Monday 14 2023

न्यायालय परिसरों में महिलाओं के लिए सुलभ शौचालय की व्यवस्था

 भारत में सार्वजनिक स्थलों पर शौचालयों की आवश्यकता पर सबसे पहले इस देश के महान नागरिक श्री विंधेश्वरी पाठक द्वारा सोच विचार किया गया और सुलभ कंपलेक्स की अवधारणा का विकास हुआ। श्री पाठक ने केवल अवधारणा ही नहीं दी बल्कि उन्होंने अपने एनजीओ के माध्यम से बहुत सारे कंपलेक्स बनवाए भी । इसके उपरांत इसे सरकार ने अपने एजेंडे में शामिल किया और सार्वजनिक स्थानों पर पूरे देश में सुलभ कंपलेक्स नजर आने लगे। सुलभ कंपलेक्स के आने से एक तरफ आम नागरिकों का जीवन आसान हुआ तो दूसरी तरफ जगह जगह गंदगी और मानव मल मूत्र की दुर्गंध से मुक्ति मिली । फिर भी यह कार्य अभी भी बहुत जगहों पर किया जाना शेष है।  अतएव नागरिक जब सफर करके अपनी मंजिल पर पहुंचते थे तभी वह  दैनिक क्रिया कर सकते थे। वह तकलीफदेह दिन बहुत दुखदाई थे और सफर करने वालों को खासतौर से बहुत कष्ट होता था। ऐसे में महिलाओं की स्थिति और भी खराब होती थी। उन्हें जिस यातना और शर्मिंदगी से गुजरना पड़ता था यह बात कल्पना से परे है । इसलिए श्री बिंदेश्वरी पाठक के द्वारा किया गया यह योगदान भारत के लिए एक अमूल्य और अनमोल   है। उनके द्वारा इसका क्रियान्वयन किया जाना उन्हें आम नागरिकों से ऊपर का दर्जा भी देता है इसीलिए उनकी सेवाओं की पहचान करके भारत सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया । वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा इस विषय पर बहुत प्रशंसनीय कार्य किया गया और सरकारी धन खर्च करके  गांव-गांव घर-घर व्यक्तिगत शौचालय और सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण से गंदगी को नियंत्रित करने में एक तरफ जो सहायता मिली वह तो प्रशंसनीय है ही इसके अलावा इससे आम नागरिकों को जो सुविधा मिली है वह भी बहुत बड़ी बात है। इसके ना होने की स्थिति में बारिश के दिनों में रात्रि कालीन समय में दैनिक क्रिया करने में जिस परेशानी का सामना उठाना पड़ता था वह बहुत बड़ी समस्या थी । यहीं पर यह भी कहना आवश्यक है कि हमारे देश की आधी आबादी की समस्याएं कुछ अलग तरह की है । हमारी सामाजिक व्यवस्था में महिलाएं अपने संस्कारों के कारण खुले में शौच जैसी समस्या से बहुत अधिक परेशान रही है। इसी के कारण कई बार उनके साथ ज्यादतियां और बर्बरतायें करने वालों को अवसर मिल जाता रहा है जिससे उनका घर से बाहर निकलना सुरक्षा का भी एक प्रश्न था।  जिस को हल करने में काफी मदद मिली है ।लेकिन अभी भी एक बात बहुत ही विचारणीय है की ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत घरों और सार्वजनिक शौचालय में निर्माण कार्य की गुणवत्ता बहुत खराब है और बहुत सी स्थितियों में बनाए गए शौचालय उपयोग के योग्य नहीं है । कारण यह है कि यह पूरी तरह बन नहीं सकते हैं । ग्रामीणों से बातचीत से यह पता चलता है की शौचालय बनवाने के मद में जो पैसा दिया जाता है वो इतना कम होता है कि इतने में शौचालय पूरा बन नहीं पाता। नागरिक अपने पास से इस मद में पैसा खर्च नहीं कर पाते जिसके कारण एक ढांचा बनकर खड़ा हो जाता है लेकिन उस ढांचे का कोई उपयोग नहीं होता ।अगर निष्पक्ष रूप से जांच की जाए तो बहुत से ऐसे शौचालय मिलेंगे जिनमें टायलेट सीट नहीं बैठी ,या दरवाजा नहीं लगा, या टैंक नहीं बना या छत नहीं डली। सरकार ने नारा दिया कि दरवाजा बंद तो बीमारी बंद। लेकिन यह नारा निरर्थक ही रहा क्योंकि ना दरवाजा बंद हो सका ना बीमारी बंद हो सकी। अब इस बात पर सरकार अपनी पीठ ठोक सकती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और  है । इन्हीं कारणों से यह उपयोग के लायक नहीं है। इसकी वजह है कि इस मद में जितना पैसा दिया जाना चाहिए उससे कम पैसा ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को दिया जाता है। किसान गेहूं बेचकर टॉयलेट बनाएगा जो गेहूं उसके पास पैदा ही नहीं होता बल्कि सरकार उसे 5 किलो प्रति माह की दर से खाने के लिए ही आवंटन करती है। यह तो रही व्यक्तिगत और घरेलू समस्याएं सरकारी कार्यालयों में भी समस्या इससे अलग नहीं है। बहुत सी ऐसी जगह हैं जहां बड़ी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति होती है और वहां पर पुरुष और महिला के लिए अलग-अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं की गई है।  जैसे जिला न्यायालय परिसर एवं और भी सरकारी परिसरों का नाम लिया जा सकता है जहां सरकार का ध्यान अभी तक नहीं गया है । यह बात सामान्य विकास कार्यक्रमों के स्तर तक नहीं देखी जा सकती।  क्योंकि यह जिला न्यायालय में आने वाली महिलाओं के लिए प्रति मिनट समस्या का सबब है।  सरकार को प्राथमिकता के आधार पर इस कार्य को किया जाना चाहिए था। लेकिन इसका मूल्यांकन करने वाले लोगों से कहीं भूल हुई है जिसके कारण यह जिला न्यायालय परिसर इस योजना से छूट गया है। इसी प्रकार के जिन अन्य विभागों में इस तरह की कमियां बच गई है उसे शीघ्र पहचान करके वहां पर महिलाओं के लिए भी शौचालय की  व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि पुरुषों की स्थिति इस मामले में थोड़ी अलग है। समस्या होने पर वह इसका  समाधान कर लेते हैं क्योंकि उनके लिए कहीं भी यह कार्य कर लेना मुश्किल नहीं होता । लेकिन जैसा कि ऊपर की पंक्तियों में कहा गया है कि महिलाओं की स्थिति भारत में अलग प्रकार की है जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। एक सर्वे के अनुसार यह पाया गया कि  कई जिला न्यायालय परिसर में तो यह व्यवस्था नहीं मिलने से उपजी चिंता के कारण यह बात प्रकाश में लाई जा रही है और यह उम्मीद है कि केंद्र सरकार शीघ्र ही इस पर कार्यवाही करेगी ।


मोहन धनराज

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