[07/12, 10:07] Mohan Dhanraj: कामायनी
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सनातन संस्कृति के उद्भव से पूर्व देव संस्कृति उच्चतम स्तर से महा प्रलय को अभिशप्त होने और फिर पश्चात के महा घटनाक्रमों में श्रद्धा , इड़ा और कुमार के माध्यम से सनातन संस्कृति की कहानी एक रूपकात्मक सच्चाई जान पड़ती है। जब मानव आज के विकास क्रम को अपनी संस्कृति से जुड़कर देखता है तो वो उसकी गर्वीली ऊंचाइयों की जड़ें इतिहास, कालक्रम और घटनाओं में तलाश करने के पश्चात मनोविज्ञान और दर्शन में प्रवेश कर जाता है। कामायनी में महाकवि जयशंकर प्रसाद इसी इतिहास को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाते हैं जहां से हम सनातन संस्कृति के आगे बढ़ाने की कल्पना को सच्चाई के धरातल पर देख पाते हैं ।कामायनी में जयशंकर प्रसाद कहानी के उत्पत्ति की कथा बताते हुए लिखते हैं कि "शतपथ ब्राह्मण के आठवें अध्याय में यह उल्लेख मिलता है कि मनु ने ही मानवों के लिए देव संस्कृति से उच्चतर सनातन संस्कृति की कल्पना की क्योंकि उन्होंने यह समझ लिया था कि देव संस्कृति अपनी किन कमियों के कारण पराभव को प्राप्त हुई थी। मनु भारतीय सांस्कृतिक , इतिहास के आदि पुरुष हैं । राम, कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं । शतपथ ब्राह्मण में इन्हें श्रद्धा देव कहा गया है। "श्रद्धादेवो वै मनु:"। भागवत में इन्हीं श्रद्धा और मनु से मानवीय सृष्टि का प्रारंभ माना जाता है। "तत्मनु: श्रद्धादेव इति संज्ञामास भारत " ।
मनु और श्रद्धा की कथा का उल्लेख छांदोग्य उपनिषद ऋग्वेद में भी मिलता है। श्रद्धा वाले सूक्त में सायण ने श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है, "काम गोत्रजा श्रद्धानामर्शिका" ।
श्रद्धा कामदेव की बालिका है इसलिए इसे "कामायनी" भी कहा जाता है। जप्लावन से संबंधित बहुत कुछ वैदिक साहित्य में है, किंतु वह बिखरा हुआ है। जलप्लावन का अध्याय शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड के आठवें अध्याय में मिलता है, जिसमें उनकी नाव उत्तर गिरि के हिमवान प्रदेश में पहुंचने का प्रसंग मिलता है।
आगे की कथा को समझने के लिएआईए साक्षात्कार करते हैं कामायनी का-
(धरती पर जलप्लावन समाप्त हो रहा है,
पेड़ों में हरियाली, फूलों का खिलना, रंग-बिरंगे पंछियों का आना) सॉफ्ट, सोलफुल, मॉर्निंग फ्ल्यूट/ संतूर वादन पुरुष स्वर - प्रकृति का यह मनोरम रूप अब से पहले ऐसा नहीं था
एक विप्लव के गर्भ से जन्मा है यह प्रकृति का संगीत
घोर विप्लव, भीषण भूकंप, तूफान, आंधियां बर्फीली हवाओं, जहरीली बारिश,
उल्कापात, ओलावृष्टि के बाद जब सब कुछ काल के गाल में समा गया तब आई प्रकृति और पुरुष के मिलन की यह
नयनाभिराम झांकी।
(विप्लव का दृश्य फिर धीरे-धीरे आरंभ होता है.... क्लाइमेक्स पर जाकर ठहरता है...)
पुरुष स्वर-
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छांह
एक पुरुष भीगे नैनो से देख रहा था प्रलय प्रवाह नीचे जल था ऊपर हिम था एक तरल था एक सघन
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन
दूर-दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय सामान
नीरवता-सी शिला चरण से, टकराता फिरता पवमान
तरुण तपस्वी सा वह बैठा साधन करता सुर-श्मशान
नीचे प्रलय सिंधु लहरों का होता था सकरुण अवसान
उसी तपस्वी से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े
हुए हम धवल जैसे पत्थर बनकर ठिठुरे रहे अड़े
अवयव की दृढ़ मांसपेशियां ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार
स्फीत शिराएं स्वस्थ रक्त का होता था जिन में संचार
चिंता कातर बदन हो रहा पुरुष जिसमें हो रहा पौरुष जिसमें ओतप्रोत उधर अपेक्षा में यौवन का बहता भीतर मधुमय स्त्रोत
शब्दों के उतार-चढ़ाव के साथ मनु के चेहरे, मन और उनकी देह की बेचैनी का फिल्मांकन.... संगीत का और तेज होना.... भावों का और संघनित होना
(वाचन को प्रभावी बनाते हुए)
बंधी पहावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही उतर चला था वह जल प्लावन और निकलने लगी मही
निकल रही थी मर्म वेदना करुण विकल कहानी सी
वहां अकेली प्रकृति सुन रही हंसती सी पहचानी सी..
(प्रकृति स्त्री की विजयी हंसी का स्वर )
पुरुष स्वर -
इस महाजलप्लावन की विशाल जल राशि को जिस नाव पर बैठकर मनु बिना डांडे और पतवार के यहां हिमालय की पर्वत चोटियों पर आए थे उसे अब एक वृक्ष से बांध दिया था। उसके आसपास अब जल उतर गया था धरती दिखाई देने लगी थी। इतने दिनों बाद धरती का दिखाई देना ऐसा लग रहा था मानो वो करुण वेदना में अपनी दुख भरी कथा सुना रही हो और प्रकृति अकेली उसकी इस मर्म भेदी व्यथा को सुन रही थी और देव संस्कृति के द्वारा प्रकृति की सीमा लगने के कारण जल प्लावन से दंडित करके उनके हाल पर अब वो हंसे जा रही थी। प्रकृति की ये हंसी बहुत जानी पहचानी सी हंसी इस बात की याद दिला रही थी कि प्रकृति मनुष्यों को अनंत काल तक अभय दान नहीं दे सकती। उसके दोहन की एक सीमा रेखा है जिसे पार करने के बाद वह कभी भी धरती वासियों को कोप भजन बना सकती है।
(तांडव संगीत)
ओ चिंता की पहली रेखा, अरी विश्व-वन की ब्याली ,
ज्वालामुखी स्फोट के भीषण प्रथम कंप-सी मतवाली!
हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खल लेखा!
हरी- भरी- सी दौड़ धूप ओ जल माया की चल लेखा!
इस ग्रह कक्षा की हलचल- री तरल गरल की लघु लहरी,
जरा अमर जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बाहरी!
अरी व्याधि की सूत्रधारिणी
अरी आधि मधुमय अभिशाप!
हृदय गगन में धूमकेतु सी, पुण्य सृष्टि में सुंदर पाप!
मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चिंत जाति का जीव-
अमर मारेगा क्या?
तू कितनी गहरी डाल रही है नीव!
आह घिरेगी हृदय- लहलहे- खेतों पर
करका घन सी,
छिपी रहेगी अंतरतम में सबके तू निगूढ़ धन सी! बुद्धि, मनीषा, मति, आशा, चिंता तेरे हैं कितने नाम!
अरी पाप है तू, जा, चल ।जा यहां नहीं कुछ तेरा काम
विस्मृति आ, अवसाद घेर ले, नीरवते! बस चुप कर दे,
चेतनता चल जा, जड़ता से आज शून्य मेरा भर दे।"
चिंता करता हूं मैं जितनी उस अतीत की उस सुख की ,
उतनी ही अनंत में बनती जाती रेखाएं दुख की। आह सर्ग के अग्रदूत! तुम असफल हुए, विलीन हुए
भक्षक या रक्षक जो समझो, केवल अपने मीन हुए।
अरी आंधियों, ओ बिजली की दिवा रात्रि, तेरा नर्तन,
उसी वासना की उपासना, वह तेरा प्रत्यावर्तन!
मणि-दीपो के अंधकार मय अरे निराशा पूर्ण भविष्य!
देव-दंभ के महामेध में सब कुछ ही बन गया हविष्य।
अरे अमरता की चमकीले पुतलो! तेरे वे जयनाद-
कांप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बनकर
मानो दिन विषाद।
प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में ,
भोले थे हां तिरते केवल सब विलासिता के नद में।
वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार -
उमड़ रहा था देव - सुखों पर दुख जलधि का नाद अपार "
"वह उन्मत्त विलास हुआ क्या! स्वप्न रहा या छलना थी!
देव सृष्टि की सुख- विभावरी ताराओं की कलना थी ।
चलते थे सुरभित अंचल से जीवन के मधुमय निश्वास ,
कोलाहल में मुखरित होता देव जाति का सुख विश्वास ।
सुख केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीय भूत हुआ इतना,
छाया पथ में नव तुषार का सघन मिलन होता जितना ।
सब कुछ थे स्वायत्त, विश्व के बल वैभव आनंद अपार ,
उद्वेलित लहरों - सा होता उस समृद्धि का सुख संचार ।
कीर्ति, दीप्ति, शोभा थी नचती अरुण - किरण सी चारों ओर ,
सप्त सिंधु के तरल कणों में
द्रुम-दल में आनंद विभोर।
शक्ति रही हां शक्ति- प्रकृति थी पद- तल में विनम्र विश्रांत ,
कंपती धरणी उन चरणों से होकर प्रतिदिन ही आक्रांत ।
स्वयं देव थे हम सब तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि ?
अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।
गया, सभी कुछ गया, मधुरतम सुर-बालाओं का श्रृंगार,
उषा ज्योत्सना- सा यौवन -स्मित मधुप- सदृश निश्चिंत विहार।
भरी वासना सरिता का वह कैसा था मदमत्त प्रवाह,
प्रलय जलधि में संगम जिसका देख हृदय था उठा कराह।"
चेंज ओवर म्यूजिक
स्त्री स्वर -
चिरकिशोर वय के वरदान से विभूषित, अमर, देव गण जिनके शरीर से निकलने वाली सुरभि से दिग दिगंत सुवासित होते थे आज वे देवता कहां तिरोहित हो गए और आज कहां चला गया उनका कभी न समाप्त होने वाला बसंत? कहां तिरोहित हो गया वो बसंत?
फूलों से भरे उपवन में प्रसन्नता पूर्ण उल्लासमय प्रेमालिंगन में लीन देवों नके लिए किन्नर गन्धर्वों के गायन-वादन पर बजने वाली बीन की सुरलहरियों का भी पता नहीं! सुरबालाओं के हाथों में कंगन की खनक, पैरों में पायल के घुंघरूओं की झनकार, हृदय पर सुशोभित फूलों के हार और उनके गीतों पर सुर लहरियों का मुखरित होता अभिसार कहां खो गया? फूलों की सुगंध धरती से अंतरिक्ष तक सुवासित होती थी तो वहीं अधीर आलोक के साथ हर जड़ - चेतन अवयव में एक गति होती थी, जिसमें हवाएं भी मिलजुल कर क्रीडा करती थी। अब वह सब आनंद का अनुभव पीड़ा में बदल गए हैं।
नर्तक नर्तकियों का नाचना- गाना मधुकर के मदन उत्सव और मद के प्यासे देवों का मदिर भाव युक्त उनकी वाणी, नैनों में अलस और अनुराग , कपोलों में लज्जा की लालिमा और कल्पवृक्ष का पीला पराग जैसे सब वासनाओं के प्रतिनिधि मुरझा कर चले गए और ये सब देवगण अपने ही पाप की अग्नि में जलकर नष्ट हो गए!
सुर सुरभि मय बदन अरुण, वे नयन भरे आलस अनुराग ,
कल कपोल था जहां बिछलता, कल्पवृक्ष का पीत पराग।
विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाए चले गए,
आह जले अपनी ज्वाला से, फिर वे जल में गले गए"...
गायन /नृत्य .....
(समाप्त)
[07/12, 14:31] Mohan Dhanraj: कामायनी- भाग 2
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कामायनी के पिछले एपिसोड में हमने इसकी भाव भूमि पर एक विहंगावलोकन किया। इस अंक में हम थोड़ी सी चर्चा इस महाकाव्य के शिल्प पर भी करना चाहेंगे। इस महाकाव्य के अलग-अलग सर्गों में अलग-अलग छंदों का प्रयोग किया गया है। भाषा संस्कृतनिष्ट खड़ी बोली के साथ कहीं-कहीं देशज शब्दों को भी स्वीकार करती है जिससे इसका भाषायी सौंदर्य तो बढ़ता ही है साथ ही इसकी संप्रेषणीयता भी अधिक सटीक हो जाती है। इस महाकाव्य में बिंब विधान, रुपात्मकता और अलंकार विधान अत्यंत आकर्षक हैं। प्राय: अनुप्रास, रूपक, यमक, श्लेश और प्रश्नालंकारों की झड़ी लगी हुई दीख पड़ती है। इसकी कथा अपने आप में अपूर्व और अभूतपूर्व है जिसमें विषाद, श्रृंगार में मिलन, विरह,वात्सल्य और करुण जैसे रसों से आपूरित है यह महाकाव्य! वाचनात्मकता से अधिक यह दृश्य प्रधान है जिसमें इसके बिंब विधान इसमें अकल्पनीय सौंदर्य की सृष्टि करते हैं। यह एक संस्कृति की उत्पत्ति और उसके उत्कर्ष की कथा है जो सनातन संस्कृति के नाम से अभिहित है। यही हमारे आज के जीवन का आधार है। अतः इसकी दर्शनिकता पर भी विचार करना आवश्यक है। यह एक उच्चतर मानव मूल्यों की संवाहक है। पिछले हजारों साल के विकास क्रम में ये हर युग में विचारशील मानव के चिंतन पर खरी उतरी है। जहां आवश्यक हुआ है वहां इसने अपने रूप बदले भी इसलिए इसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। समय-समय पर नवाचारों को अपनाते हुए इसने अपने आप को प्रासंगिक बनाए रखा है। सनातन के साथ भारत की समावेशी संस्कृति हर पल में कालजयीऔर अमर है। सर्व हितकारिणी है। सनातन संस्कृति अन्नमय, मनोमय, से प्राण मय जगत के रूप में तीनों लोकों की महा यात्रा करती है और स्थूल से सूक्ष्मतम के सफर में देह से आत्म और आत्मा से ईश्वर में तिरोहित होकर मोक्ष तक ले जाने के सन्मार्ग को संपूर्णता के साथ निर्वहन करती है। (संगीत)
लेकिन वहां पहुंचने से पहले इसके संघर्ष की कहानी अभी बाकी है। अभी बाकी है मनु का नैराश्य भाव , देव संस्कृति के उत्कर्ष पर जाकर मिटने की कथा और जलप्लावन के बाद उनकी चिंता का शमन ! यह शमन कामायनी के चिंता सर्ग में आगे बढ़ता है- कुछ इस तरह: हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ अपनी चिंता में निमग्न मनु देव संस्कृति के उत्कर्ष को कालकवलित होने के कथानक को याद करते हुए उन घटनाक्रमों पर चिंतातुर हो रहे हैं-
संगीत.….
अरी उपेक्षा भरी अमरते, रीअतप्ति! निर्वाध विलास!
द्विधा रहित अपलक नयनों की भूख भरी दर्शन की प्यास
बिछड़े तेरे सब आलिंगन पलक स्पर्श का पता नहीं,
मधुमय चुंबन
कातरताएं आज न मुख को सता रही।
रत्नशोध के वातायन जिनमें आता मृदु मधुर समीर
टकराती होगी अब उनमें तिमिंगलों की भीड़ अधीर।
देव कामिनी के नयनों से, जहां नील नालिनों की सृष्टि,
होती थी अब वहां हो रही प्रलय कारिणी भीषण वृष्टि !
वे अम्लान -कुसुम- सुरभित -मणि- रचित मनोहर मालाएं
बनी श्रृंखला, जकड़ी जिनमें विलासिनी सुरबालाएं ।
देव -वजन के पशु यज्ञों की वह पूर्णाहुति की ज्वाला,
जलनिधि में बन जलती कैसी ,आज लहरियो की माला।
उनको देख कौन रोया यूं अंतरिक्ष में बैठ अधीर,
व्यस्त बरसने लगा अश्रमय यह प्रालेय हलाहल नीर ।
हाहाकार हुआ कंदनमय,
कठिन कुलिश होते थे चूर।
हुए दिगंत बधिर भीषण रव बार-बार होता था क्रूर ,
दिग्दाहों से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के ।
सघन गगन में भीम प्रकंपन झंझा के चलते झटके।
अंधकार में मलिन मित्र की धुंधली आभा लीन हुई ।
वरुण व्यस्त थे घनी कालिमा स्तर - स्तर जमती पीन हुई ।
पंचभूत का भैरव मिश्रण, शंपाओं के शकल निपात,
उल्का लेकर अमर शक्तियां खोज रही जो खोया प्रात ।
बार-बार उस भीषण रव से कंपती धरती देख विशेष,
मानो नील व्योम उतरा हो, आलिंगन के हेतु आशेष।
उधर गरजती सिंधु लहरियां कुटिल काल के जालों सी, चली आ रही फेन उगलती फन फैलाए व्यालों सी।
धंसती धरा धधकती ज्वाला ज्वालामुखियों के निश्वास,
और संकुचित क्रमशः उसके अवयव का होता था ह्रास।
सबल तरंगाघातों से उसे क्रुद्ध सिंधु के विचलित सी-
व्यस्त महाकच्छप सी धरणी ऊभचूभ सी विकलित सी।
बढ़ने लगा विलास बेग सा ,
वह अति भैरव जल संघात,
तरल तिमिर से प्रलय पवन का होता आलिंगन प्रतिघात।
वेला क्षण-क्षण निकट आ रही क्षितिज क्षीण फिर लीन हुआ ,
उदधि डुबा कर अखिल धरा को बस मर्यादाहीन हुआ ।
करका क्रंदन करती गिरती और कुचलना था सबका,
पंचभूत का यह तांडव मय नृत्य हो रहा था कब का।
एक नाव थी और उसमें डांडे लगता या पतवार, तरल तरंगों में उठ गिरकर बहती पगली बारंबार।
लगते प्रबल थपेड़े धुंधले तटका था कुछ पता नहीं,
कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं।
लहरें व्योम चूमती उठती चपलाएं असंख्य नचती,
गरल जलद की खड़ी झड़ी में बूंदे निज संसृति रचती।
चपलाएं उस जलधि विश्व में स्वयं चमत्कृत होती थी, जो विराट बाड़व ज्वालाएं खंड-खंड हो रोती थी। जलनिधि के तलवासी जलचर विकल निकलते उतराते, हुआ विलोड़ित गृह तब प्राणी कौन कहां कब सुख पाते ।
घनी भूत हो उठे पवन, फिर सांसों की गति होती रुद्ध,
और चेतना थी
बिलखाती, दृष्टि विफल होती थी क्रुद्ध।
उस विराट आलोड़न में ग्रह तारा बुद बुद से लगते,
प्रखर प्रलय- पावस में जगमग,
ज्योतिरिंगणों से जागते।
प्रहर दिवस कितने बीते, अब इसको कौन बता सकता,
इनके सूचक उपकरणों का चिन्ह कोई पा सकता।
काला शासन चक्र मृत्यु का, कब तक चला ना स्मरण रहा ,
महामत्स्य का एक चपेटा दीन पोत का मरण रहा। किंतु उसी ने ला
टकराया उत्तर गिरि के शिर से।
देव सृष्टि का ध्वंस अचानक, श्वास लगा लेने फिर से ।
आज अमरता का जीवित हूं मैं वह भीषण जर्जर दंभ,
आह! सर्ग के प्रथम अंक का अधम- पात्र मय सा विषकंभ।
ओ जीवन की मरु-मरीचिका, कायरता के अलस विषाद!
अरे पुरातन अमृत! अगतिमय मोह मुक्त जर्जर अवसाद।
मौन! नाश! विध्वंश! अंधेरा! शून्य बना जो प्रकट अभाव ,
वही सत्य है, अरी अमरते! तुझको यहां कहां अब ठांव।
मृत्यु अरी चिर निद्रे!
तेरा अंक हिमानी सा शीतल,
तू अनंत में लहर बनाती काल जलधि की सी हलचल।
महानृत्य का विषम सम अरी, अखिल स्पंदनों की तू माप ,
तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप।
अंधकार के अट्टहास सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य,
छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुंदर रहस्य है नित्य। जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घन-माला में सौदामिनी संधि सा सुंदर, क्षण भर रहा उजाला में।
पवन पी रहा था शब्दों को निर्जनता की उखड़ी सांस,
टकराती थी, दीन प्रतिध्वनि बनी हिमशिलाओं के पास।
धू - धू करता नाच रहा था अनस्तित्व का तांडव नृत्य,
आकर्षण विहीन
विद्युत्कण बने भरवाही थे भृत्य।
मृत्यु सदृश शीतल निराश ही आलिंगन पाती थी दृष्टि ,
परम व्योम से भौतिक कण सी घने कुहासों की थी वृष्टि।
वाष्प बना उड़ता जाता था, या वह भीषण जल संघात,
सौर चक्र में आवर्तन था प्रलय निशा का होता था प्रात !