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इलाहाबाद विश्वविद्यालय/ अंडरग्रैजुएट ऐडमिशन/ स्टूडेंट की भीड़/
कोमल- एक्सक्यूज मी कैन यू प्लीज स्पेयर योर पेन फार मी?
प्रिंस- ओह, येस,,,
(पेन देता है)
कोमल- थैंक यू ! प्लीज वेट जस्ट फॉर ए मिनट।
प्रिंस- नो प्रॉब्लम
(कोमल अपना फॉर्म भरने लगती है, फिर उसे फॉर्म भरने में दिक्कत आती है तो वह रुक कर कुछ सोचने लगती है)
प्रिंस-यू आर गोइंग टू टेक ऐडमिशन ?
कोमल-यस एंड यू?
प्रिंस - येस आई एम आल्सो गोइंग टू टेक ऐडमिशन इन बीए।
कोमल-ओह, दिस इस सरप्राइजिंगली गुड न्यूज़! एक्चुअली आई वांटेड टू डू बीए फ्रॉम कानपुर यूनिवर्सिटी । बट माय फादर सडेनली केम टू इलाहाबाद आन ट्रांसफर सो आई एम हिअर इन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी।
बातचीत करते हुए दोनों अपना फॉर्म भरते हैं। फॉर्म भरने के दौरान कास्ट का कालम आने पर कोमल अपनी कास्ट लिखती है तब प्रिंस को कोमल की ऊंची कास्ट का पता चलता है। जैसा उसने सुन रखा था कि यहां ऊंची जातियों के लोग सामाजिक व्यवस्था में निम्न मानी गई जातियों के साथ भेदभाव करते हैं और कम से कम उनसे मेलजोल तो नहीं ही रखते। इसलिए वह समझ गया था कि यह मित्रता बहुत लंबी नहीं चलने वाली है। हुआ भी वैसा ही। फॉर्म भरते समय जब प्रिंस ने अपनी जाति का नाम लिखा तो उसने यह महसूस किया कि कोमल कुछ ना कहते हुए भी अपनी आंखों से वह भाव नहीं छुपा सकी जो ऊंची जाति के लोगों का नीची मानी जाने वाली जातियों के लिए होता है। थोड़ा सा दुराव का भाव।
प्रिंस के पिता रामेश्वर मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर तैनात हैं और चाहते हैं कि प्रिंस अपने गांव में रहकर गांव की संपत्ति की देखभाल में अपने चाचा की मदद करे और साथ में दादा-दादी के साथ भी रहे। इसलिए उसे इलाहाबाद भेज दिया गया और वह भी खुशी-खुशी दादा दादी के पास रहने के लिए आ गया। उसके घर में माहौल कुछ ऐसा था जहां जात-पात का जिक्र नहीं होता था। लेकिन उसे इन बातों की जानकारी बराबर रहती थी इसके बारे में उसके पिता प्राय घर में बातों बातों में चर्चा कर दिया करते थे।
कोमल कानपुर के एक कॉलेज से पढ़कर आई थी और उसे भी यहां की इस व्यवस्था मैं कोई बुराई दिखती नहीं थी।
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आज की पहली मुलाकात में दोनों में थोड़ी सी जान पहचान हो तो जाती है जिसे प्रिंस आगे बढ़ाने के बारे में सोचता है लेकिन उसे मालूम है कि यह बात अब आगे नहीं बढ़ेगी। फिर भी दोनों में बातचीत शुरू हुई थी तो चलते समय एडमिशन टेस्ट के दिन मुलाकात करने का वादा करके दोनों अपने अपने घर चले जाते हैं।
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एडमिशन टेस्ट के दिन प्रिंस का सेंटर सीनेट हॉल में था जब कि कोमल का परीक्षा केंद्र परीक्षा भवन में ही बनाया गया था। प्रिंस परीक्षा होने के बाद कोमल से मिलने के बारे में सोच रहा था लेकिन फिर कुछ सोचकर आगे बढ़ जाता है। हो सकता है यह भाव कोमल के मन में भी आए रहे हो कुछ कहा नहीं जा सकता। परीक्षा के बाद दोनों की काउंसलिंग संपन्न हुई और फिर क्लासेस स्टार्ट हुई । जैसा पहले अनुमान था कोमल और प्रिंस का अंग्रेजी का सेक्शन एक ही था । दोनों के सामने पड़ने पर थोड़ा सा नोटिस करते थे, कभी-कभी हेलो भी हो जाती थी लेकिन बात आई गई हो गई और फिर इन लोगों में बात बहुत आगे नहीं बढ़ी।
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अक्टूबर का महीना था। हल्की-हल्की ठंड शुरू हो रही थी। बादल साफ हो गए थे और आसमान एकदम नीला। सूरज की सुनहरी चमकदार किरणें, जब घास के तिनकों पर पड़ती तो ओस की बूंदों से अठखेलियां करती। उन पर इंद्रधनुष उग आते थे। यह इंद्रधनुष और सूरज की अठखेलियां बहुत लंबी नहीं चलती थी क्योंकि इनके अंदर एक छिपी हुई दुश्मनी भी होती थी जो घास के तिनके पर पड़ी आस को बहुत शीघ्रता से चट कर जाती थी । कभी-कभी शरारती हवाएं भी उसके कणों को मिट्टी में मिला देती थी। यह तय नहीं था कि पहले हवा आती थी या सूरज की किरणें उन्हें सुखा जाती थी। ऐसे ही पलों में प्रिंस यूनिवर्सिटी के सीनेट हाल के सामने ठीक उसी जगह पर अक्सर बैठ जाता था जहां उसने कोमल के साथ मिलकर एडमिशन फॉर्म भरे थे। उन पलों को याद करता वह खुद नहीं समझ पाता था कि इतनी खूबसूरत यादों को लेकर कोमल मन से कितनी दूर चली गई। हालांकि, वह उसको दिखाई तो रोज पड़ती थी मगर वो समझ नहीं पाता था कि वो दीवार कौन सी है जो उसे बातें करने से भी रोक देती है? ऐसे ही किसी दिन अटेंडेंस के समय कोमल का नाम बुलाए जाने पर कोई आवाज नहीं आई तो उसे लगा हो सकता है आज वह किसी काम से घर में रुक गई होगी। लेकिन धीरे-धीरे यह क्रम एक सप्ताह तक चल गया तो उसे कोमल की चिंता होने लगी। कुछ दिन और बीते। लगभग 15 दिन बाद कोमल कॉलेज आई। इस बार वह कुछ परेशान सी दिख रही थी। क्लासरूम से बाहर निकलते हुए उसे ऐसा लगा जैसे कोमल ने उसे आवाज दी हो। उसने पीछे मुड़कर देखा तो कोमल उसी को देख रही थी। प्रिंस ने आगे बढ़कर पूछ लिया "हेलो कोमल कैसी हो"? कोमल ने धीरे से कहा "ठीक ही हूं"। कुछ पल की चुप्पी के बाद प्रिंस चलने लगा तो उसे लगा कि शायद कोमल आवाज देगी लेकिन कोमल कुछ नहीं बोली। अगले दिन उसने क्लास रूम में एक बार नजर बचाकर बहाने से उसकी ओर देखा तो वह उसी की तरफ देखे जा रही थी । फिर वह अपना ध्यान क्लासरूम में लगाने का बहाना कर रहा था लेकिन उसका मन कोमल में ही लगा हुआ था। क्लासरूम से निकलते हुए इस बार कोमल ने ही आवाज दी थी "हेलो प्रिंस, मैं तुमसे कुछ बात करना चाहती हूं"। प्रिंस रुक गया था। कोमल का इस तरह आवाज देना उसे अच्छा लगा। प्रिंस ने पूछा "कहो कोमल, तुम बहुत दिनों बाद यूनिवर्सिटी आई हो , तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना"! कोमल ने कहा "मेरी तबीयत ठीक है। पिछले दिनों नहीं आने से मेरा कोर्स काफी पीछे छूट गया है क्या तुम मुझे अपने नोट्स दे सकते हो?" प्रिंस ने कहा "हां क्यों नहीं, नोट्स ले लो। लेकिन यह बताओ तुम इतने दिन तक थी कहां?" कोमल कुछ नहीं बोली। प्रिंस ने फिर पूछा, "क्या बात है कोमल ? क्या बताने लायक बात नहीं है?" कोमल ने कहा "नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बस ऐसे ही।" प्रिंस ने हंसते हुए कहा "बताने लायक हो तो कह सकती हो। मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम अपने मन की बात शेयर करोगी"। कोमल ने कहा "पिछले दिनों तुमने अखबारों में पढ़ा होगा मेरे गांव में एक लड़ाई हो गई थी जिसमें मेरे भाई को मार दिया गया था। हमारा पूरा परिवार बर्बाद हो गया प्रिंस। हम कहीं के नहीं रहे।" प्रिंस अवाक् था । कुछ देर बाद उसने पूछा "वह जो एक गांव में कुछ जातीय मुद्दे को लेकर गोली चल गई थी, क्या वही मामला है?" कोमल ने कहा "हां "। इस मामले को प्रिंस ने भी अखबार में पढ़ा था और उसे मालूम था कि एक नीची जाति के लड़के से विवाद में ऊंची जात के लड़के ने उसको शूट कर दिया था । जिस पर नीची जाति के लोगों ने आक्रोश में उस परिवार के तीन लोगों की हत्या कर दी थी और बाद में पुलिस ने नीची जाति की पूरी आबादी को घेराबंदी करके बहुत बुरी तरह मारा पीटा था और उनके घर में आग लगा दिया था। बाल , वृद्ध और महिलाओं को पकड़ कर जेल में डाल दिया था। इस मामले में बहुत उच्च स्तरीय जांच हुई थी। मामला लखनऊ और दिल्ली तक पहुंचा था और केंद्र सरकार ने भी इसमें हस्तक्षेप करके जांच के लिए कमेटी बैठा दी थी। ये मुद्दा लोकसभा और विधानसभा में भी उठा उठा था । प्रिंस की रूह कांप गई । उसने अपने सामने अपनी जाति के दुश्मनों की बेटी को देखा। उसने यह भी देखा कि वह आज उससे मदद मांग रही है। कुछ पल के लिए रुक कर प्रिंस ने कहा "ठीक है कोमल, मैं तुम्हें अपने नोट्स लाकर कल दे दूंगा। लेकिन ये बताओ यह मामला क्या था"? पता नहीं क्यों प्रिंस को यह लगा कि वह कोमल के मुंह से सुनना चाहता है कि दोषी कौन है? कोमल ने बताया "प्रिंस मैं बहुत दुखी हूं कि मेरा भाई मर गया। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि इन्हीं लोगों ने गलती भी की थी। लेकिन इसका मतलब इस तरह नरसंहार किया जाए यह भी तो ठीक नहीं है?" प्रिंस ने थोड़ी देर रुक कर कहा "कोमल प्रजातांत्रिक देश में ऐसी बातें दुखदाई हैं लेकिन जनता अगर गलती करे यह तो स्वाभाविक हो सकता है लेकिन जब प्रशासन और पुलिस सुनियोजित ढंग से किसी खास जाति को निशाना बनाती है तो यह बहुत बड़े खतरे की ओर संकेत करता है । मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं हम और हमारी पीढ़ी गलत रास्ते पर चल पड़े हैं।" कोमल लंबी आह भरती है, फिर उसके मुंह से बस इतना ही निकलता है कि "पता नहीं, मेरा तो घर बर्बाद हो गया"। प्रिंस चुप रहा। थोड़ी देर साथ में बैठने के बाद दोनों अपने-अपने क्लास में चले गए । अगले दिन कोमल ने काफी इंतजार किया लेकिन प्रिंस क्लास में दिखाई नहीं पड़ा। कोमल ने यही सोचा कि शायद प्रिंस उसे नोट्स नहीं देना चाहता इसलिए वह यूनिवर्सिटी नहीं आया। अगले दिन प्रिंस क्लास रूम में दिखाई दिया तो कोमल ने पूछ ही लिया "प्रिंस, मेरा नोट्स ले आए हो?" प्रिंस ने कहा "सॉरी कोमल मैं नोट्स लेकर उसी दिन तुम्हारे गांव में अपने ननिहाल में था। जब यह झगड़े शुरू हुए तो मैं किसी तरह वहां से बचकर भाग आया था। लेकिन मेरे नोट्स मेरे मामा के घर में ही छूट गए थे। जब उन लोगों ने उनकी बस्तियां जलाई तो मेरी किताबें कापियां और नोट्स जो वहां मैं पढ़ने के लिए लेकर गया था वही जलकर खाक हो गए ।" कह कर प्रिंस चुप हो गया। कोमल कुछ देर चुप रहने के बाद "चलती हूं" कह कर निकल गई। प्रिंस ने उसे जाते हुए देखा भी नहीं।
[17/10, 17:43] Mohan Dhanraj: (2)
दूसरे सेमेस्टर के परीक्षाओं की तैयारी लगभग हो चली थी। परीक्षा की तारीख भी आ गई थी। मई का महीना था। सूरज में काफी तपिश आ चुकी थी । पेड़ पौधों में हरियाली की जगह सूखी डंठल मौसम को वीरान बना रही थी। हां, आम के बाग गुलजार थे। कभी-कभी कोयल बोलती थी , दिन में दोपहरियां सूनी और सड़कें वीरान नजर आती थी। इन दिनों विद्यार्थी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्राय: विश्वविद्यालय आने की बजाय घर में ही तैयारी में जुटे हुए थे । प्रिंस को इन दिनों यही बेचैनी थी कि कोमल काफी दिनों से दिखाई नहीं पड़ी और पता नहीं उसके घर में क्या चल रहा है। जिस दिन प्रवेश पत्र लेने के लिए प्रिंस यूनिवर्सिटी गया था उसी दिन उसे कोमल दिखाई पड़ी तो उसने पूछ ही लिया, "कोमल तुम्हारी तैयारी कैसी चल रही है?" कोमल ने बताया कि वह इस साल प्रवेश पत्र तो लेकर जा रही है लेकिन वह इम्तिहान नहीं देगी। वह इस साल ड्रॉप लेने वाली है। यह सुनकर प्रिंस सन्न रह गया। थोड़ी देर उसे कुछ सूझा ही नहीं फिर बाद में उसने पूछा कोमल ड्रॉप क्यों कर रही हो? कोमल ने बताया, "घर के माहौल को बहुत कोशिश करने के बावजूद बदला नहीं जा सका। घर में एक साथ तीन-तीन लोगों के मर्डर के कारण घर का माहौल गमगीन और भय से व्याप्त है। ऐसे में पढ़ने के बारे में सोच पाना भी संभव नहीं है। जब-जब पढ़ने बैठती हूं तब तब वही दृश्य बार-बार आंखों के सामने आ जाते हैं और पढ़ने लिखने के बजाय एक ऐसी तकलीफ चारों तरफ तारी हो जाती है जो पूरी दुनिया में होने वाली हर प्रकार की घुटन से अधिक डरावनी और दुखदाई होती है। माता-पिता का चेहरा उनका रात दिन का रोना देखा नहीं जाता। मैं स्वयं भी अपने आप को नियंत्रण नहीं कर पा रही हूं ऐसे में पढ़ाई लिखाई के बारे में सोचना कोई मायने नहीं रखता।" कह कर कोमल फूट पड़ी। बहुत देर तक रोती रही। प्रिंस ने उसे शांत करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसका रोना बंद नहीं हो रहा था। काफी देर के बाद जब वह शांत हुई तो उसने कहा, "सॉरी प्रिंस मैंने तुम्हें भी परेशान कर दिया । देखो मेरी हालत तो सुधरने वाली नहीं है समय बताएगा। तुम अपना ध्यान रखना।" कह कर वह चली जाती है प्रिंस उसे जाते हुए देखता रहा। उसके जाने के बाद प्रिंस बहुत देर तक वहीं बैठा सोचता रहा कि क्या से क्या हो गया। वहां से उठकर घर की ओर चला तो रास्ते में एक पार्क में जाकर बैठ गया क्योंकि उसका मन घर जाने के लिए जैसे रोक रहा था। उसके हृदय में कुछ था जो टूट चुका था।
[21/10, 07:45] Mohan Dhanraj: (3)
दूसरे सेमेस्टर की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थी। जून का महीना शुरू हो चला परंतु इस बीच विश्वविद्यालय नहीं जाने और एक दूसरे का मोबाइल नंबर नहीं लेने के कारण दोनों में बातचीत नहीं हो पाई थी। इधर प्रिंस ने एक तरफा निर्णय ले लिया था कि वह सेमेस्टर की परीक्षाएं ड्रॉप कर देगा क्योंकि उसे दृढ़ विश्वास था कि कोमल भी परीक्षा ड्रॉप कर रही है। यदि वह परीक्षा देकर आगे निकल गया तो कोमल का साथ छूट जाएगा। यह बात कुछ अद्भुत सी थी कि दोनों में किसी भी प्रकार का साथ में चलने का वादा या प्रेम जैसे भाव एक दूसरे को जाहिर नहीं किया था फिर भी प्रिंस को उसके बगैर आगे बढ़ने में दिलचस्पी खत्म होती जा रही थी। कभी-कभी उसे यह जरूर लगता था कि कोमल से उसके किसी भी प्रकार के रिश्ते की कल्पना बेमायने है लेकिन फिर भी वह अपने मन के वशीभूत अपने रास्ते पर आगे बढ़ गया। इस प्रकार इस सेमेस्टर की परीक्षाओं को उसने भी ड्रॉप कर दिया । जून के महीने में सब जगह छुट्टियां हो जाती है इसलिए प्रिंस अपने मामा के गांव चला गया । कोमल कानपुर जा चुकी थी।एक दोपहर को प्रिंस अपने मामा के घर पर बैठा हुआ था तब तक पुलिस की गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी में से कांस्टेबल राम सिंह ने उतरकर आवाज दिया "अरे ओ रामचरण, चलो तुमको साहब ने थाने पर बुलाया है। रामचरण प्रिंस के मामा थे और वह इस समय खाना खाने बैठे ही थे। प्रिंस ने बाहर निकल कर उनसे पूछा "क्या बात है दीवान जी, रामचरण को किस लिए बुलाया गया है?" कांस्टेबल राम सिंह गरज कर बोला "तुम कौन हो? रामचरण को भेजो ?" प्रिंस ने कहा "दीवान जी, मैं उनका भांजा हूं मामा जी खाना खा रहे हैं। आप चलिए मैं मामा जी को लेकर आता हूं ।"राम सिंह ने कहा "तुम अपनी बकवास बंद करो नहीं तो कान के नीचे एक बजाऊंगा अभी और उसको कहो कि वो सीधे जाकर जीप में बैठ जाए।" प्रिंस ने कहा अच्छा दीवान जी आप ऐसे नहीं कह सकते मैं भी विश्वविद्यालय का स्टूडेंट हूं और मुझे भी कानून पता है।" मैंने कहा कि आप चलिए मैं मामा जी को लेकर आऊंगा। आप इस तरह बात क्यों कर रहे हैं"? इतने पर राम सिंह के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा। उसमें प्रिंस को पकड़ कर गाड़ी में बैठा लिया और रामचरण को गालियां देता हुआ दरवाजा पीटने लगा। राम सिंह के इस तरह व्यवहार करने से इधर प्रिंस अचरज में था तो वही रामचरण घबरा गया और खाना छोड़कर बाहर आ गया। रामचरण ने कहा "दीवान जी, बस में कपड़े पहन कर आता हूं। एक मिनट का समय दीजिए।" राम सिंह बुदबुदाता हुआ आकर गाड़ी में बैठ गया। रामचरण के गाड़ी में आकर बैठते ही राम सिंह ने कहा "ड्राइवर चलो थाने ।" ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट की और चल पड़ा। इधर प्रिंस ने सारा मामला समझने के बाद अपने आप को नियंत्रण में रखा हुआ थाने तक पहुंच गया। थानेदार राम प्रताप मिश्रा ने पूछा "रामचरण तुम्हारा ही नाम है?" रामचरण के हां कहने पर थानेदार ने कहा "चलो यहां साइन करो।" प्रिंस ने पूछा
" दरोगा जी मैं डॉक्यूमेंट पढ़ना चाहता हूं।" दरोगा ने प्रिंस की तरफ घूरते हुए पूछा "क्या पढ़ोगे जी? क्या नाम है तुम्हारा ? क्या करते हो?" इस पर प्रिंस ने अपना नाम बताया और कहा कि "मैं बीए प्रथम वर्ष का छात्र हूं ।" थानेदार ने कहा "बीए का छात्र हो तो क्या जानते हो।" प्रिंस ने बड़ी विनम्रता से कहा "सर आप मुझसे क्या जानना चाहते हैं?" दरोगा ने कहा "ज्यादा भोले मत बनो और यहां हमारे काम में बाधा डालोगे तो तुमको पकड़ के इसी के साथ अंदर कर देंगे और तुम्हारी जमानत कराने भी कोई नहीं आएगा। रामचरण तुम साइन करो इसको तो मैं बाद में देख लूंगा" कड़कते हुए थानेदार ने कहा। प्रिंस पीछे की तरफ मुंह करके थोडा मुस्कुराया फिर थानेदार की तरफ मुड़कर देखा। रामचरण ने हस्ताक्षर कर दिया। प्रिंस ने थानेदार से पूछा "सर अब हम लोग जा सकते हैं ?" थानेदार ने कहा "भागो यहां से और यहां दिखाई नहीं पड़ना नहीं तो मार के हाथ पैर तोड़ दूंगा"। प्रिंस ने मामा जी से कहा ,"मामा जी चलिए घर चलते हैं" प्रिंस के चेहरे पर कुछ मुस्कराहट सी थी। थानेदार निकर कर कहा क्यों तुमको हंसी आ रही है मैंने कोई चुटकुला सुनाया है क्या?" प्रिंस ने कहा "नहीं सर मैं मुस्कुरा नहीं रहा हूं थोड़ा परेशान हूं"। प्रिंस रामचरण को लेकर अपने घर के लिए निकल दिया। थानेदार ने थोड़ी देर कुछ उलझन में रहने के बाद कांस्टेबल राम सिंह से पूछा "यह लड़का मुस्कुरा क्यों रहा था"? राम सिंह ने कहा "पता नहीं सर लेकिन मुझे भी उसकी हंसी में कुछ दाल में काला लग रहा है।"थानेदार ने कहा "पता करो यह कौन है और क्या करता है?" "जी सर मैं पता करता हूं" राम सिंह ने कहा। प्रिंस ने पूछा "मामा जी, आपने जहां हस्ताक्षर किया है उस कागज पर क्या लिखा था?" रामचरण ने कहा "प्रिंस बेटा, तुम तो जानते हो मैं इतना पढ़ा लिखा हूं नहीं कि पूरा पढ़ पाऊं। कुछ समझ में नहीं आया । प्रिंस ने कहा "मामा जी, आपने जहां साइन किया है उसमें लिखा था कि पिछले मई महीने जो गांव में झगड़ा हुआ था उसमें मैंने जो बयान दिया है वह हमारे गांव के लोगों के दबाव में दिया है। मैं अपना बयान वापस लेना चाहता हूं। प्रिंस ने कहा "मामा जी दरोगा ने आपसे गलत कागज पर साइन करा लिया है लेकिन कोई बात नहीं। फिर उसने कुछ सोचते हुए थोड़ी देर बाद बुदबुदाया, "अभी दरोगा को और मजा आने वाला है।" रामचरण ने कहा "बेटा तुम फिक्र ना करो जो होगा देखा जाएगा"। प्रिंस ने कहा "मामा जी, आप बहुत भोले हैं। अभी मैं पापा से बात करूंगा तो इनकी थानेदारी ठिकाने लगा दूंगा। आप घर चलिए मैं बताता हूं।" रामचरण ने कहा "नहीं प्रिंस, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे। बेटा तुम लोग तो चले जाओगे हमको तो यहां सब दिन रहना है। यह लोग हमें आगे भी परेशान करते रहेंगे। तुम लोग कितनी बार यहां दौड़-दौड़ कर आओगे" रामचरण कुछ सोचता हुआ चुपचाप प्रिंस को लेकर घर आ गया।
इधर राम सिंह ने गांव के मुखबिर तारा सिंह को थाने में बुलाकर पूछा तारा, यह रामचरण के घर में एक लड़का आया है, उसके बारे में तुम कुछ जानते हो?" तारा ने कहा "हां साहब यह उसकी बहन का लड़का है । सुना है रामचरण का बहनोई दिल्ली में कोई बहुत बड़ा अफसर है और यह लड़का यही इलाहाबाद में पड़ता है।"
"इसका बहनोई बहुत बड़ा अफसर है? कहां है? जरा पता करो। कहीं इसीलिए तो नहीं ये सपोला मुस्कुरा रहा था! थानेदार साहब को जानकारी चाहिए इसके बारे में पता करो"। "जी सर अभी पता करता हूं" तारा सिंह ने कहा। तारा सिंह ने अमरचंद को फोन लगाकर पूछा तो मालूम हुआ कि रामचरण का बहनोई यानी प्रिंस का पिता दिल्ली में गृह मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी पद पर पदस्थ है। जब राम सिंह को यह पता चला, राम सिंह थोड़ा नर्वस होते हुए बोला "गइली भैंसिया पानी में।"
राम सिंह ने थानेदार मिश्रा को जब यह बताया तो थानेदार गाली देते हुए "बोला यह साले हरामी पूरी बात बताते भी नहीं। लगता है यह लड़का हमें फंसा देगा। अभी यहां का बवेला चल ही रहा है। इसी को शांत करने के लिए मुझे यहां भेजा गया है और लगता है पहली ही चाल गलत होने वाली है"।
[21/10, 08:33] Mohan Dhanraj: (4)
(प्रिंस के मामा का घर, प्रिंस और उसके मामा रामचरण दिल्ली जाने के लिए निकलते हैं। ट्रेन का सफर करके घर पहुंचते हैं। प्रिंस अपनी मां से मिलता है और रामचरण अपनी बहन से। फिर उनकी बहन हाल-चाल पूछने के बाद कहती हैं आराम करो । तुम्हारे जीजा जी शाम को आएंगे । प्रिंस की मां प्रिंस का हाल-चाल पूछती है, पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछती है और कहती है बेटा तुम लोग चाय नाश्ता कर के आराम करो)
(शाम को प्रिंस के पिता नवीन चंद्रा घर आते हैं कपड़े बदलने के बाद सभी चाय पीने बैठते हैं)
"हां तो साले साहब बताइए क्या हाल-चाल है ? आपके गांव में तो खूब बवाल मचा हुआ है"नवीन चंद्र ने बहुत हल्के-फुल्के ढंग से पूछा। रामचरण बताते हैं "जीजा जी, पुलिस वालों ने पूरी बस्ती को आग लगा दिया था आपको हमने बताया ही था और अब सारे किए धराएं पर लीपा पोती करके मामले को रफा-दफा करने की कवायद चल रही है।" प्रिंस ने कहा "पापा, आप कहते थे ना कि गांव वाले जरूर कुछ गड़बड़ किए होंगे। आप तो यह नहीं मानते थे कि पुलिस इस प्रकार ज्यादती कर सकती है। लेकिन मैंने अपनी आंखों से देखा है। उन लोगों ने मामा जी को जबरदस्ती खाने पर से उठा लिया, खाना भी नहीं खाने दिया और थाने ले जाकर गलत सलत बयान पर मामा जी का सिग्नेचर करा लिया । मैंने बीच में थोड़ा पूछताछ करने की कोशिश की तो पुलिस वाले ने मुझे मारने पीटने की धमकी दी और मेरे साथ भी बदसलूकी किया है । पापा दिस इस अनफेयर।" नवीन चंद्रा ने पूछा "ऐसा क्यों हुआ था ?" प्रिंस ने बताया कि "एक पुलिस कांस्टेबल ने मामा को बुलाया और कहा कि चलो थानेदार साहब ने बुलाया है तो मैने बस इतना ही कहा था कि मामा जी खाना खा रहे हैं। खाना खा लेंगे तो मैं उनको लेकर आ जाऊंगा। इतनी सी बात पर उस पुलिस वाले ने मुझे कहा कि "चुप रहो नहीं तो कनपटी के नीचे बजा दूंगा। अब बताइए यह कोई बात है? एक आम नागरिक को भोजन पर से उठाने का कौन सा नियम है? क्या हम अपराधी हैं? कम से कम खाने की थाली पर से उठाना तो बहुत अन्याय है। मैं इसका विरोध करता हूं? आई फेल्ट वेरी बैड ऑफ इट!" कह कर प्रिंस शांत हो गया। नवीन चंद्रा ने थोड़ा कुछ सोचा फिर उन्होंने पुलिस कमिश्नर को फोन लगाया और थानेदार मिश्रा को ताकीद करने के लिए कहा। फोन रखने के बाद बोले "चलो तुम लोग परेशान मत हो सब ठीक हो जाएगा ।मैंने कमिश्नर से बोल दिया है, और हां, जो तुम्हारी एफआईआर हुई है उसकी कॉपी मुझे ला कर दो। मैं वकील से बात करता हूं । इस तरह की बदमाशियों के खिलाफ कुछ तो करना पड़ेगा।
[21/10, 08:38] Mohan Dhanraj: (5)
(कोमल का घर उसके माता-पिता बैठे हुए हैं उसके चाचा शिवनारायण मिश्रा का आना)
शिवनारायण आकर चुपचाप बैठ जाते हैं। थोड़ी देर में कोमल की मम्मी पूछती हैं "क्या हाल है भैया?" शिवनारायण बताते हैं कि भाभी बड़ी वाली बुआ जी के लड़के जो इटावा में थानेदार थे उनकी पोस्टिंग यही अपने थाने में हो गई है। उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन कर लिया है। भैया बता रहे थे कि उनकी पोस्टिंग यहां के झगड़े को समाप्त करने के लिए खास तौर से हुई है। कोमल ने कहा "चाचा झगड़ा समाप्त हो जाए अच्छी बात है लेकिन इससे हमको क्या मिलने वाला है? हमारा तो जो जाना था चला गया। शिवनारायण ढांढस बंधाते हैं और कहते हैं कि देखो कोमल दुख की बात तो है लेकिन अभी पुलिस केस चल ही रहा है। पता नहीं कौन-कौन फंसेगा और कौन बचेगा। तब तक मोबाइल की घंटी बजती है। शिवनारायण फोन उठाते हैं। "हेलो"
" हां भैया, प्रणाम"
"सब ठीक है, आपका क्या समाचार है?".... "ज्वॉइनिंग हो गई?" ...
"अरे" ....
"अच्छा ?"
" ध्यान रखिएगा"
"जी ठीक है, प्रणाम"
फोन काटने के बाद कोमल पूछती है "चाचा जी, क्या हुआ?" शिवनारायण "बोले थानेदार भैया का फोन था। कह रहे थे तुम लोग यहां के लोगों के बारे में ठीक-ठीक पता करो, कौन-कौन कहां क्या कर रहा है? बता रहे थे इधर कोई लड़का आया था जो किसी बड़े अधिकारी का बेटा है। उसको थाने पर ले आए थे। उसी से कुछ वो शंका में हैं। कुछ गड़बड़ होने की संभावना दिख रही है।" कोमल चुपचाप सुन रही थी । कोमल की मां ने कहा, "अब और क्या गड़बड़ होगी?" शिवनारायण बोले "पता नहीं भाभी, थानेदार भैया को सस्पेंड कर दिया गया है। भैया बहुत परेशान है अब तो रही सही उम्मीद भी गई। पता नहीं कौन-कौन फंसेगा और जेल की चक्की पीसेगा?
घर में सन्नाटा पसर जाता है कोई कुछ नहीं बोलता।