कहानी: अभिसारिका भाग-II
---------------------
यूं तो प्रायः लोग जीवन में मिलते हैं और बिछड़ते हैं ये एक आम बात है लेकिन जब कोई मिलना और बिछड़ना किसी के जीवन के बनने और बिगड़ने से संबंधित हो तो वह महत्वपूर्ण हो जाता है । इस अर्थ में कंचन का उस दिन मुझसे मिलने नहीं आना मेरे अपने हिसाब से दुर्भाग्यपूर्ण रहा क्योंकि उसके लिए मेरे मन में कुछ योजनाएं बनी थी जो सिरे चढ़ने से रह गई। बहरहाल यूं तो रोज ही सुबह और शाम आती है। इसे एक दिन का आना-जाना कहें तो एक बात है और इसी को जब हम जीवन के उत्सव के रूप में देखते हैं तब हमें दिखाई देता है कि हमारे सामने रोज एक चमत्कार घटित होता है। एक मेला लगता है। प्रकृति का एक मनमोहन आयोजन होता है जिसमें सूरज, चांद, सितारे चिड़िया, पंछी और हवाएं धरती और आसमान सभी मिलकर नाचते हैं और जश्न मनाते हैं। इस खूबसूरत से उत्सव को हम अगर कह दें कि "सुबह होती है शाम होती है,
उम्र यूं ही तमाम होती है,"
उस शायर को गलत नहीं कहा जा सकता जिसने ऐसा कहा था। लेकिन यह भी सही है कि जिसने जिनको जितना देखा उसने उसको उतना जाना। जिस नजर से आप प्रकृति को, स्वयं को अथवा जीव जगत को देखते हैं वह वैसा ही हो जाता है। इस बारे में मेरा दृष्टिकोण तो आपके सामने स्पष्ट है कि मेरे लिए हर सुबह का आना प्रकृति मन मोहिनी के लास्य का प्रतीक है, उसके आयोजन का हिस्सा है, और ऊर्जा, सौंदर्य तथा सृजन का प्रतिनिधि है। इसी के मेल से धरती पर जीव जगत का होना चलायमान है। इसी विचार से हम भी अपनी जीवनचर्या में चलते रहते हैं।
तो इस प्रकार अगली सुबह जब मैं प्रातः भ्रमण के लिए निकला तो वापस आते समय मुझे कंचन उस जगह पर नहीं मिली इसका जिक्र में कहानी के भाग एक में कर चुका हूं। मेरा सुबह का टहलने का क्रम जारी रहा। धीरे-धीरे वह घटना मेरे मन मस्तिष्क से गायब हो गई फिर भी इतना जरूर होता था कि उस जगह पर जहां वह मुझे मिलने के लिए कह कर गई थी वहां पहुंचने पर अनायास ही उसकी स्मृतियां मस्तिष्क में कौंध जाती थी लेकिन मैं उसे एक घटना समझ कर आगे बढ़ जाता था। कभी-कभी उसका विचार मेरा पीछा करते थे और यह सवाल उठता था कि जब उसके सामने एक रास्ता दिख रहा था तो उसे भरोसा करना चाहिए था । हालांकि भरोसा करना चाहिए था ऐसा मैं कह सकता हूं लेकिन वह भरोसा कर ही ले इसके लिए उसके पास कोई खास वजह नहीं रही होगी। मेरा कहना ही एक साक्ष्य था जिसे उसने संभवत: सत्य नहीं माना रहा हो। उसके प्रति मेरे मन में वह विश्वास नहीं पैदा हो सका हो जो मैं समझता था। इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द सोचते हुए मैं आगे निकल जाता था।
पिछले माघ मेले के दौरान बसंत पंचमी स्नान पर्व का दिन था। मैं बसंत पंचमी का स्नान करके मेला घूम कर बाहर निकल आया था और एक पान की दुकान देखकर उस ओर बढ़ गया। पनवाड़ी से मैंने पान लगाने को कहा और अपनी बारी का इंतजार करने लगा। तब तक पास में खड़ी एक काले रंग की स्कॉर्पियो की खिड़की से मेरी तरफ देखती हुई दो आंखें दिखाई पड़ी। ऐसा लगा कि वह मुझे ही एक टक देख रही थी। अपने मन का संदेह दूर करने के लिए जब मैने दोबारा उधर देखा तो उसने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया। जब मैं उसके पास गया तो मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि वह कंचन थी। उसने मुझे बड़े अदब से नमस्ते किया और बोली बाबूजी अब मैं कंचन हूं सिर्फ कंचन। ऐसा करते हुए उसका चेहरा गर्व और लज्जा भाव से एकदम लाल पड़ गया। मैं कुछ बोल पाता इसके पहले एक मोटा थुल थुल श्याम वर्ण व्यक्ति मेरे पास आ गया। तब तक कंचन ने ही परिचय कराया। "सुनिए अभिषेक, यही वह बाबूजी है जिनके बारे में मैंने आपको बताया था।" मेरे मन में सवाल तुरंत ही आया कि इसने पता नहीं क्या क्या उससे कहा होगा। लेकिन जब उस व्यक्ति ने बड़े ही आदर भाव से मुझे नमस्कार किया तो मुझे यह इत्मीनान हुआ कि संभवत: उसने मेरे बारे में कोई अच्छी बातें ही उसको बताया होगा, वरना अगर उसने यह बताया होता कि मैं उसको भागने के लिए बात कर रहा था तो शायद वह आदमी मेरा खून ही कर देता। मेरे मन में इस विचार से एक हंसी का फव्वारा छूटा पेट में एक गुदगुदी सी हुई लेकिन मैं उस समय स्थिर लेकिन मन से खुश उन लोगों को देख रहा था। अभिषेक भी मुझसे बहुत अदब से बात कर रहा था। उसने मुझे अपने घर पर आमंत्रित किया और विनय पूर्वक बोला कि आप अगर आएंगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। मैं भी उसके घर आने के लिए स्वीकृति दे दी फिर उसने कहा कि आप किसी भी रविवार को मेरे घर आईए, बल्कि आप इसी रविवार को मेरे घर आईए। हम लोग आपके साथ बैठकर बहुत आनंद महसूस करेंगे।
अगले रविवार को मैं उसके घर चला ही गया। यूं तो ऐसे किसी के घर यूं ही जाना मेरा स्वभाव नहीं है लेकिन मुझे उसके जीवन में आए इस प्रकार के सार्थक बदलाव को समझने के लिए जो उत्कंठा हुई थी उसी ने मुझे उसके घर जाने के लिए प्रेरित किया। सामान्य औपचारिकताओं के बाद हम लोग आपस में घुल मिल गए और बातचीत होने लगी। अभिषेक ने ही बताया कि वह भी अपने मां-बाप का अकेला है और उसके मां-बाप गाजीपुर में रहते हैं । कुछ कारणों से वह यहां नहीं आ सकते थे । यहां मुझे रोटी पानी की तुरंत आवश्यकता थी इसलिए कंचन से उपयुक्त कोई ग्रहणी मुझे मिलती हुई दिखाई नहीं पड़ी, या यूं कहिए कि कंचन में मुझे सब कुछ मिल गया इसलिए मैंने इसे स्वीकार कर लिया और इसने मेरा साथ स्वीकार कर लिया। हम विवाह के बंधन में बंध गए। इस बात को हुए 2 साल हो गए और अब तो हमारा एक 6 महीने का बच्चा भी है।
हम बात कर ही रहे थे कि तभी अभिषेक का फोन बजा और वह एक किनारे में जाकर फोन पर बात करने लगा।
बातें करते-करते अभिषेक सामने वाले पर चिल्ला चिल्ला कर बोलने लगा। बीच-बीच में उसके मुंह से अपशब्द भी सुनाई पड़ जाते थे और थोड़ी ही देर में वह बातें गाली गलौज तक पहुंच गई। तब कंचन ने जाकर उसे थोड़ा चुप कराने की कोशिश की। उसने कंचन को भी झिड़क दिया। इस बात पर मुझे बड़ी उलझन होने लगी। जब वह फोन पर बात कर चुका तो मैंने चलने की इच्छा जाहिर की। उसने अपने आप को संयत करते हुए मुझे सॉरी कहा और चाय पीने का आग्रह करने लगा । मैंने भी स्वीकार कर लिया। अगले 1 घंटे में चाय पीकर में उसके घर से निकल आया।
इस बात को हुए लगभग एक साल बीत गए । एक दिन मैं अपने ऑफिस में बैठा था तभी चपरासी ने आकर बताया कि कोई आपसे मिलने आया है। मैंने उसे अंदर बुला लिया। देखा तो वह कंचन थी । उसे आकस्मिक रूप से वहां देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। उसका हाल और हुलिया देखकर लग रहा था कि वह बहुत परेशान है। साथ में उसका बच्चा भी था जो शरीर से काफी कमजोर लग रहा था। कंचन की भी स्थिति बीमारों जैसी दिख रही थी। मैंने उससे पूछा क्या हुआ और यह हालात कैसे बना रखी है? उसने अपने दुख भरी कहानी सुनाई उसने बताया कि "पिछले वर्ष अभिषेक ने बातों बातों में झगड़ा लड़ाई करके उसे घर से निकाल दिया" उसने बताया कि "वैसे तो छोटी-छोटी बातों पर अक्सर झगड़े होते थे लेकिन ऐसा लगता था कि यह बातें कभी ना कभी ठीक हो जाएंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि उसकी परिणति कुछ इस तरह हुई कि मुझे घर से निकल जाना पड़ा। और अब वही यायावरी और वही फाकाकशी चल रही है जिसके कारण स्थितियां बहुत बदतर हो गई हैं"। मैंने उसे अपने ऑफिस में रुक कर काम करने के लिए कहा। उसके पास कोई विकल्प नहीं था इसलिए उसने मेरे ऑफिस में रह कर काम करना स्वीकार कर लिया।
मैंने उसको धीरे-धीरे आफिस का काम करने का पूरा सलीका सिखाया। वैसे वह खुद काफी समझदार थी और उसने मेरी बताई गई बातों को बहुत तेजी से समझना शुरू किया। धीरे-धीरे वह घर के कामों में पारंगत हो गई। उसके बाद उसकी पढ़ाई शुरू हुई। मैंने उसे हिंदी और अंग्रेजी के अल्फाबेट्स और उन्हें जोड़कर पढ़ना लिखना सिखाया। उसे गणित की भी थोड़ी बहुत जानकारी हो गई तब उसको दो साल के बाद ओपन स्कूल से दसवीं का इम्तिहान दिलवाया जो वह आराम से सेकंड डिवीजन में पास कर गई। हमारा ऑफिस हमारे अपने बिजनेस का हिस्सा था जिसमें स्टाफ को रखना मेरे ही हाथ में था इसलिए उसकी योग्यता को देखते हुए मैंने उसको अपने यहां परिचारिका के रूप में नियुक्त कर दिया। उन दिनों मेरे ऑफिस में एक नियमित कर्मचारी की जरूरत थी जो ऑफिस के सारे कार्य करें और आने जाने वालों के लिए खाने-पीने और चाय पानी की व्यवस्था देखें। कंचन के अंदर यह सब गुण बहुत निखर कर भरे हुए थे इसलिए उसने बहुत आसानी से कार्य संभाल लिया। इस प्रकार वह हमारे बिजनेस परिवार का हिस्सा बन गई और आज हमारे कार्यालय में सभी उसकी मेहनत ईमानदारी और सेवा भाव की सराहना करते हैं। मुझे पहला दिन याद आता है जब मैं उसको सुबह-सुबह एक घर से निकल कर जाते हुए देखा था और अपने मन में उसको अभिसारिका समझकर उसकी हंसी उड़ाया था। लेकिन मेरा मन संजीदा था और मैं समझ रहा था कि कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से ऐसे कार्य नहीं करता । हर किसी की कोई न कोई मजबूरी जरूर होती है। इसी बात की तफ्तीश के लिए मैंने उससे बातचीत करने का रिस्क लिया था और मेरा संदेह सही निकला। उसकी मजबूरियां मेरे सामने साफ निकल कर आई और थोड़े से प्रयासों से उसकी जिंदगी पटरी पर लौट आई। इस प्रकार सारिका सदा सदा के लिए विदा हो गई और आज वह कंचन के रूप में हमारे स्टाफ का एक अनमोल हीरा है। हीरा इसलिए है क्योंकि आज के विसंगतियां भरे जीवन में कोई ऐसा नहीं मिलता जिसके अंदर लोभ लालच, धोखा ना हो और वह कृतज्ञता भाव से सब की सेवा में ही अपना जीवन तलाश करता हो! हमारी कंचन एक ऐसी कृतज्ञ और कर्तव्य परायण महिला थी।
No comments:
Post a Comment