Sunday 15 2025

कविता: उंगलियों पर नचाया है

 दुनिया का हर कोना जहां जाता हूं मैं 

हर वो इंसान जो प्यार से 

मिलता है मुझे 

तो लगता है जैसे 

पूरी दुनिया से 

दुनिया के हर इंसान से 

मेरा कोई नाता है 

इस जनम का

पहले जन्म का

उससे पहले के जन्म का

यूं लगता है जैसे 

जन्म जन्मांतर से 

इस धरती पर 

मैं ही युगों युगों से 

जनमता और तुममें ही समाहित होता रहा हूं

तुमने मुझे अपने 

लीला विधान में एक पात्र बनाया है 

युगों से मुझे अपनी उंगलियों पर नचाया है 

इस बात का धन्यवाद मैं करूं कैसे किन शब्दों में करूं ये नहीं जानता

इस बेहद खूबसूरत कायनात में अपनी 

माया को भोगने जब तुम 

खुद आते हो

फिर अपना रूप दे कर

हमें नचाते हो तो

मैं धन्य धन्य हो जाता हूं 

मुझे बार बार चुनना 

भेजना इस कायनात में 

जिससे मुझको मोहब्बत है 

इससे मुझे मोहब्बत है 

मुझे तुमसे मोहब्बत है 

ऐ खुदा,

ऐ मेरे मालिक,

ऐ मेरे ईश्वर 

मुझे तुमसे मोहब्बत है!!

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