Friday 12 2024

इक्कीसवीं सदी में कला और कलाकार का अर्थशास्त्र


             

नब्बे के दशक में दूरदर्शन और रेडियो ही अकेले मनोरंजन के साधन थे जिनपर प्रसार भारती ने विज्ञापनों की भीड़ ठेल कर इन्हें उबाऊ बनाना शुरू कर दिया था। व्यक्तिगत तौर पर मैं यह मानता था कि इस प्रकार विज्ञापनों की भीड़ रही तो प्रसार भारती के यह दोनों चैनल जिसमें रेडियो और दूरदर्शन के सभी केंद्र शामिल है शीघ्र ही बंद हो जाएंगे। इसी के तुरंत बाद बहुत सारे अलग-अलग मनोरंजन के चैनल बाजार में आ गए जिनका विज्ञापन प्रसार भारती के विज्ञापन से अधिक होता था। एक बार मुझे यह लगने लगा कि प्रसार भारती के विज्ञापनों की अधिकता के बारे में मेरा निर्णय सही नहीं था लेकिन कुछ दिनों बाद फिर यह समझ में आया कि दरअसल विज्ञापनों की भीड़ किसी भी चैनल को बंद करने का अचूक अस्त्र है और यह धारणा मेरी पक्की होती चली गई कि आने वाले दिनों में बहुत जल्दी सारे मनोरंजन चैनलों की दुकानदारी समाप्त हो जाएगी। आज जब मैं यह बात लिख रहा हूं तो यह साबित हो चुका है कि 90 के दशक में विज्ञापनों की बढ़ती भीड़ से मनोरंजन चैनलों के बंद होने का मेरा अनुमान सही था। आज भी सही है।

            प्रश्न यह उठता है कि अगर विज्ञापन से मनोरंजन चैनल पैसा नहीं कमाएंगे तो वह प्रसारण के लिए खर्च कहां से लाएंगे ? यही एक मूल मुद्दा है जिस पर विचार नहीं किया गया और नीतियां बनती रही । बाजार में मनोरंजन की दुनिया का दीवाना पिट चुका है। इन सब की शुरुआत इलेक्ट्रॉनिक बाजार में आधुनिक उपकरणों के प्रवेश के साथ होती है। जब से मनोरंजन में "पायरेसी" ने प्रवेश किया फिल्म उद्योग मनोरंजन उद्योग नष्ट होते चले गए । दुनिया ने इन उपकरणों के सहारे कम पैसे में मनोरंजन करने की मंशा से कलाकारों के हक पर डाका डाल दिया । धीरे-धीरे फिल्म जगत , संगीत जगत और मनोरंजन की दुनिया में कलाकारों का जीवन यहां तक कि उनकी कला तक पर संकट आ गया । यह संकट आज भी है कल भी रहेगा । मनोरंजन के क्षेत्र में टेलीविजन चैनलों का इसी प्रकार बंद होना भी जारी ही रहेगा। अंततः फिर वही होगा कि हम पुराने वक्त में लौट जाएंगे जहां स्टेज होगा, कलाकार होंगे , कला के कद्रदान होंगे, महफिलें सजेंगी और हम फिर कला का आनंद ले सकेंगे । कला की दुनिया फिर से जीवित हो जाएगी। कलाकारों की एक पीढ़ी का भविष्य खराब होने के पश्चात आने वाली कलाकारों की पीढ़ी का भविष्य फिर से रास्ते पर आता हुआ दिखाई दे रहा है।

वर्ष 1991 से आगे फिल्म उद्योग मनोरंजन उद्योग और कला के क्षेत्र में आई गिरावट की वजहों पर विचार करते समय विज्ञापनों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बाद सबसे बड़ा करण सरकार के द्वारा मनोरंजन क्षेत्र से कमाई करने का आईडिया जिम्मेदार है। इसी के साथ-साथ जनता के द्वारा धन खर्च करके मनोरंजन प्राप्त करने के बजाय फ्री में मनोरंजन की प्रवृत्ति भी जिम्मेदार है भले ही उन्हें मनोरंजन की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता हो । समझौता इस बात का कि थिएटर में जाकर फिल्म देखने की तुलना में पायरेटेड सीडी से अपने घर में फिल्म देखकर पैसे बचाने की जो प्रवृत्ति उपजी उसने ना तो उन्हें स्वस्थ मनोरंजन दिया और ना ही फिल्मों पर काम करने वाले बड़े-बड़े प्रोड्यूसर और कलाकारों की मेहनत की कोई क्षतिपूर्ति हो पाई। इसी के कारण बड़े-बड़े बजट की फिल्में थिएटर में कमाई करने की बजाय धड़ाम होकर फ्लाप हो गई। कलाकारों के सीडी और उन दिनों चल रहे कैसेट बिकने के बजाय कॉपी होकर बाजार में आने लगे जिससे कलाकारों का हक पूरी तरह से समाप्त हो गया। यह मनोरंजन स्वस्थ नहीं था ऐसा जब कहा जाता है तो उसका अभिप्राय है कि जैसे गमले में धनिया मिर्च उगाकर खाने से बाजार को नुकसान नहीं होता लेकिन अगर लोग गमले में आम उगाए नीम महुआ और बरगद लगाएं तो इससे बाजार तो अपनी जगह पर रहेगा लेकिन जनता को गमले में लगे महुआ और आम से आम का आनंद तो आने से रहा! मनोरंजन के साथ कुछ ऐसा ही प्रयोग हम लोगों ने पिछले वर्षों में कर डाला। अभी भी हम फिल्मों को बड़े पर्दे पर देखने की बजाय मोबाइल के छोटे से स्क्रीन पर देखते हैं जिसमें हमें सिर्फ कहानी संवाद और गाने सुनाई पड़ते हैं लेकिन उसमें ना साउंड क्वालिटी मिलती है ना कलाकारों के भाव भंगिमा से उपजने वाले अर्थ मिलते हैं और ना ही थिएटर में बैठकर मूवी देखने का आनंद। इस प्रकार हम फिल्म देख तो लेते हैं लेकिन उससे जो तृप्ति और संतोष मिलना चाहिए था वह कभी थिएटर में मिलने वाले आनंद की बराबरी नहीं कर सकता। इस प्रकार कुल जमा बात यह है कि जैसे हम हर किसी चीज को अगर पाना चाहते हैं तो उसका मुनासिब मूल्य चुकाते हैं वैसे ही हमें मनोरंजन के लिए फिल्म देखना या संगीत सुनना हो तो उसका मूल्य चुकाने की प्रवृत्ति से बचना नहीं चाहिए नहीं तो परिणाम यही होगा जो आज हमें देखने को मिल रहा है । जैसा कि हम जानते हैं कि मनोरंजन अभी तुरंत हमारे जीवन पर कितना प्रभाव डालता है यह आकलन करना तो मुश्किल है लेकिन एक लंबे समय तक ढंग का मनोरंजन प्राप्त नहीं करना हमारे मन और मस्तिष्क को थक कर काम को बोझिल बनाता है और जीवन चर्या को बासी और उबाऊ बना देता है जिससे मन में उत्साह की कमी होने लगती है और बिना उत्साह का जीवन, जीवन नहीं कहलाता। इसीलिए शायद पिछले वर्षों की तुलना में अब डिप्रेशन और मानसिक दबाव ,शुगर और ब्लड प्रेशर के लिए खाई जाने वाली दवाइयां की बिक्री बहुत तेजी से बड़ी है और अस्पतालों की पौ-बारह हो रही है । ऐसा लगता है कि दवाओं पर पैसा खर्च करने की बजाय हमें धन स्वस्थ मनोरंजन पर खर्च करने के विकल्प पर विचार करना चाहिए। सरकार को भी यह चाहिए कि वह दूरदर्शन और आकाशवाणी को बजट प्रदान करते समय इन बातों का ध्यान रखें और दूरदर्शन और आकाशवाणी के ऊपर विज्ञापन से पैसे कमाने का ख्याल छोड़ देना चाहिए। प्राइवेट वीडियो चैनल अपनी रणनीति तय करने के लिए स्वयं आजाद है यदि वह मनोरंजन उपलब्ध करा कर उससे पैसे बनाकर चैनल चला सकते हैं तो चलाएं अन्यथा उनका बंद होना तो तय है। इसी प्रकार सरकारी मीडिया चैनलों के कार्यक्रम भी विज्ञापनों के कारण अझेल और उबाऊ बनते जा रहे हैं वो भी हमेशा के लिए जनता के द्वारा त्याग दिए जाएंगे।

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