रातें कुछ अंधेरी हो गई थी जिन दिनों
चारों तरफ डर था
डर का आलम था
मेरे हाथों में कुछ अवांछित चीजें
चिपक गई थी
जिसके साथ रहने को अभिशप्त, मैने
अपने दोस्तों के दरवाजे पर दस्तक दिया कुछ इस तरह कि
उनके दिल के दर्पण दरक गए, और
हर दर्पण में मेरी तस्वीर
खंडित होती रही
इस तरह, हुआ कुछ यूं कि
मेरा चेहरा नहीं रहा अब
वहां अब टूटे हुए आईने की कुछ किरचें हैं
उनमें कुछ धुंधली सी परछाइयां हैं मेरी
मेरे दोस्तों को गम है कि
उनके दिल के शीशे टूटे
गम मुझको भी है कि मेरा अक्स
अब वहां नहीं होता।
मुबारक हो मेरे दोस्तों तुम्हें तुम्हारा गम
मुबारक हो मुझे भी गम मेरा
सलामत रहो तुम यह दुआ है मेरी
तुम दुआ करो कि मैं भी सलामत रहूं
मिले जब कहीं तुम हम
तो आंखों में कुछ और रहे ना रहे
बस एक चाहत रहे
मुस्कुराहट रहे।