मेरी प्रव्रृत्ति और कर्म है चोरी
मैं फल भी खरीदूं तो कीमत से कम
पैसे देकर कह देता हूं बस इतने ही है
जब यहां काम हो गया तब चलते-चलते
एक फल चोरी से झोले में डाल कर
रास्ता नापा लेता हूं
तुम्हारे साथ भी ऐसा ही किया मैंने
जब तुम बूंद बूंद रिस कर
मुझमें समा रही थी
स्वयं रीत कर स्वयं से मुक्त हो रही थी
तब भी मैंने ठीक वही किया
जो मेरी प्रव्रृत्ति थी
मैं अपना कुछ चुरा कर रखे हुए था
तुमसे भी कह दिया
बस इतना ही हूं
तुमने भोलेपन में मान भी लिया।
इस तरह मेरा मन रीत कर
तुम्हारी हमारी प्रीत को संपूर्ण कर रहा था
पर ये तन कुछ शेष रहा
मृदा अपने गुणधर्म को न छोड़ सकी
इस तरह मन तुम्हारे साथ गया
तन तुम्हारे संग यहीं रहता है
यही सच मेरा तुम्हारा है
जिसे अब मैं हमारा सच भी कहता हूं,
तुम्हारी आंखों ने मुस्कुरा कर
कभी कभी कह दिया था
कि मेरी चोरी पकड़ी गई है
पर उन्हें क्या !
उनको तो स्वयं को मुझमें ही
रिस जाना था।
वही तुम्हारी आंखों की मुस्कान
अब मेरी संपदा है
जिससे मैंने पूरी दुनिया खरीद कर
तुम पर वार दिया है...
शेष फिर
मैं अब और नहीं बोल सकता
मेरी आंखें नम हो रही हैं
अब जब कल तुम आओगी तब
कुछ और स्वीकारोक्तियां होंगी
तुम्हारे साथ तुम्हारे सामने।
यूं तुम्हारी मेरी आंखों का नम हो जाना
रोज रोज रत्ती रत्ती रीतने की प्रक्रिया है
जो चलती रहेगी
अब तुम जाओ
फूट फूटकर रोना मैं नहीं चाहता
मुझे आंखों में नमी रखने के लिए
अभी ये समंदर और चाहिए
तुम अब जाओ...बस अब जाओ
जाओ भी....
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