मन
दुनिया की मुश्किलों से हारा
एक बेचैन परिंदा है
जिसे सुख कहते हैं
उसे ढूंढता
हर शय में उसे ही देखता
ये नहीं, वो नहीं
नहीं नहीं इनमें से
कोई नहीं
कल ही अच्छा था
अब आजकल तो
कुछ भी अच्छा नहीं लगता
हां, हो सकता है
आने वाले दिन अच्छे हों
इन्हीं जोड़ जुगत में
सब से सुनहरा आज का
दिन भी हाथों से
ये फिसला, वो गया
वो आज के सूरज की पहली पहली किरण
सोना बरसाती हुई निकल गई
हवाएं महका कर चली गई पूरी कायनात
पंछियों ने उसका स्तुतिगान गाया
सबने अपने अपने हिस्से का सुख पाया
एक हमारा मन
दुनिया की मुश्किलों से हारा
एक बेचैन परिंदा है
ढूंढता ही रहा उसे
सुख कहते हैं जिसे
वो कहीं न मिला
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