इस भागती हुई दुनिया में ठहराव का अर्थ बताता है ख़य्याम का संगीत। उनका संगीत ध्यानावस्था में आती हुई गहरी श्वांस है।पूर्ण सजग,पूर्ण चैतन्य किंतु इतनी धीमी कि उसके होने से चेतना खिल रही हो और किसी को उसकी भनक भी न लगे।
दुनिया में ऐसे भी इंसान हैं जिन्हें कोई जल्दी नहीं है। उन्हें कहीं नहीं पहुंचना सिवाय खुद के। उनके वक्त को धन भी खरीद नहीं सकता। वे कम काम करेंगे,कम धन कमाएंगे लेकिन जो करेंगे वो सर्वोत्कृष्ट होगा । ये बात अपने काम के प्रति मुहब्बत और जुनून के सिवाय और किसी चीज़ से पैदा नहीं हो सकती।
ख़य्याम के संगीत में ऐसा क्या है जो बार बार उनके गीतों की चौखट पर ले जाकर खड़ा कर देता है। इसका जवाब तो सिर्फ दिल ही दे सकता है जो उस संगीत की एक छुअन से पिघल उठता है।
बेइंतेहा इश्क़ में हो अगर तो-
' ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें' सुनना ।
आंखें यूं मुंदने लगेंगी मानो प्रेमी ने पास खींचकर माथे पर एक बोसा रख दिया हो।
विरह में हो तो सुनना -
' है नाम होंठों पे अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गईं दरारें'
इतने बरसों सख़्ती से रोके गए आंसुओं को ढुलकने देना गालों पर कि ये गीत मुक्ति लेकर आया है एक मज़बूती से बांधे हुए समन्दर की।
उनके संगीत में साज ऐसे बजते हैं जैसे गीत की आत्मा हों। चाहे बांसुरी हो या शहनाई और चाहे पर्बतों से बादलों की तरह उतरता सन्तूर। लाउड होना ख़य्याम की प्रकृति नहीं।
कहीं देखा है ख़य्याम के संगीत के सिवाय कि साज ऐसे बजें कि गायन को अपनी हथेली पर नाजुकी से उठा लें।
' अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े,सीढियां धड़कती हैं'
जब लता इसे गाती हैं तो पीछे धीमे-धीमे बजते साज ऐसा प्रभाव जगाते हैं जैसे कोई कवि कविता रच रहा हो और एक दीया टिमटिमा रहा हो बस उतना ही जितना कागज़ पर मद्धम रोशनी गिर सके।यह गीत तिलिस्म और रहस्य का जादू जगाता है। ट्रांस में जाने की सीढ़ी है ये गीत। न्यूनतम साजों में दिल की रगों को छेड़ देना ख़य्याम के ही बस की बात है।
इसी गीत का अंतरा है-
'एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम सी'
इन पंक्तियों में जब लता जी 'कम-कम' गाती हैं तो जैसे सब धुंधलाता जाता है। सब धीमा हो रहा है, धड़कन मन्द पड़ रही है । दिल डूब रहा है। आप चीख के रोना चाहते हैं या फिर एकदम चुप लगा लेना चाहते हैं। बीच का कोई रास्ता नहीं।
एक बार तलत अजीज़ बता रहे थे एक आर्टिकल के ज़रिए कि बेग़म अख़्तर की गाई ग़ज़ल ' वो जो हममें तुममें क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो' की धुन ख़य्याम साब ने बनाई है । जानकर लगा जैसे एक अनमोल खज़ाना हाथ लग गया हो। ये बेशकीमती ग़ज़ल मेरे दिलरुबा संगीतकार की रची हुई है, रोम-रोम सिहर उठा।कैसे-कैसे अद्भुत मोती इस शांत महासागर से निकलकर आये हैं।
क्या यह छोटी बात है कि ख़य्याम के हर गीत पर एक काव्य लिखा जा सकता है।
इकलौते ख़य्याम ही तो हैं जिन्होंने ख़ामोशी को भी बजाया है,ख़ामोशी से भी गवाया है।मौन की झंकार ख़य्याम ने ही दुनिया को सुनाई है।
दरअसल 'ये ज़मीं चुप है,आसमां चुप है ' के बाद की वो चुप ही ख़य्याम का संगीत है ।
क्या कमाल के लोग थे ! वो सृष्टि को सुरीला बनाने आए थे। खय्याम का संगीत सुनें तो ऊंचे पहाड़ों पर परतदार चोटियां या कोई झरना, किसी नई नवेली दुल्हन की तरह सकुचाते शर्माते परतदार झरने सा बह रहा हो ऐसा दृश्य उभरने लगता है। उनके गाने ये दिल और उनकी निगाहों के साए ,आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करें, तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है तेरा गम ही मेरी हयात है जैसे गानों की खूबसूरती बयान किए न बने। खय्याम साहब ने अपने संगीत में गजब के इंस्ट्रूमेंट्स और उसमें भी जल तरंग का प्रयोग किया है । उन्होंने अपने संगीत में सुरीले संतूर का भी भरपूर प्रयोग किया है। शायद खय्याम साहब के बारे में इतने से मन नहीं भरता। वैसे उनके संगीत के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है । एक बार रेखा ने उनके बारे में कहा था कि रेखा को रेखा बनाने वाले खय्याम साहब ही हैं। ये सच भी है उमराव जान का संगीत का नाम लें या फिर कभी-कभी, त्रिशूल, बाजार, आखिरी खत सब एक से बढ़कर एक बेजोड़ संगीत से अमर हो चुके हैं। पर्वतों के पेड़ों पर, वो सुबह कभी तो आएगी, तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो, तुम चली जाओगी तनहाइयां रह जाएगी जैसे गाने फिल्मी संगीत को एक नई परिभाषा देते हैं। वहीं मोहब्बत बड़े काम की चीज है, मेरे घर आई एक नन्ही परी के अलावा चाहे चले छुरिया आदि में तेज बिट्स डालकर आपने अपनी विशिष्ट शैली का भी परिचय दिया है। वही रजिया सुल्तान में अरबी संगीत की 13वीं सदी के जैसा संगीत भी दिया। खय्याम ही ऐसे संगीतकार हैं जिनके हर गीत पसंद किए जाते हैं। उनके संगीत में ऐसा कुछ भी नहीं आया जो पसंद ना आने वाला हो। बेशक खय्याम साहब के सुरीले संगीत से सजे मधुर नगमे कानों में धीमा धीमा सरस घोलते हैं और उस पर सोने में सुहागा ये है कि अगर आवाज लता जी और आशा जी की हो तो सुनने वाला एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाता है ,जहां पहाड़ों का सुकून समंदर सी गहराई और आबशार के बहते हुए पानी की कल कल सुनने वालों को मदहोश कर देती है। फिर इस मीठे-मीठे एहसास के दायरे से काफी देर तक हम चाहकर भी आजाद नहीं हो पाते। रजिया सुल्तान फिल्म का ऐ दिल ए नादान में चुप्पी के बाद का सन्नाटा सुनकर दिल की धड़कन भी थम जाती है । अद्भुत है उनका संगीत!