Wednesday 09 2025

कविता

 बचपन में 

जिम्मेदारियों का बोझ था 

उन दिनों में 

दादी की सूनी उदास आंखों ने

जब अपने लिए मुझमें 

उम्मीद की किरण देखा,

मुझमें वो समझ न थी ।

अब जब वो सूनी आंखों के चित्र ज़ेहन में उभरते हैं 

एक हूक सी उठती है ।

कुछ कर न सकने का दुख तो अपनी जगह है ,

दादी की उम्मीद भरी आंखों से आंखें नहीं मिला पाता  

इस दुख का क्या करूं ?

 कम समझ

या ना समझी में 

जिम्मेदारियों का पूरा 

न हो पाना

जब खटकता है,

खटकती हैं वो बातें 

जब दोस्तों की नेकियों के बदले

अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके थे,

सोचता हूं कि ईश्वर 

तुमने इतनी समझ तो दी होती ।

और अब जब समय बीत गया है, 

खाली समय ही समय है 

तो ये सभी चित्र 

बारी बारी से आते हैं 

और अपना हिसाब मांगते हैं ,

रीते हाथ हजारों सवाल 

पीछा करते हैं ,

मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है!

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