Thursday 31 2024

रिश्तो की सांप सीढ़ी"

 "रिश्तो की सांप सीढ़ी" का खेल ही रिश्तो की सच्चाई है। जीवन किसी का भी हो, भारतीय समाज में परिवार की मजबूत व्यवस्था के बीच यह खेल चलता रहता है फिर भी समाज जीवित है और परिवार भी चल रहे हैं । भारतीय समाज में ऐसा इसलिए भी है कि हमारे यहां परिवार होते हैं और परिवार के सदस्यों से अपेक्षाएं भी होती है। अपेक्षाओं पर कुछ खरे उतरते हैं तो कुछ अपेक्षाओं से दूर अपने ही लोगों से दुश्मनों जैसा सुलूक भी करते हैं। इन बातों के समानांतर विदेश में परिवार होते तो हैं लेकिन उनमें आपस में किसी से कोई अपेक्षा का भाव नहीं रहता। इसलिए कोई भी किसी से ना मतलब रखता है और ना ही उनके अच्छे बुरे में शामिल रहता है। अब इन दोनों की अपनी अलग-अलग अच्छाइयां हैं तो उनकी कमियां भी! विदेश में इन बातों की जरूरत महसूस होती है। भारत में यह बातें कहीं आवश्यक तो किसी के लिए अनावश्यक लगने लगती हैं। यहां पर उनका स्वार्थ जन्म लेता है। उसी के वशीभूत होकर एक दूसरे का नुकसान करते हैं कराते हैं और सांप सीढ़ी के खेल का जन्म होता है। यह एक विसंगति है और इस विसंगति के ऊपर केंद्रित श्री पन्नालाल 'असर' की पुस्तक "रिश्तो की सांप सीढ़ी" बेहतरीन ढंग से इस समस्या पर प्रकाश डालती हैं।

पुस्तक श्रीअसर जी की आत्मकथा के रूप में है और उनके पैतृक निवास से शुरू होती हुई आगे बढ़ती है। इस कहानी में उनके पैतृक स्थान की संस्कृति , लोकाचार विचार और व्यवहार का एक अद्भुत चित्रण है जो तत्कालीन समाज व्यवस्था की पहचान करने में मदद करता है। नई पीढ़ी जब कभी भी उस संस्कृति को जानना चाहेगी तो यह पुस्तक मददगार होगी या जब कभी नई पीढ़ी इसे पड़ेगी तो अपनी संस्कृति से उसका साक्षात्कार स्वयं हो जाएगा। इस अर्थ में पुस्तक की पहली सफलता यही है कि वह तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, संस्कृति और लोकाचार की एक मजबूत संवाहक है। यहां बड़े भाई राम दास पहलवान और भाभी गोमती की सादगी छोटे भाई और उसकी पत्नी नन्नी की अपनी जेठानी और जेठ तथा उनके बच्चों से बेरुखी आज के समाज की कड़वी सच्चाई है तो वही बाबू लाल सेठ और उनकी पत्नी भगवती की इस परिवार के प्रति सहानुभूति भी एक सच्चाई है जहां परिवार के लोग आपका नुकसान करते हैं तो वही गांव के लोग उनकी सहायता भी करके उनके जीवन यापन में मददगार होते हैं। यह हर घर परिवार की कहानी है, इसी प्रकार रामदास पहलवान के झांसी में डॉक्टर आनंद के द्वारा सहायता करना और उन्हें सवाईमाधोपुर की सीमेंट फैक्ट्री में पहलवानी का कोच बना देना एक उदार हृदय सामाजिक सदस्य के चरित्र को उजागर करता है और सवाईमाधोपुर में उनकी बढ़ती लोकप्रियता से जलने वाले पुराने कोच महावीर सिंह के मनोविज्ञान को भी तब के समाज में और आज के समाज में बखूबी देखा जा सकता है। यहां पर यह कोच रामदास पहलवान को अपहरण करके जिस तरह उनकी जिंदगी बर्बाद कर रहा है ऐसे उदाहरण हजारों पड़े हुए मिलते हैं और देश और समाज की संस्कृति को बदरंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

 थक हार कर सांप सीढ़ी के खेल का शिकार रामदास का परिवार वापस अपने गांव आकर नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरु करता है। इसमें धीरे-धीरे वह कामयाब भी होता है लेकिन तब तक रामदास की वापसी उनके परिवार के लिए संजीवनी के रूप में दिखती तो है लेकिन रामदास की नशे की लत फिर से उस परिवार के लिए सांप सीढ़ी का खेल शुरू करने की पृष्ठभूमि को जन्म देती है।

यही से प्रकाश कहानी में मुख्य पात्र की भूमिका में आता है । प्रकाश एक होनहार, सर्वगुण संपन्न, मेहनती और ईमानदार नौजवान है। प्रकाश अस्सी के दशक में संघर्ष करके आगे बढ़ने वाली युवा पीढ़ी का प्रतिनिधि भी है इसलिए उसके अंदर मेहनत करने के साथ समाज और देश की सेवा का जज्बा हिलोरें ले रहा है। अपने इसी जज्बे से प्रकाश आईटीआई की पढ़ाई के साथ-साथ बाजार में खिलौने बेच कर अपनी माता का हाथ बंटाता है। समय आने पर वो भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स भोपाल में परीक्षा पास कर के नौकरी ज्वाइन करता है। यहां पर प्रकाश अपनी मेहनत से अधिकारियों का कृपा पात्र बनने के साथ-साथ एक लोकप्रिय कलाकार भी बन जाता है। यह भी एक संयोग है कि प्रकाश आकाशवाणी से जुड़कर अपनी प्रतिभा को निखारता है। वह लोकगीत का कलाकार होने के साथ-साथ कवि और लेखक के रूप में भी अपने आप को स्थापित करता है। संदर्भ वश पुस्तक में आकाशवाणी के तत्कालीन केंद्र निदेशक श्री गुलाब चंद जी का उल्लेख आता है। श्री गुलाब चंद बाद में आकाशवाणी में 

अपर महानिदेशक के पद को सुशोभित किया। श्री गुलाब चंद स्वयं एक बेहतरीन अधिकारी और विद्वान साहित्यकार रहे हैं जिन्होंने अपने सेवा काल में बहुत सारे साहित्यकारों को मार्ग देकर बड़ा साहित्यकार बनने में मदद की है। इनके अतिरिक्त श्री कमल नारायण, श्रीयुत श्री राम, हीरालाल और श्री शंभू दयाल का ज़िक्र हुआ है जो उस समय आकाशवाणी के नामचीन और विद्वान अधिकारियों में अपना स्थान रखते हैं। श्री पन्नालाल 'असर' के लेखन कार्य को राज्य स्तर तक सराहना और सम्मान मिलता है जिससे कंपनी में तो उसका नाम होता ही है पूरे उत्तर प्रदेश में उसकी पहचान होती है । प्रकाश अपने घर परिवार के साथ समाज को भी लेकर आगे बढ़ता है। वो कंपनी की सांस्कृतिक टोली का भी नेतृत्व करता है। जो टोली तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नजर में आती है और उनकी प्रशंसा और सराहना प्राप्त करती है। यह उपलब्धि प्रकाश की टोली की उपलब्धि के साथ-साथ प्रकाश और भेल कंपनी की उपलब्धि मानी गई। इसके लिए कंपनी के द्वारा प्रकाश की बहुत सराहना हुई। प्रकाश की जिजीविषा की तारीफ की जानी चाहिए जब प्रकाश कैंसर से पीड़ित होकर भी एक बहादुर की तरह कैंसर को पछाड़ कर फिर से स्वस्थ होकर समाज में वापस आ जाता है। अपने साल की सेवा के उपरांत भेल से सेवानिवृत्ति तक प्रकाश का जीवन व्यक्तिगत रूप से सांप सीढ़ी के खेल में विजयी खिलाडी के रूप में उभर कर आता है जिसको निन्यानबे पर बैठा सर्प डंस नहीं पाता और सौ की गिनती पूरी करके विजयी बनता है। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि यह पुस्तक लेखक श्री पन्नालाल 'असर' के जीवन की कथा है। इस अर्थ में श्री पन्नालाल 'असर' सही मायने में एक नायक के रूप में भरते हैं जो अपने असली जीवन में सफल हो कर समाज को दिशा देने के लिए बेहतरीन साहित्य का सृजन भी करते हैं । यह सौभाग्य की बात है कि उन्हें पहचान दर पहचान मिलती चली जाती है। इस प्रकार पुस्तक "रिश्तो की सांप सीढ़ी" एक बेहतरीन आत्मकथा और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है ।

आशा है यह पुस्तक पाठकों के बीच अपना स्थान बनाएगी ।

श्री पन्नालाल 'असर' को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

भजकटया के फूल"

 काशी के वरिष्ठ कवि श्री सूर्य प्रकाश मिश्र के काव्य संकलन "भजकटया के फूल" पढ़ने का सौभाग्य मिला। संकलन के पृष्ठ क्रमांक 26 पर 'मीठा ज़हर' नाम की कविता पढ़ी और बस मन वहीं ठहर गया जब श्री सूर्य प्रकाश मिश्र अपनी कविता में कहते हैं "सुनी जाएंगी सभी की हर शिकायत, लग चुके हैं पोस्टर सारे शहर में।' 

इस कविता को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि अब आज की पढ़ाई खत्म, बाकी कल पढ़ेंगे। साधारण भाषा में कहें तो जैसे तृप्त होकर भोजन करने के बाद आपने एक लजीज़ पान की गिलौरी मुंह में रखा और उसके बाद कोई आपसे कह दे कि लीजिए रसमलाई खाईए तो आप यही कह सकते हैं कि भाई आज नहीं! अभी नहीं!! 

 साहित्य को पढ़ने के समय भी पाठक को कभी-कभी ऐसी तृप्ति का एहसास होता है जो एहसास इस कविता को पढ़कर मिला । इसी की और लाइनें बहुत खूबसूरत है "रात में तस्वीर की जब यह चमक है ,

क्या गजब ढाएगी चढ़ती दोपहर में।"

फिर आगे लिखते हैं "रोटियों की फसल अब जी भर उगेगी है बड़ा विश्वास 

इस मीठे ज़हर में ।"

और इस कविता की शुरुआत होती है जब इस पंक्ति से कि "हो गए चोरी चमकते ख्वाब सारे चांद आया रात के अंतिम पहर में।"

 यहीं से इस कविता को ध्यान से पढ़ने की बात मन में आती है और फिर यह पूरी की पूरी कविता मन को आनंद से भर देती है। इस संकलन में भाषा की सुंदरता, अलग-अलग रूपकों और अलंकारों का उपयोग इसे एक पठनीय काव्य संकलन बनाता है। गीतों में वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को चित्रित किया गया है जो बहुत ही सरलता से समझ में आता है। लेकिन इस सरलता में भी एक कठिनाई है कि आपको ध्यान से पढ़ना पड़ेगा। उदाहरण के लिए 'एक मुट्ठी ओस' कविता में श्री मिश्र कहते हैं कि "हवा पानी की वसीयत हो चुकी है

 हम महज अफसोस लेकर क्या करेंगे 

प्राण प्यासे हैं हमारी कोख से ही 

जी रहे सदियों पुराना घाव लेकर 

खो गया सूरज कहीं पर वादियों में 

जिसे आना था नया बदलाव लेकर 

 हवा पानी की वसीयत हो चुकी है 

हम आज अफसोस लेकर क्या करेंगे "

ये ऐसी रचनाएं हैं जो या तो हमारे मन की हताशा को जाहिर करती हैं या फिर हुक्मरान के निजाम से स्वाभाविक रूप से बरसते हुए अन्याय को सहती हुई जनता की बेबसी का बयान करते हैं । यहीं पर देखते हैं कि 'भूख का ऊंट' कविता में कहते हैं "धरती की बढ़ी जिम्मेदारी 

है ऊंट भूख का बहुत बड़ा 

जीरे सी है राहत सरकारी 

रोटी की फसल के ये अंकुर 

पनपे ना अगर मर जाएंगे 

मुश्किल में कटे या कटे सुख से 

पर दिन तो गुजर ही जाएंगे 

खेती के लिए कुछ कर न सकी 

पत्थर दिल निकली सरदारी

 है ऊंट भूख का बहुत बड़ा 

जीरे सी है राहत सरकारी ।'

इस प्रकार श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की पहले के काव्य संग्रह "कौवा पुराण", "दरबार ऊंघते खड़े रहे" के समानांतर काव्य संग्रह "भजकटिया के फूल" में भी संकलित कविताएं उनके इसी तेवर को बरकरार रखती है जो तेवर उनके पहले के संग्रह में देखने को मिलता है। मूल रूप से श्री मिश्र कमजोर, गरीब, मजदूर, स्त्री, बूढ़े जवान और किसान जैसे मूल मुद्दों पर अपनी कलम चलाते हैं और उनके लेखन का सबसे बड़ी विशेषता ये है कि आप शब्दों की व्यंजन में अपनी बात कह कर निकल जाते हैं और उनके गंभीर अर्थ भरे शब्दों को समझने के लिए उन्हें ध्यान से पढ़ना पड़ता है । इन सभी अर्थों में श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की काव्य कृति "भजकटिया के फूल" अपने आप में साहित्यिक सौंदर्य से परिपूर्ण बेहतरीन गीतों का संग्रह है। 

 उन्हें पढ़ते समय हमें भाषा और साहित्य का आनंद तो मिलता ही है साथ में हम आज के सरोकारों से भी परिचित होते चलते हैं। विसंगतियों से भी हमारा सामना होता है समाधान भी मिलते हैं। लेकिन हमारी समस्या ये है कि समाधान की तरफ हम केंद्रित नहीं होते। हां, एक व्यक्ति के रूप में हर किसी की मजबूरी हो सकती है कि वह पूरे सिस्टम या समाज को नहीं बदल सकता फिर भी अपने आप को बदलना तो हमारे हाथ में होता है। शायद साहित्यकार का सरोकार भी यही होता है कि कम से कम कोई एक व्यक्ति बदलेगा तो शुरुआत होगी‌। बदलाव की नीव रखना बदलाव को आगे बढ़ाना उसे एक रूप आकार देना यही साहित्य का अर्थ और साध्य है ।श्री सूर्य प्रकाश मिश्र की रचना "भजकटिया के फूल" में संकलित सभी कविताएं अपने आप में बेहतरीन है और अच्छे भविष्य की तरफ ले जाने के लिए अच्छी मार्गदर्शक हैं ।विश्वास है कि पाठक उन्हें पढ़ेंगे और सराहेंगे।एक पाठक के रूप में मेरी ओर से श्री सूर्य प्रकाश मिश्र जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

अक्षय कुमार

 रील और रियल लाइफ, दोनों ही में जिसने महारत दिखाई और सच्चा खिलाड़ी बन गये उनका नाम है अक्षय कुमार । आज अक्षय कुमार के करियर से जुड़ी कुछ मजेदार बातें होगी फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें सेगमेंट में। आपके साथ यह बातचीत लेकर हाजिर हूं मैं सीमा शाही। स्वीकार कीजिए मेरा प्यार भरा नमस्कार ।


दोस्तों, 

इस असली खिलाड़ी का जीवन ऐसा कुछ है कि उनका खिलाड़ी होना हर तरह से जस्टिफाई होता है। उनका नाम खिलाड़ी नाम से बनने वाली कई फिल्मों के क्रेडिट से जुड़ा हुआ है।

90 के दशक में सुपर हिट फिल्में खिलाड़ी , मोहरा और सबसे बड़ा खिलाड़ी में अभिनय करने के कारण, अक्षय को बॉलीवुड के एक्शन हीरो के नाम से बुलाए जाने लगा। ऐसा नहीं है कि अक्षय कुमार केवल एक्शन फिल्में ही करते हैं । उनकी रूमानियत भरी फिल्मों की भी एक लंबी सूची है। जैसे "ये दिल्लगी" और "धड़कन"। शुद्ध अभिनय पर आधारित नाटक फिल्मों मैं भी अक्षय कुमार ने अपने अभिनय के झंडे गाड़े। "एक रिश्ता" उनकी अभिनय क्षमता को दिखाने वाली एक अच्छी फिल्म है तो वही उन्हें वर्ष 2002 में अच्छी नाटकीय प्रदर्शन वाली फिल्म "अजनबी" के लिए पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ खलनायक के लिए दिया गया। अक्षय कुमार ने अपने अभिनय से यह साबित किया कि वह एक सर्वगुण संपन्न कलाकार हैं जो एक्शन रोमांस नाटक के साथ-साथ हास्य पर आधारित फिल्में भी इसी कुशलता के साथ करते हैं। पिछले दिनों उनकी हास्य पर प्रदर्शित फिल्में "हेरा फेरी" उसके बाद इसी"हेरा फेरी-2 , वेलकम के साथ-साथ बहुत सी हास्य फिल्में हैं और अक्षय कुमार की वर्सेटाइल एक्टर की छवि को पुख्ता करती है। "मुझसे शादी करोगी" "गरम मसाला" और जान-ए-मन फिल्म में हास्य के लिए अक्षय के अभिनय की प्रशंसा हुई।

 सफलता की ऊचाईयों को छूने वाले अक्षय कुमार की लगातार चार कामर्सियल फिल्में हिट हुई। इस तरह से, उन्होंने अपने आपको हिन्दी फ़िल्म उद्योग में एक प्रमुख अभिनेता के रूप में स्थापित किया। अक्षय कुमार ने बैंकाक में मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण भी लिया है जहां वो एक रसोइया की नौकरी करते थे। 

फिल्मों में प्रवेश के शुरुआती दौर में अक्षय कुमार ने मॉडलिंग भी की।   

अक्षय कुमार का जन्म अमृतसर, पंजाब में हुआ। बॉलीवुड में रहने के दौरान, अक्षय कुमार का नाम रवीना टंडन, रेखा और शिल्पा शेट्टी जैसी बड़ी अभिनेत्रियों के साथ जुड़ा। जाने माने कलाकार राजेश खन्ना और डिम्पल कपाड़िया की बेटी ट्विंकल खन्ना से उनकी दो बार सगाई हुई । इसके बाद 14 जनवरी 2001 को शादी कर ली जिनसे उनका एक बेटा है जिसका नाम है आरव।

 खबर यह भी आई थी कि उनके कई अफेयर्स के चलते ट्विंकल खन्ना ने उनको थप्पड़ भी मारा था पर बाद में अक्षय कुमार ने खुद इन खबरों का खंडन किया।


अक्षय कुमार 145 से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम कर चुके हैं।


2007 में वे सफलता की ऊचाईयों को छूने लगे, जब उनकी लगातार चार कामर्सियल फिल्में हिट हुई। इस तरह से, उन्होंने अपने आपको हिन्दी फ़िल्म उद्योग में एक प्रमुख अभिनेता के रूप में स्थापित किया।  

     

1997 में, यश चोपड़ा की हिट फ़िल्म दिल तो पागल है में मेहमान कलाकार की भूमिका निभाई, जिसके लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार में उनका नामांकन हुआ। फ़िल्म हिट हुई। वर्ष 

 1999 में, अक्षय को फ़िल्म संघर्ष' और जानवर में उनके किरदार को दर्शकों ने खूब पसंद किया। 


   वर्ष 2001 में, फ़िल्म अजनबी में कुमार ने एक नकारात्मक किरदार निभाया। उनकी फ़िल्म को काफी सराहा गया तथा बेस्ट विलेन के लिए पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।

वर्ष 2007 अक्षय कुमार के कैरियर के लिए सबसे ज्यादा सफल वर्ष रहा। उनकी फिल्म "नमस्ते लंदन", कामर्शियल नजरिए से अच्छी और सफल रही। उनकी दो अन्य फिल्में 

"हे बेबी" और "भूल भुलैया" बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट हुई।   

    उनकी फिल्मे सेल्फी , रक्षाबंधन, पृथ्वीराज चौहान, बच्चन पांडे ,छोटे मियां बड़े मियां, राम सेतु आदि वर्ष 2020-21 के दौरान आई और चर्चित रही।

दोस्तों ये था फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का आज का अंक जिसमें हम सुपर खिलाड़ी, एक्शन हीरो और हास्य के पुरोधा अक्षय कुमार के बारे में बातें कर रहे थे। उनके बारे में कुछ और बातें फिर कभी । आगे के अंक में हम किसी अन्य कलाकार अथवा फिल्म की बातें लेकर फिर से आपके सामने हाजिर होंगे। तब तक के लिए सीमा शाही को अनुमति दीजिए और स्वीकार कीजिए मेरा नमस्कार।

Monday 21 2024

No Politics Please

No Politics Please 

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय/ अंडरग्रैजुएट ऐडमिशन/ स्टूडेंट की भीड़/

कोमल- एक्सक्यूज मी कैन यू प्लीज स्पेयर योर पेन फार मी?

प्रिंस- ओह, येस,,,

(पेन देता है)

कोमल- थैंक यू ! प्लीज वेट जस्ट फॉर ए मिनट। 

प्रिंस- नो प्रॉब्लम 

(कोमल अपना फॉर्म भरने लगती है, फिर उसे फॉर्म भरने में दिक्कत आती है तो वह रुक कर कुछ सोचने लगती है) 

प्रिंस-यू आर गोइंग टू टेक ऐडमिशन ?

कोमल-यस एंड यू?

प्रिंस - येस आई एम आल्सो गोइंग टू टेक ऐडमिशन इन बीए।

कोमल-ओह, दिस इस सरप्राइजिंगली गुड न्यूज़! एक्चुअली आई वांटेड टू डू बीए फ्रॉम कानपुर यूनिवर्सिटी । बट माय फादर सडेनली केम टू इलाहाबाद आन ट्रांसफर सो आई एम हिअर इन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी।

बातचीत करते हुए दोनों अपना फॉर्म भरते हैं। फॉर्म भरने के दौरान कास्ट का कालम आने पर कोमल अपनी कास्ट लिखती है तब प्रिंस को कोमल की ऊंची कास्ट का पता चलता है। जैसा उसने सुन रखा था कि यहां ऊंची जातियों के लोग सामाजिक व्यवस्था में निम्न मानी गई जातियों के साथ भेदभाव करते हैं और कम से कम उनसे मेलजोल तो नहीं ही रखते। इसलिए वह समझ गया था कि यह मित्रता बहुत लंबी नहीं चलने वाली है। हुआ भी वैसा ही। फॉर्म भरते समय जब प्रिंस ने अपनी जाति का नाम लिखा तो उसने यह महसूस किया कि कोमल कुछ ना कहते हुए भी अपनी आंखों से वह भाव नहीं छुपा सकी जो ऊंची जाति के लोगों का नीची मानी जाने वाली जातियों के लिए होता है। थोड़ा सा दुराव का भाव। 

     प्रिंस के पिता रामेश्वर मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर तैनात हैं और चाहते हैं कि प्रिंस अपने गांव में रहकर गांव की संपत्ति की देखभाल में अपने चाचा की मदद करे और साथ में दादा-दादी के साथ भी रहे। इसलिए उसे इलाहाबाद भेज दिया गया और वह भी खुशी-खुशी दादा दादी के पास रहने के लिए आ गया। उसके घर में माहौल कुछ ऐसा था जहां जात-पात का जिक्र नहीं होता था। लेकिन उसे इन बातों की जानकारी बराबर रहती थी इसके बारे में उसके पिता प्राय घर में बातों बातों में चर्चा कर दिया करते थे।

 कोमल कानपुर के एक कॉलेज से पढ़कर आई थी और उसे भी यहां की इस व्यवस्था मैं कोई बुराई दिखती नहीं थी।         

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आज की पहली मुलाकात में दोनों में थोड़ी सी जान पहचान हो तो जाती है जिसे प्रिंस आगे बढ़ाने के बारे में सोचता है लेकिन उसे मालूम है कि यह बात अब आगे नहीं बढ़ेगी। फिर भी दोनों में बातचीत शुरू हुई थी तो चलते समय एडमिशन टेस्ट के दिन मुलाकात करने का वादा करके दोनों अपने अपने घर चले जाते हैं।  

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 एडमिशन टेस्ट के दिन प्रिंस का सेंटर सीनेट हॉल में था जब कि कोमल का परीक्षा केंद्र परीक्षा भवन में ही बनाया गया था। प्रिंस परीक्षा होने के बाद कोमल से मिलने के बारे में सोच रहा था लेकिन फिर कुछ सोचकर आगे बढ़ जाता है। हो सकता है यह भाव कोमल के मन में भी आए रहे हो कुछ कहा नहीं जा सकता। परीक्षा के बाद दोनों की काउंसलिंग संपन्न हुई और फिर क्लासेस स्टार्ट हुई । जैसा पहले अनुमान था कोमल और प्रिंस का अंग्रेजी का सेक्शन एक ही था । दोनों के सामने पड़ने पर थोड़ा सा नोटिस करते थे, कभी-कभी हेलो भी हो जाती थी लेकिन बात आई गई हो गई और फिर इन लोगों में बात बहुत आगे नहीं बढ़ी।

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अक्टूबर का महीना था। हल्की-हल्की ठंड शुरू हो रही थी। बादल साफ हो गए थे और आसमान एकदम नीला। सूरज की सुनहरी चमकदार किरणें, जब घास के तिनकों पर पड़ती तो ओस की बूंदों से अठखेलियां करती। उन पर इंद्रधनुष उग आते थे। यह इंद्रधनुष और सूरज की अठखेलियां बहुत लंबी नहीं चलती थी क्योंकि इनके अंदर एक छिपी हुई दुश्मनी भी होती थी जो घास के तिनके पर पड़ी आस को बहुत शीघ्रता से चट कर जाती थी । कभी-कभी शरारती हवाएं भी उसके कणों को मिट्टी में मिला देती थी। यह तय नहीं था कि पहले हवा आती थी या सूरज की किरणें उन्हें सुखा जाती थी। ऐसे ही पलों में प्रिंस यूनिवर्सिटी के सीनेट हाल के सामने ठीक उसी जगह पर अक्सर बैठ जाता था जहां उसने कोमल के साथ मिलकर एडमिशन फॉर्म भरे थे। उन पलों को याद करता वह खुद नहीं समझ पाता था कि इतनी खूबसूरत यादों को लेकर कोमल मन से कितनी दूर चली गई। हालांकि, वह उसको दिखाई तो रोज पड़ती थी मगर वो समझ नहीं पाता था कि वो दीवार कौन सी है जो उसे बातें करने से भी रोक देती है? ऐसे ही किसी दिन अटेंडेंस के समय कोमल का नाम बुलाए जाने पर कोई आवाज नहीं आई तो उसे लगा हो सकता है आज वह किसी काम से घर में रुक गई होगी। लेकिन धीरे-धीरे यह क्रम एक सप्ताह तक चल गया तो उसे कोमल की चिंता होने लगी। कुछ दिन और बीते। लगभग 15 दिन बाद कोमल कॉलेज आई। इस बार वह कुछ परेशान सी दिख रही थी। क्लासरूम से बाहर निकलते हुए उसे ऐसा लगा जैसे कोमल ने उसे आवाज दी हो। उसने पीछे मुड़कर देखा तो कोमल उसी को देख रही थी। प्रिंस ने आगे बढ़कर पूछ लिया "हेलो कोमल कैसी हो"? कोमल ने धीरे से कहा "ठीक ही हूं"। कुछ पल की चुप्पी के बाद प्रिंस चलने लगा तो उसे लगा कि शायद कोमल आवाज देगी लेकिन कोमल कुछ नहीं बोली। अगले दिन उसने क्लास रूम में एक बार नजर बचाकर बहाने से उसकी ओर देखा तो वह उसी की तरफ देखे जा रही थी । फिर वह अपना ध्यान क्लासरूम में लगाने का बहाना कर रहा था लेकिन उसका मन कोमल में ही लगा हुआ था। क्लासरूम से निकलते हुए इस बार कोमल ने ही आवाज दी थी "हेलो प्रिंस, मैं तुमसे कुछ बात करना चाहती हूं"। प्रिंस रुक गया था। कोमल का इस तरह आवाज देना उसे अच्छा लगा। प्रिंस ने पूछा "कहो कोमल, तुम बहुत दिनों बाद यूनिवर्सिटी आई हो , तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना"! कोमल ने कहा "मेरी तबीयत ठीक है। पिछले दिनों नहीं आने से मेरा कोर्स काफी पीछे छूट गया है क्या तुम मुझे अपने नोट्स दे सकते हो?" प्रिंस ने कहा "हां क्यों नहीं, नोट्स ले लो। लेकिन यह बताओ तुम इतने दिन तक थी कहां?" कोमल कुछ नहीं बोली। प्रिंस ने फिर पूछा, "क्या बात है कोमल ? क्या बताने लायक बात नहीं है?" कोमल ने कहा "नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बस ऐसे ही।" प्रिंस ने हंसते हुए कहा "बताने लायक हो तो कह सकती हो। मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम अपने मन की बात शेयर करोगी"। कोमल ने कहा "पिछले दिनों तुमने अखबारों में पढ़ा होगा मेरे गांव में एक लड़ाई हो गई थी जिसमें मेरे भाई को मार दिया गया था। हमारा पूरा परिवार बर्बाद हो गया प्रिंस। हम कहीं के नहीं रहे।" प्रिंस अवाक् था । कुछ देर बाद उसने पूछा "वह जो एक गांव में कुछ जातीय मुद्दे को लेकर गोली चल गई थी, क्या वही मामला है?" कोमल ने कहा "हां "। इस मामले को प्रिंस ने भी अखबार में पढ़ा था और उसे मालूम था कि एक नीची जाति के लड़के से विवाद में ऊंची जात के लड़के ने उसको शूट कर दिया था । जिस पर नीची जाति के लोगों ने आक्रोश में उस परिवार के तीन लोगों की हत्या कर दी थी और बाद में पुलिस ने नीची जाति की पूरी आबादी को घेराबंदी करके बहुत बुरी तरह मारा पीटा था और उनके घर में आग लगा दिया था। बाल , वृद्ध और महिलाओं को पकड़ कर जेल में डाल दिया था। इस मामले में बहुत उच्च स्तरीय जांच हुई थी। मामला लखनऊ और दिल्ली तक पहुंचा था और केंद्र सरकार ने भी इसमें हस्तक्षेप करके जांच के लिए कमेटी बैठा दी थी। ये मुद्दा लोकसभा और विधानसभा में भी उठा उठा था । प्रिंस की रूह कांप गई । उसने अपने सामने अपनी जाति के दुश्मनों की बेटी को देखा। उसने यह भी देखा कि वह आज उससे मदद मांग रही है। कुछ पल के लिए रुक कर प्रिंस ने कहा "ठीक है कोमल, मैं तुम्हें अपने नोट्स लाकर कल दे दूंगा। लेकिन ये बताओ यह मामला क्या था"? पता नहीं क्यों प्रिंस को यह लगा कि वह कोमल के मुंह से सुनना चाहता है कि दोषी कौन है? कोमल ने बताया "प्रिंस मैं बहुत दुखी हूं कि मेरा भाई मर गया। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि इन्हीं लोगों ने गलती भी की थी। लेकिन इसका मतलब इस तरह नरसंहार किया जाए यह भी तो ठीक नहीं है?" प्रिंस ने थोड़ी देर रुक कर कहा "कोमल प्रजातांत्रिक देश में ऐसी बातें दुखदाई हैं लेकिन जनता अगर गलती करे यह तो स्वाभाविक हो सकता है लेकिन जब प्रशासन और पुलिस सुनियोजित ढंग से किसी खास जाति को निशाना बनाती है तो यह बहुत बड़े खतरे की ओर संकेत करता है । मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं हम और हमारी पीढ़ी गलत रास्ते पर चल पड़े हैं।" कोमल लंबी आह भरती है, फिर उसके मुंह से बस इतना ही निकलता है कि "पता नहीं, मेरा तो घर बर्बाद हो गया"। प्रिंस चुप रहा। थोड़ी देर साथ में बैठने के बाद दोनों अपने-अपने क्लास में चले गए । अगले दिन कोमल ने काफी इंतजार किया लेकिन प्रिंस क्लास में दिखाई नहीं पड़ा। कोमल ने यही सोचा कि शायद प्रिंस उसे नोट्स नहीं देना चाहता इसलिए वह यूनिवर्सिटी नहीं आया। अगले दिन प्रिंस क्लास रूम में दिखाई दिया तो कोमल ने पूछ ही लिया "प्रिंस, मेरा नोट्स ले आए हो?" प्रिंस ने कहा "सॉरी कोमल मैं नोट्स लेकर उसी दिन तुम्हारे गांव में अपने ननिहाल में था। जब यह झगड़े शुरू हुए तो मैं किसी तरह वहां से बचकर भाग आया था। लेकिन मेरे नोट्स मेरे मामा के घर में ही छूट गए थे। जब उन लोगों ने उनकी बस्तियां जलाई तो मेरी किताबें कापियां और नोट्स जो वहां मैं पढ़ने के लिए लेकर गया था वही जलकर खाक हो गए ।" कह कर प्रिंस चुप हो गया। कोमल कुछ देर चुप रहने के बाद "चलती हूं" कह कर निकल गई। प्रिंस ने उसे जाते हुए देखा भी नहीं।

[17/10, 17:43] Mohan Dhanraj: (2)

दूसरे सेमेस्टर के परीक्षाओं की तैयारी लगभग हो चली थी। परीक्षा की तारीख भी आ गई थी। मई का महीना था। सूरज में काफी तपिश आ चुकी थी । पेड़ पौधों में हरियाली की जगह सूखी डंठल मौसम को वीरान बना रही थी। हां, आम के बाग गुलजार थे। कभी-कभी कोयल बोलती थी , दिन में दोपहरियां सूनी और सड़कें वीरान नजर आती थी। इन दिनों विद्यार्थी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्राय: विश्वविद्यालय आने की बजाय घर में ही तैयारी में जुटे हुए थे । प्रिंस को इन दिनों यही बेचैनी थी कि कोमल काफी दिनों से दिखाई नहीं पड़ी और पता नहीं उसके घर में क्या चल रहा है। जिस दिन प्रवेश पत्र लेने के लिए प्रिंस यूनिवर्सिटी गया था उसी दिन उसे कोमल दिखाई पड़ी तो उसने पूछ ही लिया, "कोमल तुम्हारी तैयारी कैसी चल रही है?" कोमल ने बताया कि वह इस साल प्रवेश पत्र तो लेकर जा रही है लेकिन वह इम्तिहान नहीं देगी। वह इस साल ड्रॉप लेने वाली है। यह सुनकर प्रिंस सन्न रह गया। थोड़ी देर उसे कुछ सूझा ही नहीं फिर बाद में उसने पूछा कोमल ड्रॉप क्यों कर रही हो? कोमल ने बताया, "घर के माहौल को बहुत कोशिश करने के बावजूद बदला नहीं जा सका। घर में एक साथ तीन-तीन लोगों के मर्डर के कारण घर का माहौल गमगीन और भय से व्याप्त है। ऐसे में पढ़ने के बारे में सोच पाना भी संभव नहीं है। जब-जब पढ़ने बैठती हूं तब तब वही दृश्य बार-बार आंखों के सामने आ जाते हैं और पढ़ने लिखने के बजाय एक ऐसी तकलीफ चारों तरफ तारी हो जाती है जो पूरी दुनिया में होने वाली हर प्रकार की घुटन से अधिक डरावनी और दुखदाई होती है। माता-पिता का चेहरा उनका रात दिन का रोना देखा नहीं जाता। मैं स्वयं भी अपने आप को नियंत्रण नहीं कर पा रही हूं ऐसे में पढ़ाई लिखाई के बारे में सोचना कोई मायने नहीं रखता।" कह कर कोमल फूट पड़ी। बहुत देर तक रोती रही। प्रिंस ने उसे शांत करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसका रोना बंद नहीं हो रहा था। काफी देर के बाद जब वह शांत हुई तो उसने कहा, "सॉरी प्रिंस मैंने तुम्हें भी परेशान कर दिया । देखो मेरी हालत तो सुधरने वाली नहीं है समय बताएगा। तुम अपना ध्यान रखना।" कह कर वह चली जाती है प्रिंस उसे जाते हुए देखता रहा। उसके जाने के बाद प्रिंस बहुत देर तक वहीं बैठा सोचता रहा कि क्या से क्या हो गया। वहां से उठकर घर की ओर चला तो रास्ते में एक पार्क में जाकर बैठ गया क्योंकि उसका मन घर जाने के लिए जैसे रोक रहा था। उसके हृदय में कुछ था जो टूट चुका था।

[21/10, 07:45] Mohan Dhanraj: (3)


दूसरे सेमेस्टर की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थी। जून का महीना शुरू हो चला परंतु इस बीच विश्वविद्यालय नहीं जाने और एक दूसरे का मोबाइल नंबर नहीं लेने के कारण दोनों में बातचीत नहीं हो पाई थी। इधर प्रिंस ने एक तरफा निर्णय ले लिया था कि वह सेमेस्टर की परीक्षाएं ड्रॉप कर देगा क्योंकि उसे दृढ़ विश्वास था कि कोमल भी परीक्षा ड्रॉप कर रही है। यदि वह परीक्षा देकर आगे निकल गया तो कोमल का साथ छूट जाएगा। यह बात कुछ अद्भुत सी थी कि दोनों में किसी भी प्रकार का साथ में चलने का वादा या प्रेम जैसे भाव एक दूसरे को जाहिर नहीं किया था फिर भी प्रिंस को उसके बगैर आगे बढ़ने में दिलचस्पी खत्म होती जा रही थी। कभी-कभी उसे यह जरूर लगता था कि कोमल से उसके किसी भी प्रकार के रिश्ते की कल्पना बेमायने है लेकिन फिर भी वह अपने मन के वशीभूत अपने रास्ते पर आगे बढ़ गया। इस प्रकार इस सेमेस्टर की परीक्षाओं को उसने भी ड्रॉप कर दिया । जून के महीने में सब जगह छुट्टियां हो जाती है इसलिए प्रिंस अपने मामा के गांव चला गया । कोमल कानपुर जा चुकी थी।एक दोपहर को प्रिंस अपने मामा के घर पर बैठा हुआ था तब तक पुलिस की गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी में से कांस्टेबल राम सिंह ने उतरकर आवाज दिया "अरे ओ रामचरण, चलो तुमको साहब ने थाने पर बुलाया है। रामचरण प्रिंस के मामा थे और वह इस समय खाना खाने बैठे ही थे। प्रिंस ने बाहर निकल कर उनसे पूछा "क्या बात है दीवान जी, रामचरण को किस लिए बुलाया गया है?" कांस्टेबल राम सिंह गरज कर बोला "तुम कौन हो? रामचरण को भेजो ?" प्रिंस ने कहा "दीवान जी, मैं उनका भांजा हूं मामा जी खाना खा रहे हैं। आप चलिए मैं मामा जी को लेकर आता हूं ।"राम सिंह ने कहा "तुम अपनी बकवास बंद करो नहीं तो कान के नीचे एक बजाऊंगा अभी और उसको कहो कि वो सीधे जाकर जीप में बैठ जाए।" प्रिंस ने कहा अच्छा दीवान जी आप ऐसे नहीं कह सकते मैं भी विश्वविद्यालय का स्टूडेंट हूं और मुझे भी कानून पता है।" मैंने कहा कि आप चलिए मैं मामा जी को लेकर आऊंगा। आप इस तरह बात क्यों कर रहे हैं"? इतने पर राम सिंह के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा। उसमें प्रिंस को पकड़ कर गाड़ी में बैठा लिया और रामचरण को गालियां देता हुआ दरवाजा पीटने लगा। राम सिंह के इस तरह व्यवहार करने से इधर प्रिंस अचरज में था तो वही रामचरण घबरा गया और खाना छोड़कर बाहर आ गया। रामचरण ने कहा "दीवान जी, बस में कपड़े पहन कर आता हूं। एक मिनट का समय दीजिए।" राम सिंह बुदबुदाता हुआ आकर गाड़ी में बैठ गया। रामचरण के गाड़ी में आकर बैठते ही राम सिंह ने कहा "ड्राइवर चलो थाने ।" ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट की और चल पड़ा। इधर प्रिंस ने सारा मामला समझने के बाद अपने आप को नियंत्रण में रखा हुआ थाने तक पहुंच गया। थानेदार राम प्रताप मिश्रा ने पूछा "रामचरण तुम्हारा ही नाम है?" रामचरण के हां कहने पर थानेदार ने कहा "चलो यहां साइन करो।" प्रिंस ने पूछा

" दरोगा जी मैं डॉक्यूमेंट पढ़ना चाहता हूं।" दरोगा ने प्रिंस की तरफ घूरते हुए पूछा "क्या पढ़ोगे जी? क्या नाम है तुम्हारा ? क्या करते हो?" इस पर प्रिंस ने अपना नाम बताया और कहा कि "मैं बीए प्रथम वर्ष का छात्र हूं ।" थानेदार ने कहा "बीए का छात्र हो तो क्या जानते हो।" प्रिंस ने बड़ी विनम्रता से कहा "सर आप मुझसे क्या जानना चाहते हैं?" दरोगा ने कहा "ज्यादा भोले मत बनो और यहां हमारे काम में बाधा डालोगे तो तुमको पकड़ के इसी के साथ अंदर कर देंगे और तुम्हारी जमानत कराने भी कोई नहीं आएगा। रामचरण तुम साइन करो इसको तो मैं बाद में देख लूंगा" कड़कते हुए थानेदार ने कहा। प्रिंस पीछे की तरफ मुंह करके थोडा मुस्कुराया फिर थानेदार की तरफ मुड़कर देखा। रामचरण ने हस्ताक्षर कर दिया। प्रिंस ने थानेदार से पूछा "सर अब हम लोग जा सकते हैं ?" थानेदार ने कहा "भागो यहां से और यहां दिखाई नहीं पड़ना नहीं तो मार के हाथ पैर तोड़ दूंगा"। प्रिंस ने मामा जी से कहा ,"मामा जी चलिए घर चलते हैं" प्रिंस के चेहरे पर कुछ मुस्कराहट सी थी। थानेदार निकर कर कहा क्यों तुमको हंसी आ रही है मैंने कोई चुटकुला सुनाया है क्या?" प्रिंस ने कहा "नहीं सर मैं मुस्कुरा नहीं रहा हूं थोड़ा परेशान हूं"। प्रिंस रामचरण को लेकर अपने घर के लिए निकल दिया। थानेदार ने थोड़ी देर कुछ उलझन में रहने के बाद कांस्टेबल राम सिंह से पूछा "यह लड़का मुस्कुरा क्यों रहा था"? राम सिंह ने कहा "पता नहीं सर लेकिन मुझे भी उसकी हंसी में कुछ दाल में काला लग रहा है।"थानेदार ने कहा "पता करो यह कौन है और क्या करता है?" "जी सर मैं पता करता हूं" राम सिंह ने कहा। प्रिंस ने पूछा "मामा जी, आपने जहां हस्ताक्षर किया है उस कागज पर क्या लिखा था?" रामचरण ने कहा "प्रिंस बेटा, तुम तो जानते हो मैं इतना पढ़ा लिखा हूं नहीं कि पूरा पढ़ पाऊं। कुछ समझ में नहीं आया । प्रिंस ने कहा "मामा जी, आपने जहां साइन किया है उसमें लिखा था कि पिछले मई महीने जो गांव में झगड़ा हुआ था उसमें मैंने जो बयान दिया है वह हमारे गांव के लोगों के दबाव में दिया है। मैं अपना बयान वापस लेना चाहता हूं। प्रिंस ने कहा "मामा जी दरोगा ने आपसे गलत कागज पर साइन करा लिया है लेकिन कोई बात नहीं। फिर उसने कुछ सोचते हुए थोड़ी देर बाद बुदबुदाया, "अभी दरोगा को और मजा आने वाला है।" रामचरण ने कहा "बेटा तुम फिक्र ना करो जो होगा देखा जाएगा"। प्रिंस ने कहा "मामा जी, आप बहुत भोले हैं। अभी मैं पापा से बात करूंगा तो इनकी थानेदारी ठिकाने लगा दूंगा। आप घर चलिए मैं बताता हूं।" रामचरण ने कहा "नहीं प्रिंस, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे। बेटा तुम लोग तो चले जाओगे हमको तो यहां सब दिन रहना है। यह लोग हमें आगे भी परेशान करते रहेंगे। तुम लोग कितनी बार यहां दौड़-दौड़ कर आओगे" रामचरण कुछ सोचता हुआ चुपचाप प्रिंस को लेकर घर आ गया।

इधर राम सिंह ने गांव के मुखबिर तारा सिंह को थाने में बुलाकर पूछा तारा, यह रामचरण के घर में एक लड़का आया है, उसके बारे में तुम कुछ जानते हो?" तारा ने कहा "हां साहब यह उसकी बहन का लड़का है । सुना है रामचरण का बहनोई दिल्ली में कोई बहुत बड़ा अफसर है और यह लड़का यही इलाहाबाद में पड़ता है।"

"इसका बहनोई बहुत बड़ा अफसर है? कहां है? जरा पता करो। कहीं इसीलिए तो नहीं ये सपोला मुस्कुरा रहा था! थानेदार साहब को जानकारी चाहिए इसके बारे में पता करो"। "जी सर अभी पता करता हूं" तारा सिंह ने कहा। तारा सिंह ने अमरचंद को फोन लगाकर पूछा तो मालूम हुआ कि रामचरण का बहनोई यानी प्रिंस का पिता दिल्ली में गृह मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी पद पर पदस्थ है। जब राम सिंह को यह पता चला, राम सिंह थोड़ा नर्वस होते हुए बोला "गइली भैंसिया पानी में।"

राम सिंह ने थानेदार मिश्रा को जब यह बताया तो थानेदार गाली देते हुए "बोला यह साले हरामी पूरी बात बताते भी नहीं। लगता है यह लड़का हमें फंसा देगा। अभी यहां का बवेला चल ही रहा है। इसी को शांत करने के लिए मुझे यहां भेजा गया है और लगता है पहली ही चाल गलत होने वाली है"।

[21/10, 08:33] Mohan Dhanraj: (4)


(प्रिंस के मामा का घर, प्रिंस और उसके मामा रामचरण दिल्ली जाने के लिए निकलते हैं। ट्रेन का सफर करके घर पहुंचते हैं। प्रिंस अपनी मां से मिलता है और रामचरण अपनी बहन से। फिर उनकी बहन हाल-चाल पूछने के बाद कहती हैं आराम करो । तुम्हारे जीजा जी शाम को आएंगे । प्रिंस की मां प्रिंस का हाल-चाल पूछती है, पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछती है और कहती है बेटा तुम लोग चाय नाश्ता कर के आराम करो)


(शाम को प्रिंस के पिता नवीन चंद्रा घर आते हैं कपड़े बदलने के बाद सभी चाय पीने बैठते हैं)


"हां तो साले साहब बताइए क्या हाल-चाल है ? आपके गांव में तो खूब बवाल मचा हुआ है"नवीन चंद्र ने बहुत हल्के-फुल्के ढंग से पूछा। रामचरण बताते हैं "जीजा जी, पुलिस वालों ने पूरी बस्ती को आग लगा दिया था आपको हमने बताया ही था और अब सारे किए धराएं पर लीपा पोती करके मामले को रफा-दफा करने की कवायद चल रही है।" प्रिंस ने कहा "पापा, आप कहते थे ना कि गांव वाले जरूर कुछ गड़बड़ किए होंगे। आप तो यह नहीं मानते थे कि पुलिस इस प्रकार ज्यादती कर सकती है। लेकिन मैंने अपनी आंखों से देखा है। उन लोगों ने मामा जी को जबरदस्ती खाने पर से उठा लिया, खाना भी नहीं खाने दिया और थाने ले जाकर गलत सलत बयान पर मामा जी का सिग्नेचर करा लिया । मैंने बीच में थोड़ा पूछताछ करने की कोशिश की तो पुलिस वाले ने मुझे मारने पीटने की धमकी दी और मेरे साथ भी बदसलूकी किया है । पापा दिस इस अनफेयर।" नवीन चंद्रा ने पूछा "ऐसा क्यों हुआ था ?" प्रिंस ने बताया कि "एक पुलिस कांस्टेबल ने मामा को बुलाया और कहा कि चलो थानेदार साहब ने बुलाया है तो मैने बस इतना ही कहा था कि मामा जी खाना खा रहे हैं। खाना खा लेंगे तो मैं उनको लेकर आ जाऊंगा। इतनी सी बात पर उस पुलिस वाले ने मुझे कहा कि "चुप रहो नहीं तो कनपटी के नीचे बजा दूंगा। अब बताइए यह कोई बात है? एक आम नागरिक को भोजन पर से उठाने का कौन सा नियम है? क्या हम अपराधी हैं? कम से कम खाने की थाली पर से उठाना तो बहुत अन्याय है। मैं इसका विरोध करता हूं? आई फेल्ट वेरी बैड ऑफ इट!" कह कर प्रिंस शांत हो गया। नवीन चंद्रा ने थोड़ा कुछ सोचा फिर उन्होंने पुलिस कमिश्नर को फोन लगाया और थानेदार मिश्रा को ताकीद करने के लिए कहा। फोन रखने के बाद बोले "चलो तुम लोग परेशान मत हो सब ठीक हो जाएगा ।मैंने कमिश्नर से बोल दिया है, और हां, जो तुम्हारी एफआईआर हुई है उसकी कॉपी मुझे ला कर दो। मैं वकील से बात करता हूं । इस तरह की बदमाशियों के खिलाफ कुछ तो करना पड़ेगा।

[21/10, 08:38] Mohan Dhanraj: (5)


(कोमल का घर उसके माता-पिता बैठे हुए हैं उसके चाचा शिवनारायण मिश्रा का आना)


शिवनारायण आकर चुपचाप बैठ जाते हैं। थोड़ी देर में कोमल की मम्मी पूछती हैं "क्या हाल है भैया?" शिवनारायण बताते हैं कि भाभी बड़ी वाली बुआ जी के लड़के जो इटावा में थानेदार थे उनकी पोस्टिंग यही अपने थाने में हो गई है। उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन कर लिया है। भैया बता रहे थे कि उनकी पोस्टिंग यहां के झगड़े को समाप्त करने के लिए खास तौर से हुई है। कोमल ने कहा "चाचा झगड़ा समाप्त हो जाए अच्छी बात है लेकिन इससे हमको क्या मिलने वाला है? हमारा तो जो जाना था चला गया। शिवनारायण ढांढस बंधाते हैं और कहते हैं कि देखो कोमल दुख की बात तो है लेकिन अभी पुलिस केस चल ही रहा है। पता नहीं कौन-कौन फंसेगा और कौन बचेगा। तब तक मोबाइल की घंटी बजती है। शिवनारायण फोन उठाते हैं। "हेलो"

" हां भैया, प्रणाम"

 "सब ठीक है, आपका क्या समाचार है?".... "ज्वॉइनिंग हो गई?" ...

"अरे" ....

"अच्छा ?"

" ध्यान रखिएगा"

 "जी ठीक है, प्रणाम"

 फोन काटने के बाद कोमल पूछती है "चाचा जी, क्या हुआ?" शिवनारायण "बोले थानेदार भैया का फोन था। कह रहे थे तुम लोग यहां के लोगों के बारे में ठीक-ठीक पता करो, कौन-कौन कहां क्या कर रहा है? बता रहे थे इधर कोई लड़का आया था जो किसी बड़े अधिकारी का बेटा है। उसको थाने पर ले आए थे। उसी से कुछ वो शंका में हैं। कुछ गड़बड़ होने की संभावना दिख रही है।" कोमल चुपचाप सुन रही थी । कोमल की मां ने कहा, "अब और क्या गड़बड़ होगी?" शिवनारायण बोले "पता नहीं भाभी, थानेदार भैया को सस्पेंड कर दिया गया है। भैया बहुत परेशान है अब तो रही सही उम्मीद भी गई। पता नहीं कौन-कौन फंसेगा और जेल की चक्की पीसेगा?

घर में सन्नाटा पसर जाता है कोई कुछ नहीं बोलता।

Friday 18 2024

आलिया भट्ट

 वर्ष 2020-21 के दौरान चर्चा में आई फिल्म "हाईवे" से नाम कमाने वाली एक्ट्रेस आलिया भट्ट इन दिनों उभरती हुई सितारा है। फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातों के कार्यक्रम में आज हम आलिया भट्ट के जीवन और उनके अभिनय के बारे में आपसे कुछ खास बातें करेंगे। तो अपने सेट का वॉल्यूम बढ़ा लीजिए और स्वीकार कीजिए सीमा शाही का नमस्कार!

दोस्तों,

आलिया भट्ट फिल्म निर्देशक महेश भट्ट और अभिनेत्री सोनी राज़दान की बेटी हैं। इनका जन्म 15 मार्च 1993 को मुंबई में हुआ था। मशहूर सिने स्टार पूजा भट्ट उनकी बड़ी बहन हैं।      

   आलिया को बचपन से ही अभिनय का शौक था इसलिए उन्होंने श्यामक डाबर के संस्थान में नृत्य सीखने के लिए एडमिशन लिया ।  

 उन्होंने अपने जीवन की पहली फिल्म में अभिनेत्री प्रीति जिंटा के बचपन का रोल किया था जो उनके पिता महेश भट्ट स्वयं ही बना रहे थे। सही मायने में आलिया भट्ट ने वर्ष 2012 में  

 करण जौहर की फिल्म "स्टूडेंट ऑफ द ईयर" में प्रमुख भूमिका निभाई और इसी फिल्म को आलिया भट्ट की पहली फिल्म माना जा सकता है। इस फिल्म में उनके साथ सिद्धार्थ मल्होत्रा और वरुण धवन सह अभिनेता थे। फिल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर एक प्रेम त्रिकोण कहानी पर आधारित थी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 960 मिलियन डॉलर की कमाई की और एक व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म बन गई। फिर भी इस फिल्म को

दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली और ना ही आलोचकों ने इसकी सराहना मिल सकी जिस कारण आलिया भट्ट को बेहतर भूमिका निभाने के लिए कुछ और जुनून सवार हो गया। इसी जुनून की परिणति इम्तियाज अली की फिल्म हाईवे में मिली। आलिया भट्ट के बेहतरीन प्रदर्शन से सजी फिल्म हाईवे एक बेहतरीन कला फिल्म के रूप में दर्ज की गई। इस फिल्म में आलिया ने एक अकेली किशोर लड़की का अभिनय किया है जो अपने अपहरण के बाद उसकी खोज में लगी पुलिस से बचकर अपहरण कर्ताओं के साथ जाने के लिए गाड़ी में ही छुप जाती है । बाद में अपहरणकर्ताओं द्वारा पूछने पर साफ कह देती है कि उसे घर वापस नहीं जाना है। यह फिल्म कहानी के इस यू टर्न लेने के साथ ही दर्शकों के मन में एक उत्सुकता जगा देती है कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि एक लड़की अपहरण कर्ताओं के प्रति सहानुभूति रख रही है और अपने घर को त्याग देना चाहती है! दरअसल ,फिल्म की कहानी में आलिया भट्ट एक रईस परिवार की बेटी है लेकिन वह परिवार अधिक पैसे कमाने के लालच में बेटी की भावनाओं का ध्यान नहीं रखता । उसके परिवार के आसपास के मित्र रिश्तेदार उसका शारीरिक शोषण करते हैं। वह इस बारे में अपनी मां से बात करती है लेकिन वो भी उसकी बात को अनदेखा कर देती हैं क्योंकि उन्हीं लोगों से उनको रुपए मिलने की संभावना होती है। इस प्रकार फिल्म की कहानी आज के सामाजिक परिवेश में पैसे के सामने पारिवारिक मूल्यों को नष्ट होते हुए दिखाने में कामयाब हुई है। यही कामयाबी आलिया भट्ट के अभिनय की कामयाबी भी बन गई है। यह कहना मुश्किल है कि इस फिल्म की सफलता के पीछे फिल्म की कहानी है , आलिया भट्ट का प्रदर्शन है या यह निर्देशक के फिल्मोग्राफी का कमाल है। लेकिन हर फ़िल्म समीक्षक को यह तो मानना पड़ेगा कि फिल्म में आलिया भट्ट की बेहतरीन भूमिका प्रशंसा के काबिल रही है। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म हाईवे बहुत अधिक नहीं चली लेकिन आलिया ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड जीता और समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नामांकन भी प्राप्त किया। उसके बाद आलिया भट्ट शॉर्ट फ़िल्म गोइंग होम मैं दिखाई दी जो महिलाओं की सुरक्षा पर बनाई गई फिल्म थी।


धर्मा प्रोडक्शंस के साथ अपने सहयोग को जारी रखते हुए, आलिया भट्ट ने 2014 आई रोमांटिक फिल्म्स 2 स्टेट्स और हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया में अभिनय किया। 


   बॉलीवुड में उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले। उन्होंने सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरुण धवन, ऋषि कपूर, रणदीप हुड्डा, अर्जुन कपूर, रोनीत रॉय, रितेश देशमुख, शाहिद कपूर, दिलजीत डॉसंज, रणबीर कपूर और शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय कलाकारों के साथ काम किया है। वह एक मॉडल के रूप में भी काम करती है और कई मॉडलिंग असाइनमेंट करती है। इसके अलावा आलिया एक गायक कलाकार भी हैं। , आलिया अपनी खूबसूरती की वजह से युवाओं में अधिक लोकप्रिय है। इनके करोड़ों चाहने वाले है, जिनमें से अधिकतर युवा है। 2018 मै रिलीज़ हुई फिल्म "राज़ी" ने एक अरब से अधिक कमाई की जो महिला प्रधान फिल्म थी। इस फिल्म की कमाई से हिंदी सिनेमा में आलिया के कद का पता चलता है। आलिया भट्ट ने 2019 में "गली ब्वाय" में रणवीर सिह के साथ कार्य किया । उसके बाद कई सितारों से सजी हुई फिल्म कलंक में आलिया भट्ट के अभिनय को अच्छी पहचान मिली ।


 फिल्म उड़ता पंजाब काफी विवादों के साथ चर्चा में रही। अब चर्चाएं जैसी भी हो, कहा जाता है कि "बदनाम भी होंगे तो , क्या नाम ना होगा" इसी तर्ज पर जब उड़ता पंजाब फिल्म चर्चा में आई तो उसकी चर्चा के साथ-साथ आलिया भट्ट के अभिनय की भी खूब चर्चा रही।  

 आलिया भट्ट की सफल फिल्मों की श्रृंखला में रोमांटिक कॉमेडी "बद्रीनाथ की दुल्हानिया" का विशेष उल्लेख किया जा सकता है जो वर्ष 2016 में आई। यह एक स्वतंत्र युवती की कहानी है, जो उसके बॉडीगार्ड मंगेतर से उम्मीदों के अनुरूप अपने आप को ढालने से इनकार करती है। इस फिल्म के लिए आलिया को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए एक और फिल्मफेयर नामांकन प्राप्त हुआ। मेघना गुलज़ार की 2018 में आई जासूसी थ्रिलर फिल्म "राज़ी" ने आलिया भट्ट को एक बेहतर अभिनय का अवसर दिया। फिल्म "राजी" महिला प्रधान कहानी पर आधारित है। ये फिल्म भी सबसे अधिक कमाई करने वाली हिंदी फिल्मों में से एक साबित हुईं और इसकी सफलता ने बॉक्स ऑफिस पर सबसे सफल फिल्म होने का झंडा लहराया।  


आलिया भट्ट ने 2019 की शुरुआत में अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी बनाई जिसका नाम अनन्त सनशाइन प्रोडक्शंस है। उस वर्ष उनकी पहली उपस्थिति ज़ोया अख्तर के गली ब्वाय में रणवीर सिंह के साथ थी।                        

2018 में, भट्ट ने सह-कलाकार अभिनेता रणबीर कपूर को डेट करना शुरू किया। उसने 14 अप्रैल 2022 को मुंबई में एक पारंपरिक समारोह में शादी की। और 6 नवंबर 2022 को, उनके पहले बच्चे, एक लड़की का जन्म हुआ।


2018 और 2019 में, जीक्यू के भारतीय संस्करण ने उन्हें देश के 50 सबसे प्रभावशाली युवाओं में से चित्रित किया ।

     मार्केट रिसर्च फर्म YouGov ने अपने 2016 के संस्करण में भारत के नौवें सबसे प्रभावशाली सेलिब्रिटी का नाम दिया। यह थी अदाकारा युवा अभिनेत्री आलिया भट्ट के अभिनय यात्रा की एक संक्षिप्त सी चर्चा। फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के इस सेगमेंट का सफर यहीं पर रुक रहा है। अगले अंक में आपके साथ फिर किसी नए एक्टर या एक्ट्रेस या किसी नई फिल्म की चर्चा लेकर हम फिर से हाजिर होंगे। तब तक के लिए सीमा शाही को दीजिए इजाजत और स्वीकार कीजिए मेरा नमस्कार।

Tuesday 15 2024

प्रियदर्शन

 दक्षिण भारतीय भाषाओं में सफल फिल्में देने वाले पटकथा लेखक और डायरेक्टर प्रियदर्शन ने हिंदी सिनेमा में 1990 के बाद कदम रखा और मुंबई फिल्म जगत में उन्होंने एक नए युग की शुरुआत की। इस पर हम आगे अपनी बात जारी रखेंगे। फेअरफ्लिक्स के फिल्मी बातों के क्रम में मैं सीमा शाही आप सबका बहुत-बहुत स्वागत और इस्तकबाल करती हूं। आप सभी को मेरा नमस्कार, आदाब और 

सत श्रीअकाल,


दोस्तों,

जैसा कि मैंने कहा कि हिंदी सिनेमा में नए युग की शुरुआत कथा लेखक और डायरेक्टर प्रियदर्शन ने 1990 के दशक में की । इसके पहले मुंबई में रोमांटिक थ्रिलर, रहस्य और रोमांच या फिर हास्य फिल्में परंपरागत रूप से बनती थी। लेकिन प्रियदर्शन ने इस प्रकार के कई थीम को मिलाकर एक फिल्म बनाया जो गंभीर भी थी, हास्य भी थी रोमांटिक भी थी और कहीं-कहीं उसमें रहस्य रोमांच और थ्रिल भी दिखाई पड़ती है। ऐसी फिल्में दर्शकों को सिनेमा हॉल तक ले जाने में बहुत कामयाब रही और अपने नए पन के कारण अच्छी कमाई करने वाली साबित हुई। एक ही दो फिल्मों के बाद हिंदी सिनेमा जगत में प्रियदर्शन ने अपना एक मुकाम बनाया, एक ऐसा मुकाम जो विरले लोगों को ही नसीब हो सकता है।

आगे बढ़ने से पहले हम आपको बता दें कि प्रियदर्शन सोमन नायर का जन्म 30 जनवरी, 1957 को केरल के तिरुवनंतपुरम में हुआ ।प्रियदर्शन ने सरकारी मॉडल स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा और तिरुवनंतपुरम विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम ए किया। उनके पिता, एक कॉलेज में लाइब्रेरियन थे, उन्हीं की प्रेरणा से प्रियप्रदर्शन के मन में किताबों के प्रति लगाव पैदा हुआ । कॉलेज के दिनों में प्रियदर्शन ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए छोटे छोटे नाटक की स्क्रिप्ट लिखना शुरू किया। उनकी इस कला का विकास धीरे-धीरे फिल्मों के लिए कथा और पटकथा लेखन के रूप में हो गई।उनके मित्र मोहनलाल ने

प्रियदर्शन को फिल्म उद्योग में प्रवेश का रास्ता बनाया। प्रियदर्शन ने सहायक पटकथा लेखक के रूप में काम करना शुरू किया और अंततः सफल पटकथाएं लिखने में कामयाब हुए।

प्रियदर्शन ने 1990 में अभिनेत्री लिसी से शादी की और 2016 में तलाक हो गया। उनके दो बच्चे हैं, कल्याणी और सिद्धार्थ।

प्रियदर्शन ने मुंबई में जो पहली हिंदी फिल्म बनाई उसका नाम था "मुस्कुराहट" और यह वर्ष 1992 में रिलीज हुई। लेकिन यह कोई खास चर्चा का विषय नहीं बन सकी। फिर उनकी दूसरी हिंदी फिल्म आई "गर्दिश" जो 1993 में रिलीज हुई। ये मलयालम फिल्म "किरीडम" का रीमेक थी । इस फिल्म से मुंबई के सिनेमा जगत में थोड़ी सी जुंबिश हुई क्योंकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भी ठीक-ठाक प्रदर्शन कर रही थी और दर्शकों ने भी इसे पसंद किया। इसका कारण था इसकी बेहतरीन पटकथा, इसके पात्र और निश्चित तौर पर प्रियदर्शन की डायरेक्शन की स्टाइल। इस फिल्म में मुख्य किरदार थे अमरीश पुरी, जैकी श्रॉफ और डिंपल कपाड़िया। इसके बाद वर्ष 2000 में प्रदर्शित फिल्म "हेरा फेरी" ने तो हिंदी फिल्मों में धमाल सा मचा दिया। इस फिल्म में थे परेश रावल, अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, तब्बू और असरानी। इस बार प्रियदर्शन की फिल्मोग्राफी की कला ने वास्तविक धमाल कर दिया। उनकी कहानी में इन किरदारों ने अपने-अपने स्टाइल से जो हास्य प्रस्तुत किया वह बिल्कुल अलग तरह का था। देखा जाए तो यह फिल्म एक गंभीर विषय को लेकर चल रही थी जबकि इसकी शैली पूरी तरह से हास्य पर आधारित थी और इसकी परिणति पुनः एक गंभीर घटना की ओर जाकर होती है और यहीं से हेरा फेरी -2 के लिए रास्ता खुल जाता है। अब तो हेरा फेरी दो भी आगई और दर्शकों के द्वारा सराही गई है। आज भी इन फिल्मों को लोग अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बड़ी रुचि से देख रहे हैं और देखा जाए तो सभी चैनलों पर इनके व्यूज बढ़ते हुए क्रम में चल रहे हैं। इसके बाद प्रियदर्शन की फिल्म हंगामा ने वर्ष 2003 में रिलीज होते ही सिनेमा स्क्रीन पर फिर हंगामा मचाया इस फिल्म को भी दर्शकों ने बहुत पसंद किया और अब तक प्रियदर्शन का नाम सिनेमा प्रेमियों की नजर में और दिल में उतर चुका था। अब लोग प्रियदर्शन की फिल्में ढूंढ ढूंढ कर देखने लगे थे। हंगामा फिल्म में परेश रावल के साथ अक्षय खन्ना, आफताब शिवदासानी, टीकू तलसानिया , सोमा आनंद, उपासना सिंह, मनोज जोशी, रज़ाक ख़ान, राजपाल यादव, शक्ति कपूर और रिमी सेन के अभिनय कौशल ने वाकई कमाल किया है। इस फिल्म के बाद तो प्रियदर्शन की धूम मच गई थी और लोग उनकी अगली फिल्म का इंतजार कर रहे थे। वर्ष 2008 में जब उनकी फिल्म भूल भुलैया प्रदर्शित हुई तो चारों तरफ प्रियदर्शन का ही डंका बज रहा था। इस फिल्म में रहस्य रोमांच के साथ-साथ हास्य का मेल बहुत अलग तरह का दृश्य प्रस्तुत करता है, तो वही दूसरी तरफ इसमें बेहतरीन संगीत भी अपना एक खास स्थान बनाने में कामयाब हुआ है।

चार दशक से अधिक के अपने फिल्म प्रोडक्शन के करियर में, प्रियदर्शन ने मलयालम, हिंदी, तमिल और तेलुगु सहित कई भारतीय भाषाओं में 95 से अधिक फिल्में निर्देशित की हैं।

प्रियदर्शन के निर्देशन में उनकी पहली मलयालम फिल्म "पूचक्कोरु मूक्कुथि" वर्ष 1984 में आई थी जो आश्चर्यजनक रूप से सफल रही। इसी से फिल्म निर्माण में उनकी तीव्र मेधा का पता चलता है। इसके बाद 1986 में "थलावट्टम" , 1988 में "चित्रम"और 1991 में "किलुक्कम" जैसी सफल फिल्में आईं। उनकी तमिल फिल्म "गोपुरा वासलिले" और तेलुगु फिल्म "निर्णयम" ने भी अच्छी पहचान बनाई।

प्रियदर्शन के बेहतरीन निर्देशन में उनकी सफल फिल्मों के लिए बहुत से पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। उनकी

"कांचीवरम" और "माराकर: अरबिकादलिंते सिमहम" फिल्मों के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2012 में पद्मश्री पुरस्कार देकर सम्मानित किया ।

इसके अलावा उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कार, फिल्मफेयर पुरस्कार सहित कई अन्य उल्लेखनीय पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं।

पुरस्कार और सम्मान कलाकारों अथवा फिल्म से जुड़े हुए सेलिब्रिटीज के लिए उनके कद और प्रतिभा से हमारा परिचय कराते हैं तो उसके साथ ही उनके प्रशंसकों और दर्शकों के बीच उनसे उनकी अपेक्षाओं को भी बढ़ाते हैं। इन अर्थों में प्रियदर्शन से उनके दर्शकों को अभी बहुत सी उम्मीदें लगी हुई है। उन्हें इस बात का भरोसा है कि शीघ्र ही प्रियदर्शन फिर से कोई नया कमाल सिल्वर स्क्रीन पर जरूर लेकर आएंगे।

 ये थी मशहूर फिल्म कथा लेखक और निर्देशक प्रियदर्शन के जीवन और उनके कार्यों के बारे में एक संक्षिप्त जानकारी। आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें कमेंट करके बताइएगा। चलने से पहले आपको ये याद दिलाना जरूरी है कि अगर आपको यह कार्यक्रम पसंद आ रहे हैं तो हमें लाइक और सब्सक्राइब जरूर करें। इसी के साथ मुझे अनुमति दीजिए और स्वीकार कीजिए 

सीमा शाही का नमस्कार।

Monday 07 2024

सावन को आने दो

 फिल्म "सावन को आने दो" एक युवा बिरजू जिसका किरदार मशहूर स्टार अरुण गोविल ने निभाया है उसके फर्श से अर्श पर पहुंचने की कहानी है। आज फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातों में हम इसी फिल्म के शिल्प पर कुछ बातें करेंगे।

 तो स्वीकार कीजिए

 सीमा शाही का नमस्कार


 दोस्तों,

" फिल्म सावन को आने दो" राजश्री प्रोडक्शन की एक ऐसी फिल्म है जो एक बेहतरीन मनोरंजन के साथ-साथ युवाओं को अंदर से कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देकर चली जाती है। हमें पता नहीं चलता कि कब वह हमारी नसों में उबाल भर करके चली गई।

 जी हां दोस्तों, फिल्म "सावन को आने दो" 1979- 80 के दौरान रिलीज फिल्मों में एक सफल फ़िल्म थी। इसके सभी गाने एक से बढ़कर एक सुपरहिट हुए साथ ही उसकी बेहतरीन कहानी ने अवध अंचल के युवाओं को बहुत आकर्षित किया। इसी फिल्म के कुछ ही दिनों बाद धारावाहिक "रामायण" जब दूरदर्शन पर आया तो उस धारावाहिक में अरुण गोविल को बिरजू से अलग श्रीराम की भूमिका दी गई। इसके बाद अरुण गोविल अपने आप को श्री राम की भूमिका से बाहर निकाल कर किसी अन्य पात्र में नहीं समा सके। बहरहाल, हम बात कर रहे हैं फिल्म "सावन को आने दो" के शिल्प के बारे में। इस फिल्म की कहानी को संक्षिप्त में पहले आपसे बता दे ताकि आपको दोबारा से याद हो जाए कि यह कहानी कहां से कहां जाते हुए बिरजू को गांव के एक छोटे गायक से रेडियो और दूरदर्शन का मशहूर कलाकार बना देती है। आपको बता दें कि इस फिल्म में अरुण गोविल के साथ जरीना वहाब , रीता भादुड़ी और अमरीश पुरी ने अभिनय किया हैं । संगीत राज कमल का है और गीत इंदीवर , गौहर कानपुरी, माया गोविंद ने लिखे हैं। इस फिल्म में गीतों को आवाज दी थी केजे येसुदास , सुलक्षणा पंडित , जसपाल सिंह और कल्याणी मिश्रा ने। 


फिल्म की ज्यादातर शूटिंग लखनऊ शहर और बाहरी इलाकों में की गई है ।


फिल्म की शुरुआत चंद्रमुखी (ज़रीना वहाब) के अपने पैतृक गांव रामनगर में वापसी से होती है। वह एक स्वाभिमानी ज़मींदार की बेटी है। उसके पिता का रोल अमरीश पुरी ने किया है । कहानी में अमरीश पुरी ज़मीन के विवाद में मुकदमेबाजी में उलझे हुए हैं। चंद्रमुखी को छोटी उम्र में अपनी माँ को खो देने के बाद, लखनऊ में अपने नाना-नानी के पास रहने के लिए भेज दिया गया था। अब, अपनी परीक्षाएँ पूरी करने के बाद, वह अपने पिता की देखभाल करने और उनके साथ कुछ साल बिताने के लिए रामनगर वापस आती है। पिता उसके विवाह को लेकर चिंतित थे।


रामनगर लौटकर चंद्रमुखी अपने बचपन के स्कूल के दोस्त बृज मोहन यानि बिरजू से मिलती है जो रोल अरुण गोविल ने किया है। बिरजू गायन में प्रतिभावान युवक है। बिरजू के माता-पिता मर चुके हैं और वह अपने तीन बड़े भाइयों, उनकी पत्नियों और एक छोटी भतीजी के साथ रहता है। वह अपनी भतीजी से बहुत प्यार करता है। उसके भाई भी उससे बहुत प्यार करते हैं और उसका ख्याल रखते हैं, लेकिन उनकी पत्नियाँ उससे प्यार नहीं करती हैं और सोचती हैं कि उसके भाइयों ने उसे बिगाड़ दिया है, इसलिए वह खेतों में काम नहीं करता बल्कि अपना समय गाने बजाने में बिताता है। बिरजू चंद्रमुखी की ही जाति का युवक है, लेकिन उसका परिवार गरीब है। परिवार के पास कुछ विरासत में मिली खेती की ज़मीन है, लेकिन बिरजू के भाई खुद खेत जोतते हैं और फ़सल उगाते हैं। 


चंद्रमुखी बिरजू को हवेली में गाने के लिए बुलाती है और उसका गाना सुनकर चकित हो जाती है। बिरजू और चंद्रमुखी एक साथ अधिक समय बिताना शुरू करते हैं। चंद्रमुखी उसे एक गायक बनने की प्रेरणा देती है। अंततः दोनों में प्यार हो जाता है। एक रात जब बिरजू एक पेड़ के नीचे गा रहा होता है, चंद्रमुखी उससे मिलने जाती है और उसके पिता को पता चल जाता है। ये मुलाकातें उन्हें गुस्सा दिलाती हैं और वह चंद्रमुखी को वापस लखनऊ भेज देते हैं। कुछ समय बाद, बिरजू लखनऊ आता है, उसकी भाभियां उसका तिरस्कार करती है और उसे घर से निकाल देती हैं। लखनऊ में उसे एक व्यक्ति ठगने की कोशिश करता है लेकिन बाद में वह उसे शरण देकर अपने पास रखता है। अंततः उसकी मुलाकात गीतांजलि (रीता भादुड़ी) से होती है, जो चंद्रमुखी की दोस्त होती है और उसकी आवाज़ से रोमांचित हो जाती है। गीतांजलि बिरजू को अपने पिता के माध्यम से आकाशवाणी में एक गायक के रूप में नौकरी दिलाने में मदद करती है। बिरजू शादी के लिए चंद्रमुखी का हाथ माँगने के लिए रामनगर लौटता है, लेकिन एक बार फिर चंद्रमुखी के पिता उसे डांट देते हैं।

कुछ समय बाद चंद्रमुखी का परिवार कोर्ट केस में अपनी संपत्ति खो चुका होता है और वह स्थानीय स्कूल में शिक्षिका बन जाती है। चंद्रमुखी की पिता की अस्वीकृति बिरजू को एक बड़ा गायक बनने के लिए प्रेरित करती है ताकि वो अपनी योग्यता साबित कर सके। वह वापस लौटता है। वहां गीतांजलि उसकी सहायता करती है । उसकी प्रसिद्धि को देखकर मुंबई की संगीत कंपनियां उससे संपर्क करती हैं और वह यहां से मुंबई चला जाता है जहां वह एक बड़ा गायक बनता है। इस पूरे सफर में गीतांजलि उसका साथ देती है। हालांकि , वो चंद्रमुखी के लिए तरसता है और चंद्रमुखी उसका इंतजार करती है। गाँव के स्कूल में शिक्षकों की छंटनी होने की कगार पर होने के कारण, स्कूल मैनेजमेंट के लोग पैसे जुटाने के लिए बिरजू (अब पंडित बृजमोहन) को अपने चैरिटी शो में प्रदर्शन करने के लिए आमंत्रित करने का फैसला करते हैं। जब बिरजू रामनगर आता है तो वह अपने परिवार से मिलता है और अपनी भाभियों को माफ कर देता है। वह चंद्रमुखी के पिता को भी शो में आमंत्रित करता है। चंद्रमुखी के पिता अब बिरजू से चंद्रमुखी की शादी करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

 बिरजू चंद्रमुखी को समर्पित एक गीत के साथ मंच पर प्रस्तुति देता ।

इस प्रकार एक पॉजिटिव नोट पर फिल्म समाप्त होती है और इसके इस खूबसूरत समापन पर जो गाना बिरजू गाता है उसी गाने से फिल्म का समापन बहुत ही सुखद और सुंदर हो गया है। फिल्म में गौर करने की बात ये भी है कि गांव का एक गरीब युवा प्रयास करने से अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक सुप्रसिद्ध गायक बनता है। इसी के समानांतर यह भी देखने में आता है की फिल्म में एक सामान्य से कलाकार को आकाशवाणी में अपना करियर शुरू करके दूरदर्शन से होते हुए किस तरह से आगे बढ़ने में मदद मिलती है इससे आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे जन उपयोगी माध्यमों की प्रासंगिकता पर भी यह रोशनी डालती है। लेकिन , इनकी सार्थकता तभी है जब हमारे युवाओं में मेहनत और आगे बढ़ने के लिए लगन शामिल हो। राजश्री प्रोडक्शंस की एक खासियत है कि उनके प्रोडक्शन में एक बेहतरीन और कर्णप्रिय संगीत होता है। फिल्म के शिल्प में जो बात सबसे चमकदार होकर उभरी है वो समाज को साफ सुथरा बनाने की कोशिश करती हुई कहानी होती है जिसमें मारपीट या वायलेंस और अनावश्यक लफ्फाजियां नहीं होती बल्कि एक कल्पनाशील कहानी होती है जो लोगों के मन को सुकून देती है। समाज में एक साथ मिलकर रहने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। राजश्री प्रोडक्शंस की एक और खास बात है कि वह पारिवारिक मूल्यों को अपनी कहानियों में बहुत अधिक तरजीह देते हैं। फिल्म "सावन को आने दो" में भी पारिवारिक रिश्तों की अहमियत पर प्रकाश डाला गया है। इस प्रकार फिल्म अपने आप में बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति है। जब-जब दर्शक इसे देखेंगे तब तब सराहना करेंगे।

 तो, ये थी आज की फिल्म "सावन को आने दो" की कहानी और उसके शिल्प पर एक संक्षिप्त सी चर्चा। अब फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का फिल्मी बातें का आज का अंक समाप्त होता है। फिर मिलेंगे किसी नई चर्चा के साथ। तब तक के लिए आप सभी को सीमा शाही का नमस्कार।

Friday 04 2024

निरूपा राय

 दोस्तों जैसा कि आप जानते हैं कि फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन के साथ शशि कपूर अभिनय कर रहे थे जिसमें शशि कपूर ने पुलिस अधिकारी का रोल किया था। इसी फिल्म में एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन एक विद्रोही युवा की भूमिका में थे। अपने विद्रोही तेवर को अपनी सफलता मानते हुए अमिताभ बच्चन शशि कपूर से पूछते हैं "मेरे पास बंगला है ,गाड़ी है, बैंक बैलेंस है, तुम्हारे पास क्या है "? इस पर शशि कपूर का वह जवाब कि "मेरे पास मां है" आज भी लोगों के लिए एक यादगार संवाद के रूप में याद किया जाता है । फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें में आज हम मां का प्रतिरूप बन गई इसी अदाकारा निरूपा राय के जीवन के कुछ पहलुओं के बारे में बात करेंगे, जिनके बारे में लोगों के बीच बहुत कम जानकारी मिलती है।

 तो स्वीकार कीजिए 

सीमा शाही का नमस्कार ।




 दोस्तों


निरूपा राय का मूल नाम कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा था। उनका जन्म कलवाड़ा, वलसाड , गुजरात में हुआ था । बताया जाता है कि उनकी शिक्षा दीक्षा ज्यादा नहीं हुई थी। वह मात्र चौथी क्लास तक ही पढ़ सकी थी। उनके पिता ने उनकी शादी 15 वर्ष की उम्र में कमल राय से कर दिया था । कमल राय फिल्मों में एक्टर बनने का सपना देखते थे इसलिए उनका परिवार 1945 में मुंबई शिफ्ट हो गया। उनके पति कमल राय प्राय: फिल्मों में काम ढूंढने के लिए फिल्म इंडस्ट्री में जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने अभिनेताओं की तलाश के लिए एक विज्ञापन देखा और उसके लिए आवेदन किया और निरूपा राय से भी कहा कि वह आवेदन कर दें। यह भी संयोग था कि वो चुन ली गईं और उन्होंने 1946 में गुजराती फिल्म "रनकदेवी" से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। जब उन्होंने फिल्म उद्योग में प्रवेश किया तो उन्होंने अपना विवाहित नाम निरूपा रॉय रखा।


  उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली हिंदी फिल्म "अमर राज" में अभिनय किया । उनकी लोकप्रिय फिल्मों में से एक "दो बीघा ज़मीन" थी जो वर्ष 1953 में आई। उन्होंने 1940 और 50 के दशक की फिल्मों में बड़े पैमाने पर पौराणिक किरदार निभाए। हर हर महादेव में उन्होंने त्रिलोक कपूर के साथ पार्वती देवी की भूमिका निभाई, जिन्होंने शिव की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। एक देवी की उनकी छवि बहुत मजबूत थी । उनकी छवि से प्रभावित होकर लोग उनके घर जाते और उनका आशीर्वाद लेते। उनके सह-कलाकारों में त्रिलोक कपूर मुख्य कलाकार थे जिनके साथ उन्होंने अठारह फिल्मों में अभिनय किया। उनके अलावा भारत भूषण , बलराज साहनी और अशोक कुमार आदि उस समय के जाने-माने कलाकार हुआ करते थे।


1970 के दशक में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर द्वारा निभाए गए किरदारों की माँ के रूप में उनकी भूमिका ने उनके नाम को एक गरीब पीड़ित माँ का पर्याय बना दिया। वर्ष 1975 मे आई फिल्म दीवार में उनकी भूमिका और माँ और बेटे के संदर्भ में इसके संवादों को क्लिच के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।


उन्होंने वैसे तो अपने फिल्मी जीवन की शुरूआत 1946 के दौरान प्रदर्शित गुजराती फिल्म "गणसुंदरी" से किया था लेकिन हिन्दी फिल्मों में जब उन्होंने कदम रखा तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ लोग वर्ष 1949 में प्रदर्शित फिल्म "हमारी मंजिल" को उनकी पहली फिल्म मानते हैं। निरूपा राॅय ने बी॰एम॰ व्यास जैसे निर्माता निर्देशक की फिल्म "रनक देवी" में 150 रूपये प्रति माह पर कार्य किया था। हालाँकि बाद में उन्हें फिल्म से हटा दिया गया था। निरूपा राॅय को जितनी भी फिल्मों में काम मिला, माॅं के किरदार के रूप में ही मिला, लेकिन उन्होंने इसे चुनौती के रूप स्वीकार किया और यही उनकी सफलता का कारण बना। उन्होंने अपने करियर के दौरान 120 से अधिक फिल्मों में काम किया। हिंदी सिनेमा में एक लंबा सफरनामा तय करने के बाद उन्होंने 13 अक्टूबर 2004 को इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। 


निरूपा रॉय को सहायक अभिनेत्री के किरदार को निभाने के लिए एक बार नहीं बल्कि तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


आपको बता दें कि दर्शकों को उनका मां का किरदार बहुत पसंद आता था. इसी वजह से उन्हें उसी किरदार में ज्यादातर रखा गया।


हालांकि वह अपने निजी जीवन के बारे में ज्यादा बात करना पसंद नहीं करती थी इसी वजह से उनके फैमिली बैकग्राउंड के बारे में कुछ ज्यादा अभी तक पता नहीं चला है।


 उनकी शादी के कुछ सालों के बाद में उन्हें दो बेटे हुए जिनका नाम योगेश राय और किरण रॉय रखा गया. 


  निरूपा रॉय की बहू ऊना रॉय ने अपनी सास पर दहेज लेने के आरोप लगाए और उनके खिलाफ एफ आई आर दर्ज करवा दी. बता दें कि एक्ट्रेस को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। उनके बेटे उन्हें टॉर्चर करते थे और तरह-तरह से परेशान करते थे। निरूपा रॉय ने ताउम्र दर-दर की ठोकरें खाई ।


 ये सब देखने के बाद में पूरी फिल्म इंडस्ट्री में इस बात की चर्चा होने लगी. 


  निरूपा रॉय के बेटे योगेश रॉय और किरण रॉय दोनों ही जायदाद के लिए एक दूसरे से लड़ा करते थे । 


हिंदी सिनेमा की मशहूर अदाकारा निरूपा राय भले ही आज हमारे बीच नहीं है लेकिन जब भी मां के किरदार का जिक्र किया जाता है तो उन्हें बराबर याद किया जाता है। अपनी दमदार अदाकारी के जरिए लोगों के दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री निरूपा राय ने देवी के रूप में जो अभिनय किया था उसके कारण उनकी एक छवि "देवी" की और एक "मां"की छवि दर्शकों के दिलों पर राज करती है।




तो दोस्तों यह थी हिंदी फिल्मों में "मां" का प्रतिरूप अभिनेत्री निरूपा राय के जीवन से जुड़ी कुछ जानी अंजानी बातें जिनके बारे में जानकारी बहुत मुश्किल से मिल पाती है। फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का फिल्मी बातें सेगमेंट आपको कैसा लगता है कमेंट करके हमें जरूर बताइएगा और हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा। अब चलते हैं। फिर मिलेंगे। तब तक के लिए -


 सीमा शाही का नमस्कार।

Monday 23 2024

माधुरी दीक्षित

 फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का आज का अंक धक धक गर्ल माधुरी दीक्षित की हिंदी सिनेमा में चमकदार उपस्थित पर केंद्रित है। माधुरी अपने समय की दो पीढी के कलाकारों के साथ लीड रोल किया कर चुकी हैं। उन्होंने राजेश खन्ना और उनके पुत्र अक्षय खन्ना दोनों के साथ बतौर नायिका काम करके एक रिकॉर्ड काम किया है।

दोस्तों, 

युवा दिलों की धड़कन माधुरी दीक्षित की बात करने से पहले एक बात कहने से हम अपने आप को नहीं रोक सकते कि वो अपने जमाने की सबसे सफल अभिनेत्री रही हैं जिसने अपने सारे सपने माया नगरी में पूरे किए। ये वही माया नगरी है जहां सपने देखने तो बहुत लोग आते हैं मगर उन्हें साकार कर पाने वाले लोग बहुत कम होते हैं। माधुरी दीक्षित उन भाग्यशाली लोगों में से एक हैं जिन्होंने जो सपना देखा उसे पाया भी।

एक बार माधुरी दीक्षित किसी पत्रकार के ये पूछने पर कि आपका सपना क्या है, कहा था कि "सपनों के मामले में मैं बहुत गरीब हूं क्योंकि मैंने सारे सपने देख डाले और उन्हें सरकार भी कर लिया। अब मेरे पास देखने के लिए कोई नया सपना बाकी नहीं है"। ये भी कमाल है और वो भी कमाल है जो हम माया नगरी में सितारों के उगने और अस्त होने का तमाशा रोज देखते हैं। बहरहाल चलिए हम अपनी बात आगे बढ़ाते हैं। 

माधुरी दीक्षित ने भारतीय हिन्दी फ़िल्मों मे एक ऐसा मुकाम बनाया है जिसे आज की अभिनेत्रियां अपने लिए आदर्श मानती हैं। वर्ष 1980 और 90 के दशक मे इन्होने स्वयं को हिन्दी सिनेमा मे एक प्रमुख अभिनेत्री तथा सुप्रसिद्ध नृत्यांगना के रूप मे स्थापित किया। उनके लाजवाब नृत्य और स्वाभाविक अभिनय का ऐसा जादू था कि माधुरी पूरे देश की धड़कन बन गयी। 15 मई 1967 को मुंबई में मराठी परिवार में माधुरी दीक्षित का जन्म हुआ। पिता शंकर दीक्षित और माता स्नेह लता दीक्षित की लाडली माधुरी को बचपन से डॉक्टर बनने की चाह थी और शायद यह भी एक वज़ह रही कि माधुरी ने अपना जीवन साथी श्रीराम नेने को चुना जो कि पेशे से एक चिकित्सक हैं। डिवाइन चाइल्ड हाई स्कूल से पढने के बाद माधुरी दीक्षित ने मुंबई यूनिवर्सिटी से स्नातक की शिक्षा पूरी की। बचपन से ही उन्हें नृत्य मे रूचि थी जिसके लिए माधुरी ने आठ वर्ष तक कथक का प्रशिक्षण लिया। सन 2008 मे उन्हे भारत सरकार् के चतुर्थ सर्वोच्च नागारिक सम्मान " पद्मश्री " से सम्मनित किया गया।

माधुरी दीक्षित हिन्दी सिनेमा की सबसे सफल अभिनेत्री हैं। इन्होंने अपने अभिनय जीवन की शुरुआत सन 1984 में " अबोध " नामक चलचित्र से की। किन्तु इन्हे पहचान 1988 मे आई फिल्म " तेजाब " से मिली। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड कर नही देखा। एक के बाद एक सुपरहिट फिल्मों के कारवां ने इनको भारतीय सिनेमा की सर्वोच्च अभिनेत्री बनाया । वर्ष 1989 में माधुरी दीक्षित की फिल्में राम लखन , परिन्दा और त्रिदेव एक साथ हिट रही। उसके बाद 1990 में उनकी "किशन - कन्हैया" और "दिल" फिल्में रिलीज हुई जिसमें "दिल" फिल्म में इन्होंने एक अमीर तथा बिगडैल लड़की का किरदार निभाया है जो एक साधारण परिवार के लडके से इश्क करती है तथा उससे शादी के लिये अपनों से बगावत कर देती है। उनके इस किरदार के लिये उन्हें फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। 

एक्टिंग की दुनिया के किंग गोविंदा ने अपने करियर में कई हिट और ब्लॉकबस्टर फिल्मों में काम किया है। करिश्मा कपूर के साथ तो उनकी जोड़ी काफी पसंद की जाती थी। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गोविंदा माधुरी दीक्षित को बहुत पसंद करते थे। वह तो उनसे शादी भी करना चाहते थे। ये हम नहीं कहर रहे। खुद गोविंदा ने इस बात का खुलासा किया है।

माधुरी दीक्षित की कुछ खास फिल्में जिनमें बेटा वर्ष 1992 मे, हम आपके हैं कौन 1994 में, और वर्ष 1997 में "दिल तो पागल है" सुपरहिट फिल्में रही। इन फिल्मों में अभिनय के लिए माधुरी दीक्षित को 4 फिल्म फेयर बेस्ट एक्ट्रेस पुरस्कार प्रदान किए गए । इन वर्षों में इनकी व्यावसायिक रूप से सफल फिल्में थी त्रिदेव ,थानेदार, किशन कन्हैया, साजन , खलनायक और राजा ।

 व्यावसायिक फिल्मों में सफलता के साथ-साथ उन्हें कुछ अन्य फिल्मों के लिए भी बहुत प्रशंसा मिली जिसमें प्रेम प्रतिज्ञा, परिंदा, अंजाम मृत्यु दंड, पुकार, और वर्ष 2001 में आई फिल्म लज्जा शामिल है। वर्ष 2002 में आई मशहूर फिल्म देवदास में बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के लिए माधुरी दीक्षित को चंद्रमुखी का किरदार निभाने के लिए फिल्मफेयर अवार्ड प्रदान किया गया । इसके बाद माधुरी दीक्षित ने कुछ दिनों तक फिल्मों से दूरी बना लिया । उसके बाद वर्ष 2007 में फिल्म "आ जा नच ले" से दोबारा फिल्मी दुनिया में कदम रखा। लेकिन उसके बाद उनका फिल्मों में आना कुछ कम हो गया। 2019 में उन्होंने "टोटल धमाल" नाम की कॉमेडी फिल्म में धमाकेदार वापसी की। 2014 की फिल्म "डेढ़ इश्किया" भी काफी सराही गई। इन फिल्मों के बाद उन्होंने डांस रियलिटी शो "झलक दिखला जा" में जज के रूप में दिखाई पड़ी । .

माधुरी दीक्षित 1990 और वर्ष 2000 के दो दशकों तक हिंदी सिनेमा की सबसे महंगी अदाकारा रही है। माधुरी फोर्ब्स इंडिया की मिलेनियम एडिशन में भारत की 100 सेलिब्रिटीज में शामिल रही है। अभिनय के अतिरिक्त माधुरी

बाल अधिकारों के लिए यूनिसेफ की तरफ से कल्याणकारी कार्यों में लगी हुई है। उन्होंने बाल मजदूरी के खिलाफ जन जागरूकता के लिए भी काम किया है। उनकी कुछ अच्छी फिल्मों में जैकी श्रॉफ के साथ पुकार और 100 डेज, संजय दत्त और सलमान खान की फिल्म साजन, टी रामा राव की प्रतिकार और नाना पाटेकर के साथ फिल्म प्रहार आदि शामिल है।

उन्होंने दूरदर्शन और एनएफडीसी की सम्मिलित फिल्म "धारावी" में अनिल कपूर और शबाना आजमी और ओम पुरी के साथ काम किया जो बहुत सराहनीय रही और उसे वर्ष 1992 का बेस्ट फीचर फिल्म का अवार्ड भी दिया गया। अनिल कपूर के साथ उनकी फिल्म बेटा अत्यंत सफल फिल्म रही जिसके लिए उन्हें दूसरा फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया और इसी फिल्म से उनका हिंदी फिल्म उद्योग में उनका नाम "धक-धक" गर्ल के नाम से मशहूर हो गया। राजश्री प्रोडक्शंस की फिल्म "हम आपके हैं कौन" गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के मिलेनियम एडिशन में सबसे अधिक भीड़ आकर्षित करने वाली फिल्म के रूप में दर्ज की गई है। इस फिल्म में माधुरी दीक्षित ने नायिका निशा का रोल निभाया था । 

  दोस्तों ,

धक धक गर्ल माधुरी दीक्षित के अभिनय और उनके हिंदी सिनेमा में योगदान के बारे में चर्चा करें तो समय कम पड़ जाएगा। फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट माधुरी दीक्षित के सुंदर भविष्य की कामना करते हुए आशा करता है कि हिंदी सिनेमा जगत और भारतीय समाज को उनका योगदान मिलता रहेगा । अब इसी के साथ यह अंक समाप्त होता है। अगले अंक में हम किसी और सेलिब्रिटी के बारे में जानकारी लेकर आपके बीच फिर से उपस्थित होंगे। तब तक के लिए अनुमति दीजिए ।आप सभी को सीमा शाही का नमस्कार।

Monday 16 2024

फिल्म वो छोकरी

 दोस्तों वर्ष 1994 में दूरदर्शन पर एक फिल्म आई थी जिसका नाम था "वो छोकरी"।

इस फिल्म ने उसे समय अपने कालखंड से 50 साल आगे की बात रखी थी जिस कारण इसमें भाग लेने वाले कलाकारों और फिल्म निर्माता को काफी आलोचना प्रत्यालोचना सहनी पड़ी थी और यह फिल्म काफी चर्चित भी हुई । फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट की फिल्मी बातों में आज हम इसी फिल्म के इर्द-गिर्द अपनी बातचीत रखेंगे। तो स्वीकार कीजिए 

सीमा शाही का 

नमस्कार, 


दोस्तों 

 फिल्म वो छोकरी 1994 में बनी सुभंकर घोष द्वारा निर्देशित एक भारतीय फिल्म है, जिसमें पल्लवी जोशी , नीना गुप्ता , परेश रावल और ओम पुरी ने अभिनय किया है। इस फिल्म ने 1993 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में 3 पुरस्कार जीते । पल्लवी जोशी ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार - विशेष जूरी पुरस्कार जीता , जबकि परेश रावल ने इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और नीना गुप्ता ने सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। 

फिल्म वो छोकरी का कथानक कुछ इस प्रकार है कि एक प्रतिष्ठित और धनी परिवार की बहुओं में से एक गीता देवी दुर्भाग्य से एक विधवा है। जिसका रोल नीना गुप्ता ने किया है अभी भी युवा और आकर्षक महिला है। वह पड़ोस के एक आदमी, ललित रामजी की चालों में फंस जाती है और उसके साथ रहना शुरू कर देती है। ललित राम जी का रोल परेश रावल ने किया है। उसकी एक बेटी है, अप्सरा । अप्सरा का रोल पल्लवी जोशी ने निभाया है और तीनों को एक खुशहाल परिवार के रूप में चित्रित किया गया है।


एक दिन ललित बिना किसी कारण के गायब हो जाता है और तब से परित्यक्त माँ और बेटी का जीवन लगातार नीचे की ओर जाता है। अप्सरा को स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है । उसके माता-पिता का अतीत स्कूल के अधिकारियों को पता चलता है। आय के साधन न होने के कारण, उनके मकान मालिक उन्हें घर से जाने के लिए कहता है। इस कारण से उन्हें एक झोपड़ी वाली कॉलोनी में जाना पड़ता है। गीता अपनी बेटी का भरण-पोषण करने और आजीविका कमाने के लिए नौकरानी का काम शुरू करती है। फिल्म में एक मार्मिक विषय अप्सरा का अपने पिता के साथ रिश्ता है, जिसके भ्रामक प्रेम में वह एक बचकानी और अंत में, भयानक रूप से अनुचित विश्वास के साथ बंधी रहती है।


यह जानकर कि ललित अब एक सफल राजनीतिज्ञ है, अप्सरा अपनी माँ को उससे मिलने के लिए नई दिल्ली जाने के लिए मनाती है क्योंकि उसे यकीन है कि उसके पिता उन्हें उनकी भयानक स्थिति से बचा लेंगे। ठुकराए जाने पर, माँ वापस लौट आती है, और मानवीय अच्छाई में सारी उम्मीद और विश्वास खोकर, शराब पीने लगती है। इसके तुरंत बाद, वह अपनी 16 वर्षीय बेटी को अकेला छोड़कर मर जाती है।


बेटी 15 साल से विधुर ओम पुरी के घर में नौकरानी के रूप में अपनी माँ की नौकरी करती है। वह वास्तव में लड़की के कल्याण के लिए चिंतित दिखता है और धीरे-धीरे उसका विश्वास जीतता है और अंत में उम्र के अंतर के बावजूद उसे अपने साथ रहने के लिए कहता है। कुछ शुरुआती अनिच्छा के बाद, लड़की अंततः स्वीकार करती है और ओम पुरी के साथ रहना शुरू कर देती है। कुछ समय के लिए युवा लड़की को अभावों से मुक्त एक सुरक्षित जीवन जीने का अवसर देता है। उसके रक्षक की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो जाती है। उसके रिश्तेदार लड़की पर हत्या का आरोप लगाते हैं जिस कारण उसे हिरासत में लेकर पुलिस पूछताछ की जाती है। कुछ महीनों के बाद, सबूतों के अभाव में उसे रिहा कर दिया जाता है। अपने हाल पर छोड़ दी गई और उसके बाद वह कुछ समय के लिए वेश्या के रूप में काम करती है।


मुंबई में, वह तीन अन्य सड़क के बच्चों के साथ रेलवे स्टेशन पर रहती है। यहाँ तक कि उनके बीच नेतृत्व का दर्जा भी हासिल कर लेती है। एक दिन, उसे पता चलता है कि उसके पिता दिल्ली से शहर आ रहे हैं और एक सम्मेलन में भाग लेंगे। वह सम्मेलन में भाग लेने का फैसला करती है और सम्मेलन के दौरान, वह उठती है और दूर से ही चिल्ला चिल्ला कर अपने पिता को आवाज देकर बुलाती है। वह उन्हें बताने की कोशिश करती है कि वह उनकी बेटी है। ललित उसकी पुकार को अनदेखा कर देता है और पुलिस को आदेश देकर उसे बाहर निकलवा देता है और सड़क से दूर शहर के बाहर भेजवा देता है 


फिर उस लड़की को एहसास होता है कि उसकी माँ सही थी और उसके पिता ने वास्तव में उन्हें उनके भाग्य पर छोड़ दिया था। जीवन में क्रूरता का सामना करते हुए, वह जोर-जोर से अपने भाग्य पर विलाप करती हुई और जीवन को कोसती हुई आगे बढ़ रही है, तभी उसके पिता का एक गुर्गा उसके पीछे से आता है और उसे बेरहमी से मार देता है। फिल्म यहीं पर उसके मरने के साथ समाप्त हो जाती है।

 'वो छोकरी'—अपने समय से आगे आने वाले समय की शानदार कल्पना है और कलाकारों के बेहतरीन अभिनय से सजी हुई फिल्म है।

सुबंकर घोष द्वारा निर्मित फिल्म वह छोकरी एक कला फिल्म है जिसे तीन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। वो छोकरी उस समय की झलक है जो बहुत दूर लगता है, लेकिन सामाजिक चलन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भविष्य में यही कुछ होने वाला है।

संतुलित और पूरी तरह ईमानदार, यह फिल्म अपने अविस्मरणीय प्रदर्शनों और सीधे दिल पर वार करने वाली कहानी के कारण अनुशंसा के मोर्चे पर उच्च स्थान पर है।

कहानी में फिल्माए गए कई दृश्यों के कारण फिल्म अपने समय से आगे चलती हुई सी लगती है।

 आश्चर्य होता है कि 1994 की एक फिल्म लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में बात कर रही थी। एक ऐसा विषय जो भारत में अभी भी अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है और भारत के पारंपरिक ताने-बाने के कारण वर्जित है।

एक और आश्चर्यजनक हिस्सा यह था कि इसमें एक महिला और थोड़े बड़े व्यक्ति के बीच सहमति से बने रिश्ते को भी छुआ गया था, जो सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर साथ-साथ रहते हैं। इस प्रकार इन मुद्दों के आधार पर देखते हैं तो फिल्म

वो छोकरी अपने समय से काफी आगे की बात करती है।


नीना गुप्ता, पल्लवी जोशी ने शुरू से अंत तक कथा का नेतृत्व किया है।

सिनेमाई और सांसारिक परंपराओं के विपरीत, जब महिलाएं कथा का नेतृत्व करती हैं तो यह हमेशा एक ताज़ा बदलाव होता है।

हालांकि कथानक को इस तरह से बुना गया है कि पल्लवी जोशी और उसके बाद नीना गुप्ता को अधिकतम समय दिया गया है, लेकिन जब आपको पता चलता है कि ये अभिनेता भले ही फिल्म के प्रभारी हों, लेकिन फिल्म की घटनाओं में उनके चरित्र को उनके लिंग के कारण हाशिये पर धकेल दिया गया है, तो यह कटु विडंबना आपको परेशान करती है।

गुप्ता, रावल, जोशी को उनके शानदार काम के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिले । "वो छोकरी" को कलाकारों के अभिनय ने खूबसूरती से आगे बढ़ाया है।

गुप्ता आपके दिल को छू जाती है जब उसे रावल की पहचान का पता चलता है और वह उसके प्रति उसकी उदासीनता से चौंक जाती है। फटी हुई साड़ी और रूखे चेहरे वाली पल्लवी जोशी ने अपने जटिल किरदार को बेहतरीन ढंग से पेश किया है।

जहां तक परेश रावल का सवाल है, वह हमेशा आश्चर्यजनक रहेगा कि भारत के सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकारों में से एक बनने से पहले वह एक बेहतरीन खलनायक थे!

शीर्षक के महत्व की बात करें तो, वो छोकरी इस बात का प्रतिनिधित्व करती है कि कैसे समाज - ज्यादातर, महिलाओं की ओर इशारा करता है जो किसी पुरुष के "संरक्षण" में नहीं हैं।

महिलाओं को अपना मूल्य समझने तथा भेदभाव-विरोधी नजरिए से देखे जाने के लिए, उन्हें पुरुषों से के संरक्षण में होना चाहिए, अन्यथा वे शिकारियों का शिकार बन जाएंगी।

यह बात आज की अपेक्षा 1994 में इस फिल्म के रिलीज़ किस समय और भी अधिक सत्य है।

भले ही आप कला फिल्मों के पारखी न हों, लेकिन इसके अपरंपरागत विचारों, आसानी से समझ में आने वाली लेकिन मनोरंजक कहानी और इसकी रीढ़ कलाकारों के अभिनय के कारण आप फिल्म वो छोकरी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। फिल्म की कहानी और अभिनय प्रामाणिक, भावपूर्ण और मार्मिक हैं जिसमें कभी कहीं भी नाटकीयता नहीं है । वो छोकरी समाज और इसकी सुस्पष्ट लेकिन स्वीकार्य कमियों का एक शानदार प्रतिनिधित्व है।


दोस्तों,

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 और अब चलने का समय है तो अनुमति दीजिए सीमा शाही को ।

आप सभी को 

मेरा प्यार भरा

 नमस्कार।

Sunday 15 2024

तब्बू

  मशहूर अभिनेत्री तब्बू ने कई तमिल, तेलुगू, मलयालम, बंगला भाषा एवं हिंदी फिल्मों में मुख्य रूप से अभिनय किया है। साथ ही उन्होंने एक अमरीकी फिल्म में भी काम किया है। उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है एवं उन्हें सबसे अधिक बार सर्वश्रेष्ठ महिला कलाकार की श्रेणी में फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड हासिल है। उन्होंने यह अवार्ड लगातार चार बार, जीता है। आज हम फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातों के अंतर्गत तब्बू के जीवन और उनके फिल्मी करियर के बारे में बात करेंगे।

स्वीकार कीजिए सीमा शाही का 

नमस्कार।


दोस्तों,

तब्बू का पूरा नाम तबस्सुम फातिमा हाशमी है और इनका जन्म 4 नवम्बर 1970 को हैदराबाद में हुआ। इनके पिता का नाम जमाल हाशमी व माता का नाम रिजवाना है।

कुछ अपवादों के बावजूद, तब्बू मुख्यतः कलात्मक एवं कम बजट फिल्मों में अपने अभिनय के लिए जानी जाती हैं, जो बॉक्स ऑफिस पर आंकड़े जुटाने की बजाय कहीं अधिक आलोचनात्मक सराहना जुटाती हैं। व्यावसायिक तौर पर सफल फिल्मों में उनकी उपस्थिति कम ही रही है और ऐसी फिल्मों में उनकी भूमिका भी बहुत छोटी रही हैं। मसलन-बॉर्डर , साजन चले ससुराल , बीवी नंबर वन, हम साथ साथ हैं आदि फ़िल्में हैं। वर्ष 1996 में बनी फिल्म माचिस , 1997 में बनी फिल्म विरासत , 1997 की हु तू तू ,1999 की अस्तित्व ,2000 मैं बनी चांदनी बार वर्ष 2001 में बनी मक़बूल फिर चीनी कम और 2024 में आई फिल्म crew में उन्होंने उल्लेखनीय अभिनय किया है। मीरा नायर की अमेरिकी फिल्म 'द नेमसेक ' में भी उनकी मुख्य भूमिका को काफी प्रशंसा मिली। अपनी फिल्मों एवं भूमिकाओं के मामले में काफी चुनिन्दा मानी जाने वाली इस अभिनेत्री का कहना है कि 'मैं वही फ़िल्में करती हूं, जो मुझे भावुक बना दे एवं सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फिल्म की यूनिट एवं निर्देशक मुझे प्रभावित करने चाहिए। 

   उनके जन्म के तुरंत बाद ही उनके माता-पिता का तलाक़ हो गया। उनकी मां एक स्कूल अध्यापिका थीं एवं उनके नाना सेवा-निवृत्त प्राध्यापक थे जो एक स्कूल चलाते थे। नानी अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका थीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई हैदराबाद के सेंट एन्स हाई स्कूल में की। 1983 में तब्बू मुंबई चली गयी एवं उन्होनें दो वर्षों तक वहां के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई की। 


वे शबाना आज़मी की भतीजी एवं अभिनेत्री फरहा नाज़ की छोटी बहन हैं। उनके घर मुंबई एवं हैदराबाद दोनों जगहों पर हैं।

तबस्सुम 'तब्बू' हाशमी ने अपने करियर की शुरुआत पंद्रह साल की उम्र में 1985 'हम नौजवान ' फिल्म से की. इस फिल्म में उन्होंने एक दुष्कर्म पीड़िता का किरदार निभाया था । देव साहब ने ही फिल्मों के लिए इन्हे तब्बू नाम दिया। एक अभिनेत्री के रूप में उनकी पहली भूमिका एक तेलुगू फिल्म, कुली नंबर 1 में थी। दिसम्बर 1987 में, बोनी कपूर ने अपनी दो बड़ी फिल्मों, रूप की रानी चोरों का राजा एवं प्रेम, की शुरुआत की. प्रेम में तब्बू को संजय कपूर के साथ लिया गया। यह फिल्म आठ साल में बनकर तैयार हुई। तब्बू ने एक बार मजाक में कहा "मुझे इस दशक का, सबसे ज्यादा इंतज़ार करने वाली नयी अभिनेत्री का अवॉर्ड मिलना चाहिए." मुख्य किरदार के रूप में हिंदी में उनकी पहली रिलीज़ हुई फिल्म थी पहला पहला प्यार, जो लोगों का ज़रा भी ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई. वर्ष 1994 में विजयपथ में अजय देवगन के साथ उनकी भूमिका के बाद वे प्रतिष्ठित हुईं। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला नवागंतुक अवॉर्ड हासिल हुआ। इसके बाद भी उनकी कई फ़िल्में आयीं, जो बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं दिखा पायीं.

तब्बू ने अजय देवगन के साथ पांच फिल्में की है जिनमें विजयपथ, हकीकत, तक्षक, दृश्यम्, गोलमाल अगेन । उन्होंने अजय के साथ नेटफ्लिक्स पर रिलीज फिल्म एक सूटेबल बाय मैं भी अभिनय किया है। व्यक्तिगत जीवन में अविवाहित हैं और कहती हैं कि मैं अजय देवगन के कारण सिंगल हूं। फिल्मी गॉसिप के हिसाब से तब्बू अजय से कहती हैं कि तुम मेरे लिए लड़का ढूंढो। तब्बू बताती हैं कि जब भी मैं किसी अन्य एक्टर से बात करती थी तो अजय अक्सर उसको पीट देते थे। तब्बू कहती हैं कि हो सकता है अजय को मेरे सिंगल रहने का मलाल भी हो।


बहरहाल, कही सुनी बातों से अलग उनके करियर की सफलता दूसरी कहानी कहती है। वर्ष1996 में, तब्बू की आठ फ़िल्में रिलीज़ हुईं. इनमें से दो फ़िल्में, साजन चले ससुराल एवं जीत काफी सफल रहीं; दोनों ने ही उस साल की टॉप पांच फिल्मों में जगह बना ली. उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण फिल्म माचिस समीक्षकों द्वारा काफी सराही गयी थी। इस फिल्म में, सिक्ख आतंकवाद के उदय के समय पकड़ी जाने वाली एक पंजाबी महिला की उनकी भूमिका को बहुत सराहना मिली एवं उन्हें सर्वश्रष्ठ अभिनेत्री का अपना पहला राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड मिला.


1997 में रिलीज़ होने वाली उनकी पहली फिल्म थी बॉर्डर . यह फिल्म 1997 के भारत-पाक युद्ध के दौरान लोंगेवाला की लड़ाई से जुड़ी जीवन की सच्ची घटनाओं के बारे में थी। उन्होनें इस फिल्म में सन्नी देवल की पत्नी की भूमिका निभाई थी। उनकी भूमिका इस फिल्म में छोटी थी, लेकिन यह फिल्म 1997 की सबसे बड़ी हिट बनी. उसी वर्ष, उन्होंने समीक्षकों द्वारा सराही गयी फिल्म विरासत में भी भूमिका निभाई. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही; तब्बू को अपने अभिनय के लिए फिल्मफेयर समीक्षक अवॉर्ड मिला।


1999 में उन्होंने दो सफल बहु-अभिनीत फिल्मों, बीवी नंबर 1 एवं हम साथ साथ हैं, में अभिनय किया। दोनों फ़िल्में उस वर्ष की क्रमशः पहली और दूसरी सबसे बड़ी हिट फ़िल्में रहीं.


सन् 2000 में, अभिनेत्री ने हेराफेरी और अस्तित्व में अभिनय किया। इनमें से पहली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर काफी हिट रही, जबकि दूसरी समीक्षकों द्वारा सराही गयी। उन्हें अस्तित्व के लिए, सर्वश्रेष्ठ अभिनय का अपना तीसरा फिल्म फेयर समीक्षक अवॉर्ड मिला।


2001 में उन्हें मधुर भंडारकर निर्देशित फिल्म "चांदनी बार" में देखा गया। एक बार-डांसर के उनके चित्रण को एक सिरे से सभी ने सराहा एवं अपने अभिनय के लिए उन्होनें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का अपना दूसरा राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड जीता। समीक्षक तरण आदर्श के शब्दों में, "चांदनी बार पूरी तरह से तब्बू की फिल्म है और इसमें कोई दो राय नहीं." उनका अभिनय सबसे अधिक अंकों एवं सभी अवॉर्डों का हक़दार है। उनका काम दोषरहित है एवं उनके चरित्र का जो असर दर्शकों के दिल-ओ-दिमाग़ पर पड़ता है वह उनके चरित्र रूपायन की क्षमता के कारण ही है।  


उन्होंने कई तेलुगू फिल्मों में काम किया है, जिनमें से बहुत सी तो काफी सफल थी, मसलन - कुली नंबर 1 एवं निन्ने पेल्लादुत्था. इनमें से दूसरी तो उनकी सबसे अधिक प्रसिद्द व मशहूर फिल्मों में से एक है।


2003 में तब्बू ने विलियम शेक्सपियर की मैकबेथ पर आधारित एक फिल्म में अभिनय किया। इसमें इस अभिनेत्री ने लेडी मैकबेथ के चरित्र पर आधारित 'निम्मी' का किरदार निभाया। मक़बूल नाम की यह फिल्म विशाल भारद्वाज द्वारा निर्देशित थी एवं इसे 2003 में टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित किया गया। यूं तो मक़बूल बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, लेकिन इसे भरपूर प्रशंसा मिली। इसमें तब्बू के अभिनय को बहुत सराहना मिली। एक समीक्षक ने कहा, "तब्बू एक जटिल किरदार में अद्भुत नज़र आयीं. इस फिल्म में उनका प्रदर्शन अवॉर्ड के लायक है। चांदनी बार के बाद यह ऐसा दूसरा किरदार है, जिसके लिए उन्हें लम्बे समय तक याद किया जायेगा।"


वे फ़ना (2006) में आमिर खान और काजोल के साथ सहायक भूमिका में थीं। यह फिल्म उस वर्ष की चौथी सबसे बड़ी हिट बनी। 


सन् 2007 में, तब्बू ने अपनी पहली हॉलीवुड फिल्म, मीरा नायर निर्देशित 'द नेमसेक ' में अभिनय किया। यह फिल्म विदेशों में बड़ी हिट हुई. उन्होंने चीनी कम में भी अभिनय किया, जिसमें उन्होंनें एक 34 साल की महिला की भूमिका निभाई जिसे, अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत, एक 64 वर्षीय आदमी से प्यार हो जाता है। इस फिल्म को समीक्षकों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिलीं। तरण आदर्श ने कहा 'तब्बू अपने दुर्जेय सह-अभिनेता की हावी हो जाने लायक उपस्थिति के बावजूद अपनी पहचान बना लेती हैं। वे उत्कृष्ट हैं। हालांकि यह फिल्म देश के भीतर खूब नहीं चली, लेकिन इसने विदेशों में, ख़ास तौर पर ब्रिटेन और अमेरिका में, अच्छा प्रदर्शन किया।


वर्ष 2009 की उनकी शुरुआत वोग इंडिया के जनवरी 2009 अंक के कवर पर छापे जाने से हुई।

एशियाई फिल्म एवं टेलीविज़न अकादमी के अंतर्राष्ट्रीय क्लब, नोयडा की आजीवन सदस्य हैं।


1998 में, हम साथ साथ हैं की शूटिंग के दौरान उनपर अपने सह-कलाकारों सलमान खान, सैफ अली खान, सोनाली बेंद्रे एवं नीलम के साथ कांकणी में दो काले हिरण के शिकार का आरोप लगा था ये आरोप जल्दी ही हटा लिए गए एवं तब्बू को इन आरोपों से बरी कर दिया गया।

तब्बू अभी भी फिल्मी करियर में सक्रिय है और उम्मीद की जानी चाहिए कि वह सिनेमा जगत को अपने बेहतरीन अभिनय से समृद्ध करती रहेगी।

यह था फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का आज का फिल्मी बातें। आपको यह कार्यक्रम कैसा लगता है यह हमें कमेंट करके बताइएगा और हमारे चैनल को सब्सक्राइब भी करिएगा। अब चलने का वक्त है, सीमा शाही को दीजिए इजाजत।

 आप सभी को 

मेरा प्यार भरा 

नमस्कार।

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...