एक रात की सहर होते होते हो गई
जिंदगी की सहर
एक मां थी उस पर हो गई जिंदगी की मेहर
रोते-रोते सो गई उसकी याद में वो नहीं आया
कितना घना था ओ खुदाया उस पर गमों का साया
सियाह चेहरे पे एक मुकम्मल किस्सा था यूं नुमाया
गोया उसकी याद में लिपट कर रोई थी ज़ार ज़ार
जो गुज़र गई ज़िन्दगी न लौटी, दी सदाएं बार बार
उसका चेहरा था ज़ेहन ओ दिल में
मुस्कुराता था
एक आरी थी उसका जिस्म था और वो चलाता था
यूं कोई बुरा ख्वाब था कभी आता था चला जाता था
कभी बांहों में लिपट जाता, आता था मुस्कुराता था
ऐसी कोई रात थी, मां थी, यादें थी वो सब आईं
मां के बेचैन कानों में बेटा आया ये खबर ना आई !
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