भारत की आजादी के बाद संवैधानिक प्रावधानों के अनुरुप देश को चलाने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न विभागों का गठन किया गया था। इन विभागों के संचालन के लिए आवश्यक अधिकारियों कर्मचारियों की गणना करके उनके पदों का सृजन किया गया था। उसी अनुसार कर्मचारियों और अधिकारियों की पदस्थापना करके विभागों का संचालन आरंभ हुआ। कालांतर में वर्ष 1990 के बाद कार्यालय में कंप्यूटर का प्रवेश हुआ जिससे ऐसा लगने लगा था की अब कार्यों के संचालन के लिए कर्मचारियों की संख्या कम हो जाएगी। लेकिन तब तक देश की आबादी लगभग दो गुनी हो चुकी थी इसलिए सरकारी विभागों से जनता की अपेक्षाएं बदल कर बढ़ चुकी थी। इसलिए कर्मचारियों की संख्या कोई समस्या नहीं थी। सरकार ने कंप्यूटराइजेशन के बाद ठीक ढंग से आवश्यक गणना का कोई प्रयास नहीं किया और जो लोग सेवा निवृत्त होते चले गए उनकी जगह नहीं भरी गई और यह कह कर के कम को आगे बढ़ा दिया गया कि कंप्यूटर के कारण अब कर्मचारियों की आवश्यकता है लेकिन बाद में इसका परिणाम इस रूप में देखने को आ रहा है की सरकारी विभागों में बिना निस्तारण के लाखों की संख्या में मामले और फाइलें रुकी हुई है और लोगों के काम प्रभावित हो रहे हैं। सरकार के द्वारा इसका कोई विकल्प अब तक नहीं ढूंढा गया। यह भी देखना आवश्यक है कि सरकार के विभागों मे रिक्त पदों पर भर्तियां नहीं होने से बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित प्रशिक्षित युवक और युवतियां रोजगार की अपेक्षा में खाली पड़े निराश हो रहे हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए नौकरियों के रास्ते पूरी तरह से बंद हो गए हैं जो देश के युवाओं को बेरोजगारी की तरफ तेजी से ले जा रहे हैं। अतः समय की मांग है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के अधीन आने वाले विभिन्न विभागों मैं बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप कर्मचारियों की आवश्यकता की गणना करके नए पद सृजित कर उन पर भर्तियां तुरंत करने की कार्यवाही की जाए।
इस बारे में आपको याद दिलाना है कि विगत कई दशकों से सरकारी विभागों में भर्तियां बंद है और इसके कारण पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा आंदोलन के रास्ते पर निकलने को बाध्य है। यह स्थिति देश के लिए बहुत चिंताजनक है। इस समस्या की जड़ में जाते हैं तो यह समझ में आता है कि विभिन्न प्रकार के विभागों जैसे दूरसंचार, रेलवे, डाक एवं तार, सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन आने वाले विभिन्न विभाग ,भारतीय सेना, सेना की रक्षा इकाईयां और नवरत्न कंपनियां, बैंक, अस्पताल, तथा बीमा सेक्टर के विभिन्न विभाग तथा अन्य छोटे-मोटे कारखाने जिनका या तो निजीकरण किया गया है या निगमीकरण किया गया है। यही रोजगार की समस्या को पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। आप स्वयं अवगत है कि सबसे अधिक नौकरियां यही विभाग युवाओं को दिया करते थे और इनके निगमीकरण और निजी करण के उपरांत इनके पास नौकरिया नहीं रहीं और यह लाभ के लिए काम करने के कारण नौकरी से बहुत सारे युवाओं की छटनी कर दिए और बहुत से युवाओं को नौकरी देने के रास्ते बंद कर दिए। भारत के संविधान के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक तत्वों के अनुपालन में देश को एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा गया था। किंतु भारत में पूंजीवाद की व्यवस्था ने राजनीतिक और प्रशासन में घुसपैठ करके उनसे मनमाना काम करवा कर अपने लाभ के लिए सरकार के बड़े-बड़े उपक्रमों को हथिया लिया। इसका सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को हुआ तो उससे भी बड़ा नुकसान सरकार को हो रहा है क्योंकि ऐसी कंपनियां जो लाभ कमाती थी वह सरकार के खाते में जाता था और देश के विकास में काम आता था साथ ही युवाओं को रोजगार भी मिलता था ।जब से यह नई व्यवस्था आई है तब से सरकार के राजस्व में भी कमी हुई हुई है और युवाओं को रोजगार भी नहीं मिल पा रहा है।
कंपनियां अपने लाभ के लिए काम करती हैं और लाभांश में से आयकर में छूट के लिए विभिन्न प्रकार के बहाने बनाकर कम से कम आयकर देकर अधिक से अधिक पूंजी अपने पास एकत्रित करती है जिससे भारत का राजस्व कम होता चला जा रहा है।
भारत में अनुसूचित जाति अनु सूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए शासकीय नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था इन वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए गई थी। लेकिन आजादी के बाद से आज तक यह व्यस्था पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई जिसके कारण केंद्र और राज्य सरकार के अधीन आने वाले विभागों मंत्रालयों, राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री सचिवालय, लोकसभा सचिवालय, राज्यसभा सचिवालय जैसे विभागों में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व अभी तक नहीं हो पाया है। इन मंत्रालयों में खाली पड़े पदों पर भर्तियों का कोई कार्यक्रम किसी भी सरकार द्वारा नहीं किया गया और
शासकीय सेवा के प्रत्येक ग्रुप में रोस्टर के आधार पर आरक्षण प्रदान किया जाए ताकि सभी सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व हो सके। ज्ञातव्य है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के अधीन आने वाले ग्रुप ए की सेवाओं में खास तौर पर मंत्रालय में सचिव, उप सचिव और संयुक्त सचिव जैसे पदों पर ,विश्वविद्यालयों में वॉइस चांसलर विभागाध्यक्ष जैसे पदों पर तथा उच्चतर न्यायिक सेवा में माननीय नयायाधीश के पदों पर आज भी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग नहीं पहुंच सके हैं । उन्हें जानबूझकर रोका गया है और आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था की अनदेखी की गई है जो कि संविधान विरुद्ध कार्य है। एक आंकड़े के अनुसार सेंट्रल गवर्नमेंट पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज में ग्रुप ए के पदों में ओबीसी कर्मचारियों की संख्या 16. 79% ग्रुप बी में 17. 79% ग्रुप सी में 19.85 और ग्रुप डी में 25. 40% है जिससे पता चलता है कि उनके प्रतिनिधित्व की स्थिति बहुत कमजोर है। उदाहरण के लिए डिपार्टमेंट ऑफ फर्टिलाइजर में ग्रुप सी के कुल स्वीकृत 3615 पदों के सापेक्ष sc के 683 STके 208 और ओबीसी के 925 पद ही भरे गए हैं ।इसी प्रकार मिनिस्ट्री ऑफ स्टील में 21636 ग्रुप ए के पदों में SC के 3452 पद ST के 1540 पद के भरे हुए हैं जबकि ओबीसी के पद पर 3434 लोग कार्य कर रहे हैं।
मिनिस्ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट में कुल स्वीकृत ग्रुप ए के 72 पद हैं जिसके समानांतर SC, ST और ओबीसी के सारे पद रिक्त है और उनकी संख्या शून्य है। अतः इस विभाग में मंत्रालय में SC, ST और ओबीसी का प्रतिनिधित्व शून्य है।
इस प्रकार प्रतिनिधित्व की स्थिति का आकलन करके समस्त विभागों के सभी पदों पर SC,ST और ओबीसी के समस्त पदों पर उचित प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता है। ग्रुप ए की सेवाओं में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए भी होना आवश्यक है कि नीति निर्माता विभागों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का प्रतिनिधित्व होने से ही उनके लिए कल्याणकारी नीतियां बनाई जा सकती है। इसके लिए सरकार का संवैधानिक दायित्व है की वह
बैकलाग वैकेंसी निकाल कर सारे खाली पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरे तभी यह माना जा सकेगा कि शासकीय नौकरियों में सरकार ने सभी वर्गों के साथ न्याय किया है अन्यथा की स्थिति में यह स्पष्ट रूप से एक बड़ी आबादी की उपेक्षा और अन्याय का उदाहरण है।
इस संबंध में अभी हाल में आए माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आलोक में यह कहना है कि माननीय न्यायालय ने यह माना है कि प्रतिनिधित्व के आधार पर आरक्षण देना राज्यों पर निर्भर है ।
सरकार के द्वारा आरक्षण के क्षेत्र में संविधान की मूल भावना का आदर करते हुए की गई न्याय संगत व्यवस्था देश में समानता की भावना कायम कर सकेगी।
इस विषय में आप का ध्यान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 /चार (क) एवं (ख) का उल्लेख करना आवश्यक है जिसमें व्यवस्था दी गई है कि सरकार के अधीन किसी विभाग में आरक्षित वर्ग के लिए विशेष भर्ती एवं प्रोन्नति के लिए व्यवस्था करने हेतु सरकार पर कोई रोक नहीं होगी।
इस प्रकार संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार कार्य कर के इन वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था पर अविलंब कार्रवाई करने के लिए सभी विभागों एवं राज्य सरकारों को केन्द्र सरकार द्वारा निर्देश देने की आवश्यकता है ताकि देश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों का आर्थिक और सामाजिक उत्थान हो सके और उन्हें भी देश में समानता का अधिकार मिल सके ।
इस विषय में सरकार के द्वारा उठाए गए कदम हमारे लिए स्वागत योग्य होंगे और इससे देश में राजनैतिक और आर्थिक समानता कायम करने में मदद मिलेगी।
इसी प्रकार सफाई कर्मचारियों की समस्या बहुत ही चिंताजनक है। इस कार्य के लिए लगे हुए सरकारी कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है इस कारण यह कार्य ठेकेदारी द्वारा कराया जा रहा है । इस व्यवस्था में सफाई कर्मचारियों की स्थिति शोषण की दर्दनाक कहानियों से भरी पड़ी है। इस मामले में यह भी देखा गया है कि इनसे सीवर लाइन के अंदर घुस कर और अमानवीय ढंग से मानव मल को उठाने और साफ करने कराने का कार्य किया जाता है जो आज के इस विकसित युग में मानवता के लिए एक कलंक है । कहीं-कहीं पर सिर पर मैला रखकर ढोने की भी प्रथा है। नगरपालिका या कस्बा के स्थानीय प्रशासन के पास बजट नहीं होता इस बात का तर्क दिया जाता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी की मांग है कि इन श्रमिकों के वेतन में वृद्धि की जाए ताकि इनका जीवन स्तर सुधर सके। एक राजनीतिक दल के रूप में भारत के कल्याणकारी राज्य के अंतर्गत ऐसी व्यवस्था के पक्षधर हम नहीं हो सकते। इसलिए एक राजनीतिक दल के रूप में जनता की आवाज सरकार के पास तक पहुंचाते हुए सरकार से यह अपेक्षा करते हैं कि इस मामले का त्वरित संज्ञान लेकर सभी संबंधित पक्षों को सख्त निर्देश दे।श्रमिकों की नियुक्ति सरकारी कर्मचारी की तरह से की जाए। उन्हें वेतन समय से मिले वेतन के साथ साथ आवास चिकित्सा उनके बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था भी अन्य शासकीय कर्मचारियों की तरह से ही की जाए । इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि सफाई कर्मचारियों को ठेकेदारों के हवाले न किया जाए और इस विभाग से ठेकेदारी की प्रथा को अविलंब समाप्त किया जाए ताकि समाज को साफ सुथरा रखने वाले इन महत्वपूर्ण कर्मचारियों की जीवन चर्या में बदलाव हो सके। माननीय प्रधानमंत्री जी का भी यह संकल्प है कि भारत को स्वच्छ बनाना है। ऐसे में इस महती कार्य को करने वाले लोगों के कल्याण को नकारना और उपेक्षा करना सही नहीं है।
सरकारी सेवाओं में एक बहुत बड़ी समस्या यह है की किसी कारणवश सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध निलंबन अथवा विभागीय जांच के मामले हैं तो इनमें ऐसा देखा गया है कि सरकारी कर्मचारियो के अनुशासनिक मामलों में अनावश्यक विलम्ब किया जाता है।कभी तो निलाम्बन के पश्चात कई महीनों तक chagesheet नही दी जाती और यदि chargesheet दे दी गयी तो IO /PO नियुक्त करने मे अनावश्यक विलम्ब किया जाता है।यह भी देखा गया है की IO /pO भी अपनी जांच में बहुत विलम्ब करते है और कई मामलों में यह 10 वर्ष या उससे अधिक का समय लगा देते हैं। जिस कारण कर्मचारियों का भविष्य लंबे समय तक अनावश्यक रूप से अनिश्चय में रहता है और उनका असहनीय उतपीड़न होता है। अतः आवश्यक है कि सरकार यह सुनिश्चित करें कि जो भी अधिकारी जांच में संलग्न हैं उन्हें समय से जांच की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए समय बद्ध तरीके से काम करने का निर्देश दें। और जो अधिकारी ऐसा नहीं करते उनके ही खिलाफ जांच बैठा कर उनके विरुद्ध कर्तव्य में लापरवाही के लिए कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। ताकि निलंबित अधिकारी को न्याय मिल सके और सरकार का काम सुगमता पूर्वक संचालित हो सके।