Saturday 12 2023

कविता - मेरे पहलू में कोई आग है

 मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद  सुलगता है,

जलता है 

उसकी सेंक से मैं नहीं

 मेरी रुह हर वक्त 

कतरा कतरा जलती है

एक कशमकश होती है

क्या करूं किधर जाऊं

जिधर भी जाऊं

एक जलता साया सा है

मेरे भीतर जलता है 

उसकी सेंक से मेरा वजूद

 जलता है पिघलता है।

मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद सुलगता है

जलता है ।

वो मेरी हमराह है

छोड़ती नहीं मुझको तन्हा

मेरे भीतर एक आग है

जो मेरे साथ हर रोज हमबिस्तर है

नींद की परछाइयां भी 

मुझ तक नहीं आती

मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद  सुलगता है

जलता है ।

वो मेरा बचपन था जब मैं

बेसाख्ता हंसता था

दौड़ता था तितलियों के पीछे

हर शय मुस्कुराती थी मेरी जानिब

जवां होकर हंसी मुझसे रूठ गई

तितलियां अब ना रहीं 

ना बचपन का ज़माना रहा

बस एक आग है जो हर सू मेरे

दहकती है जलती है 

मेरे पहलू में कोई आग है

जो साथ साथ चलती है

कोई देख नहीं सकता कैसे

मेरा वजूद  सुलगता है,

जलता है ।



मोहन धनराज

आईबीपीएस 

सहायक निदेशक (सेवानिवृत्त )दूरदर्शन लखनऊ

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