बनारसी घाट का जिद्दी इश्क पढ़ा और पढ़कर मन इस प्रकार आनंदित हुआ कि जैसे अध्यात्म की नदिया में गोता लगाकर चले आए। बनारस प्राचीनतम जीवित आध्यात्मिक नगरी के रूप में जानी जाती रही है और इसको महादेव का आशीर्वाद और उनका स्थान माना जाता रहा है ।ज्ञान की त्रिवेणी यहां सदियों से बहती रही है। ज्ञान में अध्यात्म का मेल हो तो बात ही कुछ और है। यहां घाटों पर अगर आरती शंख और ढोल नगाड़े के साथ मां गंगा की आरती, भोले बाबा का सुमिरन होता है तो वही यहां जवां दिलों की धड़कने नई नई कहानियां लिखती रही है। बनारस में अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट के साथ-साथ मणिकर्णिका घाट को कैसे भूल सकते हैं जहां जाकर आत्मा को परमात्मा से मिलते हुए महसूस करते हैं। यही भाव बनारस में वह मस्ती लेकर आता है जिसमें मृत्यु पर भी शोक नहीं जश्न मनाए जाते हैं । इस अर्थ में ऐसा प्रतीत होता है कि बनारस का रहने वाला जीवन और मृत्यु के अर्थ को अपने जीवन में एक साथ जीता है । इसीलिए उसकी मस्ती बेजोड़ है और बेजोड़ है बनारस के घाटों का जिद्दी इश्क ।
इश्क वैसे तो परमात्मा से मिलन का साधन है ही ऊपर से अगर यह जिद्दी हो जाए तो सोने में सुहागा। क्योंकि जब तक मनुष्य कोई भी काम करने में जिद नहीं करता, जिद नहीं उठाता तब तक कामयाबी नहीं मिलती और अगर इश्क में जिद ना हो तो फिर वो इश्क कैसा ? बनारसी घाट का जिद्दी इश्क तो बस बनारस में ही हो सकता है कहीं और नहीं। इस पुस्तक के लेखक विजय विनीत जी को बहुत-बहुत बधाई इसलिए भी दी जानी चाहिए उन्होंने बनारस के घाटों, बनारस की संस्कृति ,यहां की जीवन शैली और बनारस के मानस को इतना ठीक से समझा है कि अपने आप में उनकी समझ एक पैमाना बन जाती है । पुस्तक का शीर्षक ही है बनारसी घाटों का जिद्दी इश्क । इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि इससे अच्छा नाम इस पुस्तक का हो भी नहीं सकता था जो अपने नाम को पूरी तरह से सार्थक करता हो। पुस्तक में संग्रहीत कहानियां अपने आप में बनारस के एक युवा की ही कई कहानियां लगती है जिसमें वह युवा अपने बनारसी पन को, बनारसी ठसक को अपने जीवन में जीता है और अपने इश्क में भी अपने जिद्दी पन को पकड़ कर के ही रखता है । जिसमें इश्क में अध्यात्म मिलता है ,जहां प्रेम मिलता है, अध्यात्म मिलता है। इस इश्क में वासना नहीं मिलती। यही बनारसी घाटों के जिद्दी इश्क की खूबसूरती है। आमतौर पर इश्क और प्रेम पर इसीलिए लोग लिखने से संकोच कर जाते हैं कि कहीं उनकी बात को गलत न समझ लिया जाए। लेकिन इन तमाम खतरों को उठाते हुए भी विजय विनीत जी ने जिस युवा की कहानी को उठाया है उसकी कहानी के मर्म में कहीं भी वासना नहीं आई और कहीं भी इश्क की गहराई में कमी भी देखने को महसूस करने को नहीं मिली। लगभग सभी कहानियों का नायक लेखक या पत्रकार है जो बनारस का रहने वाला है और अपनी नायिका की साथ की मुलाकातों का लेखा-जोखा बयान करता है । जो घटनाक्रम इस बीच पेश आते हैं वह इतने स्वाभाविक है कि उस पर सहज ही पाठक कन्विंस होता है । वो यह मानता है कि बिल्कुल ठीक ऐसा ही हुआ होगा । यह कोई कल्पना नहीं है । यह कहानी भी नहीं है । एक सच्चाई है जिसे एक नायक ने अपनी जिंदगी में जिया है। आरंभ से ही अगर देखें तो सभी कहानियों में बनारस की गंगा जमुनी तहजीब बहुत ही साफगोई के साथ सामने प्रस्तुत होती है और कहीं ना कहीं बनारसी होने के गर्व का अहसास करा जाती है। संकलन की पहली कहानी इश्क ए बनारस की नायिका पंक्ति जब नायक को झन्नाटेदार चाटा जड़ती है तो पाठक को लगता है कि यह चाटा उसके गाल पर लगा है । यही इस कहानी की खूबसूरती है कि यह कहीं से भी कहानी नहीं लगती और हर कोई पाठक इसमें स्वयं नायक बन जाता है । इसी प्रकार आगे की कहानियों में भी जो भी नायिकाएं आई है वह भले ही खूबसूरत हैं मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत भी हैं। सभी कहानियों का नायक मानवीय कमजोरियों और खूबियों को अपने साथ समेटे हुए हैं लेकिन उसकी जिद, उसका जिद्दी इश्क कहीं भी अपनी मर्यादा को तोड़कर वासना की तरफ बढ़ने से पहले एक आदर्श रास्ता निकाल लेता है जहां हम कह सकते हैं कि- " वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन , उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा"। संग्रह में संकलित अन्य कहानियां रुक जाओ ना ,काश, कशमकश ,सफर के हमसफ़र ,सुबह हो गई ,नैना ,आखिरी खत, एक थी अदीबा और आखिरी इश्क सभी कहानियां पाठकों को अपनी रंगीन जादुई दुनिया में ले जाती है और प्रेम, श्रृंगार ,मिलन और बिछोह के भाव से ओतप्रोत करके छोड़ देती है। हर कहानी को पढ़ने के बाद पाठक ठगा सा खड़ा कुछ देखता था कुछ सोचता था रह जाता है। लगभग सारी कहानियों का लय कहीं टूटता नहीं ।भाषा का सौंदर्य कहीं विद्रूप नहीं होता ,अशिष्ट शब्दों का कोई प्रयोग नहीं होता ।जो आज साहित्य रचा जा रहा है उसकी तुलना में बनारसी घाटों का जिद्दी इश्क कहानी संग्रह अपने आप में अपनी पहचान को बनाकर रखता है और कागज काला करने वाले लेखकों की भीड़ से अलग अपनी पहचान के साथ खड़ा दिखाई देता है । क्योंकि यह भी उसकी जिद ही है जो उसे बाजारू भाषा में बिकाऊ साहित्य लिखने से रोकती है। साहित्य की मर्यादा को कायम रखते हुए भाषा के सौंदर्य बोध को बढ़ाती है । कुल मिलाकर कहानी पाठकों के द्वारा हाथों हाथ उठा ली जाएगी और तमाम सारी बधाइयां लेखक को मिल रही होंगी । उसी क्रम में मैं भी अपनी बधाई प्रेषित करते हुए इस उम्मीद में हूं की विजय विनीत का कोई और कहानी संग्रह आएगा तो हम पुन: एक बार भाषा और साहित्य के संगम में स्नान करेंगे।
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