Thursday 12 2024

सकल घरेलू उत्पाद में जनता की हिस्सेदारी। ------------------

 सकल घरेलू उत्पाद में जनता की हिस्सेदारी।

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सकल घरेलू उत्पाद में जनता का एक हक़ तो यह है कि वह अपने श्रम से देश की आमदनी में अपना हिस्सा जोड़ती है। फिर उस धन का देश को चलने वाली विभिन्न योजनाओं के लिए  जो बंटवारा होता है उसमें से किसको क्या मिलता है? प्रश्न यह है कि उसमें जनता की हिस्सेदारी कितनी और कहां है ? इस प्रश्न के जवाब बहुत से हो सकते हैं लेकिन आज हम यह बात करेंगे कि देश की समस्त कमाई का जनता की भलाई के लिए खर्च किस प्रकार किया जाता है ?

आमतौर पर इस प्रकार की बातचीत को स्पष्ट करने के लिए आंकड़ों का सहारा लिया जाता है । लेकिन इसे थोड़ाऔर आसानी से समझने के लिए केवल व्यावहारिकता के धरातल पर बात की जाए तो ठीक रहेगा।

सरकारी खजाने में प्राप्त धन से सरकार कल्याणकारी योजनाएं चलाती है और इन योजनाओं को चलाने के लिए सरकारी मशीनरी तैयार की जाती है, जिसमें विभिन्न प्रकार के सरकारी विभाग होते हैं। इन विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारी और अधिकारी नौकरी पाते हैं और अपने-अपने निर्धारित कर्तव्यों के आधार पर देश की सेवा और राष्ट्रीय उत्पादकता में अपना योगदान देते हैं। इस प्रकार सेवा में नियोजित होने से आम नागरिकों का शासन में योगदान होता है तो वहीं पर उन्हें देश की सेवा करने का अवसर मिलता है और उन्हें अपनी योग्यता को साबित करने का अवसर भी मिलता है। यह उनके सपनों को पूरा करने का भी मामला है। लेकिन सरकार की नजर में यह एक रोजगार सृजन की बात है। अगर इस नजर से भी देखा जाए तो यह अत्यंत ही पुनीत कर्तव्य होता है जिसे सरकार को बहुत ईमानदारी और पवित्रता के साथ अंजाम देना चाहिए।

 वर्ष 2000  आते आते शासन में शिक्षामित्र, स्वास्थ्य मित्र, सफाई मित्र के नाम पर कर्मचारियों की नियुक्ति में घालमेल आरंभ हुआ था, जो बाद में एड- हॉक और कैजुअल से होते हुए अब कॉन्ट्रैक्ट तक पहुंच चुका है। यहां ध्यान देने की बात ये है कि सरकार अब स्वयं डॉक्टर और इंजीनियर की भर्ती संविदा पर कर रही है। इस प्रकार चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसी विशेषज्ञता प्राप्त महंगी पढ़ाई करने वाले युवाओं की शिक्षा और डिग्री की बेकद्री केवल भारत में ही देखने को मिलती है। सामान्य स्नातक की डिग्री और परास्नातक  पढ़ाई का कोई मोल हमारे देश में अब नहीं रहा। देखें तो एक ही अस्पताल में एक मेडिकल ऑफिसर 60 हजार रुपये प्रतिमाह सैलरी पाता है दूसरा मेडिकल ऑफिसर 2 लाख रुपए प्रतिमाह पाता है। इसी प्रकार एक कार्यालय में एक क्लर्क ₹50 हजार प्रतिमाह पाता है और वही काम करने वाला एक दूसरा क्लर्क जो संविदा पर है वह ₹10 हजार ही पाता है। इस प्रकार प्रशासन में एड- हॉक, कैजुअल और अब कॉन्ट्रैक्ट पर सरकार चल रही है। अगर आप इनके काम का मूल्यांकन करना चाहें तो सरकार के द्वारा पिछले  वर्षों में किए गए कार्यों का मूल्यांकन करें। आप पाएंगे कि हर परीक्षा के पेपर लीक हो जाते हैं, अस्पतालों में क्या-क्या हो जाता है, दफ्तरों में फाइलें कौन सी कब कहां गुम हो जाती है, किसको कौन सा कॉन्ट्रैक्ट कब मिल जाता है, किन नियमों की अनदेखी हो जाती है यह पता नहीं चलता! यह परिणाम कैजुअल और कॉन्ट्रैक्ट पर होने वाली भर्तियों से होने वाले कार्य का नतीजा है। मुख्य मुद्दा इतना पेचीदा और संवेदनशील है जिस पर सरकार कभी कोई ईमानदार चर्चा नहीं करना चाहती। वर्ष 2014 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने पर ऐसी संभावना व्यक्त की गई थी कि भारत में कुल बच्चे जो स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, अगर उन्हें स्कूल भेजना है तो लाखों की संख्या में विद्यालय खोलने की आवश्यकता पड़ेगी। वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार का मूल्यांकन  आया है और अब यह पता चला है कि कुछ स्कूलों को बंद करके दूसरे स्कूलों में मिला दिया जाएगा ! यह निर्णय किन आंकड़ों के आधार पर लिए जाते हैं इसका पता नहीं चलता। अकेले शिक्षा विभाग में एक राज्य में लाखों पद खाली हैं। अगर सभी विभागों में सरकारी पदों को भरा जाए तो हर राज्य का राजस्व का एक बड़ा हिस्सा कर्मचारियों की तनख्वाह पर जा सकता है। यही पैसा बचाकर सरकार यह दावा करती है कि हमारी इकोनॉमी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। इन दोनों आंकड़ों को समानांतर रखकर विचार करने से इकोनॉमी के बढ़ने का सच बड़े आराम से सामने आ जाता है और तब इस ढोल में केवल पोल ही पोल दिखाई पड़ता है।

 इसी प्रकार केंद्र सरकार के पास वर्ष 2001 में 50 लाख से अधिक अधिकारी और कर्मचारी थे जिनकी संख्या अब 30 से 35 000 लाख तक पहुंच चुकी है। शेष 15 लाख पद केंद्र सरकार में खाली हैं जिन्हें भरने के लिए अभी तक केंद्र सरकार के पास कोई योजना नहीं है। इस प्रकार 15 लाख लोगों की भरती नहीं होने से जो युवा रोजगार से वंचित हो रहे हैं उनके प्रति सरकार की कोई जवाबदेही दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे युवा जो केंद्र सरकार की सेवा में जाकर अपने सपनों को साकार करना चाहते थे या अपनी महत्वाकांक्षा को फलीभूत होते देखना चाहते थे केंद्र सरकार के पास उनके सपनों को जगह देने के लिए कोई योजना नहीं है। ऐसी सरकार जिसको युवाओं के सपनों और उसके भविष्य की चिंता नहीं है उसके बारे में क्या कहा जा सकता है!

 यह जरूर है कि जिस देश के युवा का सपना मर जाएगा वह देश कितने दिनों तक बूढ़े नेताओं की नजर से आगे बढ़ने का सपना देखेगा यह कह पाना बहुत कठिन है। यहां पर आकर हम वापस सकल घरेलू उत्पाद में जनता के हिस्से की बात दोहराना चाहेंगे क्योंकि यह दोनों बातें आसपास रखकर समझा जाए तभी आम बोलचाल की भाषा में आम आदमी की सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी की बात को समझा जा सकता है। यहां पर यह भी समझा जा सकता है कि सरकार के द्वारा इकोनॉमी के तेजी से बढ़ने की सच्चाई कितनी सच्चाई है और कितनी हवा-हवाई ! यदि सरकार के पास रखी हुई समस्त पूंजी में से केंद्र सरकार के 15 लाख कर्मचारियों की सालाना सैलरी निकाल दी जाए तो सरकार की बचत और उसकी इकोनामी दोनों का मतलब समझ में आ जाएगा। इस प्रकार आंकड़ों का खेल जनता को भ्रम में डालने के लिए किया जाता है। जनता को भ्रम में ही डालने के लिए सरकारों के द्वारा रोजगार सृजन के कार्य को अनदेखा किया जाता है । सरकारों के द्वारा कैजुअल, एड-हाक और अनुबंध पर की जाने वाली भर्तियों से देश के युवाओं का भविष्य खतरे में पड़ता है। इन बातों को एक साथ रखकर समझना ही इस लेख का मूल मकसद है। यहीं पर राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी अपनी बात को स्पष्ट करना चाहती है कि देश में समस्याएं उतनी बड़ी नहीं है जितनी बड़ी करके उन्हें प्रदर्शित किया जाता है। देश की समस्या को केवल राजनेता हल नहीं कर सकते। सीमाओं पर राजनेता लड़ने नहीं जाते, अस्पतालों और स्कूलों में डॉक्टर और अध्यापक काम करते हैं और उन्हें वेतन देश के सकल घरेलू उत्पाद और सकल संग्रहित कर इत्यादि से दिया जाता है।  इसलिए सरकार को युवाओं का हिस्सा हजम करके मौजें उड़ाने का और झूठे वादे करने का कोई अधिकार नहीं है। उसे अपनी इस प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए।

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