Thursday 23 2025

मेरे शब्दों पर मत जाना

 मेरे शब्दों पर मत जाना

--------------------

कोई बहुत खूबसूरत सी 

बात कहने के लिए

बहुत सुंदर शब्दों का चुनाव करके मैं 

उन शब्दों की लीक पर  चलकर देखता हूं तो 

मेरे भाव जहां पहुंचे

 ऐसे लगा जैसे

 कोई पत्र सही पते पर ना पहुंचा ,अपनी राह भटक गया हो !

मैंने फिर से सोचा

 शब्दों की लीक पर चलकर अगर 

अपनी बात 

कही जा सकी होती तो व्याकरणाचार्य पाणिनि अथवा 

 फादर कामिल बुल्के दुनिया के सबसे अच्छे प्रेमी रहे होते, क्योंकि उनके पास 

सबसे अधिक शब्द थे और वो सभी शब्दों के

सही अर्थ जानते थे! लेकिन यह भी ना हुआ

सबसे अच्छे प्रेमी तो लैला मजनू 

शीरी फरहाद 

और 

सोहनी महिवाल हुए थे! 

 लेकिन मेरे मन का संशय  और अकुलाहट अभी भी खत्म नहीं होती !

 जिन शब्दों का मैं 

प्रयोग कर रहा हूं 

 देखता हूं कि वे शब्द मुझे अभी भी वहां नहीं ले जा पाए हैं 

जहां मैं जाना चाहता हूं।

इस बात की बेचैनी है कि ये शब्द इतने लाचार आज क्यों है ?

इसी बात से यह 

समझ में आता है कि सृष्टि में ईश्वर की 

सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति शब्दों की राह अपने उच्चतम शिखर तक पहुंच पाने में असमर्थ क्यों है?

शब्दों के रास्ते आदर्श प्रेम को 

आज तक ऐसे नहीं पा सका 

जिस तरह चंद्रमा ने चांदनी को 

सूरज ने किरण को

 पाया है !

आज शब्दों ने मेरे मन को एक प्रकार की लाचारी से भर दिया है ।

और आज मैं जो कहना चाह रहा हूं वह शब्दों के द्वारा कह नहीं पा रहा हूं 

ये भाषा के सामने 

एक चुनौती है 

कि वो कितनी भी खूबसूरत क्यों ना हो 

वह अपने मुकाम तक तब तक नहीं पहुंच सकती ,

जब तक उसमें  भाव ना हों!

शब्द और अर्थ के द्वंद्व में मैं आज कुछ समझ ना पाने की स्थिति में 

तुमसे कहता हूं कि तुम मेरे शब्दों पर मत जाना मैं शब्द शब्द कहूंगा

 तुम भाव भाव समझना हो सके तो तुम मेरी आंखों की तरफ देखना मेरे चेहरे को पढ़ लेना 

मेरे शब्दों पर मत जाना क्योंकि हो सकता है कि जब मेरा भरोसा शब्दों पर से उठ ही गया है तो क्या पता मैं तुम्हें शब्दों से 

वो जज्बात ना कह पाऊं 

जो शब्दों की लीक पर चलकर कह पा रहा हूं 

या तुम वह बातें 

समझ ना पाओ

और तुम भी अपने 

पते से भटके हुए 

पत्र की तरह वापस मेरे पास तक 

शब्दों की लीक पर चलकर आ न सको!

Thursday 12 2024

कामायनी

 [07/12, 10:07] Mohan Dhanraj: कामायनी 

--------


सनातन संस्कृति के उद्भव से पूर्व देव संस्कृति उच्चतम स्तर से महा प्रलय को अभिशप्त होने और फिर पश्चात के महा घटनाक्रमों में श्रद्धा , इड़ा और कुमार के माध्यम से सनातन संस्कृति की कहानी एक रूपकात्मक सच्चाई जान पड़ती है। जब मानव आज के विकास क्रम को अपनी संस्कृति से जुड़कर देखता है तो वो उसकी गर्वीली ऊंचाइयों की जड़ें इतिहास, कालक्रम और घटनाओं में तलाश करने के पश्चात मनोविज्ञान और दर्शन में प्रवेश कर जाता है। कामायनी में महाकवि जयशंकर प्रसाद इसी इतिहास को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाते हैं जहां से हम सनातन संस्कृति के आगे बढ़ाने की कल्पना को सच्चाई के धरातल पर देख पाते हैं ।कामायनी में जयशंकर प्रसाद कहानी के उत्पत्ति की कथा बताते हुए लिखते हैं कि "शतपथ ब्राह्मण के आठवें अध्याय में यह उल्लेख मिलता है कि मनु ने ही मानवों के लिए देव संस्कृति से उच्चतर सनातन संस्कृति की कल्पना की क्योंकि उन्होंने यह समझ लिया था कि देव संस्कृति अपनी किन कमियों के कारण पराभव को प्राप्त हुई थी। मनु भारतीय सांस्कृतिक , इतिहास के आदि पुरुष हैं । राम, कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं । शतपथ ब्राह्मण में इन्हें श्रद्धा देव कहा गया है। "श्रद्धादेवो वै मनु:"। भागवत में इन्हीं श्रद्धा और मनु से मानवीय सृष्टि का प्रारंभ माना जाता है। "तत्मनु: श्रद्धादेव इति संज्ञामास भारत " ।

मनु और श्रद्धा की कथा का उल्लेख छांदोग्य उपनिषद ऋग्वेद में भी मिलता है। श्रद्धा वाले सूक्त में सायण ने श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है, "काम गोत्रजा श्रद्धानामर्शिका" ।

श्रद्धा कामदेव की बालिका है इसलिए इसे "कामायनी" भी कहा जाता है। जप्लावन से संबंधित बहुत कुछ वैदिक साहित्य में है, किंतु वह बिखरा हुआ है। जलप्लावन का अध्याय शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड के आठवें अध्याय में मिलता है, जिसमें उनकी नाव उत्तर गिरि के हिमवान प्रदेश में पहुंचने का प्रसंग मिलता है।

आगे की कथा को समझने के लिएआईए साक्षात्कार करते हैं कामायनी का-


(धरती पर जलप्लावन समाप्त हो रहा है,

 पेड़ों में हरियाली, फूलों का खिलना, रंग-बिरंगे पंछियों का आना) सॉफ्ट, सोलफुल, मॉर्निंग फ्ल्यूट/ संतूर वादन पुरुष स्वर - प्रकृति का यह मनोरम रूप अब से पहले ऐसा नहीं था

 एक विप्लव के गर्भ से जन्मा है यह प्रकृति का संगीत 

घोर विप्लव, भीषण भूकंप, तूफान, आंधियां बर्फीली हवाओं, जहरीली बारिश,

उल्कापात, ओलावृष्टि के बाद जब सब कुछ काल के गाल में समा गया तब आई प्रकृति और पुरुष के मिलन की यह

 नयनाभिराम झांकी।

(विप्लव का दृश्य फिर धीरे-धीरे आरंभ होता है.... क्लाइमेक्स पर जाकर ठहरता है...)


 पुरुष स्वर-

 हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छांह 

एक पुरुष भीगे नैनो से देख रहा था प्रलय प्रवाह नीचे जल था ऊपर हिम था एक तरल था एक सघन

 एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन 

दूर-दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय सामान 

नीरवता-सी शिला चरण से, टकराता फिरता  पवमान 

तरुण तपस्वी सा वह बैठा साधन करता सुर-श्मशान

  नीचे प्रलय सिंधु लहरों का होता था सकरुण अवसान 

उसी तपस्वी से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े 

हुए हम धवल जैसे पत्थर बनकर ठिठुरे रहे अड़े 

अवयव की दृढ़ मांसपेशियां ऊर्जस्वित  था वीर्य्य अपार

 स्फीत शिराएं स्वस्थ रक्त का होता था जिन में संचार 

चिंता कातर बदन हो रहा पुरुष जिसमें हो रहा  पौरुष जिसमें ओतप्रोत  उधर अपेक्षा में यौवन का बहता भीतर मधुमय स्त्रोत

 शब्दों के उतार-चढ़ाव के साथ मनु के चेहरे, मन और उनकी देह की बेचैनी का फिल्मांकन.... संगीत का और तेज होना.... भावों का और संघनित होना

 (वाचन को प्रभावी बनाते हुए)

 

 बंधी पहावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही उतर चला था वह जल प्लावन और निकलने लगी मही

 निकल रही थी मर्म वेदना करुण विकल कहानी सी 

वहां अकेली प्रकृति सुन रही हंसती सी पहचानी सी..

(प्रकृति स्त्री की विजयी हंसी का स्वर )

पुरुष स्वर -

इस महाजलप्लावन की विशाल जल राशि को जिस नाव पर बैठकर मनु बिना डांडे और पतवार के  यहां हिमालय की पर्वत चोटियों पर आए थे उसे अब एक वृक्ष से बांध दिया था।  उसके आसपास अब जल उतर गया था धरती दिखाई देने लगी थी। इतने दिनों बाद धरती का दिखाई देना ऐसा लग रहा था मानो वो करुण वेदना में  अपनी दुख भरी कथा सुना रही हो और प्रकृति अकेली उसकी इस मर्म भेदी व्यथा को सुन रही थी और देव संस्कृति के द्वारा प्रकृति की सीमा लगने के कारण जल प्लावन से दंडित करके उनके हाल पर अब वो हंसे जा रही थी। प्रकृति की ये हंसी बहुत जानी पहचानी सी हंसी इस बात की याद दिला रही थी कि प्रकृति मनुष्यों को अनंत काल तक अभय दान नहीं दे सकती। उसके दोहन की एक सीमा रेखा है जिसे पार करने के बाद वह कभी भी धरती वासियों को  कोप भजन बना सकती है।


(तांडव संगीत)


ओ चिंता की पहली रेखा, अरी विश्व-वन की ब्याली ,

ज्वालामुखी स्फोट के भीषण प्रथम कंप-सी मतवाली!

 हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खल लेखा!

 हरी- भरी- सी दौड़ धूप ओ जल माया की चल लेखा!

 इस ग्रह कक्षा की हलचल- री तरल गरल की लघु लहरी,

 जरा अमर जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बाहरी!

अरी व्याधि की सूत्रधारिणी

 अरी आधि मधुमय अभिशाप!

 हृदय गगन में धूमकेतु सी, पुण्य सृष्टि में सुंदर पाप!

 मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चिंत जाति का जीव-

 अमर मारेगा क्या?

 तू कितनी गहरी डाल रही है नीव!

 आह घिरेगी हृदय- लहलहे- खेतों पर 

करका घन सी,

 छिपी रहेगी अंतरतम में सबके तू निगूढ़ धन सी! बुद्धि, मनीषा, मति, आशा, चिंता तेरे हैं कितने नाम!

 अरी पाप है तू, जा, चल ।जा यहां नहीं कुछ तेरा काम

 विस्मृति आ, अवसाद घेर ले, नीरवते! बस चुप कर दे, 

चेतनता चल जा, जड़ता से आज शून्य मेरा भर दे।"

 चिंता करता हूं मैं जितनी उस अतीत की उस सुख की ,

उतनी ही अनंत में बनती जाती रेखाएं दुख की। आह सर्ग के अग्रदूत! तुम असफल हुए, विलीन हुए

  भक्षक या रक्षक जो समझो, केवल अपने मीन हुए।

 अरी आंधियों, ओ बिजली की दिवा रात्रि, तेरा नर्तन,

 उसी वासना की उपासना, वह तेरा प्रत्यावर्तन!

 मणि-दीपो के अंधकार मय अरे निराशा पूर्ण भविष्य!

 देव-दंभ के महामेध में सब कुछ ही बन गया हविष्य।

 अरे अमरता की चमकीले पुतलो! तेरे वे जयनाद-

 कांप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बनकर

मानो दिन विषाद।

 प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में ,

भोले थे हां तिरते केवल सब विलासिता के नद में।

 वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार -

उमड़ रहा था देव - सुखों पर दुख जलधि का नाद अपार "


"वह उन्मत्त विलास हुआ क्या! स्वप्न रहा या छलना थी!

 देव सृष्टि की सुख- विभावरी ताराओं की कलना थी ।

चलते थे सुरभित अंचल से जीवन के मधुमय निश्वास ,

कोलाहल में मुखरित होता देव जाति का सुख विश्वास ।

सुख केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीय भूत हुआ इतना,

छाया पथ में नव तुषार का सघन मिलन होता जितना ।

सब कुछ थे स्वायत्त, विश्व के बल वैभव आनंद अपार ,

उद्वेलित लहरों - सा होता उस समृद्धि का सुख संचार ।

कीर्ति, दीप्ति, शोभा थी नचती अरुण - किरण सी चारों ओर ,

सप्त सिंधु के तरल कणों में 

द्रुम-दल में आनंद विभोर।

 शक्ति रही हां शक्ति- प्रकृति थी पद- तल में विनम्र विश्रांत ,

कंपती धरणी उन चरणों से होकर प्रतिदिन ही आक्रांत ।

स्वयं देव थे हम सब तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि ?

अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।

 गया, सभी कुछ गया, मधुरतम सुर-बालाओं का श्रृंगार,

 उषा ज्योत्सना- सा यौवन -स्मित मधुप- सदृश निश्चिंत विहार।

 भरी वासना सरिता का वह कैसा था मदमत्त प्रवाह,

 प्रलय जलधि में संगम जिसका देख हृदय था उठा कराह।"


चेंज ओवर म्यूजिक

 स्त्री स्वर -

चिरकिशोर वय के वरदान से विभूषित, अमर, देव गण जिनके शरीर से निकलने वाली सुरभि से दिग दिगंत सुवासित होते थे आज वे देवता कहां तिरोहित हो गए और आज कहां चला गया उनका कभी न समाप्त होने वाला बसंत? कहां तिरोहित हो गया वो बसंत?


फूलों से भरे उपवन में प्रसन्नता पूर्ण उल्लासमय प्रेमालिंगन में लीन देवों नके  लिए किन्नर गन्धर्वों के गायन-वादन पर बजने वाली बीन की सुरलहरियों का भी पता नहीं! सुरबालाओं के हाथों में कंगन की खनक, पैरों में पायल के  घुंघरूओं की झनकार, हृदय पर सुशोभित फूलों के हार और उनके गीतों पर सुर लहरियों का मुखरित होता अभिसार कहां खो गया? फूलों की सुगंध   धरती से अंतरिक्ष तक सुवासित होती थी तो वहीं अधीर आलोक के साथ  हर जड़ - चेतन अवयव में एक गति होती थी, जिसमें हवाएं भी मिलजुल कर क्रीडा करती थी। अब वह सब आनंद का अनुभव पीड़ा में बदल गए हैं। 

नर्तक नर्तकियों का नाचना- गाना मधुकर के मदन उत्सव और मद के प्यासे देवों का मदिर भाव युक्त उनकी वाणी, नैनों में अलस और अनुराग , कपोलों में लज्जा की लालिमा और कल्पवृक्ष का पीला पराग जैसे सब वासनाओं के प्रतिनिधि मुरझा कर चले गए और ये सब देवगण अपने ही पाप की अग्नि में जलकर नष्ट हो गए! 

सुर सुरभि मय बदन अरुण, वे नयन भरे आलस अनुराग ,

कल कपोल था जहां बिछलता, कल्पवृक्ष का पीत पराग।

 विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाए  चले गए, 

आह जले अपनी ज्वाला से, फिर वे जल में गले गए"...



      गायन /नृत्य .....  

         (समाप्त)

[07/12, 14:31] Mohan Dhanraj: कामायनी- भाग 2 

-----------------

कामायनी के पिछले एपिसोड में हमने इसकी भाव भूमि पर एक विहंगावलोकन किया।  इस अंक में हम थोड़ी सी चर्चा इस महाकाव्य के शिल्प पर भी करना चाहेंगे। इस महाकाव्य के अलग-अलग सर्गों में अलग-अलग छंदों का प्रयोग किया गया है। भाषा संस्कृतनिष्ट खड़ी बोली के साथ कहीं-कहीं देशज शब्दों को भी स्वीकार करती है जिससे इसका भाषायी सौंदर्य तो बढ़ता ही है साथ ही इसकी संप्रेषणीयता  भी अधिक सटीक हो जाती है। इस महाकाव्य में बिंब विधान, रुपात्मकता और अलंकार विधान अत्यंत आकर्षक हैं। प्राय: अनुप्रास, रूपक, यमक, श्लेश और प्रश्नालंकारों  की झड़ी लगी हुई दीख पड़ती है। इसकी कथा अपने आप में अपूर्व और अभूतपूर्व है जिसमें विषाद,  श्रृंगार में मिलन, विरह,वात्सल्य और करुण जैसे रसों से आपूरित है यह महाकाव्य! वाचनात्मकता से अधिक यह दृश्य प्रधान है जिसमें इसके बिंब विधान इसमें अकल्पनीय सौंदर्य की सृष्टि करते हैं। यह एक संस्कृति की उत्पत्ति और उसके उत्कर्ष की कथा है जो सनातन संस्कृति के नाम से अभिहित है। यही हमारे आज के जीवन का आधार है। अतः इसकी दर्शनिकता पर भी विचार करना आवश्यक है। यह एक उच्चतर मानव मूल्यों की संवाहक है। पिछले हजारों साल के विकास क्रम में ये हर युग में विचारशील मानव के चिंतन पर खरी उतरी है। जहां आवश्यक हुआ है वहां इसने अपने रूप बदले भी इसलिए इसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। समय-समय पर नवाचारों को अपनाते हुए इसने अपने आप को प्रासंगिक बनाए रखा है। सनातन के साथ भारत की समावेशी संस्कृति हर पल में कालजयीऔर अमर है। सर्व हितकारिणी है। सनातन संस्कृति अन्नमय, मनोमय,  से प्राण मय जगत के रूप में तीनों लोकों की महा यात्रा करती है और स्थूल से सूक्ष्मतम के सफर में देह से आत्म और आत्मा से ईश्वर में तिरोहित होकर  मोक्ष तक ले जाने के सन्मार्ग को संपूर्णता के साथ निर्वहन करती है। (संगीत) 

लेकिन वहां पहुंचने से पहले इसके संघर्ष की कहानी अभी बाकी है। अभी बाकी है मनु का नैराश्य  भाव , देव संस्कृति के उत्कर्ष पर जाकर मिटने की कथा और जलप्लावन के बाद उनकी चिंता का शमन ! यह शमन कामायनी के चिंता सर्ग में आगे बढ़ता है- कुछ इस तरह: हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ अपनी चिंता में निमग्न मनु देव संस्कृति के उत्कर्ष को कालकवलित होने के कथानक को याद करते हुए उन घटनाक्रमों पर चिंतातुर हो रहे हैं-

संगीत.….

अरी उपेक्षा भरी अमरते, रीअत‌प्ति! निर्वाध विलास!

 द्विधा रहित अपलक नयनों की भूख भरी दर्शन की प्यास

 बिछड़े तेरे सब आलिंगन पलक स्पर्श का पता नहीं, 

मधुमय चुंबन 

कातरताएं आज न मुख को सता रही।

 रत्नशोध के वातायन जिनमें आता मृदु मधुर समीर

 टकराती होगी अब उनमें तिमिंगलों की भीड़ अधीर।

 देव कामिनी के नयनों से, जहां नील नालिनों की सृष्टि,

 होती थी अब वहां हो रही प्रलय कारिणी भीषण वृष्टि !

वे अम्लान -कुसुम- सुरभित -मणि- रचित मनोहर मालाएं

 बनी श्रृंखला, जकड़ी जिनमें विलासिनी सुरबालाएं ।

देव -वजन के पशु यज्ञों की वह पूर्णाहुति की ज्वाला,

 जलनिधि में बन जलती कैसी ,आज लहरियो की माला।

 उनको देख कौन रोया यूं अंतरिक्ष में बैठ अधीर,

 व्यस्त बरसने लगा अश्रमय यह प्रालेय हलाहल नीर ।

हाहाकार हुआ कंदनमय,

 कठिन कुलिश होते थे चूर।

 हुए दिगंत बधिर भीषण रव बार-बार होता था क्रूर ,

दिग्दाहों से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के ।

सघन गगन में भीम प्रकंपन झंझा के चलते झटके।

 अंधकार में मलिन मित्र की धुंधली आभा लीन हुई ।

वरुण व्यस्त थे घनी कालिमा स्तर - स्तर जमती पीन हुई ।

पंचभूत का भैरव मिश्रण, शंपाओं के शकल निपात,

 उल्का लेकर अमर शक्तियां खोज रही जो खोया प्रात ।

बार-बार उस भीषण रव से कंपती धरती देख विशेष,

 मानो नील व्योम उतरा हो, आलिंगन के हेतु आशेष।

 उधर गरजती सिंधु लहरियां कुटिल काल के जालों सी, चली आ रही फेन उगलती फन फैलाए व्यालों सी।

 धंसती धरा धधकती ज्वाला ज्वालामुखियों के निश्वास,

 और संकुचित क्रमशः उसके अवयव का होता था ह्रास।

 सबल तरंगाघातों से उसे क्रुद्ध सिंधु के विचलित सी-

 व्यस्त महाकच्छप सी धरणी ऊभचूभ सी विकलित सी।

 बढ़ने लगा विलास बेग सा ,

वह अति भैरव जल संघात,

 तरल तिमिर से प्रलय पवन का होता आलिंगन प्रतिघात।

 वेला क्षण-क्षण निकट आ रही क्षितिज क्षीण फिर लीन हुआ ,

उदधि डुबा कर अखिल धरा को बस मर्यादाहीन हुआ ।

करका क्रंदन करती गिरती और कुचलना था सबका,

 पंचभूत का यह तांडव मय नृत्य हो रहा था कब का।

 एक नाव थी और उसमें डांडे लगता या पतवार, तरल तरंगों में उठ गिरकर बहती पगली बारंबार।

 लगते प्रबल थपेड़े धुंधले तटका था कुछ पता नहीं,

 कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं।

 लहरें व्योम चूमती उठती चपलाएं असंख्य नचती,

 गरल जलद की खड़ी झड़ी में बूंदे निज संसृति रचती।


चपलाएं उस जलधि  विश्व में स्वयं चमत्कृत होती थी, जो विराट बाड़व ज्वालाएं खंड-खंड हो रोती थी। जलनिधि के तलवासी जलचर विकल निकलते उतराते, हुआ विलोड़ित गृह तब प्राणी कौन कहां कब सुख पाते ।

घनी भूत हो उठे पवन, फिर सांसों की गति होती रुद्ध,

 और चेतना थी 

बिलखाती, दृष्टि विफल होती थी क्रुद्ध।

उस विराट आलोड़न में ग्रह तारा बुद बुद से लगते,

 प्रखर प्रलय- पावस में जगमग,

 ज्योतिरिंगणों से जागते।

 प्रहर दिवस कितने बीते, अब इसको कौन बता सकता,

 इनके सूचक उपकरणों का चिन्ह कोई पा सकता।

 काला शासन चक्र मृत्यु का, कब तक चला ना स्मरण रहा ,

महामत्स्य का एक चपेटा दीन पोत का मरण रहा। किंतु उसी ने ला 

टकराया उत्तर गिरि के शिर से।

 देव सृष्टि का ध्वंस अचानक, श्वास लगा लेने फिर से ।

आज अमरता का जीवित हूं मैं वह भीषण जर्जर दंभ,

 आह! सर्ग के प्रथम अंक का अधम- पात्र मय सा विषकंभ।

ओ जीवन की मरु-मरीचिका,  कायरता के अलस विषाद!

 अरे पुरातन अमृत! अगतिमय मोह मुक्त जर्जर अवसाद।

 मौन! नाश!  विध्वंश! अंधेरा! शून्य बना जो प्रकट अभाव ,

वही सत्य है, अरी अमरते! तुझको यहां कहां अब ठांव।

 मृत्यु अरी चिर निद्रे!

तेरा अंक हिमानी सा शीतल,

 तू अनंत में लहर बनाती काल जलधि की सी हलचल।

 महानृत्य का विषम सम अरी, अखिल स्पंदनों की तू माप ,

तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप।

 अंधकार के अट्टहास सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य,

 छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुंदर रहस्य है नित्य। जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घन-माला में सौदामिनी संधि सा सुंदर, क्षण भर रहा उजाला में।

 पवन पी रहा था शब्दों को निर्जनता की उखड़ी सांस,

 टकराती थी, दीन प्रतिध्वनि बनी हिमशिलाओं के पास। 

धू - धू करता नाच रहा था अनस्तित्व का तांडव नृत्य,

 आकर्षण विहीन

 विद्युत्कण बने भरवाही थे भृत्य।

 मृत्यु सदृश शीतल निराश ही आलिंगन पाती थी दृष्टि ,

परम व्योम से भौतिक कण सी घने कुहासों की थी वृष्टि।

 वाष्प बना उड़ता जाता था, या वह भीषण जल संघात,

 सौर चक्र में आवर्तन था प्रलय निशा का होता था प्रात !

ज़रूरी है

 ज़िन्दगी के लिए कुछ चाव हो

 ये ज़रूरी है 

गुनगुनी धूप के लिए 

जाड़े में 

लिबास मसरब भर हो

ये ज़रूरी है ।

धूप में चलते जाना है तो

राह में थोड़ी थोड़ी 

 छांव हो 

ये ज़रूरी है 

चाहते हो सोंधापन रोटी में 

तो पेट में थोड़ी भूख रक्खो ये

 ज़रूरी है 

प्यार में जो गर्मी चाहो

तो रिश्ते में थोड़ी दूरी रखना,

 ये ज़रूरी है 

बड़ी बड़ी खुशियों से क्या होगा 

छोटी छोटी खुशियों में खुशी हो, 

ये जरूरी है ।

धन दौलत माल खजाने में भी खुशी मिलती है ,

बस इन सब के लिए कुछ फकीरी हो,

 ये ज़रूरी है।

आनलाइन परीक्षा प्रणाली भ्रष्ट प्रणाली है ---------------------

 आनलाइन परीक्षा प्रणाली भ्रष्ट प्रणाली है 

---------------------


 दैनिक भास्कर, पटना के 15 नवंबर 2024 के अंक में प्रकाशित समाचार कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा में बैठने के लिए अभ्यर्थियों से 10-10 लाख की दलाली खाने वाला समाचार छपा है। इस समाचार के पश्चात पुलिस के द्वारा कुछ धर पकड़ की कार्यवाही करने का भी समाचार मिला है। इस संपूर्ण मामले में अगर देखा जाए तो सरकार की ओर से इस व्यवस्था में सुधार के लिए की गई किसी भी कार्यवाही के बारे में अब तक कुछ भी पता नहीं चलता। ऐसा नहीं है कि यह पहला समाचार है । इसके पहले भी केवल कर्मचारी चयन आयोग ही नहीं बल्कि सभी चयन अयोगों सहित ऑनलाइन होने वाली ज्यादातर परीक्षाओं में इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती रही है। पिछले दिनों मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट ) और इंजीनियरिंग में प्रवेश की परीक्षाओं में हुआ शोर शराबा किसी निर्णय तक नहीं पहुंचा। समय बीत गया लोग बातें भूल गए। इन परीक्षाओं का सीधा-सीधा मतलब यह है कि परीक्षा केंद्र संचालकों द्वारा मिली भगत करके इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। लेकिन यह बात आश्चर्य में डालती है कि सरकार इसको गलत मानकर इसमें ना किसी सुधार के लिए आगे आना चाहती है और ना ही परीक्षा केंद्र संचालकों के प्रति कोई ठोस कार्यवाही करती हुई दिखती है। सारी चिंता केवल परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों और उनके माता-पिता के चेहरे पर दिखाई देती है क्योंकि भविष्य तो उन्हीं का नष्ट हो रहा है। कुर्सी पर बैठे लोग या तो काम नहीं करना चाहते और या तो इस व्यवस्था अथवा अव्यवस्था जो भी नाम दिया जाए इससे उनको कोई लाभ प्राप्त हो रहा हैं इसलिए वह स्वयं  किसी भी प्रकार के सुधार की बात करना नहीं चाहते। यह बात हर व्यक्ति को स्पष्ट रूप से मान लेना चाहिए कि इसमें नौकरी देने वाली एजेंसियों का ही हित छुपा हुआ है।  वह परीक्षाएं ऑनलाइन इसलिए कराती है  ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे। 

यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि तकनीक का उपयोग अगर लाभकारी है तभी उस तकनीक का प्रयोग किया जाए। यदि तकनीक का प्रयोग आवश्यक नहीं है तो  उसका प्रयोग ना किया जाए। यहां ये बात भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि पिछले दिनों ऑनलाइन परीक्षा के पहले की व्यवस्था में ओएमआर शीट  पर परीक्षा होती थी जिसमें किसी भी प्रकार का घपला कभी नहीं देखा गया। अगर ओएमआर शीट और ऑनलाइन परीक्षा की व्यवस्था में लगने वाले समय, श्रम और सुविधा का मूल्यांकन किया जाए तो ओएमआर शीट से परीक्षा अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित और कम समय लेने वाली है । लेकिन ऑनलाइन परीक्षा से होने वाले छिपे हुए लाभ के कारण सरकार   ओएमआर शीट को नहीं लाना चाहती। दूसरी बात यह भी है कि भले ही ऑनलाइन परीक्षा थोड़ी अधिक सुविधा देती हो लेकिन यदि इस परीक्षा में इस प्रकार से हेराफेरी की जा रही है तो क्या इसे बंद नहीं कर देना चाहिए? 

परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए और परीक्षा को ईमानदार और पारदर्शी बनाने के नाम पर क्या यह देश ओएमआर शीट पर होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकता?   

 अगर हम ओएमआर शीट को प्रयोग कर सकते हैं तो इस प्रकार की परीक्षाओं में हर हालत में केवल ओएमआर शीट का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। परीक्षा केंद्रों के चयन और उन्हें परीक्षा कराने की जिम्मेदारी दिए जाने की प्रक्रिया की अगर जांच की जाए तो यही मालूम चलेगा कि परीक्षा केंद्रों का चयन अपात्र लोगों को ही किया जाता है। दूसरी बात यह भी है कि अगर  परीक्षा केंद्रों पर कंप्यूटर को किसी अन्य नेटवर्क से जोड़ने का खतरा सामने आ ही चुका है तो इस व्यवस्था को समाप्त करने के अलावा कोई अन्य रास्ता चुनना गलत होगा।

 अगर इस प्रकार की परीक्षाओं को जनता के प्रति जवाब देय बनाना है तो कंप्यूटर पर आधारित ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली से पूर्ण मुक्ति पाने की आवश्यकता है। पिछले कुछ दिनों से राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी एनटीए का नाम भी सामने आ रहा है। हमें यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता पड़ेगी कि जब परीक्षा आयोजित करने के लिए लोक सेवा आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, रेल सेवा आयोग, रेल भर्ती परिषद सहित तमाम तरह के चयन बोर्ड पहले से अस्तित्व में हैं तो एक नए विभाग एनटीए की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कर्मचारी चयन आयोग जैसे अन्य आयोग में कर्मचारी और अधिकारियों की संख्या बढ़ाकर उनके काम को और दक्ष बनाने में सरकार को क्या समस्या हो रही है? इन सारी बातों की तह में जाने पर एक ही बात समझ में आती है की शासन प्रशासन यह बात पूरी तरह से समझता है कि अव्यवस्था फैलाने से ही मनमानी करने के रास्ते खुलते हैं और सिस्टम में जितनी भी अव्यवस्थाएं की जाती है वह केवल परीक्षा प्रणालियों को मनमाने ढंग से संचालित कर अनाप-शनाप ढंग से पैसा बनाने के लिए ही की जाती है।

 राष्ट्रीय जल समर्थन पार्टी इस मामले में ऐसा मानती है कि देश के युवाओं के भविष्य को संवारने के लिए एक पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए। कर्मचारी चयन आयोग, रेल भर्ती परिषद , संघ और राज्य लोक सेवा आयोग जैसी परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों को और सुदृढ़ और शक्ति संपन्न बनाकर उनसे ही कार्य लिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी जैसी एजेंसियों को किसी भी हालत में परीक्षा की जिम्मेदारी नहीं दिया जाना चाहिए।देश के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना और परीक्षा की व्यवस्था को संदिग्ध बनाना युवाओं के साथ धोखा है। अतः इस परीक्षा को जनता के प्रति जवाब देय, ईमानदार और पारदर्शी बनाए रखने के लिए केवल कर्मचारी चयन आयोग, लोक सेवा आयोग, रेल सेवा आयोग जैसे विभाग और एजेंसियों को ही सुदृढ़ करके उन्हें ही परीक्षाएं आयोजित करने का काम दिया जाना चाहिए। इस संबंध में एक बात और बहुत आवश्यक है कि ऑनलाइन परीक्षा के बजाय ओएमआर शीट पर परीक्षा कराया जाना अधिक सुरक्षित है। अतः सरकार को ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली को बंद करके ओएमआर शीट पर ही परीक्षा आयोजित कराना चाहिए।

सकल घरेलू उत्पाद में जनता की हिस्सेदारी। ------------------

 सकल घरेलू उत्पाद में जनता की हिस्सेदारी।

------------------

सकल घरेलू उत्पाद में जनता का एक हक़ तो यह है कि वह अपने श्रम से देश की आमदनी में अपना हिस्सा जोड़ती है। फिर उस धन का देश को चलने वाली विभिन्न योजनाओं के लिए  जो बंटवारा होता है उसमें से किसको क्या मिलता है? प्रश्न यह है कि उसमें जनता की हिस्सेदारी कितनी और कहां है ? इस प्रश्न के जवाब बहुत से हो सकते हैं लेकिन आज हम यह बात करेंगे कि देश की समस्त कमाई का जनता की भलाई के लिए खर्च किस प्रकार किया जाता है ?

आमतौर पर इस प्रकार की बातचीत को स्पष्ट करने के लिए आंकड़ों का सहारा लिया जाता है । लेकिन इसे थोड़ाऔर आसानी से समझने के लिए केवल व्यावहारिकता के धरातल पर बात की जाए तो ठीक रहेगा।

सरकारी खजाने में प्राप्त धन से सरकार कल्याणकारी योजनाएं चलाती है और इन योजनाओं को चलाने के लिए सरकारी मशीनरी तैयार की जाती है, जिसमें विभिन्न प्रकार के सरकारी विभाग होते हैं। इन विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारी और अधिकारी नौकरी पाते हैं और अपने-अपने निर्धारित कर्तव्यों के आधार पर देश की सेवा और राष्ट्रीय उत्पादकता में अपना योगदान देते हैं। इस प्रकार सेवा में नियोजित होने से आम नागरिकों का शासन में योगदान होता है तो वहीं पर उन्हें देश की सेवा करने का अवसर मिलता है और उन्हें अपनी योग्यता को साबित करने का अवसर भी मिलता है। यह उनके सपनों को पूरा करने का भी मामला है। लेकिन सरकार की नजर में यह एक रोजगार सृजन की बात है। अगर इस नजर से भी देखा जाए तो यह अत्यंत ही पुनीत कर्तव्य होता है जिसे सरकार को बहुत ईमानदारी और पवित्रता के साथ अंजाम देना चाहिए।

 वर्ष 2000  आते आते शासन में शिक्षामित्र, स्वास्थ्य मित्र, सफाई मित्र के नाम पर कर्मचारियों की नियुक्ति में घालमेल आरंभ हुआ था, जो बाद में एड- हॉक और कैजुअल से होते हुए अब कॉन्ट्रैक्ट तक पहुंच चुका है। यहां ध्यान देने की बात ये है कि सरकार अब स्वयं डॉक्टर और इंजीनियर की भर्ती संविदा पर कर रही है। इस प्रकार चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसी विशेषज्ञता प्राप्त महंगी पढ़ाई करने वाले युवाओं की शिक्षा और डिग्री की बेकद्री केवल भारत में ही देखने को मिलती है। सामान्य स्नातक की डिग्री और परास्नातक  पढ़ाई का कोई मोल हमारे देश में अब नहीं रहा। देखें तो एक ही अस्पताल में एक मेडिकल ऑफिसर 60 हजार रुपये प्रतिमाह सैलरी पाता है दूसरा मेडिकल ऑफिसर 2 लाख रुपए प्रतिमाह पाता है। इसी प्रकार एक कार्यालय में एक क्लर्क ₹50 हजार प्रतिमाह पाता है और वही काम करने वाला एक दूसरा क्लर्क जो संविदा पर है वह ₹10 हजार ही पाता है। इस प्रकार प्रशासन में एड- हॉक, कैजुअल और अब कॉन्ट्रैक्ट पर सरकार चल रही है। अगर आप इनके काम का मूल्यांकन करना चाहें तो सरकार के द्वारा पिछले  वर्षों में किए गए कार्यों का मूल्यांकन करें। आप पाएंगे कि हर परीक्षा के पेपर लीक हो जाते हैं, अस्पतालों में क्या-क्या हो जाता है, दफ्तरों में फाइलें कौन सी कब कहां गुम हो जाती है, किसको कौन सा कॉन्ट्रैक्ट कब मिल जाता है, किन नियमों की अनदेखी हो जाती है यह पता नहीं चलता! यह परिणाम कैजुअल और कॉन्ट्रैक्ट पर होने वाली भर्तियों से होने वाले कार्य का नतीजा है। मुख्य मुद्दा इतना पेचीदा और संवेदनशील है जिस पर सरकार कभी कोई ईमानदार चर्चा नहीं करना चाहती। वर्ष 2014 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने पर ऐसी संभावना व्यक्त की गई थी कि भारत में कुल बच्चे जो स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, अगर उन्हें स्कूल भेजना है तो लाखों की संख्या में विद्यालय खोलने की आवश्यकता पड़ेगी। वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार का मूल्यांकन  आया है और अब यह पता चला है कि कुछ स्कूलों को बंद करके दूसरे स्कूलों में मिला दिया जाएगा ! यह निर्णय किन आंकड़ों के आधार पर लिए जाते हैं इसका पता नहीं चलता। अकेले शिक्षा विभाग में एक राज्य में लाखों पद खाली हैं। अगर सभी विभागों में सरकारी पदों को भरा जाए तो हर राज्य का राजस्व का एक बड़ा हिस्सा कर्मचारियों की तनख्वाह पर जा सकता है। यही पैसा बचाकर सरकार यह दावा करती है कि हमारी इकोनॉमी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। इन दोनों आंकड़ों को समानांतर रखकर विचार करने से इकोनॉमी के बढ़ने का सच बड़े आराम से सामने आ जाता है और तब इस ढोल में केवल पोल ही पोल दिखाई पड़ता है।

 इसी प्रकार केंद्र सरकार के पास वर्ष 2001 में 50 लाख से अधिक अधिकारी और कर्मचारी थे जिनकी संख्या अब 30 से 35 000 लाख तक पहुंच चुकी है। शेष 15 लाख पद केंद्र सरकार में खाली हैं जिन्हें भरने के लिए अभी तक केंद्र सरकार के पास कोई योजना नहीं है। इस प्रकार 15 लाख लोगों की भरती नहीं होने से जो युवा रोजगार से वंचित हो रहे हैं उनके प्रति सरकार की कोई जवाबदेही दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे युवा जो केंद्र सरकार की सेवा में जाकर अपने सपनों को साकार करना चाहते थे या अपनी महत्वाकांक्षा को फलीभूत होते देखना चाहते थे केंद्र सरकार के पास उनके सपनों को जगह देने के लिए कोई योजना नहीं है। ऐसी सरकार जिसको युवाओं के सपनों और उसके भविष्य की चिंता नहीं है उसके बारे में क्या कहा जा सकता है!

 यह जरूर है कि जिस देश के युवा का सपना मर जाएगा वह देश कितने दिनों तक बूढ़े नेताओं की नजर से आगे बढ़ने का सपना देखेगा यह कह पाना बहुत कठिन है। यहां पर आकर हम वापस सकल घरेलू उत्पाद में जनता के हिस्से की बात दोहराना चाहेंगे क्योंकि यह दोनों बातें आसपास रखकर समझा जाए तभी आम बोलचाल की भाषा में आम आदमी की सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी की बात को समझा जा सकता है। यहां पर यह भी समझा जा सकता है कि सरकार के द्वारा इकोनॉमी के तेजी से बढ़ने की सच्चाई कितनी सच्चाई है और कितनी हवा-हवाई ! यदि सरकार के पास रखी हुई समस्त पूंजी में से केंद्र सरकार के 15 लाख कर्मचारियों की सालाना सैलरी निकाल दी जाए तो सरकार की बचत और उसकी इकोनामी दोनों का मतलब समझ में आ जाएगा। इस प्रकार आंकड़ों का खेल जनता को भ्रम में डालने के लिए किया जाता है। जनता को भ्रम में ही डालने के लिए सरकारों के द्वारा रोजगार सृजन के कार्य को अनदेखा किया जाता है । सरकारों के द्वारा कैजुअल, एड-हाक और अनुबंध पर की जाने वाली भर्तियों से देश के युवाओं का भविष्य खतरे में पड़ता है। इन बातों को एक साथ रखकर समझना ही इस लेख का मूल मकसद है। यहीं पर राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी अपनी बात को स्पष्ट करना चाहती है कि देश में समस्याएं उतनी बड़ी नहीं है जितनी बड़ी करके उन्हें प्रदर्शित किया जाता है। देश की समस्या को केवल राजनेता हल नहीं कर सकते। सीमाओं पर राजनेता लड़ने नहीं जाते, अस्पतालों और स्कूलों में डॉक्टर और अध्यापक काम करते हैं और उन्हें वेतन देश के सकल घरेलू उत्पाद और सकल संग्रहित कर इत्यादि से दिया जाता है।  इसलिए सरकार को युवाओं का हिस्सा हजम करके मौजें उड़ाने का और झूठे वादे करने का कोई अधिकार नहीं है। उसे अपनी इस प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए।

Friday 01 2024

भोजपुरी फिल्मों के गीतकार महेंदर मिसिर

 

दोस्तों नमस्कार,

 फेयरफ्लिक्स इंटरटेनमेंट के फिल्मी बातों में आज हम आपको एक विशिष्ट गीतकार महेंद्र मिसिर के बारे में जानकारियां देंगे। महेंदर मिसिर भोजपुरी बोली के वो गीतकार हैं जिन्होंने बीसवीं और 21वीं सदी को अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रभावित किया है। तत्कालीन समाज की विसंगतियों के अलावा प्रेम उनका मुख्य विषय रहा जिसमें मिलन और विरह पर आधारित उनके गीत सीधे लोगों के दिलों में प्रवेश कर जाते हैं।

'पूर्वी सम्राट' और 'पुरबिया उस्ताद' की उपाधि से विभूषित, भोजपुरी लोक रास-रंग के चितेरे महेंद्र मिसिर पूर्वांचल के नामचीन शख्सियत हैं जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे। वो सिर्फ कलाकार ही नहीं बल्कि अंग्रेजों के विरुद्ध कड़ा युद्ध छेड़ने वाले एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाजसेवी और भविष्य दृष्टा कवि भी थे। भोजपुरी लोकगीतों की कहानी बिना महेंद्र मिसिर का नाम लिए पूरी नहीं होती। बॉलीवुड के शुरुआती दिनों में फिल्मों का निर्माण करते समय हिंदी या भोजपुरी का कोई बंटवारा नहीं था। उस समय फिल्म बनाने के समय जिस प्रकार की कहानी और टीम होती थी उस तरह से फिल्म बन जाती थी। यही कारण है कि उन दिनों भोजपुरी फिल्मों में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, और तलत महमूद जैसे दिग्गज कलाकारों ने अपनी आवाज दिया तो वहीं शैलेंद्र, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे बड़े गीतकारों ने गीत लिखे तो वहीं रवीन्द्र जैन और चित्रगुप्त जैसे संगीतकारों ने भोजपुरी फिल्मों में संगीत भी दिया। फिल्मों में महेंदर मिसिर और भिखारी ठाकुर के लिखे गीतों को आधार बनाकर कहानियां लिखी गई और उन गीतों को शामिल किया गया।

 बताया जाता है कि वर्ष 1958 के फिल्म समारोह में तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों को भोजपुरी में भी फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया था। उनके प्रस्ताव पर काम हुआ और वर्ष 1963 में पहली फिल्म जो भोजपुरी में बनी उसका नाम था "गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो"। भिखारी ठाकुर के नाटक विदेशिया पर आधारित इसी नाम से बनी फिल्म भी 1963 में बनी। बता दें कि भोजपुरी में कई नाटक और गीतों सहित कई पुस्तकों के लेखक भिखारी ठाकुर महेंदर मिसिर के समकालीन थे और उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है। गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो और विदेशिया के बाद तो भोजपुरी फिल्मों की लाइन लग गई और एक से बढ़कर एक फिल्में बनी। एक से बढ़कर एक कलाकार भोजपुरी फिल्मों में आए और उसे अपनी कला से समृद्ध किया। उन दिनों बनी फिल्मों में बिदेसिया, गंगा जइसन भौजी हमार, गंगा किनारे मोरा गांव, नदियां के पार जैसी बहुत सी फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं। तब से लेकर आज तक बनने वाली फिल्मों को और भोजपुरी के मशहूर गानों की सूची बनाई जाए तो यह पता चलता है कि भोजपुरी का बॉलीवुड में बहुत बड़ा दखल है।

  हमारी आज की बातचीत का विषय महेंद्र मिसिर हैं ।महेंद्र मिसिर के लिखे बहुत सारे गाने बॉलीवुड में स्टार गायकों ने गाया और बड़े संगीत कारों ने अपने संगीत से भोजपुरी बोलों में झंकार पैदा की।  

महेंद्र मिसिर का नाम आते ही भोजपुरी लोक रंग में प्रेम विरह, श्रृंगार वियोग और लालित्य जैसे कल्पनाओं का एक संसार बनता है। जहां संगीत , साज और रस का संगम दिखाई पड़ता है। बॉलीवुड के अलावा महेंद्र मिसिर के लिखे गीत गाने वाले भोजपुरी के सभी प्रमुख कलाकार शामिल हैं। उनके गाए गीतों की प्रसिद्धि महेंद्र मिसिर के नाम को लेकर आगे बढ़ रही है। महेंद्र मिसिर का जन्म 16 मार्च 1886 को बिहार के सारण जिले के मिश्रौलिया गांव में हुआ था। 26 अक्टूबर 1946 में उनका देहांत हुआ। इस प्रकार 60 वर्ष की उम्र तक वह भोजपुरी लोक साहित्य लोक संगीत और लोक परंपरा का संरक्षण और संवर्धन करते रहे। उन्हें "पूर्वी सम्राट" और "पुरबिया उस्ताद" की उपाधि दी गई थी। महेंद्र मिसिर के जीवन के विषय में लिखित जानकारी बहुत अधिक नहीं मिलती फिर भी भोजपुरी लेखक कपिल पांडे के उपन्यास "फुलसुंघी" और रामनाथ पांडे के उपन्यास "महेंद्र मिसिर" में उनके बारे में जानकारी मिलती है।    

 ऐसा माना जाता है कि महेंद्र मिसिर कविता, संगीत, एथलेटिक्स और समाज सेवा सहित अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाले संघर्ष में भी जी जान से लगे हुए थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे लेकिन भोजपुरी की सेवा में अपने आप को बराबर लगाए रखा।


 जैसा कि मैंने कहा कि उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती लेकिन देखा जाए तो उनके गीतों में ही उनकी विरासत बिखरी हुई मिलती है। 

तो दोस्तों यह थी भोजपुरी गीतों के रचयिता महेंद्र मिसिर के बारे में कुछ रोचक जानकारियां। हमें उम्मीद है कि आपको यह जानकारियां अच्छी लगी होंगी। अगर अच्छी लगी हैं तो हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब कर लीजिए और अब अपनी दोस्त सीमा शाही को इजाजत दीजिए।

 नमस्कार।

Thursday 31 2024

रिश्तो की सांप सीढ़ी"

 "रिश्तो की सांप सीढ़ी" का खेल ही रिश्तो की सच्चाई है। जीवन किसी का भी हो, भारतीय समाज में परिवार की मजबूत व्यवस्था के बीच यह खेल चलता रहता है फिर भी समाज जीवित है और परिवार भी चल रहे हैं । भारतीय समाज में ऐसा इसलिए भी है कि हमारे यहां परिवार होते हैं और परिवार के सदस्यों से अपेक्षाएं भी होती है। अपेक्षाओं पर कुछ खरे उतरते हैं तो कुछ अपेक्षाओं से दूर अपने ही लोगों से दुश्मनों जैसा सुलूक भी करते हैं। इन बातों के समानांतर विदेश में परिवार होते तो हैं लेकिन उनमें आपस में किसी से कोई अपेक्षा का भाव नहीं रहता। इसलिए कोई भी किसी से ना मतलब रखता है और ना ही उनके अच्छे बुरे में शामिल रहता है। अब इन दोनों की अपनी अलग-अलग अच्छाइयां हैं तो उनकी कमियां भी! विदेश में इन बातों की जरूरत महसूस होती है। भारत में यह बातें कहीं आवश्यक तो किसी के लिए अनावश्यक लगने लगती हैं। यहां पर उनका स्वार्थ जन्म लेता है। उसी के वशीभूत होकर एक दूसरे का नुकसान करते हैं कराते हैं और सांप सीढ़ी के खेल का जन्म होता है। यह एक विसंगति है और इस विसंगति के ऊपर केंद्रित श्री पन्नालाल 'असर' की पुस्तक "रिश्तो की सांप सीढ़ी" बेहतरीन ढंग से इस समस्या पर प्रकाश डालती हैं।

पुस्तक श्रीअसर जी की आत्मकथा के रूप में है और उनके पैतृक निवास से शुरू होती हुई आगे बढ़ती है। इस कहानी में उनके पैतृक स्थान की संस्कृति , लोकाचार विचार और व्यवहार का एक अद्भुत चित्रण है जो तत्कालीन समाज व्यवस्था की पहचान करने में मदद करता है। नई पीढ़ी जब कभी भी उस संस्कृति को जानना चाहेगी तो यह पुस्तक मददगार होगी या जब कभी नई पीढ़ी इसे पड़ेगी तो अपनी संस्कृति से उसका साक्षात्कार स्वयं हो जाएगा। इस अर्थ में पुस्तक की पहली सफलता यही है कि वह तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, संस्कृति और लोकाचार की एक मजबूत संवाहक है। यहां बड़े भाई राम दास पहलवान और भाभी गोमती की सादगी छोटे भाई और उसकी पत्नी नन्नी की अपनी जेठानी और जेठ तथा उनके बच्चों से बेरुखी आज के समाज की कड़वी सच्चाई है तो वही बाबू लाल सेठ और उनकी पत्नी भगवती की इस परिवार के प्रति सहानुभूति भी एक सच्चाई है जहां परिवार के लोग आपका नुकसान करते हैं तो वही गांव के लोग उनकी सहायता भी करके उनके जीवन यापन में मददगार होते हैं। यह हर घर परिवार की कहानी है, इसी प्रकार रामदास पहलवान के झांसी में डॉक्टर आनंद के द्वारा सहायता करना और उन्हें सवाईमाधोपुर की सीमेंट फैक्ट्री में पहलवानी का कोच बना देना एक उदार हृदय सामाजिक सदस्य के चरित्र को उजागर करता है और सवाईमाधोपुर में उनकी बढ़ती लोकप्रियता से जलने वाले पुराने कोच महावीर सिंह के मनोविज्ञान को भी तब के समाज में और आज के समाज में बखूबी देखा जा सकता है। यहां पर यह कोच रामदास पहलवान को अपहरण करके जिस तरह उनकी जिंदगी बर्बाद कर रहा है ऐसे उदाहरण हजारों पड़े हुए मिलते हैं और देश और समाज की संस्कृति को बदरंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

 थक हार कर सांप सीढ़ी के खेल का शिकार रामदास का परिवार वापस अपने गांव आकर नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरु करता है। इसमें धीरे-धीरे वह कामयाब भी होता है लेकिन तब तक रामदास की वापसी उनके परिवार के लिए संजीवनी के रूप में दिखती तो है लेकिन रामदास की नशे की लत फिर से उस परिवार के लिए सांप सीढ़ी का खेल शुरू करने की पृष्ठभूमि को जन्म देती है।

यही से प्रकाश कहानी में मुख्य पात्र की भूमिका में आता है । प्रकाश एक होनहार, सर्वगुण संपन्न, मेहनती और ईमानदार नौजवान है। प्रकाश अस्सी के दशक में संघर्ष करके आगे बढ़ने वाली युवा पीढ़ी का प्रतिनिधि भी है इसलिए उसके अंदर मेहनत करने के साथ समाज और देश की सेवा का जज्बा हिलोरें ले रहा है। अपने इसी जज्बे से प्रकाश आईटीआई की पढ़ाई के साथ-साथ बाजार में खिलौने बेच कर अपनी माता का हाथ बंटाता है। समय आने पर वो भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स भोपाल में परीक्षा पास कर के नौकरी ज्वाइन करता है। यहां पर प्रकाश अपनी मेहनत से अधिकारियों का कृपा पात्र बनने के साथ-साथ एक लोकप्रिय कलाकार भी बन जाता है। यह भी एक संयोग है कि प्रकाश आकाशवाणी से जुड़कर अपनी प्रतिभा को निखारता है। वह लोकगीत का कलाकार होने के साथ-साथ कवि और लेखक के रूप में भी अपने आप को स्थापित करता है। संदर्भ वश पुस्तक में आकाशवाणी के तत्कालीन केंद्र निदेशक श्री गुलाब चंद जी का उल्लेख आता है। श्री गुलाब चंद बाद में आकाशवाणी में 

अपर महानिदेशक के पद को सुशोभित किया। श्री गुलाब चंद स्वयं एक बेहतरीन अधिकारी और विद्वान साहित्यकार रहे हैं जिन्होंने अपने सेवा काल में बहुत सारे साहित्यकारों को मार्ग देकर बड़ा साहित्यकार बनने में मदद की है। इनके अतिरिक्त श्री कमल नारायण, श्रीयुत श्री राम, हीरालाल और श्री शंभू दयाल का ज़िक्र हुआ है जो उस समय आकाशवाणी के नामचीन और विद्वान अधिकारियों में अपना स्थान रखते हैं। श्री पन्नालाल 'असर' के लेखन कार्य को राज्य स्तर तक सराहना और सम्मान मिलता है जिससे कंपनी में तो उसका नाम होता ही है पूरे उत्तर प्रदेश में उसकी पहचान होती है । प्रकाश अपने घर परिवार के साथ समाज को भी लेकर आगे बढ़ता है। वो कंपनी की सांस्कृतिक टोली का भी नेतृत्व करता है। जो टोली तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नजर में आती है और उनकी प्रशंसा और सराहना प्राप्त करती है। यह उपलब्धि प्रकाश की टोली की उपलब्धि के साथ-साथ प्रकाश और भेल कंपनी की उपलब्धि मानी गई। इसके लिए कंपनी के द्वारा प्रकाश की बहुत सराहना हुई। प्रकाश की जिजीविषा की तारीफ की जानी चाहिए जब प्रकाश कैंसर से पीड़ित होकर भी एक बहादुर की तरह कैंसर को पछाड़ कर फिर से स्वस्थ होकर समाज में वापस आ जाता है। अपने साल की सेवा के उपरांत भेल से सेवानिवृत्ति तक प्रकाश का जीवन व्यक्तिगत रूप से सांप सीढ़ी के खेल में विजयी खिलाडी के रूप में उभर कर आता है जिसको निन्यानबे पर बैठा सर्प डंस नहीं पाता और सौ की गिनती पूरी करके विजयी बनता है। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि यह पुस्तक लेखक श्री पन्नालाल 'असर' के जीवन की कथा है। इस अर्थ में श्री पन्नालाल 'असर' सही मायने में एक नायक के रूप में भरते हैं जो अपने असली जीवन में सफल हो कर समाज को दिशा देने के लिए बेहतरीन साहित्य का सृजन भी करते हैं । यह सौभाग्य की बात है कि उन्हें पहचान दर पहचान मिलती चली जाती है। इस प्रकार पुस्तक "रिश्तो की सांप सीढ़ी" एक बेहतरीन आत्मकथा और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है ।

आशा है यह पुस्तक पाठकों के बीच अपना स्थान बनाएगी ।

श्री पन्नालाल 'असर' को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

भजकटया के फूल"

 काशी के वरिष्ठ कवि श्री सूर्य प्रकाश मिश्र के काव्य संकलन "भजकटया के फूल" पढ़ने का सौभाग्य मिला। संकलन के पृष्ठ क्रमांक 26 पर 'मीठा ज़हर' नाम की कविता पढ़ी और बस मन वहीं ठहर गया जब श्री सूर्य प्रकाश मिश्र अपनी कविता में कहते हैं "सुनी जाएंगी सभी की हर शिकायत, लग चुके हैं पोस्टर सारे शहर में।' 

इस कविता को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि अब आज की पढ़ाई खत्म, बाकी कल पढ़ेंगे। साधारण भाषा में कहें तो जैसे तृप्त होकर भोजन करने के बाद आपने एक लजीज़ पान की गिलौरी मुंह में रखा और उसके बाद कोई आपसे कह दे कि लीजिए रसमलाई खाईए तो आप यही कह सकते हैं कि भाई आज नहीं! अभी नहीं!! 

 साहित्य को पढ़ने के समय भी पाठक को कभी-कभी ऐसी तृप्ति का एहसास होता है जो एहसास इस कविता को पढ़कर मिला । इसी की और लाइनें बहुत खूबसूरत है "रात में तस्वीर की जब यह चमक है ,

क्या गजब ढाएगी चढ़ती दोपहर में।"

फिर आगे लिखते हैं "रोटियों की फसल अब जी भर उगेगी है बड़ा विश्वास 

इस मीठे ज़हर में ।"

और इस कविता की शुरुआत होती है जब इस पंक्ति से कि "हो गए चोरी चमकते ख्वाब सारे चांद आया रात के अंतिम पहर में।"

 यहीं से इस कविता को ध्यान से पढ़ने की बात मन में आती है और फिर यह पूरी की पूरी कविता मन को आनंद से भर देती है। इस संकलन में भाषा की सुंदरता, अलग-अलग रूपकों और अलंकारों का उपयोग इसे एक पठनीय काव्य संकलन बनाता है। गीतों में वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को चित्रित किया गया है जो बहुत ही सरलता से समझ में आता है। लेकिन इस सरलता में भी एक कठिनाई है कि आपको ध्यान से पढ़ना पड़ेगा। उदाहरण के लिए 'एक मुट्ठी ओस' कविता में श्री मिश्र कहते हैं कि "हवा पानी की वसीयत हो चुकी है

 हम महज अफसोस लेकर क्या करेंगे 

प्राण प्यासे हैं हमारी कोख से ही 

जी रहे सदियों पुराना घाव लेकर 

खो गया सूरज कहीं पर वादियों में 

जिसे आना था नया बदलाव लेकर 

 हवा पानी की वसीयत हो चुकी है 

हम आज अफसोस लेकर क्या करेंगे "

ये ऐसी रचनाएं हैं जो या तो हमारे मन की हताशा को जाहिर करती हैं या फिर हुक्मरान के निजाम से स्वाभाविक रूप से बरसते हुए अन्याय को सहती हुई जनता की बेबसी का बयान करते हैं । यहीं पर देखते हैं कि 'भूख का ऊंट' कविता में कहते हैं "धरती की बढ़ी जिम्मेदारी 

है ऊंट भूख का बहुत बड़ा 

जीरे सी है राहत सरकारी 

रोटी की फसल के ये अंकुर 

पनपे ना अगर मर जाएंगे 

मुश्किल में कटे या कटे सुख से 

पर दिन तो गुजर ही जाएंगे 

खेती के लिए कुछ कर न सकी 

पत्थर दिल निकली सरदारी

 है ऊंट भूख का बहुत बड़ा 

जीरे सी है राहत सरकारी ।'

इस प्रकार श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की पहले के काव्य संग्रह "कौवा पुराण", "दरबार ऊंघते खड़े रहे" के समानांतर काव्य संग्रह "भजकटिया के फूल" में भी संकलित कविताएं उनके इसी तेवर को बरकरार रखती है जो तेवर उनके पहले के संग्रह में देखने को मिलता है। मूल रूप से श्री मिश्र कमजोर, गरीब, मजदूर, स्त्री, बूढ़े जवान और किसान जैसे मूल मुद्दों पर अपनी कलम चलाते हैं और उनके लेखन का सबसे बड़ी विशेषता ये है कि आप शब्दों की व्यंजन में अपनी बात कह कर निकल जाते हैं और उनके गंभीर अर्थ भरे शब्दों को समझने के लिए उन्हें ध्यान से पढ़ना पड़ता है । इन सभी अर्थों में श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की काव्य कृति "भजकटिया के फूल" अपने आप में साहित्यिक सौंदर्य से परिपूर्ण बेहतरीन गीतों का संग्रह है। 

 उन्हें पढ़ते समय हमें भाषा और साहित्य का आनंद तो मिलता ही है साथ में हम आज के सरोकारों से भी परिचित होते चलते हैं। विसंगतियों से भी हमारा सामना होता है समाधान भी मिलते हैं। लेकिन हमारी समस्या ये है कि समाधान की तरफ हम केंद्रित नहीं होते। हां, एक व्यक्ति के रूप में हर किसी की मजबूरी हो सकती है कि वह पूरे सिस्टम या समाज को नहीं बदल सकता फिर भी अपने आप को बदलना तो हमारे हाथ में होता है। शायद साहित्यकार का सरोकार भी यही होता है कि कम से कम कोई एक व्यक्ति बदलेगा तो शुरुआत होगी‌। बदलाव की नीव रखना बदलाव को आगे बढ़ाना उसे एक रूप आकार देना यही साहित्य का अर्थ और साध्य है ।श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की रचना "भजकटिया के फूल" में संकलित सभी कविताएं अपने आप में बेहतरीन है और अच्छे भविष्य की तरफ ले जाने के लिए अच्छी मार्गदर्शक हैं ।विश्वास है कि पाठक उन्हें पढ़ेंगे और सराहेंगे।एक पाठक के रूप में मेरी ओर से श्री सूर्य प्रकाश मिश्र जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

अक्षय कुमार

 रील और रियल लाइफ, दोनों ही में जिसने महारत दिखाई और सच्चा खिलाड़ी बन गये उनका नाम है अक्षय कुमार । आज अक्षय कुमार के करियर से जुड़ी कुछ मजेदार बातें होगी फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें सेगमेंट में। आपके साथ यह बातचीत लेकर हाजिर हूं मैं सीमा शाही। स्वीकार कीजिए मेरा प्यार भरा नमस्कार ।


दोस्तों, 

इस असली खिलाड़ी का जीवन ऐसा कुछ है कि उनका खिलाड़ी होना हर तरह से जस्टिफाई होता है। उनका नाम खिलाड़ी नाम से बनने वाली कई फिल्मों के क्रेडिट से जुड़ा हुआ है।

90 के दशक में सुपर हिट फिल्में खिलाड़ी , मोहरा और सबसे बड़ा खिलाड़ी में अभिनय करने के कारण, अक्षय को बॉलीवुड के एक्शन हीरो के नाम से बुलाए जाने लगा। ऐसा नहीं है कि अक्षय कुमार केवल एक्शन फिल्में ही करते हैं । उनकी रूमानियत भरी फिल्मों की भी एक लंबी सूची है। जैसे "ये दिल्लगी" और "धड़कन"। शुद्ध अभिनय पर आधारित नाटक फिल्मों मैं भी अक्षय कुमार ने अपने अभिनय के झंडे गाड़े। "एक रिश्ता" उनकी अभिनय क्षमता को दिखाने वाली एक अच्छी फिल्म है तो वही उन्हें वर्ष 2002 में अच्छी नाटकीय प्रदर्शन वाली फिल्म "अजनबी" के लिए पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ खलनायक के लिए दिया गया। अक्षय कुमार ने अपने अभिनय से यह साबित किया कि वह एक सर्वगुण संपन्न कलाकार हैं जो एक्शन रोमांस नाटक के साथ-साथ हास्य पर आधारित फिल्में भी इसी कुशलता के साथ करते हैं। पिछले दिनों उनकी हास्य पर प्रदर्शित फिल्में "हेरा फेरी" उसके बाद इसी"हेरा फेरी-2 , वेलकम के साथ-साथ बहुत सी हास्य फिल्में हैं और अक्षय कुमार की वर्सेटाइल एक्टर की छवि को पुख्ता करती है। "मुझसे शादी करोगी" "गरम मसाला" और जान-ए-मन फिल्म में हास्य के लिए अक्षय के अभिनय की प्रशंसा हुई।

 सफलता की ऊचाईयों को छूने वाले अक्षय कुमार की लगातार चार कामर्सियल फिल्में हिट हुई। इस तरह से, उन्होंने अपने आपको हिन्दी फ़िल्म उद्योग में एक प्रमुख अभिनेता के रूप में स्थापित किया। अक्षय कुमार ने बैंकाक में मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण भी लिया है जहां वो एक रसोइया की नौकरी करते थे। 

फिल्मों में प्रवेश के शुरुआती दौर में अक्षय कुमार ने मॉडलिंग भी की।   

अक्षय कुमार का जन्म अमृतसर, पंजाब में हुआ। बॉलीवुड में रहने के दौरान, अक्षय कुमार का नाम रवीना टंडन, रेखा और शिल्पा शेट्टी जैसी बड़ी अभिनेत्रियों के साथ जुड़ा। जाने माने कलाकार राजेश खन्ना और डिम्पल कपाड़िया की बेटी ट्विंकल खन्ना से उनकी दो बार सगाई हुई । इसके बाद 14 जनवरी 2001 को शादी कर ली जिनसे उनका एक बेटा है जिसका नाम है आरव।

 खबर यह भी आई थी कि उनके कई अफेयर्स के चलते ट्विंकल खन्ना ने उनको थप्पड़ भी मारा था पर बाद में अक्षय कुमार ने खुद इन खबरों का खंडन किया।


अक्षय कुमार 145 से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम कर चुके हैं।


2007 में वे सफलता की ऊचाईयों को छूने लगे, जब उनकी लगातार चार कामर्सियल फिल्में हिट हुई। इस तरह से, उन्होंने अपने आपको हिन्दी फ़िल्म उद्योग में एक प्रमुख अभिनेता के रूप में स्थापित किया।  

     

1997 में, यश चोपड़ा की हिट फ़िल्म दिल तो पागल है में मेहमान कलाकार की भूमिका निभाई, जिसके लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार में उनका नामांकन हुआ। फ़िल्म हिट हुई। वर्ष 

 1999 में, अक्षय को फ़िल्म संघर्ष' और जानवर में उनके किरदार को दर्शकों ने खूब पसंद किया। 


   वर्ष 2001 में, फ़िल्म अजनबी में कुमार ने एक नकारात्मक किरदार निभाया। उनकी फ़िल्म को काफी सराहा गया तथा बेस्ट विलेन के लिए पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।

वर्ष 2007 अक्षय कुमार के कैरियर के लिए सबसे ज्यादा सफल वर्ष रहा। उनकी फिल्म "नमस्ते लंदन", कामर्शियल नजरिए से अच्छी और सफल रही। उनकी दो अन्य फिल्में 

"हे बेबी" और "भूल भुलैया" बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट हुई।   

    उनकी फिल्मे सेल्फी , रक्षाबंधन, पृथ्वीराज चौहान, बच्चन पांडे ,छोटे मियां बड़े मियां, राम सेतु आदि वर्ष 2020-21 के दौरान आई और चर्चित रही।

दोस्तों ये था फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का आज का अंक जिसमें हम सुपर खिलाड़ी, एक्शन हीरो और हास्य के पुरोधा अक्षय कुमार के बारे में बातें कर रहे थे। उनके बारे में कुछ और बातें फिर कभी । आगे के अंक में हम किसी अन्य कलाकार अथवा फिल्म की बातें लेकर फिर से आपके सामने हाजिर होंगे। तब तक के लिए सीमा शाही को अनुमति दीजिए और स्वीकार कीजिए मेरा नमस्कार।

Monday 21 2024

No Politics Please

No Politics Please 

xxxxxxxxxxxxcccx


इलाहाबाद विश्वविद्यालय/ अंडरग्रैजुएट ऐडमिशन/ स्टूडेंट की भीड़/

कोमल- एक्सक्यूज मी कैन यू प्लीज स्पेयर योर पेन फार मी?

प्रिंस- ओह, येस,,,

(पेन देता है)

कोमल- थैंक यू ! प्लीज वेट जस्ट फॉर ए मिनट। 

प्रिंस- नो प्रॉब्लम 

(कोमल अपना फॉर्म भरने लगती है, फिर उसे फॉर्म भरने में दिक्कत आती है तो वह रुक कर कुछ सोचने लगती है) 

प्रिंस-यू आर गोइंग टू टेक ऐडमिशन ?

कोमल-यस एंड यू?

प्रिंस - येस आई एम आल्सो गोइंग टू टेक ऐडमिशन इन बीए।

कोमल-ओह, दिस इस सरप्राइजिंगली गुड न्यूज़! एक्चुअली आई वांटेड टू डू बीए फ्रॉम कानपुर यूनिवर्सिटी । बट माय फादर सडेनली केम टू इलाहाबाद आन ट्रांसफर सो आई एम हिअर इन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी।

बातचीत करते हुए दोनों अपना फॉर्म भरते हैं। फॉर्म भरने के दौरान कास्ट का कालम आने पर कोमल अपनी कास्ट लिखती है तब प्रिंस को कोमल की ऊंची कास्ट का पता चलता है। जैसा उसने सुन रखा था कि यहां ऊंची जातियों के लोग सामाजिक व्यवस्था में निम्न मानी गई जातियों के साथ भेदभाव करते हैं और कम से कम उनसे मेलजोल तो नहीं ही रखते। इसलिए वह समझ गया था कि यह मित्रता बहुत लंबी नहीं चलने वाली है। हुआ भी वैसा ही। फॉर्म भरते समय जब प्रिंस ने अपनी जाति का नाम लिखा तो उसने यह महसूस किया कि कोमल कुछ ना कहते हुए भी अपनी आंखों से वह भाव नहीं छुपा सकी जो ऊंची जाति के लोगों का नीची मानी जाने वाली जातियों के लिए होता है। थोड़ा सा दुराव का भाव। 

     प्रिंस के पिता रामेश्वर मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर तैनात हैं और चाहते हैं कि प्रिंस अपने गांव में रहकर गांव की संपत्ति की देखभाल में अपने चाचा की मदद करे और साथ में दादा-दादी के साथ भी रहे। इसलिए उसे इलाहाबाद भेज दिया गया और वह भी खुशी-खुशी दादा दादी के पास रहने के लिए आ गया। उसके घर में माहौल कुछ ऐसा था जहां जात-पात का जिक्र नहीं होता था। लेकिन उसे इन बातों की जानकारी बराबर रहती थी इसके बारे में उसके पिता प्राय घर में बातों बातों में चर्चा कर दिया करते थे।

 कोमल कानपुर के एक कॉलेज से पढ़कर आई थी और उसे भी यहां की इस व्यवस्था मैं कोई बुराई दिखती नहीं थी।         

+++++++++++++++

आज की पहली मुलाकात में दोनों में थोड़ी सी जान पहचान हो तो जाती है जिसे प्रिंस आगे बढ़ाने के बारे में सोचता है लेकिन उसे मालूम है कि यह बात अब आगे नहीं बढ़ेगी। फिर भी दोनों में बातचीत शुरू हुई थी तो चलते समय एडमिशन टेस्ट के दिन मुलाकात करने का वादा करके दोनों अपने अपने घर चले जाते हैं।  

++++++++++++++

      

 एडमिशन टेस्ट के दिन प्रिंस का सेंटर सीनेट हॉल में था जब कि कोमल का परीक्षा केंद्र परीक्षा भवन में ही बनाया गया था। प्रिंस परीक्षा होने के बाद कोमल से मिलने के बारे में सोच रहा था लेकिन फिर कुछ सोचकर आगे बढ़ जाता है। हो सकता है यह भाव कोमल के मन में भी आए रहे हो कुछ कहा नहीं जा सकता। परीक्षा के बाद दोनों की काउंसलिंग संपन्न हुई और फिर क्लासेस स्टार्ट हुई । जैसा पहले अनुमान था कोमल और प्रिंस का अंग्रेजी का सेक्शन एक ही था । दोनों के सामने पड़ने पर थोड़ा सा नोटिस करते थे, कभी-कभी हेलो भी हो जाती थी लेकिन बात आई गई हो गई और फिर इन लोगों में बात बहुत आगे नहीं बढ़ी।

+++++++++---+++


अक्टूबर का महीना था। हल्की-हल्की ठंड शुरू हो रही थी। बादल साफ हो गए थे और आसमान एकदम नीला। सूरज की सुनहरी चमकदार किरणें, जब घास के तिनकों पर पड़ती तो ओस की बूंदों से अठखेलियां करती। उन पर इंद्रधनुष उग आते थे। यह इंद्रधनुष और सूरज की अठखेलियां बहुत लंबी नहीं चलती थी क्योंकि इनके अंदर एक छिपी हुई दुश्मनी भी होती थी जो घास के तिनके पर पड़ी आस को बहुत शीघ्रता से चट कर जाती थी । कभी-कभी शरारती हवाएं भी उसके कणों को मिट्टी में मिला देती थी। यह तय नहीं था कि पहले हवा आती थी या सूरज की किरणें उन्हें सुखा जाती थी। ऐसे ही पलों में प्रिंस यूनिवर्सिटी के सीनेट हाल के सामने ठीक उसी जगह पर अक्सर बैठ जाता था जहां उसने कोमल के साथ मिलकर एडमिशन फॉर्म भरे थे। उन पलों को याद करता वह खुद नहीं समझ पाता था कि इतनी खूबसूरत यादों को लेकर कोमल मन से कितनी दूर चली गई। हालांकि, वह उसको दिखाई तो रोज पड़ती थी मगर वो समझ नहीं पाता था कि वो दीवार कौन सी है जो उसे बातें करने से भी रोक देती है? ऐसे ही किसी दिन अटेंडेंस के समय कोमल का नाम बुलाए जाने पर कोई आवाज नहीं आई तो उसे लगा हो सकता है आज वह किसी काम से घर में रुक गई होगी। लेकिन धीरे-धीरे यह क्रम एक सप्ताह तक चल गया तो उसे कोमल की चिंता होने लगी। कुछ दिन और बीते। लगभग 15 दिन बाद कोमल कॉलेज आई। इस बार वह कुछ परेशान सी दिख रही थी। क्लासरूम से बाहर निकलते हुए उसे ऐसा लगा जैसे कोमल ने उसे आवाज दी हो। उसने पीछे मुड़कर देखा तो कोमल उसी को देख रही थी। प्रिंस ने आगे बढ़कर पूछ लिया "हेलो कोमल कैसी हो"? कोमल ने धीरे से कहा "ठीक ही हूं"। कुछ पल की चुप्पी के बाद प्रिंस चलने लगा तो उसे लगा कि शायद कोमल आवाज देगी लेकिन कोमल कुछ नहीं बोली। अगले दिन उसने क्लास रूम में एक बार नजर बचाकर बहाने से उसकी ओर देखा तो वह उसी की तरफ देखे जा रही थी । फिर वह अपना ध्यान क्लासरूम में लगाने का बहाना कर रहा था लेकिन उसका मन कोमल में ही लगा हुआ था। क्लासरूम से निकलते हुए इस बार कोमल ने ही आवाज दी थी "हेलो प्रिंस, मैं तुमसे कुछ बात करना चाहती हूं"। प्रिंस रुक गया था। कोमल का इस तरह आवाज देना उसे अच्छा लगा। प्रिंस ने पूछा "कहो कोमल, तुम बहुत दिनों बाद यूनिवर्सिटी आई हो , तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना"! कोमल ने कहा "मेरी तबीयत ठीक है। पिछले दिनों नहीं आने से मेरा कोर्स काफी पीछे छूट गया है क्या तुम मुझे अपने नोट्स दे सकते हो?" प्रिंस ने कहा "हां क्यों नहीं, नोट्स ले लो। लेकिन यह बताओ तुम इतने दिन तक थी कहां?" कोमल कुछ नहीं बोली। प्रिंस ने फिर पूछा, "क्या बात है कोमल ? क्या बताने लायक बात नहीं है?" कोमल ने कहा "नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बस ऐसे ही।" प्रिंस ने हंसते हुए कहा "बताने लायक हो तो कह सकती हो। मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम अपने मन की बात शेयर करोगी"। कोमल ने कहा "पिछले दिनों तुमने अखबारों में पढ़ा होगा मेरे गांव में एक लड़ाई हो गई थी जिसमें मेरे भाई को मार दिया गया था। हमारा पूरा परिवार बर्बाद हो गया प्रिंस। हम कहीं के नहीं रहे।" प्रिंस अवाक् था । कुछ देर बाद उसने पूछा "वह जो एक गांव में कुछ जातीय मुद्दे को लेकर गोली चल गई थी, क्या वही मामला है?" कोमल ने कहा "हां "। इस मामले को प्रिंस ने भी अखबार में पढ़ा था और उसे मालूम था कि एक नीची जाति के लड़के से विवाद में ऊंची जात के लड़के ने उसको शूट कर दिया था । जिस पर नीची जाति के लोगों ने आक्रोश में उस परिवार के तीन लोगों की हत्या कर दी थी और बाद में पुलिस ने नीची जाति की पूरी आबादी को घेराबंदी करके बहुत बुरी तरह मारा पीटा था और उनके घर में आग लगा दिया था। बाल , वृद्ध और महिलाओं को पकड़ कर जेल में डाल दिया था। इस मामले में बहुत उच्च स्तरीय जांच हुई थी। मामला लखनऊ और दिल्ली तक पहुंचा था और केंद्र सरकार ने भी इसमें हस्तक्षेप करके जांच के लिए कमेटी बैठा दी थी। ये मुद्दा लोकसभा और विधानसभा में भी उठा उठा था । प्रिंस की रूह कांप गई । उसने अपने सामने अपनी जाति के दुश्मनों की बेटी को देखा। उसने यह भी देखा कि वह आज उससे मदद मांग रही है। कुछ पल के लिए रुक कर प्रिंस ने कहा "ठीक है कोमल, मैं तुम्हें अपने नोट्स लाकर कल दे दूंगा। लेकिन ये बताओ यह मामला क्या था"? पता नहीं क्यों प्रिंस को यह लगा कि वह कोमल के मुंह से सुनना चाहता है कि दोषी कौन है? कोमल ने बताया "प्रिंस मैं बहुत दुखी हूं कि मेरा भाई मर गया। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि इन्हीं लोगों ने गलती भी की थी। लेकिन इसका मतलब इस तरह नरसंहार किया जाए यह भी तो ठीक नहीं है?" प्रिंस ने थोड़ी देर रुक कर कहा "कोमल प्रजातांत्रिक देश में ऐसी बातें दुखदाई हैं लेकिन जनता अगर गलती करे यह तो स्वाभाविक हो सकता है लेकिन जब प्रशासन और पुलिस सुनियोजित ढंग से किसी खास जाति को निशाना बनाती है तो यह बहुत बड़े खतरे की ओर संकेत करता है । मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं हम और हमारी पीढ़ी गलत रास्ते पर चल पड़े हैं।" कोमल लंबी आह भरती है, फिर उसके मुंह से बस इतना ही निकलता है कि "पता नहीं, मेरा तो घर बर्बाद हो गया"। प्रिंस चुप रहा। थोड़ी देर साथ में बैठने के बाद दोनों अपने-अपने क्लास में चले गए । अगले दिन कोमल ने काफी इंतजार किया लेकिन प्रिंस क्लास में दिखाई नहीं पड़ा। कोमल ने यही सोचा कि शायद प्रिंस उसे नोट्स नहीं देना चाहता इसलिए वह यूनिवर्सिटी नहीं आया। अगले दिन प्रिंस क्लास रूम में दिखाई दिया तो कोमल ने पूछ ही लिया "प्रिंस, मेरा नोट्स ले आए हो?" प्रिंस ने कहा "सॉरी कोमल मैं नोट्स लेकर उसी दिन तुम्हारे गांव में अपने ननिहाल में था। जब यह झगड़े शुरू हुए तो मैं किसी तरह वहां से बचकर भाग आया था। लेकिन मेरे नोट्स मेरे मामा के घर में ही छूट गए थे। जब उन लोगों ने उनकी बस्तियां जलाई तो मेरी किताबें कापियां और नोट्स जो वहां मैं पढ़ने के लिए लेकर गया था वही जलकर खाक हो गए ।" कह कर प्रिंस चुप हो गया। कोमल कुछ देर चुप रहने के बाद "चलती हूं" कह कर निकल गई। प्रिंस ने उसे जाते हुए देखा भी नहीं।

[17/10, 17:43] Mohan Dhanraj: (2)

दूसरे सेमेस्टर के परीक्षाओं की तैयारी लगभग हो चली थी। परीक्षा की तारीख भी आ गई थी। मई का महीना था। सूरज में काफी तपिश आ चुकी थी । पेड़ पौधों में हरियाली की जगह सूखी डंठल मौसम को वीरान बना रही थी। हां, आम के बाग गुलजार थे। कभी-कभी कोयल बोलती थी , दिन में दोपहरियां सूनी और सड़कें वीरान नजर आती थी। इन दिनों विद्यार्थी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्राय: विश्वविद्यालय आने की बजाय घर में ही तैयारी में जुटे हुए थे । प्रिंस को इन दिनों यही बेचैनी थी कि कोमल काफी दिनों से दिखाई नहीं पड़ी और पता नहीं उसके घर में क्या चल रहा है। जिस दिन प्रवेश पत्र लेने के लिए प्रिंस यूनिवर्सिटी गया था उसी दिन उसे कोमल दिखाई पड़ी तो उसने पूछ ही लिया, "कोमल तुम्हारी तैयारी कैसी चल रही है?" कोमल ने बताया कि वह इस साल प्रवेश पत्र तो लेकर जा रही है लेकिन वह इम्तिहान नहीं देगी। वह इस साल ड्रॉप लेने वाली है। यह सुनकर प्रिंस सन्न रह गया। थोड़ी देर उसे कुछ सूझा ही नहीं फिर बाद में उसने पूछा कोमल ड्रॉप क्यों कर रही हो? कोमल ने बताया, "घर के माहौल को बहुत कोशिश करने के बावजूद बदला नहीं जा सका। घर में एक साथ तीन-तीन लोगों के मर्डर के कारण घर का माहौल गमगीन और भय से व्याप्त है। ऐसे में पढ़ने के बारे में सोच पाना भी संभव नहीं है। जब-जब पढ़ने बैठती हूं तब तब वही दृश्य बार-बार आंखों के सामने आ जाते हैं और पढ़ने लिखने के बजाय एक ऐसी तकलीफ चारों तरफ तारी हो जाती है जो पूरी दुनिया में होने वाली हर प्रकार की घुटन से अधिक डरावनी और दुखदाई होती है। माता-पिता का चेहरा उनका रात दिन का रोना देखा नहीं जाता। मैं स्वयं भी अपने आप को नियंत्रण नहीं कर पा रही हूं ऐसे में पढ़ाई लिखाई के बारे में सोचना कोई मायने नहीं रखता।" कह कर कोमल फूट पड़ी। बहुत देर तक रोती रही। प्रिंस ने उसे शांत करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसका रोना बंद नहीं हो रहा था। काफी देर के बाद जब वह शांत हुई तो उसने कहा, "सॉरी प्रिंस मैंने तुम्हें भी परेशान कर दिया । देखो मेरी हालत तो सुधरने वाली नहीं है समय बताएगा। तुम अपना ध्यान रखना।" कह कर वह चली जाती है प्रिंस उसे जाते हुए देखता रहा। उसके जाने के बाद प्रिंस बहुत देर तक वहीं बैठा सोचता रहा कि क्या से क्या हो गया। वहां से उठकर घर की ओर चला तो रास्ते में एक पार्क में जाकर बैठ गया क्योंकि उसका मन घर जाने के लिए जैसे रोक रहा था। उसके हृदय में कुछ था जो टूट चुका था।

[21/10, 07:45] Mohan Dhanraj: (3)


दूसरे सेमेस्टर की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थी। जून का महीना शुरू हो चला परंतु इस बीच विश्वविद्यालय नहीं जाने और एक दूसरे का मोबाइल नंबर नहीं लेने के कारण दोनों में बातचीत नहीं हो पाई थी। इधर प्रिंस ने एक तरफा निर्णय ले लिया था कि वह सेमेस्टर की परीक्षाएं ड्रॉप कर देगा क्योंकि उसे दृढ़ विश्वास था कि कोमल भी परीक्षा ड्रॉप कर रही है। यदि वह परीक्षा देकर आगे निकल गया तो कोमल का साथ छूट जाएगा। यह बात कुछ अद्भुत सी थी कि दोनों में किसी भी प्रकार का साथ में चलने का वादा या प्रेम जैसे भाव एक दूसरे को जाहिर नहीं किया था फिर भी प्रिंस को उसके बगैर आगे बढ़ने में दिलचस्पी खत्म होती जा रही थी। कभी-कभी उसे यह जरूर लगता था कि कोमल से उसके किसी भी प्रकार के रिश्ते की कल्पना बेमायने है लेकिन फिर भी वह अपने मन के वशीभूत अपने रास्ते पर आगे बढ़ गया। इस प्रकार इस सेमेस्टर की परीक्षाओं को उसने भी ड्रॉप कर दिया । जून के महीने में सब जगह छुट्टियां हो जाती है इसलिए प्रिंस अपने मामा के गांव चला गया । कोमल कानपुर जा चुकी थी।एक दोपहर को प्रिंस अपने मामा के घर पर बैठा हुआ था तब तक पुलिस की गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी में से कांस्टेबल राम सिंह ने उतरकर आवाज दिया "अरे ओ रामचरण, चलो तुमको साहब ने थाने पर बुलाया है। रामचरण प्रिंस के मामा थे और वह इस समय खाना खाने बैठे ही थे। प्रिंस ने बाहर निकल कर उनसे पूछा "क्या बात है दीवान जी, रामचरण को किस लिए बुलाया गया है?" कांस्टेबल राम सिंह गरज कर बोला "तुम कौन हो? रामचरण को भेजो ?" प्रिंस ने कहा "दीवान जी, मैं उनका भांजा हूं मामा जी खाना खा रहे हैं। आप चलिए मैं मामा जी को लेकर आता हूं ।"राम सिंह ने कहा "तुम अपनी बकवास बंद करो नहीं तो कान के नीचे एक बजाऊंगा अभी और उसको कहो कि वो सीधे जाकर जीप में बैठ जाए।" प्रिंस ने कहा अच्छा दीवान जी आप ऐसे नहीं कह सकते मैं भी विश्वविद्यालय का स्टूडेंट हूं और मुझे भी कानून पता है।" मैंने कहा कि आप चलिए मैं मामा जी को लेकर आऊंगा। आप इस तरह बात क्यों कर रहे हैं"? इतने पर राम सिंह के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा। उसमें प्रिंस को पकड़ कर गाड़ी में बैठा लिया और रामचरण को गालियां देता हुआ दरवाजा पीटने लगा। राम सिंह के इस तरह व्यवहार करने से इधर प्रिंस अचरज में था तो वही रामचरण घबरा गया और खाना छोड़कर बाहर आ गया। रामचरण ने कहा "दीवान जी, बस में कपड़े पहन कर आता हूं। एक मिनट का समय दीजिए।" राम सिंह बुदबुदाता हुआ आकर गाड़ी में बैठ गया। रामचरण के गाड़ी में आकर बैठते ही राम सिंह ने कहा "ड्राइवर चलो थाने ।" ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट की और चल पड़ा। इधर प्रिंस ने सारा मामला समझने के बाद अपने आप को नियंत्रण में रखा हुआ थाने तक पहुंच गया। थानेदार राम प्रताप मिश्रा ने पूछा "रामचरण तुम्हारा ही नाम है?" रामचरण के हां कहने पर थानेदार ने कहा "चलो यहां साइन करो।" प्रिंस ने पूछा

" दरोगा जी मैं डॉक्यूमेंट पढ़ना चाहता हूं।" दरोगा ने प्रिंस की तरफ घूरते हुए पूछा "क्या पढ़ोगे जी? क्या नाम है तुम्हारा ? क्या करते हो?" इस पर प्रिंस ने अपना नाम बताया और कहा कि "मैं बीए प्रथम वर्ष का छात्र हूं ।" थानेदार ने कहा "बीए का छात्र हो तो क्या जानते हो।" प्रिंस ने बड़ी विनम्रता से कहा "सर आप मुझसे क्या जानना चाहते हैं?" दरोगा ने कहा "ज्यादा भोले मत बनो और यहां हमारे काम में बाधा डालोगे तो तुमको पकड़ के इसी के साथ अंदर कर देंगे और तुम्हारी जमानत कराने भी कोई नहीं आएगा। रामचरण तुम साइन करो इसको तो मैं बाद में देख लूंगा" कड़कते हुए थानेदार ने कहा। प्रिंस पीछे की तरफ मुंह करके थोडा मुस्कुराया फिर थानेदार की तरफ मुड़कर देखा। रामचरण ने हस्ताक्षर कर दिया। प्रिंस ने थानेदार से पूछा "सर अब हम लोग जा सकते हैं ?" थानेदार ने कहा "भागो यहां से और यहां दिखाई नहीं पड़ना नहीं तो मार के हाथ पैर तोड़ दूंगा"। प्रिंस ने मामा जी से कहा ,"मामा जी चलिए घर चलते हैं" प्रिंस के चेहरे पर कुछ मुस्कराहट सी थी। थानेदार निकर कर कहा क्यों तुमको हंसी आ रही है मैंने कोई चुटकुला सुनाया है क्या?" प्रिंस ने कहा "नहीं सर मैं मुस्कुरा नहीं रहा हूं थोड़ा परेशान हूं"। प्रिंस रामचरण को लेकर अपने घर के लिए निकल दिया। थानेदार ने थोड़ी देर कुछ उलझन में रहने के बाद कांस्टेबल राम सिंह से पूछा "यह लड़का मुस्कुरा क्यों रहा था"? राम सिंह ने कहा "पता नहीं सर लेकिन मुझे भी उसकी हंसी में कुछ दाल में काला लग रहा है।"थानेदार ने कहा "पता करो यह कौन है और क्या करता है?" "जी सर मैं पता करता हूं" राम सिंह ने कहा। प्रिंस ने पूछा "मामा जी, आपने जहां हस्ताक्षर किया है उस कागज पर क्या लिखा था?" रामचरण ने कहा "प्रिंस बेटा, तुम तो जानते हो मैं इतना पढ़ा लिखा हूं नहीं कि पूरा पढ़ पाऊं। कुछ समझ में नहीं आया । प्रिंस ने कहा "मामा जी, आपने जहां साइन किया है उसमें लिखा था कि पिछले मई महीने जो गांव में झगड़ा हुआ था उसमें मैंने जो बयान दिया है वह हमारे गांव के लोगों के दबाव में दिया है। मैं अपना बयान वापस लेना चाहता हूं। प्रिंस ने कहा "मामा जी दरोगा ने आपसे गलत कागज पर साइन करा लिया है लेकिन कोई बात नहीं। फिर उसने कुछ सोचते हुए थोड़ी देर बाद बुदबुदाया, "अभी दरोगा को और मजा आने वाला है।" रामचरण ने कहा "बेटा तुम फिक्र ना करो जो होगा देखा जाएगा"। प्रिंस ने कहा "मामा जी, आप बहुत भोले हैं। अभी मैं पापा से बात करूंगा तो इनकी थानेदारी ठिकाने लगा दूंगा। आप घर चलिए मैं बताता हूं।" रामचरण ने कहा "नहीं प्रिंस, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे। बेटा तुम लोग तो चले जाओगे हमको तो यहां सब दिन रहना है। यह लोग हमें आगे भी परेशान करते रहेंगे। तुम लोग कितनी बार यहां दौड़-दौड़ कर आओगे" रामचरण कुछ सोचता हुआ चुपचाप प्रिंस को लेकर घर आ गया।

इधर राम सिंह ने गांव के मुखबिर तारा सिंह को थाने में बुलाकर पूछा तारा, यह रामचरण के घर में एक लड़का आया है, उसके बारे में तुम कुछ जानते हो?" तारा ने कहा "हां साहब यह उसकी बहन का लड़का है । सुना है रामचरण का बहनोई दिल्ली में कोई बहुत बड़ा अफसर है और यह लड़का यही इलाहाबाद में पड़ता है।"

"इसका बहनोई बहुत बड़ा अफसर है? कहां है? जरा पता करो। कहीं इसीलिए तो नहीं ये सपोला मुस्कुरा रहा था! थानेदार साहब को जानकारी चाहिए इसके बारे में पता करो"। "जी सर अभी पता करता हूं" तारा सिंह ने कहा। तारा सिंह ने अमरचंद को फोन लगाकर पूछा तो मालूम हुआ कि रामचरण का बहनोई यानी प्रिंस का पिता दिल्ली में गृह मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी पद पर पदस्थ है। जब राम सिंह को यह पता चला, राम सिंह थोड़ा नर्वस होते हुए बोला "गइली भैंसिया पानी में।"

राम सिंह ने थानेदार मिश्रा को जब यह बताया तो थानेदार गाली देते हुए "बोला यह साले हरामी पूरी बात बताते भी नहीं। लगता है यह लड़का हमें फंसा देगा। अभी यहां का बवेला चल ही रहा है। इसी को शांत करने के लिए मुझे यहां भेजा गया है और लगता है पहली ही चाल गलत होने वाली है"।

[21/10, 08:33] Mohan Dhanraj: (4)


(प्रिंस के मामा का घर, प्रिंस और उसके मामा रामचरण दिल्ली जाने के लिए निकलते हैं। ट्रेन का सफर करके घर पहुंचते हैं। प्रिंस अपनी मां से मिलता है और रामचरण अपनी बहन से। फिर उनकी बहन हाल-चाल पूछने के बाद कहती हैं आराम करो । तुम्हारे जीजा जी शाम को आएंगे । प्रिंस की मां प्रिंस का हाल-चाल पूछती है, पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछती है और कहती है बेटा तुम लोग चाय नाश्ता कर के आराम करो)


(शाम को प्रिंस के पिता नवीन चंद्रा घर आते हैं कपड़े बदलने के बाद सभी चाय पीने बैठते हैं)


"हां तो साले साहब बताइए क्या हाल-चाल है ? आपके गांव में तो खूब बवाल मचा हुआ है"नवीन चंद्र ने बहुत हल्के-फुल्के ढंग से पूछा। रामचरण बताते हैं "जीजा जी, पुलिस वालों ने पूरी बस्ती को आग लगा दिया था आपको हमने बताया ही था और अब सारे किए धराएं पर लीपा पोती करके मामले को रफा-दफा करने की कवायद चल रही है।" प्रिंस ने कहा "पापा, आप कहते थे ना कि गांव वाले जरूर कुछ गड़बड़ किए होंगे। आप तो यह नहीं मानते थे कि पुलिस इस प्रकार ज्यादती कर सकती है। लेकिन मैंने अपनी आंखों से देखा है। उन लोगों ने मामा जी को जबरदस्ती खाने पर से उठा लिया, खाना भी नहीं खाने दिया और थाने ले जाकर गलत सलत बयान पर मामा जी का सिग्नेचर करा लिया । मैंने बीच में थोड़ा पूछताछ करने की कोशिश की तो पुलिस वाले ने मुझे मारने पीटने की धमकी दी और मेरे साथ भी बदसलूकी किया है । पापा दिस इस अनफेयर।" नवीन चंद्रा ने पूछा "ऐसा क्यों हुआ था ?" प्रिंस ने बताया कि "एक पुलिस कांस्टेबल ने मामा को बुलाया और कहा कि चलो थानेदार साहब ने बुलाया है तो मैने बस इतना ही कहा था कि मामा जी खाना खा रहे हैं। खाना खा लेंगे तो मैं उनको लेकर आ जाऊंगा। इतनी सी बात पर उस पुलिस वाले ने मुझे कहा कि "चुप रहो नहीं तो कनपटी के नीचे बजा दूंगा। अब बताइए यह कोई बात है? एक आम नागरिक को भोजन पर से उठाने का कौन सा नियम है? क्या हम अपराधी हैं? कम से कम खाने की थाली पर से उठाना तो बहुत अन्याय है। मैं इसका विरोध करता हूं? आई फेल्ट वेरी बैड ऑफ इट!" कह कर प्रिंस शांत हो गया। नवीन चंद्रा ने थोड़ा कुछ सोचा फिर उन्होंने पुलिस कमिश्नर को फोन लगाया और थानेदार मिश्रा को ताकीद करने के लिए कहा। फोन रखने के बाद बोले "चलो तुम लोग परेशान मत हो सब ठीक हो जाएगा ।मैंने कमिश्नर से बोल दिया है, और हां, जो तुम्हारी एफआईआर हुई है उसकी कॉपी मुझे ला कर दो। मैं वकील से बात करता हूं । इस तरह की बदमाशियों के खिलाफ कुछ तो करना पड़ेगा।

[21/10, 08:38] Mohan Dhanraj: (5)


(कोमल का घर उसके माता-पिता बैठे हुए हैं उसके चाचा शिवनारायण मिश्रा का आना)


शिवनारायण आकर चुपचाप बैठ जाते हैं। थोड़ी देर में कोमल की मम्मी पूछती हैं "क्या हाल है भैया?" शिवनारायण बताते हैं कि भाभी बड़ी वाली बुआ जी के लड़के जो इटावा में थानेदार थे उनकी पोस्टिंग यही अपने थाने में हो गई है। उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन कर लिया है। भैया बता रहे थे कि उनकी पोस्टिंग यहां के झगड़े को समाप्त करने के लिए खास तौर से हुई है। कोमल ने कहा "चाचा झगड़ा समाप्त हो जाए अच्छी बात है लेकिन इससे हमको क्या मिलने वाला है? हमारा तो जो जाना था चला गया। शिवनारायण ढांढस बंधाते हैं और कहते हैं कि देखो कोमल दुख की बात तो है लेकिन अभी पुलिस केस चल ही रहा है। पता नहीं कौन-कौन फंसेगा और कौन बचेगा। तब तक मोबाइल की घंटी बजती है। शिवनारायण फोन उठाते हैं। "हेलो"

" हां भैया, प्रणाम"

 "सब ठीक है, आपका क्या समाचार है?".... "ज्वॉइनिंग हो गई?" ...

"अरे" ....

"अच्छा ?"

" ध्यान रखिएगा"

 "जी ठीक है, प्रणाम"

 फोन काटने के बाद कोमल पूछती है "चाचा जी, क्या हुआ?" शिवनारायण "बोले थानेदार भैया का फोन था। कह रहे थे तुम लोग यहां के लोगों के बारे में ठीक-ठीक पता करो, कौन-कौन कहां क्या कर रहा है? बता रहे थे इधर कोई लड़का आया था जो किसी बड़े अधिकारी का बेटा है। उसको थाने पर ले आए थे। उसी से कुछ वो शंका में हैं। कुछ गड़बड़ होने की संभावना दिख रही है।" कोमल चुपचाप सुन रही थी । कोमल की मां ने कहा, "अब और क्या गड़बड़ होगी?" शिवनारायण बोले "पता नहीं भाभी, थानेदार भैया को सस्पेंड कर दिया गया है। भैया बहुत परेशान है अब तो रही सही उम्मीद भी गई। पता नहीं कौन-कौन फंसेगा और जेल की चक्की पीसेगा?

घर में सन्नाटा पसर जाता है कोई कुछ नहीं बोलता।

Friday 18 2024

आलिया भट्ट

 वर्ष 2020-21 के दौरान चर्चा में आई फिल्म "हाईवे" से नाम कमाने वाली एक्ट्रेस आलिया भट्ट इन दिनों उभरती हुई सितारा है। फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातों के कार्यक्रम में आज हम आलिया भट्ट के जीवन और उनके अभिनय के बारे में आपसे कुछ खास बातें करेंगे। तो अपने सेट का वॉल्यूम बढ़ा लीजिए और स्वीकार कीजिए सीमा शाही का नमस्कार!

दोस्तों,

आलिया भट्ट फिल्म निर्देशक महेश भट्ट और अभिनेत्री सोनी राज़दान की बेटी हैं। इनका जन्म 15 मार्च 1993 को मुंबई में हुआ था। मशहूर सिने स्टार पूजा भट्ट उनकी बड़ी बहन हैं।      

   आलिया को बचपन से ही अभिनय का शौक था इसलिए उन्होंने श्यामक डाबर के संस्थान में नृत्य सीखने के लिए एडमिशन लिया ।  

 उन्होंने अपने जीवन की पहली फिल्म में अभिनेत्री प्रीति जिंटा के बचपन का रोल किया था जो उनके पिता महेश भट्ट स्वयं ही बना रहे थे। सही मायने में आलिया भट्ट ने वर्ष 2012 में  

 करण जौहर की फिल्म "स्टूडेंट ऑफ द ईयर" में प्रमुख भूमिका निभाई और इसी फिल्म को आलिया भट्ट की पहली फिल्म माना जा सकता है। इस फिल्म में उनके साथ सिद्धार्थ मल्होत्रा और वरुण धवन सह अभिनेता थे। फिल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर एक प्रेम त्रिकोण कहानी पर आधारित थी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 960 मिलियन डॉलर की कमाई की और एक व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म बन गई। फिर भी इस फिल्म को

दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली और ना ही आलोचकों ने इसकी सराहना मिल सकी जिस कारण आलिया भट्ट को बेहतर भूमिका निभाने के लिए कुछ और जुनून सवार हो गया। इसी जुनून की परिणति इम्तियाज अली की फिल्म हाईवे में मिली। आलिया भट्ट के बेहतरीन प्रदर्शन से सजी फिल्म हाईवे एक बेहतरीन कला फिल्म के रूप में दर्ज की गई। इस फिल्म में आलिया ने एक अकेली किशोर लड़की का अभिनय किया है जो अपने अपहरण के बाद उसकी खोज में लगी पुलिस से बचकर अपहरण कर्ताओं के साथ जाने के लिए गाड़ी में ही छुप जाती है । बाद में अपहरणकर्ताओं द्वारा पूछने पर साफ कह देती है कि उसे घर वापस नहीं जाना है। यह फिल्म कहानी के इस यू टर्न लेने के साथ ही दर्शकों के मन में एक उत्सुकता जगा देती है कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि एक लड़की अपहरण कर्ताओं के प्रति सहानुभूति रख रही है और अपने घर को त्याग देना चाहती है! दरअसल ,फिल्म की कहानी में आलिया भट्ट एक रईस परिवार की बेटी है लेकिन वह परिवार अधिक पैसे कमाने के लालच में बेटी की भावनाओं का ध्यान नहीं रखता । उसके परिवार के आसपास के मित्र रिश्तेदार उसका शारीरिक शोषण करते हैं। वह इस बारे में अपनी मां से बात करती है लेकिन वो भी उसकी बात को अनदेखा कर देती हैं क्योंकि उन्हीं लोगों से उनको रुपए मिलने की संभावना होती है। इस प्रकार फिल्म की कहानी आज के सामाजिक परिवेश में पैसे के सामने पारिवारिक मूल्यों को नष्ट होते हुए दिखाने में कामयाब हुई है। यही कामयाबी आलिया भट्ट के अभिनय की कामयाबी भी बन गई है। यह कहना मुश्किल है कि इस फिल्म की सफलता के पीछे फिल्म की कहानी है , आलिया भट्ट का प्रदर्शन है या यह निर्देशक के फिल्मोग्राफी का कमाल है। लेकिन हर फ़िल्म समीक्षक को यह तो मानना पड़ेगा कि फिल्म में आलिया भट्ट की बेहतरीन भूमिका प्रशंसा के काबिल रही है। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म हाईवे बहुत अधिक नहीं चली लेकिन आलिया ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड जीता और समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नामांकन भी प्राप्त किया। उसके बाद आलिया भट्ट शॉर्ट फ़िल्म गोइंग होम मैं दिखाई दी जो महिलाओं की सुरक्षा पर बनाई गई फिल्म थी।


धर्मा प्रोडक्शंस के साथ अपने सहयोग को जारी रखते हुए, आलिया भट्ट ने 2014 आई रोमांटिक फिल्म्स 2 स्टेट्स और हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया में अभिनय किया। 


   बॉलीवुड में उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले। उन्होंने सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरुण धवन, ऋषि कपूर, रणदीप हुड्डा, अर्जुन कपूर, रोनीत रॉय, रितेश देशमुख, शाहिद कपूर, दिलजीत डॉसंज, रणबीर कपूर और शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय कलाकारों के साथ काम किया है। वह एक मॉडल के रूप में भी काम करती है और कई मॉडलिंग असाइनमेंट करती है। इसके अलावा आलिया एक गायक कलाकार भी हैं। , आलिया अपनी खूबसूरती की वजह से युवाओं में अधिक लोकप्रिय है। इनके करोड़ों चाहने वाले है, जिनमें से अधिकतर युवा है। 2018 मै रिलीज़ हुई फिल्म "राज़ी" ने एक अरब से अधिक कमाई की जो महिला प्रधान फिल्म थी। इस फिल्म की कमाई से हिंदी सिनेमा में आलिया के कद का पता चलता है। आलिया भट्ट ने 2019 में "गली ब्वाय" में रणवीर सिह के साथ कार्य किया । उसके बाद कई सितारों से सजी हुई फिल्म कलंक में आलिया भट्ट के अभिनय को अच्छी पहचान मिली ।


 फिल्म उड़ता पंजाब काफी विवादों के साथ चर्चा में रही। अब चर्चाएं जैसी भी हो, कहा जाता है कि "बदनाम भी होंगे तो , क्या नाम ना होगा" इसी तर्ज पर जब उड़ता पंजाब फिल्म चर्चा में आई तो उसकी चर्चा के साथ-साथ आलिया भट्ट के अभिनय की भी खूब चर्चा रही।  

 आलिया भट्ट की सफल फिल्मों की श्रृंखला में रोमांटिक कॉमेडी "बद्रीनाथ की दुल्हानिया" का विशेष उल्लेख किया जा सकता है जो वर्ष 2016 में आई। यह एक स्वतंत्र युवती की कहानी है, जो उसके बॉडीगार्ड मंगेतर से उम्मीदों के अनुरूप अपने आप को ढालने से इनकार करती है। इस फिल्म के लिए आलिया को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए एक और फिल्मफेयर नामांकन प्राप्त हुआ। मेघना गुलज़ार की 2018 में आई जासूसी थ्रिलर फिल्म "राज़ी" ने आलिया भट्ट को एक बेहतर अभिनय का अवसर दिया। फिल्म "राजी" महिला प्रधान कहानी पर आधारित है। ये फिल्म भी सबसे अधिक कमाई करने वाली हिंदी फिल्मों में से एक साबित हुईं और इसकी सफलता ने बॉक्स ऑफिस पर सबसे सफल फिल्म होने का झंडा लहराया।  


आलिया भट्ट ने 2019 की शुरुआत में अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी बनाई जिसका नाम अनन्त सनशाइन प्रोडक्शंस है। उस वर्ष उनकी पहली उपस्थिति ज़ोया अख्तर के गली ब्वाय में रणवीर सिंह के साथ थी।                        

2018 में, भट्ट ने सह-कलाकार अभिनेता रणबीर कपूर को डेट करना शुरू किया। उसने 14 अप्रैल 2022 को मुंबई में एक पारंपरिक समारोह में शादी की। और 6 नवंबर 2022 को, उनके पहले बच्चे, एक लड़की का जन्म हुआ।


2018 और 2019 में, जीक्यू के भारतीय संस्करण ने उन्हें देश के 50 सबसे प्रभावशाली युवाओं में से चित्रित किया ।

     मार्केट रिसर्च फर्म YouGov ने अपने 2016 के संस्करण में भारत के नौवें सबसे प्रभावशाली सेलिब्रिटी का नाम दिया। यह थी अदाकारा युवा अभिनेत्री आलिया भट्ट के अभिनय यात्रा की एक संक्षिप्त सी चर्चा। फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के इस सेगमेंट का सफर यहीं पर रुक रहा है। अगले अंक में आपके साथ फिर किसी नए एक्टर या एक्ट्रेस या किसी नई फिल्म की चर्चा लेकर हम फिर से हाजिर होंगे। तब तक के लिए सीमा शाही को दीजिए इजाजत और स्वीकार कीजिए मेरा नमस्कार।

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...