फिल्म "सावन को आने दो" एक युवा बिरजू जिसका किरदार मशहूर स्टार अरुण गोविल ने निभाया है उसके फर्श से अर्श पर पहुंचने की कहानी है। आज फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातों में हम इसी फिल्म के शिल्प पर कुछ बातें करेंगे।
तो स्वीकार कीजिए
सीमा शाही का नमस्कार
दोस्तों,
" फिल्म सावन को आने दो" राजश्री प्रोडक्शन की एक ऐसी फिल्म है जो एक बेहतरीन मनोरंजन के साथ-साथ युवाओं को अंदर से कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देकर चली जाती है। हमें पता नहीं चलता कि कब वह हमारी नसों में उबाल भर करके चली गई।
जी हां दोस्तों, फिल्म "सावन को आने दो" 1979- 80 के दौरान रिलीज फिल्मों में एक सफल फ़िल्म थी। इसके सभी गाने एक से बढ़कर एक सुपरहिट हुए साथ ही उसकी बेहतरीन कहानी ने अवध अंचल के युवाओं को बहुत आकर्षित किया। इसी फिल्म के कुछ ही दिनों बाद धारावाहिक "रामायण" जब दूरदर्शन पर आया तो उस धारावाहिक में अरुण गोविल को बिरजू से अलग श्रीराम की भूमिका दी गई। इसके बाद अरुण गोविल अपने आप को श्री राम की भूमिका से बाहर निकाल कर किसी अन्य पात्र में नहीं समा सके। बहरहाल, हम बात कर रहे हैं फिल्म "सावन को आने दो" के शिल्प के बारे में। इस फिल्म की कहानी को संक्षिप्त में पहले आपसे बता दे ताकि आपको दोबारा से याद हो जाए कि यह कहानी कहां से कहां जाते हुए बिरजू को गांव के एक छोटे गायक से रेडियो और दूरदर्शन का मशहूर कलाकार बना देती है। आपको बता दें कि इस फिल्म में अरुण गोविल के साथ जरीना वहाब , रीता भादुड़ी और अमरीश पुरी ने अभिनय किया हैं । संगीत राज कमल का है और गीत इंदीवर , गौहर कानपुरी, माया गोविंद ने लिखे हैं। इस फिल्म में गीतों को आवाज दी थी केजे येसुदास , सुलक्षणा पंडित , जसपाल सिंह और कल्याणी मिश्रा ने।
फिल्म की ज्यादातर शूटिंग लखनऊ शहर और बाहरी इलाकों में की गई है ।
फिल्म की शुरुआत चंद्रमुखी (ज़रीना वहाब) के अपने पैतृक गांव रामनगर में वापसी से होती है। वह एक स्वाभिमानी ज़मींदार की बेटी है। उसके पिता का रोल अमरीश पुरी ने किया है । कहानी में अमरीश पुरी ज़मीन के विवाद में मुकदमेबाजी में उलझे हुए हैं। चंद्रमुखी को छोटी उम्र में अपनी माँ को खो देने के बाद, लखनऊ में अपने नाना-नानी के पास रहने के लिए भेज दिया गया था। अब, अपनी परीक्षाएँ पूरी करने के बाद, वह अपने पिता की देखभाल करने और उनके साथ कुछ साल बिताने के लिए रामनगर वापस आती है। पिता उसके विवाह को लेकर चिंतित थे।
रामनगर लौटकर चंद्रमुखी अपने बचपन के स्कूल के दोस्त बृज मोहन यानि बिरजू से मिलती है जो रोल अरुण गोविल ने किया है। बिरजू गायन में प्रतिभावान युवक है। बिरजू के माता-पिता मर चुके हैं और वह अपने तीन बड़े भाइयों, उनकी पत्नियों और एक छोटी भतीजी के साथ रहता है। वह अपनी भतीजी से बहुत प्यार करता है। उसके भाई भी उससे बहुत प्यार करते हैं और उसका ख्याल रखते हैं, लेकिन उनकी पत्नियाँ उससे प्यार नहीं करती हैं और सोचती हैं कि उसके भाइयों ने उसे बिगाड़ दिया है, इसलिए वह खेतों में काम नहीं करता बल्कि अपना समय गाने बजाने में बिताता है। बिरजू चंद्रमुखी की ही जाति का युवक है, लेकिन उसका परिवार गरीब है। परिवार के पास कुछ विरासत में मिली खेती की ज़मीन है, लेकिन बिरजू के भाई खुद खेत जोतते हैं और फ़सल उगाते हैं।
चंद्रमुखी बिरजू को हवेली में गाने के लिए बुलाती है और उसका गाना सुनकर चकित हो जाती है। बिरजू और चंद्रमुखी एक साथ अधिक समय बिताना शुरू करते हैं। चंद्रमुखी उसे एक गायक बनने की प्रेरणा देती है। अंततः दोनों में प्यार हो जाता है। एक रात जब बिरजू एक पेड़ के नीचे गा रहा होता है, चंद्रमुखी उससे मिलने जाती है और उसके पिता को पता चल जाता है। ये मुलाकातें उन्हें गुस्सा दिलाती हैं और वह चंद्रमुखी को वापस लखनऊ भेज देते हैं। कुछ समय बाद, बिरजू लखनऊ आता है, उसकी भाभियां उसका तिरस्कार करती है और उसे घर से निकाल देती हैं। लखनऊ में उसे एक व्यक्ति ठगने की कोशिश करता है लेकिन बाद में वह उसे शरण देकर अपने पास रखता है। अंततः उसकी मुलाकात गीतांजलि (रीता भादुड़ी) से होती है, जो चंद्रमुखी की दोस्त होती है और उसकी आवाज़ से रोमांचित हो जाती है। गीतांजलि बिरजू को अपने पिता के माध्यम से आकाशवाणी में एक गायक के रूप में नौकरी दिलाने में मदद करती है। बिरजू शादी के लिए चंद्रमुखी का हाथ माँगने के लिए रामनगर लौटता है, लेकिन एक बार फिर चंद्रमुखी के पिता उसे डांट देते हैं।
कुछ समय बाद चंद्रमुखी का परिवार कोर्ट केस में अपनी संपत्ति खो चुका होता है और वह स्थानीय स्कूल में शिक्षिका बन जाती है। चंद्रमुखी की पिता की अस्वीकृति बिरजू को एक बड़ा गायक बनने के लिए प्रेरित करती है ताकि वो अपनी योग्यता साबित कर सके। वह वापस लौटता है। वहां गीतांजलि उसकी सहायता करती है । उसकी प्रसिद्धि को देखकर मुंबई की संगीत कंपनियां उससे संपर्क करती हैं और वह यहां से मुंबई चला जाता है जहां वह एक बड़ा गायक बनता है। इस पूरे सफर में गीतांजलि उसका साथ देती है। हालांकि , वो चंद्रमुखी के लिए तरसता है और चंद्रमुखी उसका इंतजार करती है। गाँव के स्कूल में शिक्षकों की छंटनी होने की कगार पर होने के कारण, स्कूल मैनेजमेंट के लोग पैसे जुटाने के लिए बिरजू (अब पंडित बृजमोहन) को अपने चैरिटी शो में प्रदर्शन करने के लिए आमंत्रित करने का फैसला करते हैं। जब बिरजू रामनगर आता है तो वह अपने परिवार से मिलता है और अपनी भाभियों को माफ कर देता है। वह चंद्रमुखी के पिता को भी शो में आमंत्रित करता है। चंद्रमुखी के पिता अब बिरजू से चंद्रमुखी की शादी करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
बिरजू चंद्रमुखी को समर्पित एक गीत के साथ मंच पर प्रस्तुति देता ।
इस प्रकार एक पॉजिटिव नोट पर फिल्म समाप्त होती है और इसके इस खूबसूरत समापन पर जो गाना बिरजू गाता है उसी गाने से फिल्म का समापन बहुत ही सुखद और सुंदर हो गया है। फिल्म में गौर करने की बात ये भी है कि गांव का एक गरीब युवा प्रयास करने से अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक सुप्रसिद्ध गायक बनता है। इसी के समानांतर यह भी देखने में आता है की फिल्म में एक सामान्य से कलाकार को आकाशवाणी में अपना करियर शुरू करके दूरदर्शन से होते हुए किस तरह से आगे बढ़ने में मदद मिलती है इससे आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे जन उपयोगी माध्यमों की प्रासंगिकता पर भी यह रोशनी डालती है। लेकिन , इनकी सार्थकता तभी है जब हमारे युवाओं में मेहनत और आगे बढ़ने के लिए लगन शामिल हो। राजश्री प्रोडक्शंस की एक खासियत है कि उनके प्रोडक्शन में एक बेहतरीन और कर्णप्रिय संगीत होता है। फिल्म के शिल्प में जो बात सबसे चमकदार होकर उभरी है वो समाज को साफ सुथरा बनाने की कोशिश करती हुई कहानी होती है जिसमें मारपीट या वायलेंस और अनावश्यक लफ्फाजियां नहीं होती बल्कि एक कल्पनाशील कहानी होती है जो लोगों के मन को सुकून देती है। समाज में एक साथ मिलकर रहने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। राजश्री प्रोडक्शंस की एक और खास बात है कि वह पारिवारिक मूल्यों को अपनी कहानियों में बहुत अधिक तरजीह देते हैं। फिल्म "सावन को आने दो" में भी पारिवारिक रिश्तों की अहमियत पर प्रकाश डाला गया है। इस प्रकार फिल्म अपने आप में बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति है। जब-जब दर्शक इसे देखेंगे तब तब सराहना करेंगे।
तो, ये थी आज की फिल्म "सावन को आने दो" की कहानी और उसके शिल्प पर एक संक्षिप्त सी चर्चा। अब फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का फिल्मी बातें का आज का अंक समाप्त होता है। फिर मिलेंगे किसी नई चर्चा के साथ। तब तक के लिए आप सभी को सीमा शाही का नमस्कार।
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