुम आधी अधूरी नहीं 

अपनी संपूर्णता के साथ 

बाबा के घर की दहलीज के अंदर आओगी

तुम नहीं जानती कि

नारी की आजादी के

गुमराह करने वाले 

नारों में लंपटों की साज़िशें शामिल हो जाती हैं धीरे से 

तुम्हारे साथ छल कर के

निकल जाती हैं

शादी, नौकरी, धन दौलत के झांसे

शराफ़त के चोले 

मासूमियत भरे चेहरे 

कई रूपों में 

तुमको मिलेंगे 

तुम भ्रमित न होना

लालच लिए भेड़िए भी 

मिलेंगे 

तुम इन सब से बचते 

बचाते अपने लिए 

उस आकाश की तलाश से डिगना नहीं 

वरना, करे चाहे कोई भी इल्जाम तुम पर ही आएगा 

इसलिए -

लड़कियों तुम 

सावधान रहना!

Tuesday 22 2025

रेडियो और डाकिया

 कभी यूं मुस्कुराई थी जिंदगी तुम्हें देख कर 

कि जैसे दीप कोटिक जल गए हों राह में ।"


मोबाईल से पहले की दुनिया में सपनों के दो वाहक थे । एक डाकिया और दूसरा रेडियो। डाकिया हमारे अपनों की खोज खबर और रोजी-रोटी के पत्र लाता था और रेडियो हमारे सुख दुख के हिसाब से सुंदर सपनों की दुनिया से सजाता था। ये एक खूबसूरत सा इत्तेफाक है कि मुझे भारतीय डाक और रेडियो दोनों महकमों में नौकरी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारतीय डाक में लगभग चार साल और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन में तैंतीस साल नौकरी करके समझ पाया कि हमारे जीवन में इन दोनों की भूमिका कितनी जीवनदायनी संजीवनी रही है। कम से कम हमारे देश में तो रही ही है । समय के बदलने के साथ बहुत कुछ बदला है लेकिन वर्ष 1970 से आसपास जन्म लिए लोग इस बात को महसूस कर सकते हैं कि किस प्रकार रेडियो और डाकिया हमारे घर के एक सम्मानित सदस्य की हैसियत रखता था।

Friday 18 2025

कहानी - लाली

 

मैं साल में तीन चार बार अपनी बुआ के घर जाया करता था। इस बार इंटर की परीक्षा देकर उनके गांव गया। जब मैं वापस आने की बात करता तो मुझे रोकने के बुआ के पास बहुत से बहाने होते थे। पहले कहती ,' अच्छा कल चले जाना '।

कल कहती,' खाना खा लो तब जाओ'।

खाना खा कर जाने की कहते तब कहतीं,'अरे, अब तो धूप बहुत तेज हो गई है, शाम को चले जाना '।

मुझे भी पता होता था कि मुझे वापस आने के लिए इतना सब करना ही होगा ।

इस बार एक नई बात जुड़ गई। जब मैंनै बुआ से कहा कि 'अब बहुत हो गया बुआ अब जाने दीजिए। तब बुआ ने कहा, 'बउआ, इस बार आम खूब आए हैं, कुछ दिन रुक जाओ, आम खा लो तब जाओ। मन भर के आम खा लो, अब तुम पता नहीं कब आओगे । आम तो साल भर के लिए चला जाएगा।' मैं जानता था कि मुझे रुकना तो होगा ही तो मैंने कुछ दिन और रुकने का इरादा कर लिया था। इस बीच मैंने देखा कि बुआ के पड़ोस में रहने वाली एक लड़की जो अक्सर बुआ के पास आती थी, इस बार बहाने - बहाने से बुआ के घर में ही बनी रही और अक्सर मुझसे भी तरह-तरह की बातें करती थी। वो स्कूल नहीं गई थी इसलिए उसे स्कूल कॉलेज, पढ़ाई लिखाई के बारे में कुछ न कुछ जानने की इच्छा रहती थी और इसी से जुड़े कुछ सवाल वह करती रहती थी। उसकी नज़र में पढ़ने वाला लड़का होने के कारण मेरी कुछ अलग अहमियत थी।

एक शाम उसने आकर बताया कि उसकी मां ननिहाल गई है , उसके घर के सब लोग पास के गांव में नौटंकी देखने गए हुए हैं और आज रात को घर में वो अकेली है। इसलिए उसने बुआ से कहा कि वो मुझे उसके घर सोने के लिए भेज दें। बुआ ने उसकी बात मान भी लिया और उन्होंने मुझे उसके घर जाने के लिए कह भी दिया। मैं ना चाहते हुए भी उसके घर गया क्योंकि मुझे उसके हाव-भाव से थोड़ा संदेह सा लग रहा था। मेरा संदेह भी सच निकला। वह रात भर मुझसे तरह-तरह की बातें करती रही। गांव में चलने वाली ऐसी ऐसी कहानियां सुनाती रही जिसमें लड़के लड़कियों के मिलने से क्या-क्या हो जाता है। कुछ इस तरह की कहानियां भी शामिल थी जो उसने लड़के लड़कियों के बारे में सुन रखा था। जो गलत धारणाएं गांव में प्रचलित होती थी और जिनके निराकरण गांव की लड़कियों को खासतौर से कभी नहीं मिल पाया करते थे और वह उन्हीं गलतफहमियों में जीते जीते अपनी जिंदगी गुजार दिया करती हैं।

लेकिन स्त्री सुलभ मर्यादाओं को उसने बराबर बरकरार भी रखा और उसने मुझे किसी असमंजस की स्थिति में नहीं डाला । मैं भी इंटर के विद्यार्थी की उम्र में प्रेम के यूटोपियन अस्तित्व का प्रशंसक होने के कारण उसके प्रति किसी भी तरह का गलत भाव मन में नहीं ला सका। इस प्रकार बातों बातों में सुबह हो गई और अगले दिन मैं अपने घर वापस आ गया।

मैं घर आ तो गया लेकिन इस बार मेरा मन वहीं रह गया। अब मेरा बार-बार मन करता कि मैं बुआ के घर फिर से चला जाऊं। लेकिन कॉलेज के बाद विश्वविद्यालय में एडमिशन की व्यस्तता के बाद , बी ए की पढ़ाई शुरू हो गई थी । इस कारण बुआ के घर जाना नहीं हो पाया। देखते-देखते दिवाली का त्योहार आ गया। दिवाली की छुट्टियों में मैं एक दिन के लिए भाग कर बुआ के घर चला ही गया। बुआ ने मेरी बहुत आव-भगत की क्योंकि बुआ मुझे बहुत प्यार करती थी और उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं दिवाली पर उनके घर आऊंगा। उनकी तमाम आव-भगत में मैं आसपास नजरे दौड़ता रहा। मेरी नजरें पूरे समय लाली को ढूंढती रही। जब शाम हो गई लाली कहीं दिखाई नहीं पड़ी तब मैंने बुआ से पूछ ही लिया । बुआ, वो आपकी प्यारी भतीजी नहीं दिखाई पड़ रही है, कहीं गई है क्या? सुनकर बुआ उदास हो गई। उनके चुप होते ही मुझे किसी अनहोनी की आशंका हो आई क्योंकि जब कभी बहुत अच्छे की अपेक्षा रहती है तो सबसे बुरा होने का डर भी उतना ही बना रहता है। इस बार फिर मेरा डर सच हो गया। बुआ ने बताया, 'लाली अब नहीं रही'। मेरा मन स्तब्ध हो गया! मैंने पूछा , ' क्या हो गया था उसको?' बुआ ने बताया,' धान की लगौनी के समय तेज धूप में काम करते समय उसकी तबीयत खराब हो गई थी। घर लाने पर उसे कॉलरा हो गया और वो नहीं रही'।

मैं कुछ नहीं बोल पाया।

 इस बात को बीते पच्चास वर्ष हो चुके हैं लेकिन मेरी जिंदगी के वो कुछ घंटे अब भी मेरे ज़ेहन में उभरते हैं तो आंखों में नमी तैर जाती है।

Wednesday 09 2025

कविता

 बचपन में 

जिम्मेदारियों का बोझ था 

उन दिनों में 

दादी की सूनी उदास आंखों ने

जब अपने लिए मुझमें 

उम्मीद की किरण देखा,

मुझमें वो समझ न थी ।

अब जब वो सूनी आंखों के चित्र ज़ेहन में उभरते हैं 

एक हूक सी उठती है ।

कुछ कर न सकने का दुख तो अपनी जगह है ,

दादी की उम्मीद भरी आंखों से आंखें नहीं मिला पाता  

इस दुख का क्या करूं ?

 कम समझ

या ना समझी में 

जिम्मेदारियों का पूरा 

न हो पाना

जब खटकता है,

खटकती हैं वो बातें 

जब दोस्तों की नेकियों के बदले

अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके थे,

सोचता हूं कि ईश्वर 

तुमने इतनी समझ तो दी होती ।

और अब जब समय बीत गया है, 

खाली समय ही समय है 

तो ये सभी चित्र 

बारी बारी से आते हैं 

और अपना हिसाब मांगते हैं ,

रीते हाथ हजारों सवाल 

पीछा करते हैं ,

मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है!

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...