माता-पिता की जवानी
संतान के लिए
फौत होते
क्या किसी संतान ने
देखा है कभी!
गिला नहीं फिर भी
दिल में आता है
ये सवाल
हां, मलाल भी कि-
जब जिंदगी की शाम में
अपने ही घर के
एक कोने में
तन्हाईयां हमराह होती हैं
तब पूरे घर में
सन्नाटा पसरे
उस कोने को छोड़ कर ,
शेष घर में चहल-पहल
हंसने खिलखिलाने की
आवाजें
अकेलेपन की छाती फाड़कर
निकल जाती हैं
तीर की तरह।
थरथराता है घर का
एक सहमा हुआ कोना
बच्चों की जवानी में
अपनी उम्र ढूंढती
माता-पिता की जवानी
मुस्कुराती है
एक दर्द सा होता है
एक हूक सी उठती है
सीने में
उठता है ये सवाल कि
क्या किसी संतान ने
देखा है जवानी
अपने माता-पिता की
उनके अपनों के लिए
फौत होते हुए?
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