Sunday 16 2026

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं 

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वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है 

मैं उसी पल की बात करता हूं,

मैं तुम्हारी हमारी जिंदगी की बात करता हूं।।

खुदाया आज की रात रुक जा, न जा, फना हो जाऊंगा

हाथ छूटेगा जिस पल मैं उस पल की बात करता हूं।।

एक पल की जिंदगी क्या होती है तुम क्या जानो 

 एक नज़र पे वार दी जां जिसने, मैं उसकी बात करता हूं।

वो सब में रहता है, सभी जानिब है भी लेकिन 

जो ये नहीं मानते मैं उनकी बात करता हूं।।

चलो मान लो ये दुनिया भी नहीं ये आसमान जमीं भी नहीं 

फिर वो कौन है जो होता है मैं उसकी बात करता हूं।।

Monday 06 2026

रात रात भर जाग जाग कर

 यूं रात रात भर 

जाग जाग कर 

करवटें बदल बदल कर 

जाने क्या बिसूरते रहते हो

कभी मुझसे कहो

मैं घर हूं तुम्हारा

अपनी छत और दीवारों में 

खिड़कियों पर्दों में 

तुम्हारे लिए 

मैंने बचा के रखी हैं

सब से गहरी नींदें

चैन- ओ- सुकून 

तुम सब ले लो और 

सो जाओ 

एक गहरी नींद 

जिसमें सपनों को भी 

आने की इजाज़त न हो

मैं तुम्हें ऐसे अपने पहलू में

देखना चाहता हूं 

आराम की नींद 

सोते हुए 

मैं घर हूं तुम्हारा 

 यूं रात रात भर 

जाग जाग कर 

करवटें बदल बदल कर 

जाने क्या बिसूरते रहते हो

मुझे अच्छा नहीं लगता 

मैं घर हूं तुम्हारा 

कभी मुझसे भी बातें करो

यूं तो मैं बहुत खुश हूं 

तुम्हारे बच्चो की किलकारियों में 

तुम्हारी पत्नी की छनकती पायलों में 

उनके हाथ से बने

पकवानों में 

मैं दिन भर के किस्से 

तुम्हारे बच्चो के खेल, 

शैतानियां,

तुम्हारी मालकिन की

प्यार भरी डांट डपट

मनुहार और प्यार 

बहुत कुछ तुमसे 

बताना चाहता हूं 

तुम कभी मेरी तरफ

देखो, मुझसे बातें करो

तुम्हें मैं बहुत कुछ बताना चाहता हूं 

मेरे पास तुम्हारे लिए 

बहुत सी मुस्कान और 

ठहाके हैं 

तुम्हारी ही अमानत हैं 

तुम्हें ही लौटाना चाहता हूं 

कभी तुम मुझे एक नजर 

देख लिया करो 

मेरे जिस्म के कोने कोने में 

दर्ज हैं तुम्हारे बच्चों की

बदमाशियां 

तुम्हारी पत्नी के हाथों के

कोमल स्पर्श 

मैं वो सब भी तुम्हें देना चाहता हूं 

मैं घर हूं तुम्हारा 

तुम्हारे लिए मैंने 

बचाकर रखी हैं 

निरापद सुरक्षा 

कभी मेरी तरफ देखो

मुझसे बातें करो

तुम्हें मैं अपने आगोश 

में ले कर 

तुम्हारा सब कुछ तुम्हें लौटाना चाहता हूं 

मैं घर हूं तुम्हारा!

मन

 मन

दुनिया की मुश्किलों से हारा

एक बेचैन परिंदा है 

जिसे सुख कहते हैं 

उसे ढूंढता 

हर शय में उसे ही देखता 

ये नहीं, वो नहीं 

नहीं नहीं इनमें से 

कोई नहीं 

कल ही अच्छा था 

अब आजकल तो 

कुछ भी अच्छा नहीं लगता 

हां, हो सकता है 

आने वाले दिन अच्छे हों

इन्हीं जोड़ जुगत में 

सब से सुनहरा आज का

दिन भी हाथों से 

ये फिसला, वो गया

वो आज के सूरज की पहली पहली किरण 

सोना बरसाती हुई निकल गई 

हवाएं महका कर चली गई पूरी कायनात 

पंछियों ने उसका स्तुतिगान गाया

सबने अपने अपने हिस्से का सुख पाया 

एक हमारा मन

दुनिया की मुश्किलों से हारा

एक बेचैन परिंदा है 

ढूंढता ही रहा उसे

सुख कहते हैं जिसे

वो कहीं न मिला

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बचपन में

 बचपन में 

जिम्मेदारियों का बोझ था 

उन दिनों में 

दादी की सूनी उदास आंखों ने

जब अपने लिए मुझमें 

उम्मीद की किरण देखा,

मुझमें वो समझ न थी ।

अब जब वो सूनी आंखों के चित्र ज़ेहन में उभरते हैं 

एक हूक सी उठती है ।

कुछ कर न सकने का दुख तो अपनी जगह है ,

दादी की उम्मीद भरी आंखों से आंखें नहीं मिला पाता  

इस दुख का क्या करूं ?

 कम समझ

या ना समझी में 

जिम्मेदारियों का पूरा 

न हो पाना

जब खटकता है,

खटकती हैं वो बातें 

जब दोस्तों की नेकियों के बदले

अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके थे,

सोचता हूं कि ईश्वर 

तुमने इतनी समझ तो दी होती ।

और अब जब समय बीत गया है, 

खाली समय ही समय है 

तो ये सभी चित्र 

बारी बारी से आते हैं 

और अपना हिसाब मांगते हैं ,

रीते हाथ हजारों सवाल 

पीछा करते हैं ,

मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है!

लड़कियों

 लड़कियों 

खुले आकाश में अगर 

उड़ना चाहती हो

चाहती हो असीमित आसमान, तो -

अपने पिता को भरोसा दो

मां को दो विश्वास 

भाई को आश्वस्ति दो

कि तुम अपने स्वत्व को

स्वाभिमान को

और पारिवारिक मूल्यों को 

लेकर घर से बाहर 

जा तो रही हो

इसे ऐसे ही वापस लाओगी 

तुम आधी अधूरी नहीं 

अपनी संपूर्णता के साथ 

बाबा के घर की दहलीज के अंदर आओगी

तुम नहीं जानती कि

नारी की आजादी के

गुमराह करने वाले 

नारों में लंपटों की साज़िशें शामिल हो जाती हैं धीरे से 

तुम्हारे साथ छल कर के

निकल जाती हैं

शादी, नौकरी, धन दौलत के झांसे

शराफ़त के चोले 

मासूमियत भरे चेहरे 

कई रूपों में 

तुमको मिलेंगे 

तुम भ्रमित न होना

लालच लिए भेड़िए भी 

मिलेंगे 

तुम इन सब से बचते 

बचाते अपने लिए 

उस आकाश की तलाश से डिगना नहीं 

वरना, करे चाहे कोई भी इल्जाम तुम पर ही आएगा 

इसलिए -

लड़कियों तुम 

सावधान रहना!

लोकगीत

 [27/08/2025, 12:01] mohandhanraj1509: मोरा सईंयां अनारी अब का करी

हाय दिल की बीमारी अब का करी

सोने के थारी में जेवना परोसा

जीमैं ना अनारी अब का करी 

मोरा सईंयां अनारी अब का करी

बार बार हमसे पानी मंगावै

घूंटै ना अनारी अब का करी 

सेजिया पर चंपा की चादर बिछाया 

सोवै ना अनारी अब का करी 

लौंगा इलायची का वीरा लगाया 

चाबै ना अनारी अब का करी 

मोरा सैया अनारी अब का करी

लगी दिल की बीमारी अब का करी।।

[27/08/2025, 12:35] mohandhanraj1509: ई सौतन जिउ के जवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया

रोज-रोज आवे का वादा करत है

हमसे मिलै का इरादा करत है

 नहीं आने का कोई सवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया

रहिया तकत मोरी सूनी नजरिया 

 गुलरी के फुलवा भए सैया संवरिया 

सौतन कै नगरिया गुलजार हो 

मोरी सूनी सेजरिया

हमरी सेजरिया में कांटा लगत है

सौतन कै सेजरिया बवाल हो

 मोरी सूनी सेजरिया

ई सौतन जिउ के जवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया।

जब कोई बद हवासी में जीता है

 कविता: जब कोई बद हवासी में जीता है 

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जब कोई बद हवासी में जीता है 

जिंदगी जो कि अमृत है 

बना के जहर 

 घूंट घूंट पीता है

जब कोई बदहवासी में जीता है ।

ये दुनिया एक सराय है हम सभी मुसाफिर हैं वह इसे घर समझता है जो छूटे तो वही 

जार जार होता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।

 यह रेल का सफर 

मुसल सल है

 हम सभी मुसाफिर हैं हर मुसाफिर को समझकर अपना 

लिपट लिपट के रोता है जब कोई बदहवासी में जीता है ।।

जिंदगी के लिए सब जरुरी है 

इसलिए सब ले आए फिर सबसे ऊब गए छोड़ आए

 हर बार कुछ छोड़ा कुछ रीता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।

बहुत जिद्दी था

 जन्म से पहले मैं बहुत जिद्दी था।

जब ब्रह्मा ने मुझसे कहा 

तुम्हें धरती पर जाना है,

मैंने तुरंत एक शर्त लगा दी,

मैंने कहा मैं धरती पर तभी जाऊंगा जब आप मुझे, ये धरती और पूरा ब्रह्मांड सौ साल की लीज पर दे देंगे!

उन्होंने मुझे आश्चर्य से देखा और पूछा - 

"इन सौ वर्षों का तू क्या करेगा रे?"

मैंने कह दिया 

ये जो आप ने धरती पर 

इतने व्यूह रचा रखें हैं 

मुझे उन सारे तिलिस्मों को तोड़ना है!

वो हंसे और बोले

"तू इतनी सी जान 

कैसे कर पाएगा ऐसे काम?"

मैंने कहा जब आप कहते हैं कि"तू मेरा ही अंश है, तो नन्हीं सी जान मैं कैसे हुआ? 

मैं तो आप की छवि हूं, मैं ब्रह्म हूं!"

और जब आप की शक्ति से सब कुछ है तो, 

मैं वो सब करूंगा जो आप करते हैं।

तब उन्होंने कहा -

"मेरे तिलिस्मों को तोड़ने वाले बहुत मार खाते हैं "

मैंने कहा 

वो भी कर के देख लीजिए 

उन्होंने हंस कर कहा "चल ये भी सही, 

तू कर मैं देखता हूं"

मैंने भी कह दिया मंजूर है 

तब ब्रह्मा बोले

"जा, तुझे ये धरती आकाश और पूरा ब्रह्मांड सौ साल के पट्टे पर दिया !"

तब मैं अपनी जन्मदात्री के गर्भ में समाया

और अब धरती पर मैं वो सब उपद्रव करता हूं, जिसको मैंने मिटाने का वादा किया था,

मैं मनुष्य हूं ,

मुझे धरती पर भेज कर अब ब्रह्मा भी परेशान हैं!!

गंगा में नहाने आए हैं

 गंगा में नहाने आए हैं 

मैया के दीवाने आए हैं 

दिल में हैं उमंगे बड़ी बड़ी

धूप दीपक जलाने आए हैं 

तीरथ पावन है प्रयागराज 

गंगा यमुना सरस्वती के 

संगम में हम 

डुबकी लगाने आए हैं 

एक हररियाली एक धवल धार 

गंगा यमुना सरस्वती को

हम दुग्ध पुष्प और दीपदान कर 

अपना जीवन बनाने आए हैं 

तीरथ प्रयाग के कोतवाल

गंगा मैया पखारे जिनके चरण 

बड़े बजरंगबली के पावन चरणों में

हम माथा झुकाने आए हैं

ये काया है माया

 बचपन में रुई के से फाये से बनी पूरी कलात्मक दुनिया मां-बाप के प्यार से लबालब उफनाती हुई सी, फूलों और तितलियों के पीछे भागते कब की फुर्र से निकल गई ! किशोर वह उससे भी कोमल और थोड़ा-थोड़ा संवेदनशील लेकिन अपने आप को लेकर काफी सजग और उत्साहित! जिंदगी के इंद्रधनुषी रंग इसे बेहद खूबसूरत बना रहे थे। लुका छुपी करते, कभी कोई अच्छा लगने लगता तो उसको आते जाते हुए देखना ही भला लगने लगा था लेकिन कुछ समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। ऐसे ही कुछ सपने देखने के संदेश देकर वह उम्र भी चली गई। जवानी में कदम रखे तो ऐसा लगता था कि पैर जमीन पर और हाथ आसमान में कोई भी तारे कभी भी तोड़ लेंगे ! जल्दी भी क्या है अभी नहीं तो कभी भी !!

इस बहुत खूबसूरत सी जिंदगी में आईने के सामने खड़े होकर अपने आप को टकटकी लगाए देखना, कभी दाहिने से कभी बाएं से , कभी ऊपर से नीचे तक कभी कॉलर टाइट करना, कभी बेल्ट ठीक करना ! क्या गजब जमाना था और हेयर स्टाइल का तो कहना ही क्या! ऐसे झटको कि जुल्फें पीछे की और आकर करीना से लग जाए ! हां, हमारे बड़े बूढ़े यही तो कहते थे कि यह क्या जुल्फी रख लिया है आवारा बनना है क्या ? इसे कटवा क्यों नहीं देते ? वो हमारे सबसे बड़े दुश्मन दिखाई पड़ते थे और अपने को यह कायनात और यह अपना शरीर कुदरत का करिश्मा लगता था।

अब ऐसे ही अचानक एक अजीब सी बात हुई और किसी डॉक्टर ने कहा कि अपने शरीर का सीने का एक्सरे करा कर ले आओ। एक्सरे कराया जब , तो उसमें देखा सीने में पसलियां, दो फेफड़े श्वास नली भोजन नली! यह तो पहचान में आ रही थी इसको देखकर कुछ अच्छा नहीं लगा । ऐसा लगा कि यह शरीर जिससे इतनी मोहब्बत हम करते हैं यह है क्या! मशीनी पुर्जों की तरह से असेंबलिंग की गई एक मशीन ही तो है। बड़ा अच्छा था जब हमने नहीं देखा था कि ये शरीर अंदर से ऐसा होता है । तब ऐसे लगता था जैसे शक्ति, सौंदर्य और बुद्धिमत्ता के साथ बना हुआ यह शरीर दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना है। ऐसा लगा जैसे एक पल के लिए कोई बहुत बड़ा तिलिस्म था जो टूट गया! हो सकता है ऊपर वाले ने हमें इस लायक समझा हो कि अब हम वास्तविकता को समझने के काबिल हो रहे हैं इसलिए इस समय एक्सरे कराने का आदेश दिया। उसके बाद तो फिर धीरे-धीरे शरीर के अंदर फिट किए गए कल पुर्जों की पूरी कहानी देखने और समझने को मिलने लगी। हां कुछ दिन के लिए मन सोच में पड़ गया कि काश यह शरीर ऐसे अंगों पुर्जों की असेंबलिंग ना होती! बस यह जिस्म होता ये कायनात होती , हम होते और हमारी सुंदर कल्पनाएं । लेकिन समय के साथ-साथ परिपक्वता के आने पर अब अत्यंत बुद्धिमानी के साथ संपूर्णता के स्तर तक जाकर बनाए गए इस कल पुर्जे को देख और समझ कर इस बात का एहसास हुआ है कि ये कुदरत का करिश्मा ही तो है ! हर हाल में यही हमारे सपनों की दुनिया देखने का जरिया है, यही हमें कायनात से ईश्वर तक ले जाने का भी माध्यम है।

हां,ऐसा हो सकता है

 हां,ऐसा हो सकता है 

क्यों नहीं हो सकता?

ये ब्रह्माण्ड 

कभी नहीं बना 

ये ना तो कहीं से आरंभ होता है 

ना कहीं खत्म

इसके लिए समय शब्द अर्थहीन है 

क्यों कि इसपर समय 

कोई छाप नहीं छोड़ता 

इसका ना कोई कर्ता है 

ना ही ये किसी की कृति है 

ये अनंत सर्वकालिक सर्वव्यापी है अथाह और अपरिमित 

ऊर्जा का श्रोत जिससे 

सबकुछ संचालित है 

ब्रह्माण्ड में अनंत ग्रह, नक्षत्र, तारे 

आकाश गंगाएं 

इस धरती जैसी कितनी धरती 

उन पर ऐसे ही कितने जीवन 

पलते होंगे जैसे -

इस धरती पर

जिसपर हम रहते हैं ।

हां, ऐसा हो सकता है 

क्यों नहीं हो सकता?

ये अनंत अथाह और अपरिमित 

ब्रह्माण्ड एक धरती 

एक आसमान एक सूरज एक चांद एक धरती पर कुछ लोग वनस्पतियां और ये सौंदर्य की रचना करके , क्या रुक गया होगा? 

मनुष्य का मन मस्तिष्क और उसकी शक्तियां इतनी कैसे हो सकती है जो 

इस तिलिस्म को समझ जाए?

एक फरिश्ता होना होता होगा

 मां होना 

 एक फरिश्ता होना होता होगा।

जैसे ईश्वर मां के पेट में 

मिट्टी से सिरजता है 

फिर कोख को अंवां बना कर

उसी में तपा कर बर्तन पकाता है 

वो मुझे लेकर 

आग से गुजर जाती है 

आग से गुजर जाना

फ़रिश्ता हो जाना होता होगा।

इक नहीं सी जान को

अपने रक्त, मज्जा से निसृत

 दूध से पालती

रोटी के लिए धूप के पहाड़ काटती

सात समंदर पार से

सपने चुन लाती

एक बच्चे की खुशियों खातिर 

चंदा तक जाना होता होगा 

मां होना 

एक फरिश्ता होना होता होगा।

इस दुनिया में सब कुछ नश्वर है 

सच कहते हैं लोग

अंत में बस ईश्वर है 

जब सारे दरवाजे बंद हुए 

तब मां का आंचल छाया है 

जब खिले फूल दिशाएं महकी

जीवन के हर गीत 

पुष्प मकरंद हुए 

हर खुशियों दुख के आलम में 

थैली भर आशीष लिए बस

मां का आना होता होगा 

इस दुनिया में मां का आना

एक फ़रिश्ते का ज़मीं पर 

आना होता होगा।

जिंदगी की सहर

 एक रात की सहर होते होते हो गई 

जिंदगी की सहर

एक मां थी उस पर हो गई जिंदगी की मेहर

रोते-रोते सो गई उसकी याद में वो नहीं आया 

कितना घना था ओ खुदाया उस पर गमों का साया

सियाह चेहरे पे एक मुकम्मल किस्सा था यूं नुमाया

गोया उसकी याद में लिपट कर रोई थी ज़ार ज़ार

जो गुज़र गई ज़िन्दगी न लौटी, दी सदाएं बार बार 

उसका चेहरा था ज़ेहन ओ दिल में 

मुस्कुराता था

एक आरी थी उसका जिस्म था और वो चलाता था

यूं कोई बुरा ख्वाब था कभी आता था चला जाता था

कभी बांहों में लिपट जाता, आता था मुस्कुराता था 

ऐसी कोई रात थी, मां थी, यादें थी वो सब आईं

 मां के बेचैन कानों में बेटा आया ये खबर ना आई !

जैसा कल था आज नहीं है....

 जैसा कल था आज नहीं है....

भारत अब आजाद हो गया 

गोरों का अब राज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है.....

अपनी धरा गगन है अपना 

आंखों में भी सजता सपना 

पंछी सब आजाद हुए हैं 

उनके सिर पर बाज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है .....

सोचा था मधुमास खिलेंगे 

फूलों वाले बाग मिलेंगे 

लेकिन रुत कुछ ऐसे बदली 

अब मौसम है ऋतुराज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है.... 

अपनी एक कहानी लिखो 

बचपन और जवानी लिखो 

लिखो संविधान है वो राजा 

जिसके सिर पर ताज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है ....

नौजवानों

 नौजवानों गर जवान हो तो

खून में उबाल होना चाहिए 

हर तरफ जवानी का 

जमाल होना चाहिए 

फूलों की तरह हंसो

हर तरफ रचो बसो

बात हो खुशी की तो

धमाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

तुम पढ़ो आगे बढ़ो 

ज्ञान के सूरज बनो

हर अंधेरे के लिए 

जवाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

मुश्किलें होंगी डगर में 

हल भी होंगी मगर वे

 सीनै में उनके लिए 

उबाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

हर हार की अब हार होगी

हर सितम से रार होगी 

ज़ुल्म ओ सितम के सामने 

सवाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए

Friday 10 2025

कविता: जब कोई बद हवासी में जीता है ------

 


कविता: जब कोई बदहवासी में जीता है

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जब कोई बदहवासी में जीता है

जिंदगी जो अमृत है 

बना के जहर 

उसको घूंट घूंट पीता है जब कोई बदहवासी में जीता है 

ये दुनिया एक सराय है हम सभी मुसाफिर हैं वह इसे घर समझता है जो छूटे तो वही 

जार जार होता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है

 यह रेल का सफर 

मुसल सल है

 हम सभी मुसाफिर हैं हर मुसाफिर को समझकर अपना 

लिपट लिपट के रोता है जब कोई बदहवासी में जीता है 

जिंदगी के लिए सब जरुरी है 

इसलिए सब ले आए फिर सबसे ऊब गए 

सब कुछ छोड़ आए

 हर बार कुछ छोड़ा कुछ रीता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।।।।

Wednesday 10 2025

महुआ के फूल

 महुआ के फूल 

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महुआ के फूल उत्तर प्रदेश के एक आम गांव की कहानी है। जिस प्रकार हर गांव में भोले भाले लोग बसते हैं , इस गांव में भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाकर उनका शोषण करने वाले लोग भी यहीं रहते हैं। इन्हीं लोगों के कारण गांव की जिंदगी नर्क से भी बदतर होती जा रही है और भारी संख्या में लोग गांव से निकलकर शहरों की तरफ जा रहे हैं। महुआ के फूल कहानी की शुरुआत एक शासकीय सेवक के रिटायर होकर गांव में आ कर बसने पर वह क्या-क्या अपनी नजर से देखते हैं यही से शुरुआत होती है। इनका नाम है सतीश वर्मा। सतीश वर्मा रोज की तरह सुबह टहलने जाया करते हैं। इधर गांव में आकर जब उन्होंने अपनी दिनचर्या शुरू की तो पहले दिन ही उनका साक्षात्कार एक घटना से हुआ। मिस्टर वर्मा टहलने के लिए एक बाग से होकर निकलते हैं जहां शालू नाम की एक लड़की सुबह-सुबह महुआ बीनने के लिए आई हुई थी। उससे वह थोड़ी सी बातचीत करके आगे चले जाते हैं लेकिन जब वापस आते हैं तो उस महुआ के पेड़ के नीचे बड़ा उपद्रव हो चुका होता है। आसपास बिखरे महुआ के फूल और उसकी डलिया उसके वहां हो चुके

 उपद्रव की कहानी कह रहे थे। मिस्टर वर्मा गांव में फोन लगाकर अनहोनी की खबर देते हैं जिस पर गांव के लोग इकट्ठा होते हैं । आसपास तलाश की जाती है तो लड़की की मां बगल के खेत में बेहोश मिल जाती है जबकि लड़की का कहीं अता पता नहीं चलता। उसकी मां होश में आने पर गांव के प्रदीप और सुरेंद्र का नाम लेती है और बताती है कि रामबरन और लल्लन ने उसके सिर पर चोट किया था जिससे वह बेहोश हो गई इस प्रकार चारों के खिलाफ नाम जद रिपोर्ट दर्ज होती है लेकिन पुलिस की ढीला ढाली में कुछ हासिल नहीं होता। इसी बीच मिस्टर वर्मा को पता लगता है कि गांव के प्रदीप कुमार और

उसके साथी गांव के बाहर बने फार्म हाउस में छिपे हुए हैं। इस में पुलिस भी मिली हुई है। इस पर वर्मा जी को गुस्सा आ जाता है और वर्मा जी अपने हिसाब से इन लोगों को सबक सिखाना चाहते हैं। उन्होंने शहर से अपने एक वकील मित्र की मदद से इन लड़कों को फार्म हाउस से उठवा लिया । उनको शहर में गुप्त स्थान पर रखा और 5 दिन तक भूखा प्यासा रखकर , चेतावनी देकर गांव के सरहद पर छुड़वा दिया। यह दोनों लड़के बेहोश हालत में गांव वालों को सुबह दिखाई पड़ते हैं। इनका इलाज होने पर ठीक होते हैं तब ये अपना बयान देते हैं लेकिन डर के मारे किसी का नाम नहीं लेते। इस मामले में कोर्ट की कार्यवाही भी आरंभ होती है। तब यह लोग पिछली यातना को भूलकर फिर से गवाहों को धमकाने और दबाने में लग जाते हैं। इसी बीच होली का पर्व पड़ता है तो होली के पर्व पर यह लोग आपसी रंजिश में गांव के एक व्यक्ति को मार कर अधमरा कर देते हैं। इस मामले में भी इनका नाम पुलिस के पास जाता है लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती। यह लोग जमानत पर छूट कर यहां उत्पात मचाते रहते हैं।

यह लोग पिछले दरवाजे से रंजिश निकालने के लिए शादी में भी विघ्न डालने की कोशिश करते हैं।  इसका भी खुलासा हो जाता है तो इन्हें गांव के लोग इनको बहुत बुरी तरह मारते हैं और पुलिस के ऊपर कार्रवाई करने का दबाव बन जाता है लेकिन वो लोग टाल मटोल करते रहते हैं।

अब पुलिस के द्वारा उस मारपीट पर भी कोई कार्यवाही नहीं करने पर मिस्टर वर्मा पुलिस से बात करते हैं जिस पर पुलिस का रुख सहयोगात्मक नहीं रहता और वह सलाह देते हैं कि आप सेवानिवृत्ति के बाद शांति से घर में बैठिए। गांव के पचड़े में क्यों फंस रहे हैं। इस बात पर मिस्टर वर्मा के बच्चे भी आपत्ति करते हैं और कहते हैं कि आप शहर वापस चले जाइए। लेकिन मिस्टर वर्मा अपनी जिद पर अड़ गए और उन्होंने कहा कि यह मेरा गांव है और मैं यहां पर होने वाले हर प्रकार के अन्यान्य का प्रतीकार करूंगा और यही रहूंगा। इस प्रकार मिस्टर वर्मा गांव में रहकर उन लड़कों के खिलाफ कार्यवाही कराते हैं। उन लोगों की जमानत कैंसिल हो जाती है और वह वापस जेल चले जाते हैं। गांव में अमन चैन कायम हो जाता है लेकिन यह अनिश्चय फिर भी बना रहता है कि वो लोग छूट कर आएंगे तो गांव में फिर से उत्पात मचाएंगे। मिस्टर वर्मा इस बात से भी नहीं घबराते और वह गांव के लोगों को बुलाकर उन्हें समझाते हैं कि

 शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करने से ही उन्नति हो सकती है और अशांति से उन्नति की बजाय जीवन में अवनति का प्रवेश हो जाता है और हमारी सुख शांति नष्ट हो जाती है। इस बात पर गांव के लोग मिस्टर वर्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि आपने एक बार इस गांव के प्रति अपना फर्ज पूरा करके बता दिया कि आप इस गांव के एक लायक सुपुत्र हैं।

Saturday 06 2025

शब्द ब्रह्म है।

 शब्द ब्रह्म है। 

क्यों? 

क्योंकि जिस प्रकार ब्रह्मा की पूजा नहीं होती उसी प्रकार शब्द की भी पूजा नहीं होती। शब्द और ब्रह्म दोनों पूजा और प्रार्थना से ऊपर होते हैं। हम मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं लेकिन शब्दों में प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह स्वयं ब्रह्म है, सर्वशक्तिमान है । कभी फूलों को सजाने के लिए दूसरे फूल नहीं लगाए जाते क्योंकि हर फूल ईश्वर की शक्ति से संपन्न अपने रंग, रूप और महक के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अन्य फू। इसी प्रकार शब्द की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अन्य शब्दों की जरूरत नहीं होती क्योंकि हर शब्द की अपनी एक ध्वनि है, सुगंध है, शक्ति है। यह ब्रह्म की तरह सर्वशक्तिमान, कालातीत और सर्वव्यापी है। शब्द शक्ति है। शब्द से ही मंत्र बनते हैं। मंत्र से ईश्वर की पूजा, मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा, दीर्घायु की कामना और दुनियावी जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रार्थना और मोक्ष के लिए साधना की जाती है। शब्द हमें गौरव प्रदान करते हैं। शब्द से ही ज्ञान है । ज्ञान से ही मुक्ति है। शब्दों का प्रयोग हमें मनुष्यों में सिरमौर बनता है वहीं अगर शब्द गलत बोले जाएं तो उनका दुष्प्रभाव भी हमें झेलना पड़ता है। इसलिए शब्द का प्रयोग बहुत ही सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। शब्द प्रार्थना और दुआ के लिए होते हैं । शब्द ही अपशब्द बनते हैं और अपशब्द से अघट की संभावना बनती है । शब्द से ही अप्रिय और अनवांछित परिस्थितियां बनती हैं जो हमारे लिए कहीं भी स्वीकार्य नहीं हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम कल्याणकारी शब्दों का अपनी भाषा में समावेश करें। ऐसे शब्दों का प्रयोग ही ना करें जिनके दुष्प्रभाव किसी के जीवन में पड़ सकें। एक बात तो तय है कि जो शब्द किसी अन्य के जीवन में अप्रिय स्थिति पैदा कर सकते हैं उसका प्रभाव हमारे ऊपर भी पड़ना निश्चित है क्योंकि वो शब्द हमारे द्वारा ही बोले जाते हैं । शब्द की शक्ति को समझना और उसे उसी के अनुरूप व्यवहार करने की सलाह शास्त्र सम्मत है। शब्द से ही ज्ञान है, विज्ञान है, जीत है हार है, गीत है संगीत है, कल्याण है, सुख है, संपत्ति है, शांति है, जीवन है और सुख शांति में जीवन है। जीवन मे ईश्वर का वास होता है । हम जानते हैं कि ईश्वर सर्वशक्ति संपन्न सर्व कल्याणकारी शांत सुरम्य और सुरीला होता है। किसी भी प्रकार की साधना में चाहे कोई अन्य उपकरण हो या ना हो सच्चे मन से भावपूर्ण होकर बोले गए शब्द हमें ईश्वर के नजदीक ले जाते हैं। प्रकृति के सानिध्य में ले जाते हैं। प्रकृति ईश्वर और शब्द इन तीनों के मेल से जीवन में सौंदर्य की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शिव, सत्य और सुंदर होता है। हम जानते हैं कि प्रकृति और ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती। उनके पास कोई शब्द भी नहीं होते। ना वह संस्कृत पढ़ते हैं ,ना हिंदी जानते हैं, ना ही उर्दू अंग्रेजी और फारसी की व्याकरण समझते हैं। मनुष्य ईश्वर ही है। बस क्षिति, जल, पावक गगन और समीर को अलग कर दिया जाए तो वह ईश्वर में ही समाहित हो जाता है । जब तक इन पांच बंधनों में आत्मा का वास होता है तब तक उसे शब्द की आवश्यकता होती है। जीवन काल में ही जो लोग अपने को इन पांच बंधनों से मुक्त कर प्रकृति और ब्रह्म की शक्ति के प्रवाह से जुड़ जाते हैं उन्हें शब्दों के प्रयोग की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि जो अध्यात्म में उतरते जाते हैं उनके शब्द कम होते चले जाते हैं। शब्दों का कम होते चले जाना, शांत होते चले जाना आध्यात्म को उपलब्ध होने के संकेत देता है। इसलिए शब्द अध्यात्म की पहली सीढ़ी है और शब्दों की सीढ़ियां चढ़कर अध्यात्म तक पहुंचने के बाद शब्द पीछे छूट जाते हैं। रह जाता है आत्मा, प्रकृति और ईश्वर का एकात्म। इसीलिए कहा जाता है कि ईश्वर एक है और उसी से विघटित होकर शब्द और शब्द से दुनियावी जीवन की उत्पत्ति होती है। दूसरी सीढ़ी ब्रह्म से प्रकृति की ओर जाती है जिसमें शब्द का कोई स्थान नहीं होता। प्रकृति ईश्वर से बिना किसी शब्द के अपने भावों से संवाद करती है और मनुष्य प्रकृति से शब्दों के माध्यम से जुड़ता है। ईश्वर प्रकृति और मनुष्य के इसी तारतम्य को आध्यात्म माना जाएगा। प्रकृति के बहाव के विरुद्ध खड़े होना इन्हीं अर्थों में ईश्वर के विधान को तोड़ने की तरह होता है। जब-जब प्रकृति से मनुष्य का खिलवाड़ बढ़ जाता है तब तब धरती पर विप्लव होता है। ये विप्लव छोटे-छोटे होते हैं जो हम दुनिया में रोज ही घटित होते हुए देखते हैं। भूस्खलन, बाढ़ का प्रकोप, सूखा, भयंकर तूफान और चक्रवात जैसे प्रकृति के विप्लव मनुष्य का प्रकृति के खिलाफ जाने के कारण है जिसका जिम्मेदार स्वयं मनुष्य है।

सनातन संस्कृति के मूल में महाप्रलय का उल्लेख मिलता है । इस महाप्रलय की जड़ में सभ्यता के उच्चतम स्तर तक पहुंच जाने के बाद मनुष्य के उत्पात से क्रुद्ध होकर धरती पर महा प्रलय हुआ था। उसी महाप्रलय के पश्चात एकमात्र पुरुष बच गए थे मनु । मनु के गंधर्व कन्या श्रद्धा से मिलन के परिणाम स्वरूप कुमार का जन्म हुआ । कुमार से ही सनातन संस्कृति के उत्पन्न होकर अपने चरम पर पहुंचने की गाथा आरंभ होती है। इसी गाथा की पूर्णता का परिणाम है आज की सभ्यता और संस्कृति। लेकिन इन सब बातों को जानने के बाद भी मनुष्य फिर से प्रकृति के अविरल प्रवाह में बाधक बनने की गलतियां कर रहा है जो उसे कभी भी मुश्किल में डाल सकती है। अभी समय है कि हम संभल जाएं और शब्द से चलकर प्रकृति के मार्ग से ईश्वर की सानिध्य में जाने के मार्ग का अनुसरण करते रहें। इसी में हमारा कल्याण है निहित।

Saturday 16 2025

शब्द सत्य है

 शब्द ब्रह्म है , नित्य है , सत्य है अनंत और अविनाशी है।हमें शब्दों को इसलिए धन्यवाद देना चाहिए कि वो बोले जाने के बाद जो अर्थ देते हैं उस अर्थ से हम बात को समझ कर आगे बढ़ते हैं । इस प्रकार हम पहले लड़खड़ा कर फिर चलना उसके बाद दौड़ना सीखते हैं। हमारी जिंदगी शब्दों की उंगलियां पड़कर आगे बढ़ती है, सरपट दौड़ लगाती है। शब्दों की जादूगरी से हम अपनी तमाम समस्याओं के ताले खोलते हैं और कुछ लोग शब्दों के ही बल पर बहुत कुछ पा जाते हैं तो कुछ लोग शब्दों के अभाव में बहुत कुछ हार जाते हैं। हाल कर शांत बैठ जाते हैं। आप ऐसे लोगों से भी मिलेंगे जिनके पास कई भाषाओं के शब्दों की समझ है। ऐसे लोग कई भाषाओं के शब्दों को समझकर बाकियों की तुलना में अधिक दूर तक दौड़ लगा लेते हैं। इससे उनकी दुनिया अन्य की तुलना में अधिक बड़ी हो जाती है। इस प्रकार दुनियावी जिंदगी शब्दों की जादूगरी से एक नट की तरह खेल दिखाती है, हम आगे बढ़ते हैं। यही शब्द जब प्रार्थना बनते हैं तो मंत्र की शक्ति से अभिषिक्त होकर देवताओं को भी मनुष्यों के पीछे भागने के लिए मजबूर कर देते हैं। प्रेम में बोले गए शब्द हमें सब की आंखों का तारा बना देते हैं तो वहीं नफरत, ईर्ष्या और क्रोध में बोले गए शब्द हमें अनंत शत्रुओं के सामने लाकर खड़ा कर देते हैं। शब्दों से दुनिया जीती जा सकती है शब्दों से सब कुछ मनुष्य हार जाता है। इतिहास गवाह है कि महाभारत में शब्दों के कारण ही भयानक नरसंहार हुआ और कितने योद्धा मारे गए।

 ये है शब्द की शक्ति। इसलिए कहा जाता है की जो भी बोलो सोच समझ कर तोलमोल कर बोलो।

वंदे यदुकुलगौरवम् जगद्गुरूम् श्रीकृष्णनारायणम्

 यदुकुल गौरव श्री कृष्ण ही जगद्गुरु हैं। जीवन को संपूर्णता में जी कर साबित कर दिया कि मानवता को संपूर्णता के साथ जिया जा सकता है । इसमें छल कपट का कोई स्थान नहीं है। आमतौर पर ये माना जाता है कि दुनिया में सच्चे प्रेम के लिए जगह नहीं है लेकिन उनका प्रेम उदाहरण है। माता-पिता, मित्र, पत्नी, प्रेमिका सबके लिए मर्यादित हो तो ये संभव है। स्त्री के लिए सम्मान, और मर्यादा हो तो जीवन को उच्चतम आदर्श से गौरवान्वित किया जा सकता है। श्रीराधा रानी को जो गौरव दिया, द्रौपदी का मान रखा वो अनुकरणीय है। गोपियों, ग्वालों, विप्र सुदामा को जिस मित्रता की परिभाषा दी वो सर्वकालिक है। जन्मदात्री, और पालनहार माताओं को जो प्रेम दिया वसुदेव और नंदबाबा के प्रति उनका आदर और समर्पण अनुकरणीय है। द्वरिकाधीश श्री कृष्ण की कथा कहने सुनने के लिए सचमुच की आदर्श कथा है। महाभारत का धर्मयुद्ध कालातीत आदर्श है जहां अन्याय का प्रतीकार करते हुए धर्म को धारण करते हैं। युद्ध में धर्म का जवाब धर्म से छल का जवाब छल से देने में भी नहीं हिचकते। अर्जुन को दिये उनके उपदेश गीता में संग्रहीत हैं जो उनके प्रति उठने वाले हर प्रश्न के उत्तर धारण करते हैं। विश्व के कल्याण के लिए ‌श्रीमद्भगवद्गीता एक आदर्श ग्रंथ है जिसे दुनिया मानती है।

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आयोजित महोत्सव उनके प्रति भक्ति और प्रेम का दिवस है। परमपिता से प्रार्थना है कि वो आप सभी को जीवन में वही ऊंचाइयां प्रदान करें जो उन्होंने स्वयं अपने लिए चुना था। 

वंदे यदुकुलगौरवम् जगद्गुरूम् श्रीकृष्णनारायणम् !

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...