वो
निस्सीम भाव में आपूरित हो
नि: शब्द
मुझे स्पर्श कर
मुझमें समा कर
मेरी आत्मा से
मिल आया,
एक पल में
वो हजारों मील
चल आया,
जहां जाने की राह ढूंढते
मैं एक उम्र पार कर
इतनी दूर आ गया हूं
अब तक अपने आप से
मिल नहीं पाया!
क्या खुद से मिलना
ऐसे ही हो सकता है!
ये सोचता हूं
कि तुम ऐसे हो जाते
क्यों नहीं हो जाते
कि जिंदगी कितनी आसान हो सकती है!
ऐसे भी मैं तुम तक और
तुम मुझ तक आ सकती हो
मेरी रूह को छू सकती हो
मुझे मेरे होने का एहसास करा सकती हो
कि बस अपनी आंखों को दर्पण बना लो
उन आंखों से मेरी आंखों में
अमृत की कुछ बूंदें रिस कर चली जाने दो
खुदाया हम भवबंध से
छूट जाएंगे
अमर हो जाएंगे।