मुट्ठी में बंद रेत है जिंदगी
धीरे-धीरे फिसलती है
फिसल ही जाएगी एक दिन
इसके पहले कि ये फिसल ही जाए
एक एक कण पर कुछ न कुछ रचते रहें
जब ये फिसल जाये
इसमें कभी सप्तरंगी इंद्रधनुष उभर आए
तो कभी कोई बेहद खूबसूरत तस्वीर
कभी कोई बाग तो कभी कोई फूल
और भर दे पूरी दुनिया को अपनी
मादक महक से
कभी इसमें से उगे कोई सूरज
अपने पूरे सौंदर्य के साथ
और एक सुबह आए सुकून देती हुई
जब ढले सूरज तो ले कर आए
सुहानी शाम सुरमई
जिसमें यादें हों हंसाती गुदगुदाती
कभी कभी इस शाम में
तुम्हारी कसकती याद में हो जाए
कोई उदास
तो कोई फख्र से तुम्हें याद कर
मुस्कुरा दे
जिंदगी की यही सार्थकता है
वरना तो जिंदगी मुट्ठी भर रेत है
कण कण फिसलती है
एक दिन फिसल ही जाएगी।
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