Thursday 30 2024

कहानी: अभिसारिका ------------

 कहानी: अभिसारिका

------------

प्रकृति सुंदरी की चिरयौवना पुत्री उषा से मेरे अभिसार का समय था । आज कुछ देर  हो गई थी क्योंकि अंधेरे में कुहासे का धीरे-धीरे छंटते चले जाना प्रकाश को आमंत्रित कर रहा था। ऐसे में जब मैं उषा से अभिसार के लिए निकला तो ऐसा लगा कि जैसे आज मुझसे पहले कोई उससे मिलकर चला गया। बात यह है कि मैं मुंह अंधेरे उठकर सुबह-सुबह जब टहलने जाता हूं तब रास्ते में अंधेरा, कुहासा, चिड़िया हवाएं , उषा और में यही होते हैं । ऐसे में उषा से मेरे अभिसार का बेहद खूबसूरत चित्र होता है जिसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है देखा नहीं जा सकता। सबसे पहले आईए आपको उषा से परिचय करा देता हूं। उषा प्रकृति सुंदरी की चिरयौवना बेटी सूर्य देव के आने से पहले आसमान से धरती तक हर जड़ और चेतन जीव जगत  को अपनी शीतलता, सुगंध , संगीत और स्पर्श से सब के जीवन को आह्लादित करती है । सबको दिन भर के लिए खुशी और ऊर्जा देकर सूरज की बांह पकड़े आसमान की सीढ़ियां चढ़कर उसी की उंगलियां थामे आसमान से सीढ़ी दर सीढ़ी उतरकर शाम की गोद में विश्राम करती है और रात्रि के आंचल में मुंह ढक कर सो जाती है। सुबह मुझसे मिलने का उसका क्रम जारी रहता है ।यही उषा की दिनचर्या है और यही मेरे रोज के उससे अभिसार का हर सुबह का प्रकृति नटी का आयोजन है।

        उस दिन थोड़ी सी देर हो जाने के कारण सुबह हो गई थी इसलिए ऐसा लगा कि उषा से मिलकर अभी-अभी कोई चला गया हो!  अब उषा सुंदरी  अभिसारिका अपने घर की तरफ चल पड़ी थी और रास्ते में मुझे मिली तो उसने मुझसे पूछ ही लिया "क्या समय हुआ है ? "   जब मैंने वक्त बताया तो वह मुस्कुरा कर आगे बढ़ गई। मैंने पीछे से आवाज लगाई "कौन हो तुम ?" उसने हंसकर जवाब दिया "अभिसारिका 'और फिर चल पड़ी।  उस दिन मैं सुबह देर से उठा था।आगे जाने का  औचित्य नहीं लगा फिर भी मैं चला चला गया क्योंकि उषा मेरी अभिसारिका चाहे ना भी मिली हो फिर भी मुझे टहलने तो जाना ही था। मैं चला गया और सोचता रहा अभिसारिका के बारे में!  अगले दिन सुबह वही अभिसारिका जब मुझे फिर से मिली तब मैंने जाना कि यह अभिसारिका उषा नहीं कोई और है। वह कुछ उदास सी लग रही थी। मैंने पूछा "तुम्हारा नाम क्या है?" उसने फिर से कहा "अभिसारिका। मैंने कल ही तो तुमको बताया था ।" मैंने पूछा "यह नाम तुम्हारे माता-पिता ने रखा है?" उसने कहा "नहीं मेरा नाम तो कंचन है। लोग मुझे अभिसारिका कहते हैं । अब जो लोग कहते हैं उसी नाम को मैंने भी स्वीकार कर लिया है । तब से मैं अपना परिचय अभिसारिका ही बताती हूं ।" फिर मैंने सवाल किया " फिर तुम उदास क्यों हो?"उसने कहा "यह  काम मेरे ऊपर एक अनदेखे दबाव का हिस्सा है। मेरे घर परिवार की मजबूरी की उपज है। कौन चाहता है कि वह रातों की नींद को त्याग कर सड़कों पर यूं डोलता रहे । दिन भर काम की थकान और रात में अभिसार का यह थकाऊ काम मैं नहीं करना चाहती लेकिन क्या करूं? मजबूरी है । घर में कोई नहीं है इसलिए घर की जिम्मेदारियां उठाने के लिए मैं यही करती हूं।" मुझे उसकी कहानी पर कुछ तकलीफ हुई थी । यह मैंने तो सुन रखा था कि बहुत सी अभिसारिकायें  होती हैं। कोई मजबूरी वाली कोई शौक वाली। लेकिन शौक वाली अभिसारिका होती होगी यह बात मेरे लिए बेमानी सी लगने लगी जब मैंने उससे बातें किया। यूं सड़क पर अकेली जा रही किसी लड़की से मुंह अंधेरे बात करना मुझे थोड़ा असहज सा लग रहा था इसलिए मैंने उससे कल  इसी समय मिलने के लिए वादा लिया और घर आ गया । घर में पूरे समय उसका मुरझाया हुआ चेहरा घूमता मेरे मन में कई तरह के सवाल उठाता रहा । जवाब ढूंढने की कोशिश मैं करता रहा लेकिन मेरे पास हर बात का जवाब होने के बावजूद मजबूरी के दबाव का कोई जवाब नहीं था । प्रश्नों की ऊहापोह में दिन बीता रात बीती । अगले दिन सुबह दिए गए समय पर मैं उसे फिर से मिला। उषा से मिलने के बाद   जब मैं वापस लौटा तो अभिसारिका  मेरा इंतजार करते हुए वहीं पर खड़ी मिल गई। मैंने उससे पूछा  "अभिसारिका मेरा मतलब  कंचन , तुम यह काम करती क्यों हो?उसने कहा "यह सवाल आप मुझसे क्यों करते हैं? मैंने तो बताया था कि मेरी मजबूरियां है इसलिए मैं अभिसारिका हूं ।" मैं थोड़ी देर के लिए चुप रहने के बाद उससे पूछता हूं ।"बताओ तुम, तुम्हारा घर कहां है? माता-पिता कहां है? क्या कोई भाई भी है? अगर है तो वो क्या करते हैं और अगर वह कुछ करते हैं तो फिर तुम यह क्यों करती हो जिसने तुम्हें कंचन से अभिसारिका बना दिया है ? मैं देखता हूं कि इस काम से तुम खुश भी नहीं हो ।" उसने बताया-

"कश्मीर की हसीन वादियों में मेरा गांव था। मेरे पिता परमानंद गांव के चौधरी थे। गांव के ही कुछ युवकों ने हमारी जमीन और घर हड़पने के लिए मेरे पिता से दुश्मनी ठान ली। एक वक्त ऐसा आया जब उन लोगों ने मेरे पिता की हत्या कर दी और इसी सदमें में मेरी माता भी चल बसी। उन लोगों ने मुझे बंधक बना लिया और मुझे बहुत तकलीफें देकर छोड़ दिया। मैं वहां से भाग कर सीधे रेल पकड़कर दिल्ली आ गई। दिल्ली से पता नहीं कहां से कहां होते हुए अब मैं कहां हूं मुझे कुछ पता नहीं। पता होगा भी तो जानकर क्या करूंगी । मेरे पिता मेरे जन्म की कहानी बताते थे- "उन दिनों कश्मीर की वादियों में रह रह कर बम के  सुनाई दे जाते धमाकों के बीच किसी के रोने, चीखने चिल्लाने की आवाजों के बीच आटोमेटिक रायफलों की गोलियां दनदनाती फिर सब कुछ शांत हो जाता। इस भयानक विध्वंस के बीच उसका प्रथम रुदन प्रकृति के सृजन की विजय का जय घोष था।

परिचरी ने नवजात को तौलिए से पोंछ कर सुंदर सी नई गुलाबी नैपकिन में लपेट कर मां के बगल में लिटाया तो कन्या मां के बदन की हरारत से जीवन पा गई। उसके सुकोमल गुलाबी पंखुड़ियों जैसे होंठो पर उसकी जीभ ने कुछ ढूंढने का प्रयास किया। तब तक सद्य: प्रसूता मां प्रसव पीड़ा से मुक्त बेटी को अमृतमय बूंदों से तृप्त करने को आतुर हो गई थी। ज्यों ही बच्ची ने मां का पहला दूध चखा मां तृप्ति के भाव से भर मुस्कुरा उठी और उसकी मुस्कान में प्रकृति एक बार फिर विजयी मुस्कान बिखेर रही थी। ये प्रभात की बेला थी। शीतल मन्द बयार सुगंध से भर गई। पंछियों ने प्रभाती गाया और प्रकृति सुंदरी नाच उठी। सूर्य की पहली किरण ने जब बच्ची का प्रकाशाभिषेक किया तो चारों ओर उजाला ही उजाला फैल गया।

यह उजाला पिता, दादा

और कन्या को जन्म देने वाली माता के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था ।

एक सूर्य माता के चेहरे पर ,एक सूर्य पिता के चेहरे पर एक सूर्य दादा के चेहरे पर प्रसन्नता का उजाला फैला रहे थे।

 दादी के चेहरे पर उदासी की रेखाएं साफ दिख रही थी क्योंकि उन्हें वंश को चलाने वाला वारिस चाहिए था जिसकी जगह पर कन्या ने जन्म ले लिया था इसलिए दादी के चेहरे पर खुशियों की चमक आते-आते लौट गई। दिन चढ़ते चढ़ते किन्नरों की टोली आ धमकी।  उन्होंने तालियां बजा बजा कर

 "हाय दादा के घर लल्ला भयों हम बधाई गाएंगे"

 गाते हुए पूरे अस्पताल  को सर पर उठा लिया। दादा और पिता ने उन्हें बक्शीश देकर जब विदा किया तो समस्त किन्नर वृंद ने बेटी को गोद में लेकर नाचते गाते आशीशों से उसका दामन भर दिया और बेटी को मां के हाथों सौंप कर आशीर्वाद देते हुए चले गए। उनके जाने के बाद माहौल शांत हुआ तब लड्डू बांटने की तैयारी शुरू हुई । इस प्रकार पूरे अस्पताल का माहौल एक परिवार में आई खुशियों की तरह फैल गया । सबको बख्शीशें मिली और कन्या अपनी माता के साथ अपने घर को रवाना हुई। दादी भारी कदमों से चलते हुए घर पहुंची तो आसपास की महिलाओं ने दादी को थोड़ा ढाढस दिया तो थोड़ा उकसाया भी ।धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा। इस तरह परमानंद के आंगन में एक पुष्प के पौधे का रोपण हुआ जो धीरे-धीरे चंद्रमा की कलाओं की तरह बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा का चांद बनने की ओर अग्रसर हुआ।

बाबा परमानंद प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति थे। बेटी के बाद घर के लोगों ने बहुत चाहा था कि एक बेटा भी होना चाहिए लेकिन बाबा ने कहा कि बेटी होगी तो बेटा ले आएगी या बेटा होगा तो बहू ले आएगा। दोनों हालत में घर में एक बेटा एक बेटी हो ही जाएंगे ऐसे में दूसरी संतान का कोई मतलब नहीं है। इस प्रकार एक संतान होगी तो  उसकी अच्छी तरह देखभाल हो सकेगी और आज के महंगाई के जमाने में उसकी पढ़ाई लिखाई ठीक ढंग से हो पाएगी। इसलिए बाबा अपनी बात में अडिग रहे और मैं अपने मां बाबा की अकेली संतान उनकी छत्रछाया में बढ़ने लगी। बाबा मुझे पढ़ाकर डॉक्टर बनाना चाहते थे। वो अक्सर कहते कि हमारी कंचन जब डॉक्टर का ड्रेस पहन कर गांव आएगी तो लोग उसके नाम से मुझको पहचानेंगे। बाबा ने मुझे डॉक्टर बनाने के लिए मेरी प्राइमरी पढ़ाई पर बहुत कड़ाई से ध्यान रखा और मेरे स्कूल से आने जाने पर मेरे साथ बैठकर मेरी पूरी दिन भर की पढ़ाई की जांच किया करते थे । मैं  दसवीं की परीक्षा देकर गर्मी की छुट्टियों में घर में ही रहकर मां बाबा का हाथ बंटा रही थी उन्हीं दिनों मेरे घर में कुछ बहुत अद्भुत सा चल रहा था जिसे सच कहूं तो मेरे बाबा अम्मा और मेरे खिलाफ एक बड़ी साजिश थी। मेरे दोनों चाचा चाहते थे कि  कंचन की पढ़ाई लिखाई आगे ना बढ़े । वह ऐसा इसलिए चाहते थे कि बाद में मेरे मां-बाप को खत्म करके और मुझे भी या तो खत्म कर देते या मुझे घर से भगाकर जमीन और घर पर कब्जा कर लेते । हमारे मम्मी और बाबा को या मुझको किसी को इस बात की भनक नहीं लगी। वैसे भी उन दिनों मैं इतनी छोटी थी की इन बातों का मतलब भी नहीं समझ सकती थी। उन्हीं दिनों एक दिन मेरे चाचा ने मेरे बाबा से आकर कहा  "बड़े भैया अगर आप कहें तो इस पुराने जर्जर भवन को गिराकर नया घर बना लिया जाए क्योंकि पहाड़ों पर कभी-कभी पुराने भवन टूट जाते हैं और वैसे भी हमारा पुश्तैनी घर बहुत पुराना हो चुका है"। बाबा ने भी इस बात में कोई बुराई ना देखते हुए सहमति दे दिया । फिर घर का काम चालू हुआ ।आधा घर पहले बना कर उसमें रहने का इंतजाम करके तब बाद में आधे घर को गिरानेऔर बनाने का कार्य किया जाना था। इस प्रकार जब आधा घर बन गया तब रहने वाला सारा समान उस वाले घर में डाल दिया गया और पुराने भवन को गिराने की कवायद होने लगी । इसी में एक दिन एक दीवार को खोदने का काम चल रहा था तभी मेरे चाचा जी ने मेरी मम्मी से कहा कि भाभी जी एक गिलास पानी पिला दीजिए। मम्मी ने मुझे पानी लाने के लिए इशारा किया। मैं पानी लेने चली गई तब तक वह दीवार गिराई जा चुकी थी। दीवार गिरते ही बड़ी तेज से लोगों के चिल्लाने रोने की आवाज़ें आने लगी और यह आवाजें सुनकर मैं भी पानी घर में ही छोड़कर बेतहाशा भागते हुए बाहर आई। मैंने देखा कि लोग चिल्ला रहे थे और गिरी हुई दीवार के मलबे को हटा रहे थे। मुझे तुरंत समझ में आ गया कि कोई इस मलबे के नीचे दब गया है। तब तक मेरी मम्मी बेहोश होकर गिर पड़ी। बदकिस्मती की बात है कि मेरे बाबा ही उस दीवार के नीचे दब गए थे। ये देखकर मेरी माता जी बेहोश होकर गिर पड़ी । उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनके बेहोश रहते रहते ही मेरे बाबा का अंतिम संस्कार कर दिया गया। तीन चार दिन के इलाज के बाद मेरी माता जी को होश आया । थोड़ी देर में वह फिर बेहोश हो गई ।दो-तीन दिन यही स्थिति चलती रही एक दिन उनकी तबीयत थोड़ी ठीक हुई तो उन्होंने मुझे अपने पास बुला लिया। मुझे पकड़ कर रोती रही रोती रही।  मैंने उन्हें बहुत धीरज बंधाया तब मम्मी ने मुझे बताया कि दीवार के गिरते समय मझले चाचा ने बाबा को गिरती दीवार के सामने धक्का देकर गिरा दिया था नहीं तो बाबा दीवार से दूर खड़े थे और उन्हें दीवार के गिरने से  कोई खतरा नहीं था ।  ये बताते - बताते  मम्मी के चेहरे पर भय और घबराहट के निशान मैं साफ देख पा रही थी लेकिन मैं इस बात का भरोसा भी कैसे कर सकती थी कि जिस चाचा जी को मेरे पिताजी ने पढ़ाया लिखाया बड़ा किया वही चाचा मेरे पिताजी के साथ ऐसा कृत्य कैसे कर सकते हैं ? मुझे इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था ।  मम्मी ने मुझे बताया कि "मैंने अपनी आंखों से देखा है तुम्हारे मझले चाचा ने तुम्हारे बाबा को धक्का दे कर दीवार के नीचे गिरा दिया। तुम्हारे बाबा ने संभलने की कोशिश की पर संभल नहीं पाए थे"। यह बातें बताने के बाद उन्होंने मुझसे यह वचन लिया था कि मैं यह बात किसी से नहीं कहूंगी और फिर मम्मी धीरे-धीरे ठीक होने लगी। लेकिन एक दिन अचानक उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई और बेहोशी में कुछ इधर-उधर की बातें करने लगी फिर बोलते बोलते  कोमा में चली गई और इस बार उनका कोमा में जाना फिर से ना आने के लिए था।

   मम्मी कोमा से बाहर नहीं आई और इस प्रकार सारा राज मुझे देकर वह स्वयं भगवान के पास चली गई। मम्मी के जाने के बाद मेरे पास घर में रहने की न कोई वजह थी ना कोई जगह। मुझे अपनी मृत्यु सामने दिखाई देने लगी थी।   घर के बाकी  सदस्यों की आपस में होने वाली बातचीत में मुझे मेरी मौत ही मौत दिखाई पड़ने लगी। इस प्रकार के डर के माहौल में रहते रहते मैं अर्धविक्षिप्त होने की अवस्था में चली जा रही थी। मेरी चाची मुझसे घर का बहुत सारा काम करवाते थे और फिर भी ताने देना और मेरी माता-पिता की मृत्यु के लिए मुझे जिम्मेदार बताना यही रोज-रोज की कहानी हो गई थी। वह यहां तक कहते थे कि मेरे भाग्य इतने खराब हैं कि मैं जहां रहूंगी उसी जगह पर कभी बरकत नहीं होगी। इस तरह वह दबे- छुपे मुझे यह कहना चाहते थे कि मैं घर छोड़कर कहीं और चली जाऊं। उन लोगों का यही मकसद था इसी मकसद के लिए उन लोगों ने मेरे पिता चौधरी परमानंद की हत्या तक कर डाली थी। मेरे पास घर छोड़कर भाग जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इसलिए मैं रात की गाड़ी से एक दिन अचानक भाग कर दिल्ली चली आई और फिर दिल्ली से यहां आ गई।

कंचन के परिवार में अपने ही जनों के द्वारा उसके पिता के इस प्रकार हत्या किए जाने की बात सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। मैंने कहा "तुम्हारे चाचा तुम्हारे पिता से इस तरह की रंजिश क्यों रखते थे?" उसने बताया कि "मेरे चाचा को मेरे पिताजी की मान मर्यादा और शोहरत से बहुत उन्हें बहुत ईर्ष्या होती थी। ऐसा करके उन लोगों ने अपनी ईर्ष्या और द्वेष का बदला तो लिया ही साथ में उनकी नजर पिताजी की पैतृक संपत्ति पर भी थी। वह जानते थे कि उनके पास कोई बेटा तो है नहीं और शादी करने के बाद संपत्ति बेटी को दे देंगे तो पैतृक संपत्ति में बंटवारा हो जाएगा। इसलिए   पूरी संपत्ति को हड़पने की मंशा से उन लोगों ने मेरे पिताजी को इस तरह निर्ममता पूर्वक मार डाला ।" कह कर वह रोने लगी। मैंने उसे ढांढस बंधाया फिर मैंने उससे पूछा कि "तुमने यहां आने के बाद अपना जीवन कैसे शुरू किया?" उसने बताया कि "शुरू-शुरू में एक तो भाषा की भी समस्या थी। लोग मेरी बात को देर से समझते थे और मैं भी लोगों की बात देर से समझ पाती थी क्योंकि मुझे हिंदी नहीं आती थी और ज्यादा देर तक लोगों से बात करने पर उनका अनुमान हो जाता था कि मैं अकेली हूं और लोग तरह-तरह से मुझे भटकाने की कोशिश करते रहते थे। इस प्रकार कई बार मुझे लोगों ने धोखा देकर मेरे साथ गलत काम किया और बाद में यही मेरी मजबूरी बन गई।  वह लोग समझ चुके थे कि मेरे आगे पीछे कोई नहीं है। इस प्रकार की असुरक्षा के बीच मेरा जीवन नरक बन गया था।  इसी दौरान एक ठेकेदार से मेरा संपर्क हुआ । उसने अपने साथ मुझे लेबर का काम करने के लिए रख लिया और उसके दबाव के कारण दूसरे लोग मुझसे दूरी बनाने लगे। इस तरह मेरे उस ठेकेदार के  साथ आने से मेरे जीवन में थोड़ा सा आराम आया।  आज जब मैं आपसे यहां मिल रही हूं तो मैं उसी के डेरे में गई थी। वह ठेकेदार कभी-कभी रात में शराब के नशे में मुझे बुला लेता था और मेरे जिस्म के साथ खेलता था । लेकिन इससे इतना तो हुआ कि मुझे केवल उसी को संभालना रहता था तो मेरे मन और शरीर पर पड़ा हुआ बोझ थोड़ा कम तो हुआ लेकिन यह अपराध तो मैं बार-बार कर रही थी या मेरी मजबूरियां मुझसे करा रही थी।"

 मुझे उसकी यह बातें सुनकर आश्चर्य तो नहीं हो रहा था, हां दुख जरूर हुआ। फिर भी मेरे पास उसके लिए कुछ करने के लिए दिखाई नहीं पड़ रहा था और ना ही मेरे मन में कोई उपयुक्त सवाल पैदा हो रहा था। फिर भी मैं ना चाहते हुए भी उससे पूछा कि "क्या यह जिंदगी तुम्हें किसी तरह रास आ रही है?" उसने चिढ़ कर कहा "बाबूजी कैसी बात करते हैं? यह जिंदगी भी कोई जिंदगी है! मुझे मृत्यु नहीं आती इसी बात का अफसोस है वरना इस नरक जैसे जीवन में माता-पिता की मृत्यु का बोझ लेकर जीना मेरे लिए किस तरह का जीना है समझ में नहीं आता! अपने आप से सवाल करती हूं कि आखिर मैं जीवित क्यों हूं! मैं मर क्यों नहीं जाती?"

 कह कर वह सिसक सिसक  कर रोने लगी। मैंने उसे किसी तरह चुप कराया। मैंने पूछा " तुमने कहां तक पढ़ाई किया है"? उसने बताया कि मैं दसवीं पास नहीं हो पाई थी तभी यह सब हो गया। मैंने उससे पूछा तुम पढ़ना लिखना जानती हो ?उसने कहा "हां मुझे अपने यहां की भाषा और अंग्रेजी का कुछ-कुछ पढ़ना लिखना आता है।" मुझे उसके अंग्रेजी जानने की बात पर आश्चर्य हुआ। मैंने कहा "तुम्हें अंग्रेजी कितना आती है?" वह बोली "बस थोड़ा बहुत जोड़-तोड़ कर पढ़ लेती हूं । ज्यादा कुछ समझ में नहीं आता" मैंने कुछ सोच विचार किया फिर मैंने उससे कहा कि "तुम क्या मेरे घर में मेरे साथ रह सकती हो? वहां तुम्हें सिर्फ मेरा छोटा-मोटा काम करना होगा। तुम्हें खाना पीना कपड़ा और सारी सुविधा मिलेगी और मैं तुम्हें थोड़ा बहुत पढ़ाऊंगा जिससे तुम्हें आने वाले समय में कोई काम मिल जाएगा। हो सकता है मेरे ऑफिस में ही तुम्हें कोई काम मिल जाए तो मैं वहां तुम्हारा इंतजाम कर सकता हूं। मेरे घर में मेरे साथ कोई और नहीं रहता। मेरा परिवार कानपुर में है। मैं यहां अकेला रहकर बिजनेस करता हूं । उसने डरते हुए हां कर दिया लेकिन उसका डर साफ था और मैं समझ रहा था कि वह ठेकेदार से बहुत डरती है । उसने पूछ ही लिया कि "अगर ठेकेदार ने मुझे देख लिया तो वह आपसे भी दुश्मनी ठान लेगा । बहुत टेढ़ा आदमी है वह!" मैंने कहा तुम उसकी चिंता ना करो। उसको पता ही नहीं चलेगा कि तुम कहां हो और हां तुम जहां भी रहती हो वहां से कोई सामान लेकर नहीं आना। केवल अपना बहुत जरूरी सामान ही लेना और वही सामान लेकर मुझे तुम कल इसी जगह पर इसी समय मिलना। हमारे साथ तुम हमारे घर चलना और फिर तुम्हें वही रहना होगा। कहीं आने-जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस प्रकार किसी को पता नहीं चलेगा और तुम वहां आराम से रह लोगी। वह इस बात के लिए तैयार हो गई और फिर जैसी की योजना थी अगली सुबह जब मैं प्रातः भ्रमण के लिए निकला तो वापस आते समय मुझे कंचन उसी जगह पर मिली जहां पर हमारी मुलाकात होती थी। उसको लेकर मैं अपने घर आ गया। मैंने उसको धीरे-धीरे घर का काम करने का पूरा सलीका सिखाया। वैसे वह खुद काफी समझदार थी और उसने मेरी बताई गई बातों को बहुत तेजी से समझना शुरू किया। धीरे-धीरे वह घर के कामों में पारंगत हो गई। उसके बाद उसकी पढ़ाई शुरू हुई। मैंने उसे हिंदी और अंग्रेजी के अल्फाबेट्स और उन्हें जोड़कर पढ़ना लिखना सिखाया। उसे गणित की भी थोड़ी बहुत जानकारी हो गई तब उसको दो साल के बाद ओपन स्कूल से दसवीं का इम्तिहान दिलवाया जो वह आराम से सेकंड डिवीजन में पास कर गई। हमारा ऑफिस हमारे अपने बिजनेस का हिस्सा था जिसमें स्टाफ को रखना मेरे ही हाथ में था इसलिए उसकी योग्यता को देखते हुए मैंने उसको अपने यहां परिचारिका के रूप में नियुक्त कर दिया। उन दिनों मेरे ऑफिस में एक नियमित कर्मचारी की जरूरत थी जो ऑफिस के सारे कार्य करें और आने जाने वालों के लिए खाने-पीने और चाय पानी की व्यवस्था देखें। कंचन के अंदर यह सब गुण बहुत निखर कर भरे हुए थे इसलिए उसने बहुत आसानी से कार्य संभाल लिया। इस प्रकार वह हमारे बिजनेस परिवार का हिस्सा बन गई और आज हमारे कार्यालय में सभी उसकी मेहनत ईमानदारी और सेवा भाव की सराहना करते हैं। मुझे पहला दिन याद आता है जब मैं उसको सुबह-सुबह एक घर से निकल कर जाते हुए देखा था और अपने मन में उसको अभिसारिका समझकर उसकी हंसी उड़ाया था। लेकिन मेरा मन संजीदा था और मैं समझ रहा था कि कोई भी व्यक्ति  स्वेच्छा से ऐसे कार्य नहीं करता । हर किसी की कोई न कोई मजबूरी जरूर होती है। इसी बात की तफ्तीश के लिए मैंने उससे बातचीत  करने का रिस्क लिया था और मेरा संदेह सही निकला। उसकी मजबूरियां मेरे सामने साफ निकल कर आई और थोड़े से प्रयासों से उसकी जिंदगी पटरी पर लौट आई। इस प्रकार सारिका सदा सदा के लिए विदा हो गई और आज वह कंचन के रूप में हमारे स्टाफ का एक अनमोल हीरा है। हीरा इसलिए है क्योंकि आज के विसंगतियां भरे जीवन में कोई ऐसा नहीं मिलता जिसके अंदर लोभ लालच, धोखा ना हो और वह कृतज्ञता भाव से सब की सेवा में ही अपना जीवन तलाश करता हो!   हमारी कंचन एक ऐसी कृतज्ञ और कर्तव्य परायण महिला थी।

No comments:

Post a Comment

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...