Monday 14 2023

महिलाओं की सुरक्षा: चुनौतियां क्या हैं ? ---------------------_--------_------__-__----

 

महिलाओं के ऊपर घरेलू हिंसा , सामाजिक प्रताड़ना की जड़े यहां की संस्कृति और  इतिहास में पैबस्त है। बाल विवाह, बेमेल विवाह ,सती प्रथा ,जौहर शिक्षा के अधिकार से वंचित ,सामाजिक बराबरी से वंचित , पर्दा प्रथा से युक्त, महिलाओं की दयनीय दशा का इतिहास बहुत पुराना है। बाल विवाह के पश्चात यदि बेमेल विवाह भी हो ऐसी स्थिति में बालिकाओं की शारीरिक स्थिति का जो चित्र समझ में आता है वह मानवों के बर्बर व्यवहार की कहानी कहता है ।इनकी बर्बरता की कहानी यहीं नहीं रुकती। जिस जमाने में मनुष्य की भारत में सामान्य जीवित रहने की उम्र 45 साल हुआ करती थी उस जमाने में महिलाओं के पतियों के मर जाने के पश्चात उन्हें सती प्रथा के लिए विवश कर दिया जाता था और जबरदस्ती चिता पर बैठाया जाता था। जिन सामाजिक परिवारों में सती प्रथा नहीं थी वहां पर भी महिलाओं को सिर मुड़ा कर सफेद वस्त्र पहनना , किसी भी प्रकार का शौक श्रृंगार नहीं करना, जमीन पर सोना, एक समय खाना और हंसना मुस्कुराना बंद।  वह किसी मांगलिक कार्य में भाग नहीं ले सकती थी। यह स्थिति भारत में बहुत लंबे समय तक चलने के उपरांत महाराज हर्षवर्धन ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई। उनके पश्चात कुछ वर्षों तक कुछ भी नहीं बदला। फिर 18वीं शताब्दी आते-आते राजा राममोहन राय ने इस पर काम करना शुरू किया ।लेकिन भारत में कोई भी बदलाव बिना कानून के नहीं हो सकता क्योंकि यहां के लोगों की आस्थाओं की जड़ें बहुत गहरी हैं ।19वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने कानून बनाकर जब बाल विवाह, सती प्रथा और जौहर जैसी कुरीतियों को असंवैधानिक करार दिया उसके बाद भारत में बदलाव का आरंभ होता है। महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से भी पूर्ण वंचित किया गया था जिसके कारण वह अपने प्रति होने वाले इस प्रकार के अत्याचारों का प्रतिकार नहीं कर सकती थी।  19वीं सदी में सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिबा फुले ने महिलाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए बालिकाओं को शिक्षा के लिए स्कूल खोला और उनकी पढ़ाई के रास्ते खुलने लगे। लेकिन इसके लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा । भारत की आजादी से कुछ पहले अंग्रेजों ने  महिलाओं की स्थिति को बेहतर करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में उनके लिए रास्ते खोलने का कार्य किया था।  लेकिन महिलाओं के कल्याणकारी कार्यों की वास्तविक शुरुआत भारतीय संविधान लागू होने के पश्चात 26 जनवरी 1950 से आरंभ होती है । भारत के संविधान में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और संविधान समिति के अन्य सदस्यों के उदारता पूर्वक चिंतन से महिलाओं के लिए समान नागरिक संहिता, वोट का अधिकार, शिक्षा का संपूर्ण अधिकार, कार्य करने के लिए पुरुषों के बराबर सम्मान अधिकार, समान वेतन, और अन्य सुविधाएं, प्रसूति अवकाश अपने लिए वर चुनने की आजादी, तलाक लेने का अधिकार ,संपत्ति में अधिकार नौकरी करने का अधिकार जैसे अधिकारों को शामिल करके उनकी स्थिति को एक आधार दे दिया। तब से लेकर आज तक महिलाएं अपने विकास पथ पर अग्रसर है और उन्होंने ऊंचाई की हर बुलंदियों को छुआ है। फिर भी जैसा कि ऊपर की पंक्तियों में कहा गया है कि महिलाओं के प्रति अमानवीय आचरण की जड़े इतिहास में पैबस्त हैं , अतः यह बातें इतनी आसानी से जा भी नहीं सकती। क्योंकि हमारे देश का जो सामाजिक ढांचा है वह पुरुष प्रधान है। दूसरी वजह यह है कि समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व के कारण घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं की संख्या काफी कम होती है। ऐसी स्थिति में जब कभी भी अत्याचार की घटनाएं घटी हैं तो उन्हें रोक लगाने वाले लोगों की कमी होती है। ऐसा संभव नहीं है कि हर जगह पुलिस मौजूद ही रहे । अतः जहां कहीं भी महिलाएं अकेली अथवा कमजोर स्थिति में होती है उनके साथ अप्रिय घटनाएं घट जाती है। इसे   रोक पाने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। बस प्रश्न है कि यह पुरुष समाज महिलाओं को क्यों कमजोर पाकर उनके प्रति बर्बर हो जाता है। इस पर चिंता करने की आवश्यकता है। वैसे तो घरेलू हिंसा भी कम नहीं होती और घरेलू हिंसा के मामलों का अध्ययन किया जाए तो इस प्रकार की हिंसा करने कराने में महिलाओं का भी योगदान कम नहीं होता। किंतु समाज में जब स्त्रियों के प्रति अत्याचार होते हैं तो उसमें पुरुषवादी मानसिकता का ही योगदान अधिक होता है और इस प्रकार के अत्याचारों में जब अपराधियों को सही ढंग से सजा नहीं मिल पाती तब उनके हौसले और भी बुलंद होते हैं और उनके देखा देखी कुछ अन्य दुष्ट मानसिकता के लोग प्रेरित भी होते हैं।

 अतः इस विषय पर बहुत चिंतन मनन के पश्चात राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी ने यह बात अपने राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल किया है कि महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों के प्रति हमारी सरकार का रुख जीरो टॉलरेंस का होगा। केवल महिलाएं ही नहीं बालक, बालिकाएं और बुजुर्ग को भी इस दायरे में रखते हुए हमारी पार्टी इन पर होने वाले किसी भी अत्याचार को एक भी मिनट के लिए सहन नहीं करेगी और अपराधियों की त्वरित गिरफ्तारी के साथ-साथ उन्हें लगातार चलने वाले ट्रायल के उपरांत 30 दिन से 45 दिन के अंदर उपयुक्त धाराओं में जेल भेज कर उन्हें दंडित करेगी ताकि महिलाओं के प्रति अत्याचार करने वाले लोगों को एक उदाहरण देखने को मिले और जिससे कि वह भविष्य में इस प्रकार की किसी घटना को अंजाम देने से पहले कई बार सोचे। इसके साथ ही साथ यह भी आवश्यक है कि हमारे समाज को महिलाओं के प्रति किए जाने वाले व्यवहार के प्रति सजग और संवेदनशील होना पड़ेगा । इसकी शिक्षा घर परिवार और स्कूल से बराबर बच्चों को दी जानी चाहिए। इसके लिए भी सरकार प्रयत्न करेगी और हम सामाजिक रूप से पूरे समाज का भी आह्वान करते हैं कि हमें अपनी बालिकाओं के सुरक्षित जीवन और संरक्षित भविष्य के लिए हर प्रयास में कंधे से कंधा मिला कर चलने की आवश्यकता है।

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