Thursday 31 2024

भजकटया के फूल"

 काशी के वरिष्ठ कवि श्री सूर्य प्रकाश मिश्र के काव्य संकलन "भजकटया के फूल" पढ़ने का सौभाग्य मिला। संकलन के पृष्ठ क्रमांक 26 पर 'मीठा ज़हर' नाम की कविता पढ़ी और बस मन वहीं ठहर गया जब श्री सूर्य प्रकाश मिश्र अपनी कविता में कहते हैं "सुनी जाएंगी सभी की हर शिकायत, लग चुके हैं पोस्टर सारे शहर में।' 

इस कविता को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि अब आज की पढ़ाई खत्म, बाकी कल पढ़ेंगे। साधारण भाषा में कहें तो जैसे तृप्त होकर भोजन करने के बाद आपने एक लजीज़ पान की गिलौरी मुंह में रखा और उसके बाद कोई आपसे कह दे कि लीजिए रसमलाई खाईए तो आप यही कह सकते हैं कि भाई आज नहीं! अभी नहीं!! 

 साहित्य को पढ़ने के समय भी पाठक को कभी-कभी ऐसी तृप्ति का एहसास होता है जो एहसास इस कविता को पढ़कर मिला । इसी की और लाइनें बहुत खूबसूरत है "रात में तस्वीर की जब यह चमक है ,

क्या गजब ढाएगी चढ़ती दोपहर में।"

फिर आगे लिखते हैं "रोटियों की फसल अब जी भर उगेगी है बड़ा विश्वास 

इस मीठे ज़हर में ।"

और इस कविता की शुरुआत होती है जब इस पंक्ति से कि "हो गए चोरी चमकते ख्वाब सारे चांद आया रात के अंतिम पहर में।"

 यहीं से इस कविता को ध्यान से पढ़ने की बात मन में आती है और फिर यह पूरी की पूरी कविता मन को आनंद से भर देती है। इस संकलन में भाषा की सुंदरता, अलग-अलग रूपकों और अलंकारों का उपयोग इसे एक पठनीय काव्य संकलन बनाता है। गीतों में वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को चित्रित किया गया है जो बहुत ही सरलता से समझ में आता है। लेकिन इस सरलता में भी एक कठिनाई है कि आपको ध्यान से पढ़ना पड़ेगा। उदाहरण के लिए 'एक मुट्ठी ओस' कविता में श्री मिश्र कहते हैं कि "हवा पानी की वसीयत हो चुकी है

 हम महज अफसोस लेकर क्या करेंगे 

प्राण प्यासे हैं हमारी कोख से ही 

जी रहे सदियों पुराना घाव लेकर 

खो गया सूरज कहीं पर वादियों में 

जिसे आना था नया बदलाव लेकर 

 हवा पानी की वसीयत हो चुकी है 

हम आज अफसोस लेकर क्या करेंगे "

ये ऐसी रचनाएं हैं जो या तो हमारे मन की हताशा को जाहिर करती हैं या फिर हुक्मरान के निजाम से स्वाभाविक रूप से बरसते हुए अन्याय को सहती हुई जनता की बेबसी का बयान करते हैं । यहीं पर देखते हैं कि 'भूख का ऊंट' कविता में कहते हैं "धरती की बढ़ी जिम्मेदारी 

है ऊंट भूख का बहुत बड़ा 

जीरे सी है राहत सरकारी 

रोटी की फसल के ये अंकुर 

पनपे ना अगर मर जाएंगे 

मुश्किल में कटे या कटे सुख से 

पर दिन तो गुजर ही जाएंगे 

खेती के लिए कुछ कर न सकी 

पत्थर दिल निकली सरदारी

 है ऊंट भूख का बहुत बड़ा 

जीरे सी है राहत सरकारी ।'

इस प्रकार श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की पहले के काव्य संग्रह "कौवा पुराण", "दरबार ऊंघते खड़े रहे" के समानांतर काव्य संग्रह "भजकटिया के फूल" में भी संकलित कविताएं उनके इसी तेवर को बरकरार रखती है जो तेवर उनके पहले के संग्रह में देखने को मिलता है। मूल रूप से श्री मिश्र कमजोर, गरीब, मजदूर, स्त्री, बूढ़े जवान और किसान जैसे मूल मुद्दों पर अपनी कलम चलाते हैं और उनके लेखन का सबसे बड़ी विशेषता ये है कि आप शब्दों की व्यंजन में अपनी बात कह कर निकल जाते हैं और उनके गंभीर अर्थ भरे शब्दों को समझने के लिए उन्हें ध्यान से पढ़ना पड़ता है । इन सभी अर्थों में श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की काव्य कृति "भजकटिया के फूल" अपने आप में साहित्यिक सौंदर्य से परिपूर्ण बेहतरीन गीतों का संग्रह है। 

 उन्हें पढ़ते समय हमें भाषा और साहित्य का आनंद तो मिलता ही है साथ में हम आज के सरोकारों से भी परिचित होते चलते हैं। विसंगतियों से भी हमारा सामना होता है समाधान भी मिलते हैं। लेकिन हमारी समस्या ये है कि समाधान की तरफ हम केंद्रित नहीं होते। हां, एक व्यक्ति के रूप में हर किसी की मजबूरी हो सकती है कि वह पूरे सिस्टम या समाज को नहीं बदल सकता फिर भी अपने आप को बदलना तो हमारे हाथ में होता है। शायद साहित्यकार का सरोकार भी यही होता है कि कम से कम कोई एक व्यक्ति बदलेगा तो शुरुआत होगी‌। बदलाव की नीव रखना बदलाव को आगे बढ़ाना उसे एक रूप आकार देना यही साहित्य का अर्थ और साध्य है ।श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की रचना "भजकटिया के फूल" में संकलित सभी कविताएं अपने आप में बेहतरीन है और अच्छे भविष्य की तरफ ले जाने के लिए अच्छी मार्गदर्शक हैं ।विश्वास है कि पाठक उन्हें पढ़ेंगे और सराहेंगे।एक पाठक के रूप में मेरी ओर से श्री सूर्य प्रकाश मिश्र जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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