बचपन में रुई के से फाये से बनी पूरी कलात्मक दुनिया मां-बाप के प्यार से लबालब उफनाती हुई सी, फूलों और तितलियों के पीछे भागते कब की फुर्र से निकल गई ! किशोर वह उससे भी कोमल और थोड़ा-थोड़ा संवेदनशील लेकिन अपने आप को लेकर काफी सजग और उत्साहित! जिंदगी के इंद्रधनुषी रंग इसे बेहद खूबसूरत बना रहे थे। लुका छुपी करते, कभी कोई अच्छा लगने लगता तो उसको आते जाते हुए देखना ही भला लगने लगा था लेकिन कुछ समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। ऐसे ही कुछ सपने देखने के संदेश देकर वह उम्र भी चली गई। जवानी में कदम रखे तो ऐसा लगता था कि पैर जमीन पर और हाथ आसमान में कोई भी तारे कभी भी तोड़ लेंगे ! जल्दी भी क्या है अभी नहीं तो कभी भी !!
इस बहुत खूबसूरत सी जिंदगी में आईने के सामने खड़े होकर अपने आप को टकटकी लगाए देखना, कभी दाहिने से कभी बाएं से , कभी ऊपर से नीचे तक कभी कॉलर टाइट करना, कभी बेल्ट ठीक करना ! क्या गजब जमाना था और हेयर स्टाइल का तो कहना ही क्या! ऐसे झटको कि जुल्फें पीछे की और आकर करीना से लग जाए ! हां, हमारे बड़े बूढ़े यही तो कहते थे कि यह क्या जुल्फी रख लिया है आवारा बनना है क्या ? इसे कटवा क्यों नहीं देते ? वो हमारे सबसे बड़े दुश्मन दिखाई पड़ते थे और अपने को यह कायनात और यह अपना शरीर कुदरत का करिश्मा लगता था।
अब ऐसे ही अचानक एक अजीब सी बात हुई और किसी डॉक्टर ने कहा कि अपने शरीर का सीने का एक्सरे करा कर ले आओ। एक्सरे कराया जब , तो उसमें देखा सीने में पसलियां, दो फेफड़े श्वास नली भोजन नली! यह तो पहचान में आ रही थी इसको देखकर कुछ अच्छा नहीं लगा । ऐसा लगा कि यह शरीर जिससे इतनी मोहब्बत हम करते हैं यह है क्या! मशीनी पुर्जों की तरह से असेंबलिंग की गई एक मशीन ही तो है। बड़ा अच्छा था जब हमने नहीं देखा था कि ये शरीर अंदर से ऐसा होता है । तब ऐसे लगता था जैसे शक्ति, सौंदर्य और बुद्धिमत्ता के साथ बना हुआ यह शरीर दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना है। ऐसा लगा जैसे एक पल के लिए कोई बहुत बड़ा तिलिस्म था जो टूट गया! हो सकता है ऊपर वाले ने हमें इस लायक समझा हो कि अब हम वास्तविकता को समझने के काबिल हो रहे हैं इसलिए इस समय एक्सरे कराने का आदेश दिया। उसके बाद तो फिर धीरे-धीरे शरीर के अंदर फिट किए गए कल पुर्जों की पूरी कहानी देखने और समझने को मिलने लगी। हां कुछ दिन के लिए मन सोच में पड़ गया कि काश यह शरीर ऐसे अंगों पुर्जों की असेंबलिंग ना होती! बस यह जिस्म होता ये कायनात होती , हम होते और हमारी सुंदर कल्पनाएं । लेकिन समय के साथ-साथ परिपक्वता के आने पर अब अत्यंत बुद्धिमानी के साथ संपूर्णता के स्तर तक जाकर बनाए गए इस कल पुर्जे को देख और समझ कर इस बात का एहसास हुआ है कि ये कुदरत का करिश्मा ही तो है ! हर हाल में यही हमारे सपनों की दुनिया देखने का जरिया है, यही हमें कायनात से ईश्वर तक ले जाने का भी माध्यम है।
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