Saturday 11 2024

बुद्धम् शरणं गच्छामि

 बुद्धम् शरणं गच्छामि 

गौतम बुद्ध ईसा पूर्व 563  में भारत की भूमि पर अवतरित हुए थे । लंबी तपस्या के बाद उन्होंने भारत को अष्टांगिक मार्गों का विचार दिया जिसके आधार पर संसार सागर से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। उनके इस सिद्धांत को इतनी स्वीकृति मिली कि यह धर्म बन गया और जैसा कि हम जानते हैं कि धारयति इति धर्म:, इस प्रकार इसमें धारण करने की क्षमता थी, उन विचारों की शक्ति थी और भारतीय जनमानस 

ने उन विचारों को स्वीकृति दी जिसके बल पर यह चमत्कार भारत में घटित हुआ। ईसा पूर्व 364 ईश्वी में कालिंग की लड़ाई के उपरांत सम्राट अशोक ने बुद्ध धर्म को स्वीकार किया। सम्राट ने अपनी तलवार रख दी और अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को श्रीलंका और मालाया  देशों में धर्म  प्रचार प्रसार के लिए नियुक्त किया । बुद्ध के  अन्य अनुयाई भारत की सीमाओं से लगे देशों में जाकर उनके सिद्धांतों के बारे में प्रचार प्रसार करने लगे। इस प्रकार बुद्ध का धम्म चीन, जापान कोरिया, मलेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड, जैसे देशों तक पहुंच चुका था ।यह वही समय था जब भारत में चारों ओर मानवता भाईचारा शांति और समरसता का विचार प्रवाहित हो रहा था। इस दौरान भारत के अपने भूभाग के अंदर शिक्षा का इस कदर विस्तार हुआ जिसमें विक्रमशिला तक्षशिला, बोधगया काशी जैसे स्थान शिक्षा के बड़े केंद्रों के रूप में उभरे और देश-विदेश से लोग यहां आकर इस भूमि की भाषा का अध्ययन करके यहां के धम्म और समाज को  समझ कर अपने देश गए और वहां पर पुन: धर्म का प्रचार किया। जिससे भारत के बाहर बुद्ध धर्म की जड़े गहरी होती चली गई ।यह यह वही समय था जब भारत में अन्न और दूध की नदियां बहती थी। व्यापार और व्यवसाय चरम पर था और भारत सोने की चिड़िया के नाम से दुनिया के अन्य देशों में मशहूर हो चुका था। बुद्ध का धर्म भारत माता के शरीर की अस्थि मज्जा में समाकर उसके दिल में प्राण बनकर हृदय का स्पंदन बन चुका था। भारत की इसी ख्याति ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी  ओर आकर्षित किया। पांचवीं - छठी शताब्दी में भारत में भगवान श्री आदि शंकराचार्य के उदय से लंबे समय से सुषुप्ति के कगार पर पहुंच रहे हिंदू धर्म एवं दर्शन के

पुनर्जागरण की आंधी चल पड़ी। भगवान श्री आदि शंकराचार्य के अथक प्रयासों से भारत में हिंदू धर्म का विकास होना आरंभ हुआ। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि तब तक बुद्ध धर्म के संघारों में बुद्ध के धर्म गुरुओं में वैचारिक मतभेद और संघर्ष चलने लगे थे। आपस में फूट भी पढ़ने लगी थी। जिसके कारण धीरे-धीरे बुद्ध धर्म का प्रभाव आम जनमानस में कम होता चला गया । इस संपूर्ण विवरण पर संदर्भ   विद्वत जनों के विचार, शोध पत्र और बातचीत तथा अन्य तथ्यों को देखा जा सकता है।  भारत में उस अमन चैन के युग में जब यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था तब यहां के धर्म प्राण हुक्मरानों,  बुद्ध के अनुयायियों और हुनरमंद कारीगरों ने इस भूमि पर कई आश्चर्यजनक निर्माण कर डाले जिसमें बुद्ध धर्म के पहचान चिन्हों जैसे स्तूप, संघार जिन्हें  हम पूजा घर के नाम से समझ सकते हैं और उनके अनुयायियों को रहने के लिए बड़े-बड़े धर्म स्थलों का कलात्मक विकास किया गया जो तत्कालीन उपलब्ध वास्तुशिल्प की जानकारी के आधार पर बनाया गया था । यह ध्यान देने की बात है कि निर्माण कार्यों को बाद में आक्रांताओं के द्वारा ध्वस्त करने के बहुत से प्रयास किए गए जिसके कारण उनका स्वरूप बिगड़ गया लेकिन फिर भी यह बात चौंकाने वाली है कि जहां भी उन ढांचों के अवशेष अथवा  ढांचे पूर्ण रूप से सुरक्षित है उनकी स्थिति अब भी उतनी ही अच्छी है और वो उतने ही मजबूत है जिससे यह पता चलता है कि उनका निर्माण उत्कृष्ट कारीगरी का नमूना रहा है और उनकी जगह पर खड़े होकर अगर उनकी कल्पनाओं को साकार रूप मैं देखने का प्रयत्न किया  जाए तो उसके सौंदर्य को निहारने से आंखों को सुकून मिलेगा। धर्म के प्रति आस्था और उन जगहों से जहां बुद्ध ने जाकर भारत में उपदेश दिए थे उन जगहों को देखने के लिए निहारने के लिए हाथों से छूने के लिए बुद्ध को एक मोमबत्ती जलाकर अप्पदीपोभव का संदेश दुनिया में जीवित रखने के लिए पूरे विश्व  के अलग-अलग कोने से लाखों की संख्या में अनुयाई भारत आते हैं और वह सारनाथ, बोधगया, कौशांबी सहित अन्य स्थानों पर जाकर भगवान बुद्ध के चरणों से स्पर्श की गई भूमि की धूल को अपने माथे से लगते हैं। 

बुद्धम् शरणं गच्छामि 

संघम् शरणं गच्छामि 

धम्मम् शरणं गच्छामि।।।

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