Tuesday 25 2025

वो निस्सीम

 वो

निस्सीम भाव में आपूरित हो

नि: शब्द 

मुझे स्पर्श कर 

मुझमें समा कर

मेरी आत्मा से

मिल आया,

एक पल में 

वो हजारों मील 

चल आया,

जहां जाने की राह ढूंढते 

मैं एक उम्र पार कर

इतनी दूर आ गया हूं

अब तक अपने आप से 

मिल नहीं पाया!

क्या खुद से मिलना 

ऐसे ही हो सकता है!

ये सोचता हूं

कि तुम ऐसे हो जाते

क्यों नहीं हो जाते

कि जिंदगी कितनी आसान हो सकती है!

ऐसे भी मैं तुम तक और 

तुम मुझ तक आ सकती हो

मेरी रूह को छू सकती हो

मुझे मेरे होने का एहसास करा सकती हो

कि बस अपनी आंखों को दर्पण बना लो

उन आंखों से मेरी आंखों में 

अमृत की कुछ बूंदें रिस कर चली जाने दो

खुदाया हम भवबंध से 

छूट जाएंगे 

अमर हो जाएंगे।

माता-पिता की जवानी

 माता-पिता की जवानी 

संतान के लिए 

फौत होते 

क्या किसी संतान ने 

देखा है कभी!

गिला नहीं फिर भी 

दिल में आता है 

ये सवाल 

हां, मलाल भी कि-

जब जिंदगी की शाम में 

अपने ही घर के 

 एक कोने में 

तन्हाईयां हमराह होती हैं 

तब पूरे घर में 

सन्नाटा पसरे 

उस कोने को छोड़ कर ,

शेष घर में चहल-पहल 

हंसने खिलखिलाने की

आवाजें 

अकेलेपन की छाती फाड़कर 

निकल जाती हैं 

तीर की तरह।

थरथराता है घर का

 एक सहमा हुआ कोना 

बच्चों की जवानी में 

अपनी उम्र ढूंढती

माता-पिता की जवानी 

मुस्कुराती है 

एक दर्द सा होता है 

एक हूक सी उठती है 

सीने में 

उठता है ये सवाल कि

क्या किसी संतान ने 

देखा है जवानी 

अपने माता-पिता की

उनके अपनों के लिए 

फौत होते हुए?

महामृत्यु के आह्वान पर कविता -

 

महामृत्यु की ओर 

पहला कदम बन जाए

प्रेम ,

तब समझो-

आत्मा से परमात्मा के

महामिलन का महारास

होने को है ।

ऐसे मन को पुलकित 

करने वाले पलों में,

ये आश्वस्ति कि -

नदी के उस पार 

एक घर है 

जहां वो रहती है ,

जो हर पल एक 

अनंत यात्रा पर चलने के लिए

 मेरी तरह 

प्रतीक्षारत है।

मुझे भी 

उसकी एक पुकार का

इंतजार रहता है...

एक यात्रा -

अंतर्मन की ओर उन्मुख 

उसके साथ अपने 

अस्तित्व की तलाश 

के लिए निकलने की।

प्रकृति और पुरुष के

इस महा मिलन के

अवसर पर मौन का 

तुमुल नाद है 

एक निस्पंद बेचैनी है 

इधर भी उधर भी-

कि तुम नदी के उस पार से इस पार 

क्या सचमुच में आ पाओगी

मेरी इक पुकार पर ?

Wednesday 12 2025

जिंदगी की शाम में ----------------------

जिंदगी की शाम में 
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माता-पिता की जवानी 
संतान के लिए 
फौत होते 
क्या किसी संतान ने 
देखा है कभी!
गिला नहीं फिर भी 
दिल में आता है 
ये सवाल 
हां, मलाल भी कि-
जब जिंदगी की शाम में 
अपने ही घर के 
 एक कोने में 
तन्हाईयां हमराह होती हैं 
तब पूरे घर में 
सन्नाटा पसरे 
उस कोने को छोड़ कर ,
शेष घर में चहल-पहल 
हंसने खिलखिलाने की
आवाजें 
अकेलेपन की छाती फाड़कर 
निकल जाती हैं 
तीर की तरह।
थरथराता है घर का
 एक सहमा हुआ कोना 
बच्चों की जवानी में 
अपनी उम्र ढूंढती
माता-पिता की जवानी 
मुस्कुराती है 
एक दर्द सा होता है 
एक हूक सी उठती है 
सीने में 
उठता है ये सवाल कि
क्या किसी संतान ने 
देखा है जवानी 
अपने माता-पिता की
उनके अपनों के लिए 
फौत होते हुए?

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...