Sunday 15 2025

कविता: उंगलियों पर नचाया है

 दुनिया का हर कोना जहां जाता हूं मैं 

हर वो इंसान जो प्यार से 

मिलता है मुझे 

तो लगता है जैसे 

पूरी दुनिया से 

दुनिया के हर इंसान से 

मेरा कोई नाता है 

इस जनम का

पहले जन्म का

उससे पहले के जन्म का

यूं लगता है जैसे 

जन्म जन्मांतर से 

इस धरती पर 

मैं ही युगों युगों से 

जनमता और तुममें ही समाहित होता रहा हूं

तुमने मुझे अपने 

लीला विधान में एक पात्र बनाया है 

युगों से मुझे अपनी उंगलियों पर नचाया है 

इस बात का धन्यवाद मैं करूं कैसे किन शब्दों में करूं ये नहीं जानता

इस बेहद खूबसूरत कायनात में अपनी 

माया को भोगने जब तुम 

खुद आते हो

फिर अपना रूप दे कर

हमें नचाते हो तो

मैं धन्य धन्य हो जाता हूं 

मुझे बार बार चुनना 

भेजना इस कायनात में 

जिससे मुझको मोहब्बत है 

इससे मुझे मोहब्बत है 

मुझे तुमसे मोहब्बत है 

ऐ खुदा,

ऐ मेरे मालिक,

ऐ मेरे ईश्वर 

मुझे तुमसे मोहब्बत है!!

Thursday 17 2025

स्त्री मन अथाह

 स्त्री मन अथाह 

नापना चाहा,

कई बार गुजरा

उसके पास से दूर से

आर-पार भी हुआ 

ईमानदारी से बेईमानी से भी 

मगर 

वहां कब कौन सी भंवर आएगी

कौन सा तूफान उठेगा

वो कब समंदर बन जाएगी

कब लहर, झरना, और 

नदी,पर्वत जंगल 

या फिर सुबह का सूरज

तपती दुपहरी 

पूनम या शरद की चांदनी बन जाएगी

कुछ समझ नहीं पाया ।

एक बार तो लगा कि जैसे बहुत कुछ समझ गया 

फिर तभी मौसम बदला 

मोगरे की तरह हंसी के फूटते झरने

खिज़ाओं के दरख्त बन गए 

जहां बहार के नामों निशान नहीं ,

तब मैं फिर से कहता हूं

 स्त्री मन अथाह 

पुरुष बनकर कभी नहीं 

समझ सकते!

नहीं, ईश्वर को समझ नहीं सकते 

हां, भक्ति से उसको

पाया जा सकता है जैसे  - 

वैसे ही 

नाम, रूप में आकर 

बहन, बेटी मां बनकर 

जब वो एक भाव में आ जाती है तब

उसे समझ सकते हैं ।

स्त्री - हमारे जीवन में 

ममता, प्रेम लालित्य 

और सौंदर्य का भंडार है 

आशा, विश्वास और 

ममता की ठंडी छांव है 

शक्ति, सामर्थ्य और 

हिम्मत का पहाड़ है 

तब मैं फिर से कहता हूं

 स्त्री मन अथाह 

पुरुष बनकर कभी नहीं 

समझ सकते!

भ्राता, पिता, पुत्र या पति की तरह देखो

जिंदगी आसान हो जाएगी।

         ****

Tuesday 25 2025

वो निस्सीम

 वो

निस्सीम भाव में आपूरित हो

नि: शब्द 

मुझे स्पर्श कर 

मुझमें समा कर

मेरी आत्मा से

मिल आया,

एक पल में 

वो हजारों मील 

चल आया,

जहां जाने की राह ढूंढते 

मैं एक उम्र पार कर

इतनी दूर आ गया हूं

अब तक अपने आप से 

मिल नहीं पाया!

क्या खुद से मिलना 

ऐसे ही हो सकता है!

ये सोचता हूं

कि तुम ऐसे हो जाते

क्यों नहीं हो जाते

कि जिंदगी कितनी आसान हो सकती है!

ऐसे भी मैं तुम तक और 

तुम मुझ तक आ सकती हो

मेरी रूह को छू सकती हो

मुझे मेरे होने का एहसास करा सकती हो

कि बस अपनी आंखों को दर्पण बना लो

उन आंखों से मेरी आंखों में 

अमृत की कुछ बूंदें रिस कर चली जाने दो

खुदाया हम भवबंध से 

छूट जाएंगे 

अमर हो जाएंगे।

माता-पिता की जवानी

 माता-पिता की जवानी 

संतान के लिए 

फौत होते 

क्या किसी संतान ने 

देखा है कभी!

गिला नहीं फिर भी 

दिल में आता है 

ये सवाल 

हां, मलाल भी कि-

जब जिंदगी की शाम में 

अपने ही घर के 

 एक कोने में 

तन्हाईयां हमराह होती हैं 

तब पूरे घर में 

सन्नाटा पसरे 

उस कोने को छोड़ कर ,

शेष घर में चहल-पहल 

हंसने खिलखिलाने की

आवाजें 

अकेलेपन की छाती फाड़कर 

निकल जाती हैं 

तीर की तरह।

थरथराता है घर का

 एक सहमा हुआ कोना 

बच्चों की जवानी में 

अपनी उम्र ढूंढती

माता-पिता की जवानी 

मुस्कुराती है 

एक दर्द सा होता है 

एक हूक सी उठती है 

सीने में 

उठता है ये सवाल कि

क्या किसी संतान ने 

देखा है जवानी 

अपने माता-पिता की

उनके अपनों के लिए 

फौत होते हुए?

महामृत्यु के आह्वान पर कविता -

 

महामृत्यु की ओर 

पहला कदम बन जाए

प्रेम ,

तब समझो-

आत्मा से परमात्मा के

महामिलन का महारास

होने को है ।

ऐसे मन को पुलकित 

करने वाले पलों में,

ये आश्वस्ति कि -

नदी के उस पार 

एक घर है 

जहां वो रहती है ,

जो हर पल एक 

अनंत यात्रा पर चलने के लिए

 मेरी तरह 

प्रतीक्षारत है।

मुझे भी 

उसकी एक पुकार का

इंतजार रहता है...

एक यात्रा -

अंतर्मन की ओर उन्मुख 

उसके साथ अपने 

अस्तित्व की तलाश 

के लिए निकलने की।

प्रकृति और पुरुष के

इस महा मिलन के

अवसर पर मौन का 

तुमुल नाद है 

एक निस्पंद बेचैनी है 

इधर भी उधर भी-

कि तुम नदी के उस पार से इस पार 

क्या सचमुच में आ पाओगी

मेरी इक पुकार पर ?

Wednesday 12 2025

जिंदगी की शाम में ----------------------

जिंदगी की शाम में 
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माता-पिता की जवानी 
संतान के लिए 
फौत होते 
क्या किसी संतान ने 
देखा है कभी!
गिला नहीं फिर भी 
दिल में आता है 
ये सवाल 
हां, मलाल भी कि-
जब जिंदगी की शाम में 
अपने ही घर के 
 एक कोने में 
तन्हाईयां हमराह होती हैं 
तब पूरे घर में 
सन्नाटा पसरे 
उस कोने को छोड़ कर ,
शेष घर में चहल-पहल 
हंसने खिलखिलाने की
आवाजें 
अकेलेपन की छाती फाड़कर 
निकल जाती हैं 
तीर की तरह।
थरथराता है घर का
 एक सहमा हुआ कोना 
बच्चों की जवानी में 
अपनी उम्र ढूंढती
माता-पिता की जवानी 
मुस्कुराती है 
एक दर्द सा होता है 
एक हूक सी उठती है 
सीने में 
उठता है ये सवाल कि
क्या किसी संतान ने 
देखा है जवानी 
अपने माता-पिता की
उनके अपनों के लिए 
फौत होते हुए?

Thursday 23 2025

मेरे शब्दों पर मत जाना

 मेरे शब्दों पर मत जाना

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कोई बहुत खूबसूरत सी 

बात कहने के लिए

बहुत सुंदर शब्दों का चुनाव करके मैं 

उन शब्दों की लीक पर  चलकर देखता हूं तो 

मेरे भाव जहां पहुंचे

 ऐसे लगा जैसे

 कोई पत्र सही पते पर ना पहुंचा ,अपनी राह भटक गया हो !

मैंने फिर से सोचा

 शब्दों की लीक पर चलकर अगर 

अपनी बात 

कही जा सकी होती तो व्याकरणाचार्य पाणिनि अथवा 

 फादर कामिल बुल्के दुनिया के सबसे अच्छे प्रेमी रहे होते, क्योंकि उनके पास 

सबसे अधिक शब्द थे और वो सभी शब्दों के

सही अर्थ जानते थे! लेकिन यह भी ना हुआ

सबसे अच्छे प्रेमी तो लैला मजनू 

शीरी फरहाद 

और 

सोहनी महिवाल हुए थे! 

 लेकिन मेरे मन का संशय  और अकुलाहट अभी भी खत्म नहीं होती !

 जिन शब्दों का मैं 

प्रयोग कर रहा हूं 

 देखता हूं कि वे शब्द मुझे अभी भी वहां नहीं ले जा पाए हैं 

जहां मैं जाना चाहता हूं।

इस बात की बेचैनी है कि ये शब्द इतने लाचार आज क्यों है ?

इसी बात से यह 

समझ में आता है कि सृष्टि में ईश्वर की 

सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति शब्दों की राह अपने उच्चतम शिखर तक पहुंच पाने में असमर्थ क्यों है?

शब्दों के रास्ते आदर्श प्रेम को 

आज तक ऐसे नहीं पा सका 

जिस तरह चंद्रमा ने चांदनी को 

सूरज ने किरण को

 पाया है !

आज शब्दों ने मेरे मन को एक प्रकार की लाचारी से भर दिया है ।

और आज मैं जो कहना चाह रहा हूं वह शब्दों के द्वारा कह नहीं पा रहा हूं 

ये भाषा के सामने 

एक चुनौती है 

कि वो कितनी भी खूबसूरत क्यों ना हो 

वह अपने मुकाम तक तब तक नहीं पहुंच सकती ,

जब तक उसमें  भाव ना हों!

शब्द और अर्थ के द्वंद्व में मैं आज कुछ समझ ना पाने की स्थिति में 

तुमसे कहता हूं कि तुम मेरे शब्दों पर मत जाना मैं शब्द शब्द कहूंगा

 तुम भाव भाव समझना हो सके तो तुम मेरी आंखों की तरफ देखना मेरे चेहरे को पढ़ लेना 

मेरे शब्दों पर मत जाना क्योंकि हो सकता है कि जब मेरा भरोसा शब्दों पर से उठ ही गया है तो क्या पता मैं तुम्हें शब्दों से 

वो जज्बात ना कह पाऊं 

जो शब्दों की लीक पर चलकर कह पा रहा हूं 

या तुम वह बातें 

समझ ना पाओ

और तुम भी अपने 

पते से भटके हुए 

पत्र की तरह वापस मेरे पास तक 

शब्दों की लीक पर चलकर आ न सको!

Thursday 12 2024

कामायनी

 [07/12, 10:07] Mohan Dhanraj: कामायनी 

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सनातन संस्कृति के उद्भव से पूर्व देव संस्कृति उच्चतम स्तर से महा प्रलय को अभिशप्त होने और फिर पश्चात के महा घटनाक्रमों में श्रद्धा , इड़ा और कुमार के माध्यम से सनातन संस्कृति की कहानी एक रूपकात्मक सच्चाई जान पड़ती है। जब मानव आज के विकास क्रम को अपनी संस्कृति से जुड़कर देखता है तो वो उसकी गर्वीली ऊंचाइयों की जड़ें इतिहास, कालक्रम और घटनाओं में तलाश करने के पश्चात मनोविज्ञान और दर्शन में प्रवेश कर जाता है। कामायनी में महाकवि जयशंकर प्रसाद इसी इतिहास को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाते हैं जहां से हम सनातन संस्कृति के आगे बढ़ाने की कल्पना को सच्चाई के धरातल पर देख पाते हैं ।कामायनी में जयशंकर प्रसाद कहानी के उत्पत्ति की कथा बताते हुए लिखते हैं कि "शतपथ ब्राह्मण के आठवें अध्याय में यह उल्लेख मिलता है कि मनु ने ही मानवों के लिए देव संस्कृति से उच्चतर सनातन संस्कृति की कल्पना की क्योंकि उन्होंने यह समझ लिया था कि देव संस्कृति अपनी किन कमियों के कारण पराभव को प्राप्त हुई थी। मनु भारतीय सांस्कृतिक , इतिहास के आदि पुरुष हैं । राम, कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं । शतपथ ब्राह्मण में इन्हें श्रद्धा देव कहा गया है। "श्रद्धादेवो वै मनु:"। भागवत में इन्हीं श्रद्धा और मनु से मानवीय सृष्टि का प्रारंभ माना जाता है। "तत्मनु: श्रद्धादेव इति संज्ञामास भारत " ।

मनु और श्रद्धा की कथा का उल्लेख छांदोग्य उपनिषद ऋग्वेद में भी मिलता है। श्रद्धा वाले सूक्त में सायण ने श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है, "काम गोत्रजा श्रद्धानामर्शिका" ।

श्रद्धा कामदेव की बालिका है इसलिए इसे "कामायनी" भी कहा जाता है। जप्लावन से संबंधित बहुत कुछ वैदिक साहित्य में है, किंतु वह बिखरा हुआ है। जलप्लावन का अध्याय शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड के आठवें अध्याय में मिलता है, जिसमें उनकी नाव उत्तर गिरि के हिमवान प्रदेश में पहुंचने का प्रसंग मिलता है।

आगे की कथा को समझने के लिएआईए साक्षात्कार करते हैं कामायनी का-


(धरती पर जलप्लावन समाप्त हो रहा है,

 पेड़ों में हरियाली, फूलों का खिलना, रंग-बिरंगे पंछियों का आना) सॉफ्ट, सोलफुल, मॉर्निंग फ्ल्यूट/ संतूर वादन पुरुष स्वर - प्रकृति का यह मनोरम रूप अब से पहले ऐसा नहीं था

 एक विप्लव के गर्भ से जन्मा है यह प्रकृति का संगीत 

घोर विप्लव, भीषण भूकंप, तूफान, आंधियां बर्फीली हवाओं, जहरीली बारिश,

उल्कापात, ओलावृष्टि के बाद जब सब कुछ काल के गाल में समा गया तब आई प्रकृति और पुरुष के मिलन की यह

 नयनाभिराम झांकी।

(विप्लव का दृश्य फिर धीरे-धीरे आरंभ होता है.... क्लाइमेक्स पर जाकर ठहरता है...)


 पुरुष स्वर-

 हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छांह 

एक पुरुष भीगे नैनो से देख रहा था प्रलय प्रवाह नीचे जल था ऊपर हिम था एक तरल था एक सघन

 एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन 

दूर-दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय सामान 

नीरवता-सी शिला चरण से, टकराता फिरता  पवमान 

तरुण तपस्वी सा वह बैठा साधन करता सुर-श्मशान

  नीचे प्रलय सिंधु लहरों का होता था सकरुण अवसान 

उसी तपस्वी से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े 

हुए हम धवल जैसे पत्थर बनकर ठिठुरे रहे अड़े 

अवयव की दृढ़ मांसपेशियां ऊर्जस्वित  था वीर्य्य अपार

 स्फीत शिराएं स्वस्थ रक्त का होता था जिन में संचार 

चिंता कातर बदन हो रहा पुरुष जिसमें हो रहा  पौरुष जिसमें ओतप्रोत  उधर अपेक्षा में यौवन का बहता भीतर मधुमय स्त्रोत

 शब्दों के उतार-चढ़ाव के साथ मनु के चेहरे, मन और उनकी देह की बेचैनी का फिल्मांकन.... संगीत का और तेज होना.... भावों का और संघनित होना

 (वाचन को प्रभावी बनाते हुए)

 

 बंधी पहावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही उतर चला था वह जल प्लावन और निकलने लगी मही

 निकल रही थी मर्म वेदना करुण विकल कहानी सी 

वहां अकेली प्रकृति सुन रही हंसती सी पहचानी सी..

(प्रकृति स्त्री की विजयी हंसी का स्वर )

पुरुष स्वर -

इस महाजलप्लावन की विशाल जल राशि को जिस नाव पर बैठकर मनु बिना डांडे और पतवार के  यहां हिमालय की पर्वत चोटियों पर आए थे उसे अब एक वृक्ष से बांध दिया था।  उसके आसपास अब जल उतर गया था धरती दिखाई देने लगी थी। इतने दिनों बाद धरती का दिखाई देना ऐसा लग रहा था मानो वो करुण वेदना में  अपनी दुख भरी कथा सुना रही हो और प्रकृति अकेली उसकी इस मर्म भेदी व्यथा को सुन रही थी और देव संस्कृति के द्वारा प्रकृति की सीमा लगने के कारण जल प्लावन से दंडित करके उनके हाल पर अब वो हंसे जा रही थी। प्रकृति की ये हंसी बहुत जानी पहचानी सी हंसी इस बात की याद दिला रही थी कि प्रकृति मनुष्यों को अनंत काल तक अभय दान नहीं दे सकती। उसके दोहन की एक सीमा रेखा है जिसे पार करने के बाद वह कभी भी धरती वासियों को  कोप भजन बना सकती है।


(तांडव संगीत)


ओ चिंता की पहली रेखा, अरी विश्व-वन की ब्याली ,

ज्वालामुखी स्फोट के भीषण प्रथम कंप-सी मतवाली!

 हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खल लेखा!

 हरी- भरी- सी दौड़ धूप ओ जल माया की चल लेखा!

 इस ग्रह कक्षा की हलचल- री तरल गरल की लघु लहरी,

 जरा अमर जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बाहरी!

अरी व्याधि की सूत्रधारिणी

 अरी आधि मधुमय अभिशाप!

 हृदय गगन में धूमकेतु सी, पुण्य सृष्टि में सुंदर पाप!

 मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चिंत जाति का जीव-

 अमर मारेगा क्या?

 तू कितनी गहरी डाल रही है नीव!

 आह घिरेगी हृदय- लहलहे- खेतों पर 

करका घन सी,

 छिपी रहेगी अंतरतम में सबके तू निगूढ़ धन सी! बुद्धि, मनीषा, मति, आशा, चिंता तेरे हैं कितने नाम!

 अरी पाप है तू, जा, चल ।जा यहां नहीं कुछ तेरा काम

 विस्मृति आ, अवसाद घेर ले, नीरवते! बस चुप कर दे, 

चेतनता चल जा, जड़ता से आज शून्य मेरा भर दे।"

 चिंता करता हूं मैं जितनी उस अतीत की उस सुख की ,

उतनी ही अनंत में बनती जाती रेखाएं दुख की। आह सर्ग के अग्रदूत! तुम असफल हुए, विलीन हुए

  भक्षक या रक्षक जो समझो, केवल अपने मीन हुए।

 अरी आंधियों, ओ बिजली की दिवा रात्रि, तेरा नर्तन,

 उसी वासना की उपासना, वह तेरा प्रत्यावर्तन!

 मणि-दीपो के अंधकार मय अरे निराशा पूर्ण भविष्य!

 देव-दंभ के महामेध में सब कुछ ही बन गया हविष्य।

 अरे अमरता की चमकीले पुतलो! तेरे वे जयनाद-

 कांप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बनकर

मानो दिन विषाद।

 प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में ,

भोले थे हां तिरते केवल सब विलासिता के नद में।

 वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार -

उमड़ रहा था देव - सुखों पर दुख जलधि का नाद अपार "


"वह उन्मत्त विलास हुआ क्या! स्वप्न रहा या छलना थी!

 देव सृष्टि की सुख- विभावरी ताराओं की कलना थी ।

चलते थे सुरभित अंचल से जीवन के मधुमय निश्वास ,

कोलाहल में मुखरित होता देव जाति का सुख विश्वास ।

सुख केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीय भूत हुआ इतना,

छाया पथ में नव तुषार का सघन मिलन होता जितना ।

सब कुछ थे स्वायत्त, विश्व के बल वैभव आनंद अपार ,

उद्वेलित लहरों - सा होता उस समृद्धि का सुख संचार ।

कीर्ति, दीप्ति, शोभा थी नचती अरुण - किरण सी चारों ओर ,

सप्त सिंधु के तरल कणों में 

द्रुम-दल में आनंद विभोर।

 शक्ति रही हां शक्ति- प्रकृति थी पद- तल में विनम्र विश्रांत ,

कंपती धरणी उन चरणों से होकर प्रतिदिन ही आक्रांत ।

स्वयं देव थे हम सब तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि ?

अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।

 गया, सभी कुछ गया, मधुरतम सुर-बालाओं का श्रृंगार,

 उषा ज्योत्सना- सा यौवन -स्मित मधुप- सदृश निश्चिंत विहार।

 भरी वासना सरिता का वह कैसा था मदमत्त प्रवाह,

 प्रलय जलधि में संगम जिसका देख हृदय था उठा कराह।"


चेंज ओवर म्यूजिक

 स्त्री स्वर -

चिरकिशोर वय के वरदान से विभूषित, अमर, देव गण जिनके शरीर से निकलने वाली सुरभि से दिग दिगंत सुवासित होते थे आज वे देवता कहां तिरोहित हो गए और आज कहां चला गया उनका कभी न समाप्त होने वाला बसंत? कहां तिरोहित हो गया वो बसंत?


फूलों से भरे उपवन में प्रसन्नता पूर्ण उल्लासमय प्रेमालिंगन में लीन देवों नके  लिए किन्नर गन्धर्वों के गायन-वादन पर बजने वाली बीन की सुरलहरियों का भी पता नहीं! सुरबालाओं के हाथों में कंगन की खनक, पैरों में पायल के  घुंघरूओं की झनकार, हृदय पर सुशोभित फूलों के हार और उनके गीतों पर सुर लहरियों का मुखरित होता अभिसार कहां खो गया? फूलों की सुगंध   धरती से अंतरिक्ष तक सुवासित होती थी तो वहीं अधीर आलोक के साथ  हर जड़ - चेतन अवयव में एक गति होती थी, जिसमें हवाएं भी मिलजुल कर क्रीडा करती थी। अब वह सब आनंद का अनुभव पीड़ा में बदल गए हैं। 

नर्तक नर्तकियों का नाचना- गाना मधुकर के मदन उत्सव और मद के प्यासे देवों का मदिर भाव युक्त उनकी वाणी, नैनों में अलस और अनुराग , कपोलों में लज्जा की लालिमा और कल्पवृक्ष का पीला पराग जैसे सब वासनाओं के प्रतिनिधि मुरझा कर चले गए और ये सब देवगण अपने ही पाप की अग्नि में जलकर नष्ट हो गए! 

सुर सुरभि मय बदन अरुण, वे नयन भरे आलस अनुराग ,

कल कपोल था जहां बिछलता, कल्पवृक्ष का पीत पराग।

 विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाए  चले गए, 

आह जले अपनी ज्वाला से, फिर वे जल में गले गए"...



      गायन /नृत्य .....  

         (समाप्त)

[07/12, 14:31] Mohan Dhanraj: कामायनी- भाग 2 

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कामायनी के पिछले एपिसोड में हमने इसकी भाव भूमि पर एक विहंगावलोकन किया।  इस अंक में हम थोड़ी सी चर्चा इस महाकाव्य के शिल्प पर भी करना चाहेंगे। इस महाकाव्य के अलग-अलग सर्गों में अलग-अलग छंदों का प्रयोग किया गया है। भाषा संस्कृतनिष्ट खड़ी बोली के साथ कहीं-कहीं देशज शब्दों को भी स्वीकार करती है जिससे इसका भाषायी सौंदर्य तो बढ़ता ही है साथ ही इसकी संप्रेषणीयता  भी अधिक सटीक हो जाती है। इस महाकाव्य में बिंब विधान, रुपात्मकता और अलंकार विधान अत्यंत आकर्षक हैं। प्राय: अनुप्रास, रूपक, यमक, श्लेश और प्रश्नालंकारों  की झड़ी लगी हुई दीख पड़ती है। इसकी कथा अपने आप में अपूर्व और अभूतपूर्व है जिसमें विषाद,  श्रृंगार में मिलन, विरह,वात्सल्य और करुण जैसे रसों से आपूरित है यह महाकाव्य! वाचनात्मकता से अधिक यह दृश्य प्रधान है जिसमें इसके बिंब विधान इसमें अकल्पनीय सौंदर्य की सृष्टि करते हैं। यह एक संस्कृति की उत्पत्ति और उसके उत्कर्ष की कथा है जो सनातन संस्कृति के नाम से अभिहित है। यही हमारे आज के जीवन का आधार है। अतः इसकी दर्शनिकता पर भी विचार करना आवश्यक है। यह एक उच्चतर मानव मूल्यों की संवाहक है। पिछले हजारों साल के विकास क्रम में ये हर युग में विचारशील मानव के चिंतन पर खरी उतरी है। जहां आवश्यक हुआ है वहां इसने अपने रूप बदले भी इसलिए इसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। समय-समय पर नवाचारों को अपनाते हुए इसने अपने आप को प्रासंगिक बनाए रखा है। सनातन के साथ भारत की समावेशी संस्कृति हर पल में कालजयीऔर अमर है। सर्व हितकारिणी है। सनातन संस्कृति अन्नमय, मनोमय,  से प्राण मय जगत के रूप में तीनों लोकों की महा यात्रा करती है और स्थूल से सूक्ष्मतम के सफर में देह से आत्म और आत्मा से ईश्वर में तिरोहित होकर  मोक्ष तक ले जाने के सन्मार्ग को संपूर्णता के साथ निर्वहन करती है। (संगीत) 

लेकिन वहां पहुंचने से पहले इसके संघर्ष की कहानी अभी बाकी है। अभी बाकी है मनु का नैराश्य  भाव , देव संस्कृति के उत्कर्ष पर जाकर मिटने की कथा और जलप्लावन के बाद उनकी चिंता का शमन ! यह शमन कामायनी के चिंता सर्ग में आगे बढ़ता है- कुछ इस तरह: हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ अपनी चिंता में निमग्न मनु देव संस्कृति के उत्कर्ष को कालकवलित होने के कथानक को याद करते हुए उन घटनाक्रमों पर चिंतातुर हो रहे हैं-

संगीत.….

अरी उपेक्षा भरी अमरते, रीअत‌प्ति! निर्वाध विलास!

 द्विधा रहित अपलक नयनों की भूख भरी दर्शन की प्यास

 बिछड़े तेरे सब आलिंगन पलक स्पर्श का पता नहीं, 

मधुमय चुंबन 

कातरताएं आज न मुख को सता रही।

 रत्नशोध के वातायन जिनमें आता मृदु मधुर समीर

 टकराती होगी अब उनमें तिमिंगलों की भीड़ अधीर।

 देव कामिनी के नयनों से, जहां नील नालिनों की सृष्टि,

 होती थी अब वहां हो रही प्रलय कारिणी भीषण वृष्टि !

वे अम्लान -कुसुम- सुरभित -मणि- रचित मनोहर मालाएं

 बनी श्रृंखला, जकड़ी जिनमें विलासिनी सुरबालाएं ।

देव -वजन के पशु यज्ञों की वह पूर्णाहुति की ज्वाला,

 जलनिधि में बन जलती कैसी ,आज लहरियो की माला।

 उनको देख कौन रोया यूं अंतरिक्ष में बैठ अधीर,

 व्यस्त बरसने लगा अश्रमय यह प्रालेय हलाहल नीर ।

हाहाकार हुआ कंदनमय,

 कठिन कुलिश होते थे चूर।

 हुए दिगंत बधिर भीषण रव बार-बार होता था क्रूर ,

दिग्दाहों से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के ।

सघन गगन में भीम प्रकंपन झंझा के चलते झटके।

 अंधकार में मलिन मित्र की धुंधली आभा लीन हुई ।

वरुण व्यस्त थे घनी कालिमा स्तर - स्तर जमती पीन हुई ।

पंचभूत का भैरव मिश्रण, शंपाओं के शकल निपात,

 उल्का लेकर अमर शक्तियां खोज रही जो खोया प्रात ।

बार-बार उस भीषण रव से कंपती धरती देख विशेष,

 मानो नील व्योम उतरा हो, आलिंगन के हेतु आशेष।

 उधर गरजती सिंधु लहरियां कुटिल काल के जालों सी, चली आ रही फेन उगलती फन फैलाए व्यालों सी।

 धंसती धरा धधकती ज्वाला ज्वालामुखियों के निश्वास,

 और संकुचित क्रमशः उसके अवयव का होता था ह्रास।

 सबल तरंगाघातों से उसे क्रुद्ध सिंधु के विचलित सी-

 व्यस्त महाकच्छप सी धरणी ऊभचूभ सी विकलित सी।

 बढ़ने लगा विलास बेग सा ,

वह अति भैरव जल संघात,

 तरल तिमिर से प्रलय पवन का होता आलिंगन प्रतिघात।

 वेला क्षण-क्षण निकट आ रही क्षितिज क्षीण फिर लीन हुआ ,

उदधि डुबा कर अखिल धरा को बस मर्यादाहीन हुआ ।

करका क्रंदन करती गिरती और कुचलना था सबका,

 पंचभूत का यह तांडव मय नृत्य हो रहा था कब का।

 एक नाव थी और उसमें डांडे लगता या पतवार, तरल तरंगों में उठ गिरकर बहती पगली बारंबार।

 लगते प्रबल थपेड़े धुंधले तटका था कुछ पता नहीं,

 कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं।

 लहरें व्योम चूमती उठती चपलाएं असंख्य नचती,

 गरल जलद की खड़ी झड़ी में बूंदे निज संसृति रचती।


चपलाएं उस जलधि  विश्व में स्वयं चमत्कृत होती थी, जो विराट बाड़व ज्वालाएं खंड-खंड हो रोती थी। जलनिधि के तलवासी जलचर विकल निकलते उतराते, हुआ विलोड़ित गृह तब प्राणी कौन कहां कब सुख पाते ।

घनी भूत हो उठे पवन, फिर सांसों की गति होती रुद्ध,

 और चेतना थी 

बिलखाती, दृष्टि विफल होती थी क्रुद्ध।

उस विराट आलोड़न में ग्रह तारा बुद बुद से लगते,

 प्रखर प्रलय- पावस में जगमग,

 ज्योतिरिंगणों से जागते।

 प्रहर दिवस कितने बीते, अब इसको कौन बता सकता,

 इनके सूचक उपकरणों का चिन्ह कोई पा सकता।

 काला शासन चक्र मृत्यु का, कब तक चला ना स्मरण रहा ,

महामत्स्य का एक चपेटा दीन पोत का मरण रहा। किंतु उसी ने ला 

टकराया उत्तर गिरि के शिर से।

 देव सृष्टि का ध्वंस अचानक, श्वास लगा लेने फिर से ।

आज अमरता का जीवित हूं मैं वह भीषण जर्जर दंभ,

 आह! सर्ग के प्रथम अंक का अधम- पात्र मय सा विषकंभ।

ओ जीवन की मरु-मरीचिका,  कायरता के अलस विषाद!

 अरे पुरातन अमृत! अगतिमय मोह मुक्त जर्जर अवसाद।

 मौन! नाश!  विध्वंश! अंधेरा! शून्य बना जो प्रकट अभाव ,

वही सत्य है, अरी अमरते! तुझको यहां कहां अब ठांव।

 मृत्यु अरी चिर निद्रे!

तेरा अंक हिमानी सा शीतल,

 तू अनंत में लहर बनाती काल जलधि की सी हलचल।

 महानृत्य का विषम सम अरी, अखिल स्पंदनों की तू माप ,

तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप।

 अंधकार के अट्टहास सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य,

 छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुंदर रहस्य है नित्य। जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घन-माला में सौदामिनी संधि सा सुंदर, क्षण भर रहा उजाला में।

 पवन पी रहा था शब्दों को निर्जनता की उखड़ी सांस,

 टकराती थी, दीन प्रतिध्वनि बनी हिमशिलाओं के पास। 

धू - धू करता नाच रहा था अनस्तित्व का तांडव नृत्य,

 आकर्षण विहीन

 विद्युत्कण बने भरवाही थे भृत्य।

 मृत्यु सदृश शीतल निराश ही आलिंगन पाती थी दृष्टि ,

परम व्योम से भौतिक कण सी घने कुहासों की थी वृष्टि।

 वाष्प बना उड़ता जाता था, या वह भीषण जल संघात,

 सौर चक्र में आवर्तन था प्रलय निशा का होता था प्रात !

ज़रूरी है

 ज़िन्दगी के लिए कुछ चाव हो

 ये ज़रूरी है 

गुनगुनी धूप के लिए 

जाड़े में 

लिबास मसरब भर हो

ये ज़रूरी है ।

धूप में चलते जाना है तो

राह में थोड़ी थोड़ी 

 छांव हो 

ये ज़रूरी है 

चाहते हो सोंधापन रोटी में 

तो पेट में थोड़ी भूख रक्खो ये

 ज़रूरी है 

प्यार में जो गर्मी चाहो

तो रिश्ते में थोड़ी दूरी रखना,

 ये ज़रूरी है 

बड़ी बड़ी खुशियों से क्या होगा 

छोटी छोटी खुशियों में खुशी हो, 

ये जरूरी है ।

धन दौलत माल खजाने में भी खुशी मिलती है ,

बस इन सब के लिए कुछ फकीरी हो,

 ये ज़रूरी है।

आनलाइन परीक्षा प्रणाली भ्रष्ट प्रणाली है ---------------------

 आनलाइन परीक्षा प्रणाली भ्रष्ट प्रणाली है 

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 दैनिक भास्कर, पटना के 15 नवंबर 2024 के अंक में प्रकाशित समाचार कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा में बैठने के लिए अभ्यर्थियों से 10-10 लाख की दलाली खाने वाला समाचार छपा है। इस समाचार के पश्चात पुलिस के द्वारा कुछ धर पकड़ की कार्यवाही करने का भी समाचार मिला है। इस संपूर्ण मामले में अगर देखा जाए तो सरकार की ओर से इस व्यवस्था में सुधार के लिए की गई किसी भी कार्यवाही के बारे में अब तक कुछ भी पता नहीं चलता। ऐसा नहीं है कि यह पहला समाचार है । इसके पहले भी केवल कर्मचारी चयन आयोग ही नहीं बल्कि सभी चयन अयोगों सहित ऑनलाइन होने वाली ज्यादातर परीक्षाओं में इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती रही है। पिछले दिनों मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट ) और इंजीनियरिंग में प्रवेश की परीक्षाओं में हुआ शोर शराबा किसी निर्णय तक नहीं पहुंचा। समय बीत गया लोग बातें भूल गए। इन परीक्षाओं का सीधा-सीधा मतलब यह है कि परीक्षा केंद्र संचालकों द्वारा मिली भगत करके इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। लेकिन यह बात आश्चर्य में डालती है कि सरकार इसको गलत मानकर इसमें ना किसी सुधार के लिए आगे आना चाहती है और ना ही परीक्षा केंद्र संचालकों के प्रति कोई ठोस कार्यवाही करती हुई दिखती है। सारी चिंता केवल परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों और उनके माता-पिता के चेहरे पर दिखाई देती है क्योंकि भविष्य तो उन्हीं का नष्ट हो रहा है। कुर्सी पर बैठे लोग या तो काम नहीं करना चाहते और या तो इस व्यवस्था अथवा अव्यवस्था जो भी नाम दिया जाए इससे उनको कोई लाभ प्राप्त हो रहा हैं इसलिए वह स्वयं  किसी भी प्रकार के सुधार की बात करना नहीं चाहते। यह बात हर व्यक्ति को स्पष्ट रूप से मान लेना चाहिए कि इसमें नौकरी देने वाली एजेंसियों का ही हित छुपा हुआ है।  वह परीक्षाएं ऑनलाइन इसलिए कराती है  ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे। 

यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि तकनीक का उपयोग अगर लाभकारी है तभी उस तकनीक का प्रयोग किया जाए। यदि तकनीक का प्रयोग आवश्यक नहीं है तो  उसका प्रयोग ना किया जाए। यहां ये बात भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि पिछले दिनों ऑनलाइन परीक्षा के पहले की व्यवस्था में ओएमआर शीट  पर परीक्षा होती थी जिसमें किसी भी प्रकार का घपला कभी नहीं देखा गया। अगर ओएमआर शीट और ऑनलाइन परीक्षा की व्यवस्था में लगने वाले समय, श्रम और सुविधा का मूल्यांकन किया जाए तो ओएमआर शीट से परीक्षा अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित और कम समय लेने वाली है । लेकिन ऑनलाइन परीक्षा से होने वाले छिपे हुए लाभ के कारण सरकार   ओएमआर शीट को नहीं लाना चाहती। दूसरी बात यह भी है कि भले ही ऑनलाइन परीक्षा थोड़ी अधिक सुविधा देती हो लेकिन यदि इस परीक्षा में इस प्रकार से हेराफेरी की जा रही है तो क्या इसे बंद नहीं कर देना चाहिए? 

परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए और परीक्षा को ईमानदार और पारदर्शी बनाने के नाम पर क्या यह देश ओएमआर शीट पर होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकता?   

 अगर हम ओएमआर शीट को प्रयोग कर सकते हैं तो इस प्रकार की परीक्षाओं में हर हालत में केवल ओएमआर शीट का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। परीक्षा केंद्रों के चयन और उन्हें परीक्षा कराने की जिम्मेदारी दिए जाने की प्रक्रिया की अगर जांच की जाए तो यही मालूम चलेगा कि परीक्षा केंद्रों का चयन अपात्र लोगों को ही किया जाता है। दूसरी बात यह भी है कि अगर  परीक्षा केंद्रों पर कंप्यूटर को किसी अन्य नेटवर्क से जोड़ने का खतरा सामने आ ही चुका है तो इस व्यवस्था को समाप्त करने के अलावा कोई अन्य रास्ता चुनना गलत होगा।

 अगर इस प्रकार की परीक्षाओं को जनता के प्रति जवाब देय बनाना है तो कंप्यूटर पर आधारित ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली से पूर्ण मुक्ति पाने की आवश्यकता है। पिछले कुछ दिनों से राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी एनटीए का नाम भी सामने आ रहा है। हमें यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता पड़ेगी कि जब परीक्षा आयोजित करने के लिए लोक सेवा आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, रेल सेवा आयोग, रेल भर्ती परिषद सहित तमाम तरह के चयन बोर्ड पहले से अस्तित्व में हैं तो एक नए विभाग एनटीए की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कर्मचारी चयन आयोग जैसे अन्य आयोग में कर्मचारी और अधिकारियों की संख्या बढ़ाकर उनके काम को और दक्ष बनाने में सरकार को क्या समस्या हो रही है? इन सारी बातों की तह में जाने पर एक ही बात समझ में आती है की शासन प्रशासन यह बात पूरी तरह से समझता है कि अव्यवस्था फैलाने से ही मनमानी करने के रास्ते खुलते हैं और सिस्टम में जितनी भी अव्यवस्थाएं की जाती है वह केवल परीक्षा प्रणालियों को मनमाने ढंग से संचालित कर अनाप-शनाप ढंग से पैसा बनाने के लिए ही की जाती है।

 राष्ट्रीय जल समर्थन पार्टी इस मामले में ऐसा मानती है कि देश के युवाओं के भविष्य को संवारने के लिए एक पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए। कर्मचारी चयन आयोग, रेल भर्ती परिषद , संघ और राज्य लोक सेवा आयोग जैसी परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों को और सुदृढ़ और शक्ति संपन्न बनाकर उनसे ही कार्य लिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी जैसी एजेंसियों को किसी भी हालत में परीक्षा की जिम्मेदारी नहीं दिया जाना चाहिए।देश के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना और परीक्षा की व्यवस्था को संदिग्ध बनाना युवाओं के साथ धोखा है। अतः इस परीक्षा को जनता के प्रति जवाब देय, ईमानदार और पारदर्शी बनाए रखने के लिए केवल कर्मचारी चयन आयोग, लोक सेवा आयोग, रेल सेवा आयोग जैसे विभाग और एजेंसियों को ही सुदृढ़ करके उन्हें ही परीक्षाएं आयोजित करने का काम दिया जाना चाहिए। इस संबंध में एक बात और बहुत आवश्यक है कि ऑनलाइन परीक्षा के बजाय ओएमआर शीट पर परीक्षा कराया जाना अधिक सुरक्षित है। अतः सरकार को ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली को बंद करके ओएमआर शीट पर ही परीक्षा आयोजित कराना चाहिए।

सकल घरेलू उत्पाद में जनता की हिस्सेदारी। ------------------

 सकल घरेलू उत्पाद में जनता की हिस्सेदारी।

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सकल घरेलू उत्पाद में जनता का एक हक़ तो यह है कि वह अपने श्रम से देश की आमदनी में अपना हिस्सा जोड़ती है। फिर उस धन का देश को चलने वाली विभिन्न योजनाओं के लिए  जो बंटवारा होता है उसमें से किसको क्या मिलता है? प्रश्न यह है कि उसमें जनता की हिस्सेदारी कितनी और कहां है ? इस प्रश्न के जवाब बहुत से हो सकते हैं लेकिन आज हम यह बात करेंगे कि देश की समस्त कमाई का जनता की भलाई के लिए खर्च किस प्रकार किया जाता है ?

आमतौर पर इस प्रकार की बातचीत को स्पष्ट करने के लिए आंकड़ों का सहारा लिया जाता है । लेकिन इसे थोड़ाऔर आसानी से समझने के लिए केवल व्यावहारिकता के धरातल पर बात की जाए तो ठीक रहेगा।

सरकारी खजाने में प्राप्त धन से सरकार कल्याणकारी योजनाएं चलाती है और इन योजनाओं को चलाने के लिए सरकारी मशीनरी तैयार की जाती है, जिसमें विभिन्न प्रकार के सरकारी विभाग होते हैं। इन विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारी और अधिकारी नौकरी पाते हैं और अपने-अपने निर्धारित कर्तव्यों के आधार पर देश की सेवा और राष्ट्रीय उत्पादकता में अपना योगदान देते हैं। इस प्रकार सेवा में नियोजित होने से आम नागरिकों का शासन में योगदान होता है तो वहीं पर उन्हें देश की सेवा करने का अवसर मिलता है और उन्हें अपनी योग्यता को साबित करने का अवसर भी मिलता है। यह उनके सपनों को पूरा करने का भी मामला है। लेकिन सरकार की नजर में यह एक रोजगार सृजन की बात है। अगर इस नजर से भी देखा जाए तो यह अत्यंत ही पुनीत कर्तव्य होता है जिसे सरकार को बहुत ईमानदारी और पवित्रता के साथ अंजाम देना चाहिए।

 वर्ष 2000  आते आते शासन में शिक्षामित्र, स्वास्थ्य मित्र, सफाई मित्र के नाम पर कर्मचारियों की नियुक्ति में घालमेल आरंभ हुआ था, जो बाद में एड- हॉक और कैजुअल से होते हुए अब कॉन्ट्रैक्ट तक पहुंच चुका है। यहां ध्यान देने की बात ये है कि सरकार अब स्वयं डॉक्टर और इंजीनियर की भर्ती संविदा पर कर रही है। इस प्रकार चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसी विशेषज्ञता प्राप्त महंगी पढ़ाई करने वाले युवाओं की शिक्षा और डिग्री की बेकद्री केवल भारत में ही देखने को मिलती है। सामान्य स्नातक की डिग्री और परास्नातक  पढ़ाई का कोई मोल हमारे देश में अब नहीं रहा। देखें तो एक ही अस्पताल में एक मेडिकल ऑफिसर 60 हजार रुपये प्रतिमाह सैलरी पाता है दूसरा मेडिकल ऑफिसर 2 लाख रुपए प्रतिमाह पाता है। इसी प्रकार एक कार्यालय में एक क्लर्क ₹50 हजार प्रतिमाह पाता है और वही काम करने वाला एक दूसरा क्लर्क जो संविदा पर है वह ₹10 हजार ही पाता है। इस प्रकार प्रशासन में एड- हॉक, कैजुअल और अब कॉन्ट्रैक्ट पर सरकार चल रही है। अगर आप इनके काम का मूल्यांकन करना चाहें तो सरकार के द्वारा पिछले  वर्षों में किए गए कार्यों का मूल्यांकन करें। आप पाएंगे कि हर परीक्षा के पेपर लीक हो जाते हैं, अस्पतालों में क्या-क्या हो जाता है, दफ्तरों में फाइलें कौन सी कब कहां गुम हो जाती है, किसको कौन सा कॉन्ट्रैक्ट कब मिल जाता है, किन नियमों की अनदेखी हो जाती है यह पता नहीं चलता! यह परिणाम कैजुअल और कॉन्ट्रैक्ट पर होने वाली भर्तियों से होने वाले कार्य का नतीजा है। मुख्य मुद्दा इतना पेचीदा और संवेदनशील है जिस पर सरकार कभी कोई ईमानदार चर्चा नहीं करना चाहती। वर्ष 2014 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने पर ऐसी संभावना व्यक्त की गई थी कि भारत में कुल बच्चे जो स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, अगर उन्हें स्कूल भेजना है तो लाखों की संख्या में विद्यालय खोलने की आवश्यकता पड़ेगी। वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार का मूल्यांकन  आया है और अब यह पता चला है कि कुछ स्कूलों को बंद करके दूसरे स्कूलों में मिला दिया जाएगा ! यह निर्णय किन आंकड़ों के आधार पर लिए जाते हैं इसका पता नहीं चलता। अकेले शिक्षा विभाग में एक राज्य में लाखों पद खाली हैं। अगर सभी विभागों में सरकारी पदों को भरा जाए तो हर राज्य का राजस्व का एक बड़ा हिस्सा कर्मचारियों की तनख्वाह पर जा सकता है। यही पैसा बचाकर सरकार यह दावा करती है कि हमारी इकोनॉमी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। इन दोनों आंकड़ों को समानांतर रखकर विचार करने से इकोनॉमी के बढ़ने का सच बड़े आराम से सामने आ जाता है और तब इस ढोल में केवल पोल ही पोल दिखाई पड़ता है।

 इसी प्रकार केंद्र सरकार के पास वर्ष 2001 में 50 लाख से अधिक अधिकारी और कर्मचारी थे जिनकी संख्या अब 30 से 35 000 लाख तक पहुंच चुकी है। शेष 15 लाख पद केंद्र सरकार में खाली हैं जिन्हें भरने के लिए अभी तक केंद्र सरकार के पास कोई योजना नहीं है। इस प्रकार 15 लाख लोगों की भरती नहीं होने से जो युवा रोजगार से वंचित हो रहे हैं उनके प्रति सरकार की कोई जवाबदेही दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे युवा जो केंद्र सरकार की सेवा में जाकर अपने सपनों को साकार करना चाहते थे या अपनी महत्वाकांक्षा को फलीभूत होते देखना चाहते थे केंद्र सरकार के पास उनके सपनों को जगह देने के लिए कोई योजना नहीं है। ऐसी सरकार जिसको युवाओं के सपनों और उसके भविष्य की चिंता नहीं है उसके बारे में क्या कहा जा सकता है!

 यह जरूर है कि जिस देश के युवा का सपना मर जाएगा वह देश कितने दिनों तक बूढ़े नेताओं की नजर से आगे बढ़ने का सपना देखेगा यह कह पाना बहुत कठिन है। यहां पर आकर हम वापस सकल घरेलू उत्पाद में जनता के हिस्से की बात दोहराना चाहेंगे क्योंकि यह दोनों बातें आसपास रखकर समझा जाए तभी आम बोलचाल की भाषा में आम आदमी की सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी की बात को समझा जा सकता है। यहां पर यह भी समझा जा सकता है कि सरकार के द्वारा इकोनॉमी के तेजी से बढ़ने की सच्चाई कितनी सच्चाई है और कितनी हवा-हवाई ! यदि सरकार के पास रखी हुई समस्त पूंजी में से केंद्र सरकार के 15 लाख कर्मचारियों की सालाना सैलरी निकाल दी जाए तो सरकार की बचत और उसकी इकोनामी दोनों का मतलब समझ में आ जाएगा। इस प्रकार आंकड़ों का खेल जनता को भ्रम में डालने के लिए किया जाता है। जनता को भ्रम में ही डालने के लिए सरकारों के द्वारा रोजगार सृजन के कार्य को अनदेखा किया जाता है । सरकारों के द्वारा कैजुअल, एड-हाक और अनुबंध पर की जाने वाली भर्तियों से देश के युवाओं का भविष्य खतरे में पड़ता है। इन बातों को एक साथ रखकर समझना ही इस लेख का मूल मकसद है। यहीं पर राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी अपनी बात को स्पष्ट करना चाहती है कि देश में समस्याएं उतनी बड़ी नहीं है जितनी बड़ी करके उन्हें प्रदर्शित किया जाता है। देश की समस्या को केवल राजनेता हल नहीं कर सकते। सीमाओं पर राजनेता लड़ने नहीं जाते, अस्पतालों और स्कूलों में डॉक्टर और अध्यापक काम करते हैं और उन्हें वेतन देश के सकल घरेलू उत्पाद और सकल संग्रहित कर इत्यादि से दिया जाता है।  इसलिए सरकार को युवाओं का हिस्सा हजम करके मौजें उड़ाने का और झूठे वादे करने का कोई अधिकार नहीं है। उसे अपनी इस प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए।

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...