Tuesday 20 2024

बाबी देओल

 फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट प्रस्तुत करता है फिल्मी बातें स्वीकार कीजिए सीमा शाही का नमस्कार।

 दोस्तों, आज का कार्यक्रम हिंदी सिनेमा के एक ऐसे एक्टर के बारे में है जो अपनी जिंदगी और कैरियर में होने वाले तमाम उतार-चढ़ाव को झेलते हुए भी प्रसन्नता से अपने काम में लगा रहता है। और दोस्तों उस किरदार का नाम है बॉबी देओल।

बॉबी देओल का जन्म एक पंजाबी परिवार में 27 जनवरी 1969 को हुआ था। मशहूर सिने स्टार धर्मेंद्र उनके पिता है और उनकी माता का नाम प्रकाश कौर है और सिने स्टार सनी देओल उनके बड़े भाई हैं। बॉबी देओल का बचपन का नाम विजय सिंह देवल था । हेमा मालिनी उनकी सौतेली मां है और उनकी दो बहने हैं अजिता और विजयिता। ये दोनों कैलिफोर्निया में रहती हैं। ईशा देओल और आहना देओल उनकी सौतेली बहने हैं। बाबी देओल का विवाह 1996 में तान्या आहूजा से हुआ और उनके दो बेटे हैं।

बॉबी देओल ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत राजकुमार संतोषी की फिल्म बरसात से किया जो 1995 में बनी थी। इस फिल्म में बॉबी देओल एक भोले भाले ग्रामीण युवक की भूमिका में है जो गांव से शहर आता है और यहां आकर बदमाशों के चक्रव्यूह में फस जाता है। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और इसमें उन्हें सर्वश्रेष्ठ पुरुष पदार्पण के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत भी किया गया। किसी के बाद उन्हें राजीव राय द्वारा निर्मित फिल्म "गुप्त: दि हिडेन ट्रुथ" में अभिनय किया जिसमें उनके साथ काजोल और मनीषा कोइराला थी। इस फिल्म की सफलता के साथ ही उन्होंने अपनी पहली फिल्म की सफलता को दोहराया। जिसमें एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका है जिस पर सगाई के प्रस्ताव को लेकर अपने सौतेले पिता की हत्या करने का आरोप लगाता है और गलत तरीके से उसे कैद कर लिया जाता है । यह फिल्म व्यावसायिक रूप से फायदेमंद रही और फिल्म "गुप्त" को इसके साउंडट्रैक के लिए बहुत अधिक प्रशंसा मिली। वर्ष 1998 में बनी विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म "करीब" सनी देओल की एक फ्लॉप फिल्म साबित हुई फिर उन्होंने अब्बास मस्तान के साथ मिलिट्री थ्रिलर "सोल्जर" में काम किया जो वर्ष 1998 में बनी । इसमें राखी और प्रीति जिंटा ने भी रोल किए थे। इस फिल्म में बॉबी ने एक ऐसे व्यक्ति के बेटे की भूमिका निभाई है जिसे हथियार तस्करी का दोषी ठहराया गया था। फिल्म सोल्जर को आलोचकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और फिल्म "बरसात" और "गुप्त" के बाद यह उनकी तीसरी हिट फिल्म साबित हुई। फिर वर्ष 1999 में उनकी एक ही फिल्म "दिल्लगी" रिलीज हुई जो उनके अपने भाई सनी देओल के द्वारा निर्देशित थी यह फिल्म त्रिकोणीय प्रेम पर आधारित थी । बॉबी देओल ने सन 2000 में रानी मुखर्जी के साथ "बादल" फिल्म और फिल्म "बिच्छू" में अभिनय किया। फिल्म बादल में पंजाब और दिल्ली के कुछ हिस्सों में वर्ष 1984 के दंगों के आसपास की थीम पर आधारित सेट है, जिसमें जिसमें वह एक आतंकवादी का चरित्र निभा रहे हैं जो एक भ्रष्ट निरीक्षक द्वारा अपने परिवार और ग्रामीणों के नरसंहार का गवाह बनता है। फिल्म बिच्छू में देओल ने एक मध्यमवर्गीय लड़के की भूमिका निभाई है जो एक अमीर महिला के प्यार में पड़ जाता है। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की है बाद में उन्हें "हम तो मोहब्बत करेगा" और "आशिक" फिल्म में करिश्मा कपूर के साथ जोड़ा गया लेकिन यह दोनों फिल्में फ्लॉप रही। बॉबी ने अगली बार अब्बास मस्तान की थ्रिलर फिल्म "अजनबी" में भूमिका निभाई जो औसत कमाई वाली फिल्म बनी लेकिन इसमें बॉबी देओल ने अभिनय के लिए करिश्मा प्रशंसा बटोरी। उन्होंने सनी देओल के साथ शहीद फिल्म वर्ष 2002 में किया जिसमें उनके भाई ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की भूमिकाएं निभाया। ब्रिटिश भारत में 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने तक की घटनाओं को दर्शाया गया है। फिल्म को ध्रुवीकरण समीक्षा मिलने के बाद rediff.com का मानना था कि फिल्म में बहुत सारे अच्छे और बुरे क्षण आए और यह फिल्म भगत सिंह पर बनी मूल फिल्म से बेहतर थी। हालांकि भगत सिंह की लड़ाई की पीड़ा को इसमें कम करके दिखाया गया है जो वास्तविक जीवन की घटना में हुई क्रूरता और पीड़ा को कम करता है। इसमें बॉबी के कुछ दृश्यों को अधिक प्रशंसा मिली है। माना जाता है कि "द लीजेंड ऑफ भगत सिंह" में अजय देवगन ने उन्हें पीछे छोड़ दिया था । प्रदर्शन के मामले में देवगन स्पष्ट रूप से बेहतर हैं और एक मजबूत स्क्रिप्ट और बेहतर निर्देशन के लाभ के साथ-साथ अजय देवगन ने भूमिका को अच्छे ढंग से निभाया भी है। बाद में वर्ष 2002 में बॉबी देओल को अब्बास मस्तान की रोमांटिक थ्रिलर फिल्म "हमराज" में एक धनी शिपिंग व्यवसायी की भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया जहां वह अमीषा पटेल और अक्षय खन्ना के साथ प्रेम के त्रिकोणीय कहानी में भूमिका निभाते हैं । यह फिल्म मध्यम रूप से सफल रही और आलोचकों की सकारात्मक समीक्षा भी मिली थी।"दी हिंदू" की चित्रा महेश के अनुसार देवल फिल्म के पहले भाग में अपने अभिनय में कुछ लापरवाही करते हुए से दिखाई पड़ते हैं लेकिन बाद में उनका प्रदर्शन अच्छा है। वर्ष 2002 में उनका अंतिम अभिनय एक छोटे-मोटे बदमाश का था जिसके हाथ लाखों रुपए के हीरे लग जाते हैं। बॉबी देओल एक साल के अंतराल के बाद फिल्म "किस्मत" में प्रियंका चोपड़ा के साथ वर्ष 2004 में वापसी करते हैं और अपनी अगली फिल्म "बर्दाश्त" जो कि विक्रम भट्ट के द्वारा प्रोड्यूस की गई थी और अनिल शर्मा की फिल्म "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों" में सेना अधिकारी की भूमिका निभाई है। इस फिल्म में पुलिस की बर्बरता और भ्रष्टाचार तथा अन्यान्य के विषयों पर काम किया गया था । वहीं बाद की फिल्म ऐसी थी जिसमें अमिताभ बच्चन अक्षय कुमार और देओल दोहरी भूमिका में थे। इन सभी फिल्मों ने व्यावसायिक रूप से अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। हालांकि बाद की फिल्मों के लिए उन्हें अपनी भूमिका के लिए प्रशंसा मिली। जिसमें उन्होंने एक पग पहनी थी जिसमें उन्हें पंजाबी भीड़ से दर्शक ज्यादा प्राप्त हुए और यह टिप्पणी करने के लिए प्रेरित किया कि वह पगड़ी पहन कर बेहतर दिखते हैं। देओल ने विक्रम भट्ट के साथ थ्रिलर फिल्म "जुर्म" के लिए फिर से काम किया जिसमें एक अमीर व्यवसायी की भूमिका के लिए उनकी प्रशंसा की गई जिसे अपनी पत्नी पर रोहित के साथ संबंध होने का संदेह है। उन्होंने मणि शंकर की फिल्म "युद्ध"और "टैंगो चार्ली" में संजय दत्त , सुनील शेट्टी और अजय देवगन के साथ ऊपरी असम में बोडो उग्रवादियों से लड़ने वाले पूर्वोत्तर भारतीय प्रांत में काम करने वाले एक सैनिक की भूमिका निभाई है और सुनील दर्शन की प्रेम त्रिकोण "बरसात" में चोपड़ा और बसु के साथ विदेश में रहने वाले एक महत्वाकांक्षी भारतीय की भूमिका निभाई । इनमें से किसी भी फिल्म ने उनकी व्यावसायिक अपील को पुनर्जीवित नहीं किया। दि हिंदू ने "बरसात" के लिए निष्कर्ष निकाला कि ये एक ऐसा त्रिकोण है जिसमें व्यवसायिक बॉलीवुड की सभी रूढ़िया हैं।

इस फिल्म से आपको आश्चर्य हो सकता है कि क्या बॉबी एक अभिनेता के रूप में एक इंच भी आगे बढ़ा है, जब से उसने राजकुमार संतोषी की इसी नाम की फिल्म से शुरुआत की थी? 2005 में उनकी अंतिम भूमिका "दोस्ती: फ्रेंड्स फॉरएवर" थी जिसमें अक्षय कुमार ,लारा दत्ता, करीना कपूर और जूही चावला थी जो भारत में कमतर रही लेकिन यूनाइटेड किंगडम में एक बड़ी सफलता थी। इनके अलावा बॉबी देओल की अन्य फिल्मों में "हमको तुमसे प्यार है", "शाका लका बूम बूम", " झूम बराबर झूम", " नकाब" "हीरोज"," दोस्ताना" जैसी फिल्मों में काम किया । दोस्ताना पहली बॉलीवुड फिल्म है जिसे पूरी तरह से मियामी, संयुक्त राज्य अमेरिका में फिल्माया गया और यह 2008 में भारतीय बॉक्स ऑफिस पर आठवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई। उसके बाद "एक: द पावर ऑफ़ वन"," हेल्प", "यमला पगला दीवाना" "थैंक यू" और "प्लेयर्स" फिल्में आई जो ना तो बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल दिखा सकी और ना ही उनको समीक्षकों की अच्छी टिप्पणी प्राप्त हुई। कई व्यावसायिक असफलताओं के बाद बॉबी देओल ने काम की कमी के कारण 3 साल का ब्रेक लिया। उन्होंने "कॉफी विद करण" नाम के एक शो में कबूल किया कि " मैंने हार मान ली और मैं शराब पीना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि मैं घर पर बैठा रहता था और कहता था लोग मुझे क्यों फिल्मों में नहीं लेते। मुझे लगता है कि मैं हर चीज को लेकर बहुत नकारात्मक हो गया था ।फिर अचानक बेटे को यह कहते हुए सुना की मां!, पापा घर पर बैठे रहते हैं और आप रोज कम पर जाती है! फिर मेरे अंदर कुछ टूट सा गया और मैंने कहा नहीं अब मैं ऐसा नहीं कर सकता ।

इस अंतराल के बाद फिर सनी देओल के साथ उन्होंने श्रेयस तलपड़े की "पोस्टर बॉयज" फिल्म से वापसी की जो 2017 में बनी थी। बदकिस्मती से यह फिल्म भी असफल रही और बॉबी देओल को स्थापित करने में नाकाम रही । बाद में सलमान खान और अनिल कपूर के साथ एक्शन थ्रिलर फिल्म "रेस 3" में सहायक की भूमिका निभाई और इस फिल्म पर नकारात्मक समीक्षा होने के बावजूद इसने 300 करोड रुपए से अधिक की कमाई की और 2018 की छठी सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म बनी। इसके पश्चात 2019 में "हाउसफुल 4" फिर नेटफ्लिक्स पर आने वाली फिल्म "क्लास ऑफ 83" के लिए फिल्म फेयर ओ टीटी पुरस्कार प्रदान किया गया। उनकी वेब सीरीज आश्रम का प्रीमियम एमएक्स प्लेयर पर हुआ जहां उन्होंने बाबा निराला की किरदार को निभाया। देओल ने एक्शन ड्रामा "एनिमल" किया जो बॉक्स ऑफिस पर सफल हुई और 917 करोड रुपए से अधिक की कमाई किया। उसके बाद 'फर्स्ट पोस्ट" उनकी एक अच्छी भावनात्मक फिल्म थी। 

सुभाष घई ने साल 1991 में एक बेहतरीन फिल्म बनाई थी. इस फिल्म का नाम था "सौदागर". इस फिल्म में विवेक मुशरान वाले रोल के लिए सुभाष घई की पहली पसंद बॉबी देओल थे. लेकिन धर्मेंद्र उनकी इस पेशकश पर राजी नहीं हुए. आईएमडीबी के मुताबिक धर्मेंद्र चाहते थे कि बॉबी देओल की जिस फिल्म से लॉन्चिंग हो, उस फिल्म को वो खुद बनाए. इसलिए उन्होंने बॉबी देओल को सुभाष घई की फिल्म सौदागर करने की परमिशन नहीं दी.

सुभाष घई की फिल्म सौदागर में उस दौर के कई दिग्गज सितारे थे. फिल्म में दिलीप कुमार और राज कुमार सॉलिड भूमिका में थे. उनके अलावा अनुपम खेर, अमरीश पुरी, दीप्ति नवल, मुकेश खन्ना जैसे स्टार्स भी फिल्म में अहम रोल में थे. इसी फिल्म से मनीषा कोइराला और विवेक मुशरान लॉन्च हुए थे. इस फिल्म से बॉबी देओल को लॉन्च करने की जगह धर्मेंद्र ने बरसात मूवी को चुना था. बरसात मूवी में बॉबी देओल के अलावा ट्विंकल खन्ना भी थीं. इस मूवी से ट्विंकल खन्ना ने भी डेब्यू किया था. बरसात मूवी एक म्यूजिकल लव स्टोरी थी. जिसके गाने उस दौर में बहुत हिट हुए थे.

फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट द्वारा प्रस्तुत फिल्मी बातें में यह थे बॉबी देओल फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट को लगातार देखते रहने के लिए हमें सब्सक्राइब करें और देखते रहे फिल्मी बातें। 

अब समय है कार्यक्रम समाप्त करने का, तो इजाजत दीजिए सीमा शाही को।

नमस्कार

जानी लीवर

 दोस्तों नमस्कार, आज की इस भाग दौड़ भरी जिंदगी की दुश्वारियां ने हमें इतना परेशान कर रखा है कि हंसने के दो पल बहुत मुश्किल से मिल पाते हैं। ऐसे में मनोरंजन के साधनों का खास तौर से हास्य से भरी फिल्मों का बहुत अच्छा योगदान रहा है।

इसलिए हेयर फ्लैक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें में आज हम लेकर आए हैं मशहूर अभिनेता और हास्य कलाकार जॉनी लीवर से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। तो चलिए चलते हैं इस खास सफर पर। सबसे पहले स्वीकार कीजिए 

सीमा शाही का नमस्कार।

दोस्तों,

जॉनी लीवर का जन्म 14 अगस्त 1957 को आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में एक तेलुगु ईसाई परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम जॉन प्रकाश राव जनुमाला था। वो एक भारतीय अभिनेता और प्रमुख रूप से हास्य अभिनेता हैं जो हिंदी सिनेमा में अपने काम के लिए जाने जाते हैं । वे भारत के पहले और सबसे ज़्यादा पहचाने जाने वाले हास्य कलाकारों में से एक हैं। उनके कार्यों की पहचान करते हुए उन्हें बहुत सारे पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें कॉमिक रोल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार में तेरह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार नामांकन शामिल हैं, और दीवाना मस्ताना के लिए वर्ष1997और दूल्हे राजा के लिए वर्ष 1998 में दो बार पुरस्कार जीत चुके हैं। उन्होंने अपना करियर 1984 में शुरू किया, और तीन सौ से ज़्यादा हिंदी फ़िल्मों में अभिनय किया । उनके पिता हिंदुस्तान यूनिलीवर प्लांट में ऑपरेटर के रूप में काम करते थे जहाँ उन्होंने छह साल तक मजदूर के रूप में भी काम किया। लीवर का पालन-पोषण मुंबई के धारावी के किंग्स सर्कल इलाके में हुआ। उनकी मातृभाषा तेलुगु है और वे पंजाबी, उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और तुलु में पारंगत हैं। वे तीन बहनों और दो भाइयों में सबसे बड़े हैं।


जानी लीवर ने सातवीं कक्षा तक आंध्र शिक्षा सोसायटी इंग्लिश हाई स्कूल में पढ़ाई की है। इससे आगे उनकी पढ़ाई नहीं हो सकी क्योंकि वह अपने परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। जानी उस समय के कुछ प्रसिद्ध हिंदी फिल्मी सितारों की नकल करके और हिंदी फिल्मी सितारों के गानों पर नाचकर मुंबई की सड़कों पर पेन बेचते थे। उन्होंने अपने शुरुआती साल हैदराबाद के एक पुराने शहर याकूतपुरा में भी बिताए , जहाँ उन्होंने कॉमेडी अभिनय की अनूठी शैली सीखी। 


हिंदुस्तान यूनिलीवर कंपनी के एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की नकल की और उसी दिन से कर्मचारियों ने उन्हें जॉनी लीवर कह दिया। बाद में जब वे फिल्म उद्योग में शामिल हुए तो उन्होंने अपने स्क्रीन नाम के रूप में जॉनी लीवर का उपयोग करने का फैसला किया। 

उन्होंने संगीत शो (ऑर्केस्ट्रा), तबस्सुम हिट परेड में स्टैंड-अप कॉमेडी करना शुरू किया और प्रसिद्धि अर्जित करने लगे। इसके बाद, संगीत निर्देशक जोड़ीकल्याणजी- आनंदजी के ग्रुप में शामिल हो गए। लीवर भारत के पहले स्टैंड-अप कॉमेडियन में से एक हैं और उन्हें भारत में स्टैंड-अप कॉमेडी पेशे के अग्रदूत के रूप में जाना जाता है। [ हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) में शामिल होने से पहले भी , वह मंच प्रदर्शन दे रहे थे। चूंकि वह मंच शो से अच्छी कमाई कर रहे थे, इसलिए उन्होंने वर्ष 1981 में एचयूएल छोड़ दिया। उन्होंने बहुत सारे शो किए और पूरी दुनिया में अपने हुनर का परचम लहराया। उनका पहला बड़ा दौरा 1982 में अमिताभ बच्चन के साथ था ।


उन्होंने हंसी के हंगामे नामक एक कॉमेडी कैसेट रिकॉर्ड किया, जिसने उन्हें ऑडियो मोड के ज़रिए घरों में पहचान दिलाई। इस दौरान उन्होंने शेखर कपूर द्वारा निर्देशित कछुआ छाप धूप के लिए कुछ विज्ञापन भी किए । 1986 में उन्होंने हिंदी फ़िल्म उद्योग के सदस्यों के सामने एक चैरिटी शो "होप 86" में फिलर के तौर पर परफ़ॉर्म किया। उनकी प्रतिभा को पहचाना गया, जिसके परिणामस्वरूप निर्माता गुल आनंद ने उन्हें नसीरुद्दीन शाह के साथ 

1980 के दशक में 

 पहला ब्रेक "तुम पर हम क़ुर्बान में मिला" , जिसमें मशहूर टीवी और स्टेज कम्पेयर और गुज़रे ज़माने की अभिनेत्री बेबी तबस्सुम ने अपने बेटे होशंग गोविल को मुख्य भूमिका में लॉन्च किया, और फिर तबस्सुम और दिवंगत सुनील दत्त की बदौलत फ़िल्म दर्द का रिश्ता में काम किया। तब से, उन्होंने तेज़ाब , कसम , ख़तरनाक और किशन कन्हैया जैसी फ़िल्मों सहित 350 से ज़्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया है। दर्द का रिश्ता के बाद , वे नसीरुद्दीन शाह के साथ जलवा , हीरो हीरालाल में नज़र आए ।

1990 के दशक में 

उनकी पहली बड़ी सफलता बाज़ीगर से मिली , और उसके बाद उन्हें सहायक अभिनेता और हास्य अभिनेता के रूप में फ़िल्मों में देखा गया। अपनी फ़िल्मी भूमिकाओं में व्यस्त होने के बावजूद, उन्होंने लाइव शो करना जारी रखा। फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में माइकल जैक्सन की नकल करना था। इस कार्य को उन्होंने बखूबी अंजाम दिया। उनका सबसे प्रशंसित प्रदर्शन अब्बास-मस्तान द्वारा निर्देशित फ़िल्म बाज़ीगर में "बाबूलाल" का किरदार था। उन्हें उनके कुछ अन्य प्रसिद्ध किरदारों, जैसे "छोटा छतरी " , " असलम भाई", आदि के लिए भी याद किया जाता है । 


उन्होंने एक तुलु फिल्म, "रंग" में भी अभिनय किया । उनकी पहली तमिल फीचर फिल्मअंबिरक्कु अलाविल्लई 2011 में रिलीज़ हुई थी। उन्होंने एक कन्नड़ फिल्म, "गारा" में भी अभिनय किया । 

 

जानी लीवर पहली बार 1993 में "सिटकॉम ज़बान संभालके के" के एक एपिसोड में जॉनी उटोलैंडैंड के रूप में दिखाई दिए। लीवर "ज़ी टीवी" पर अपने शो "जॉनी आला रे" में भी दिखाई दिए । वर्ष

2007 में, वो स्टैंड-अप रियलिटी शो "कॉमेडी सर्कस" में जज के रूप में दिखाई दिए । वर्ष 2017 में लीवर कमिश्नर गूगल चटर्जी के रूप में पार्टनर्स के कलाकारों में शामिल हुए ।


वो एमएएएम यानि मिमिक्री आर्टिस्ट एसोसिएशन मुंबई के अध्यक्ष हैं, और उन्होंने दुनिया भर में हजारों लाइव शो किए हैं। 

उन्होंने 1984 में सुजाता लीवर से शादी की और उनके दो बच्चे जेमी और जेसी हैं। उनके छोटे भाई, जिमी मोसेस भी एक हास्य अभिनेता और मिमिक्री कलाकार हैं। 

लीवर एक ईसाई हैं । जब उनसे उनके धर्म परिवर्तन के बारे में पूछा गया, तो लीवर ने जवाब दिया:


 यह भगवान की इच्छा थी। मैं हमेशा से धार्मिक व्यक्ति रहा हूँ, लेकिन एक घटना ने मेरी ज़िंदगी बदल दी। मेरे बेटे को गले के ट्यूमर का पता चला। मैं असहाय था और मदद के लिए भगवान की ओर मुड़ा। मैंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया और अपना सारा समय उसके लिए प्रार्थना करने में बिताया। दस दिन बाद, जब उसे टेस्ट के लिए ले जाया गया तो डॉक्टर हैरान रह गए क्योंकि कैंसर गायब हो गया था। यह मेरे लिए एक नए जीवन की शुरुआत थी। 

जॉनी लीवर की कुछ प्रसिद्ध फिल्में हैं बाज़ीगर,बादशाह, तेजाब , सूर्य ,इलाका, काला बाजार ,बंद दरवाजा, किशन कन्हैया, हमला, चमत्कार, इंसानियत का देवता, रूप की रानी रानी-चोरों का राजा, मस्ती ,कानून, अंजाम ,मै खिलाडी तू अनाड़ी , डर ,इंडियन, सपूत ,बारूद, कुछ कुछ होता है, सिर्फ तुम ,बादशाह , हेलो ब्रदर ,क्रोध, करन अर्जुन, 36 चाइना टाउन, अजनबी, यस बॉस, नायक : द रियल हीरो, फिर हेरा फेरी,फिर भी दिल है हिंदुस्तानी, फर्ज, आशिक ,चुपके-चुपके, राजा हिन्दुस्तानी, कोई ... मिल गया इत्यादि। 

    

जॉनी बेबी तबस्सुम की बहुत इज्जत करते थे और उन्हें अपनी बहन की तरह मानते थे। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि तबस्सुम दीदी मेरे परिवार का बहुत ख्याल रखती थी और आवश्यकता पड़ने पर हमारी मदद भी किया करती थी। प्रमुख हास्य फिल्म दूल्हे राजा जिसमें गोविंदा मुख्य कलाकार थे और यह फिल्म 1990 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में गोविंदा, कादर खान, जॉनी लीवर को लोगों ने खूब सराहा था. इस फिल्म ने लोगों को हंसाने और एंटरटेन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. दो दशक बाद भी इस फिल्म के सीन लोगों को हंसने पर मजबूर कर देते हैं. इसके वीडियो देखें तो आज भी आप हंस हंस के लोटपोट हो जाएंगे.

इस तरह लोगों को हंसाने का बीड़ा लेकर अपने जीवन की खुशनुमा यात्रा पर निकले मशहूर हास्य अभिनेता और कलाकार जॉनी लीवर को फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट की तरफ से हम बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं कहते हैं ।

आज के अंक में आपने साक्षात्कार किया अभिनेता और खास तौर पर प्रमुख हास्य कलाकार जॉनी लीवर से । आप हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करते रहें ताकि हमें प्रमोशन मिलता रहे। अब सीमा शाही को इजाजत दीजिए ।

नमस्कार।

Thursday 15 2024

भेड़ियो का गांव

 भेड़ियो का गांव

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 भेड़ियो का गांव उपन्यास गांव की सड़ांध को व्यक्त करने वाला उपन्यास है जिसमें लेखक ने आज के 

ताजातरीन गांव को चित्रित किया है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि गांव का नाम क्या है क्योंकि कमोवेश हर गांव में माहौल यही है।

एक तरफ अमीरी की चकाचौंध दूसरी तरफ ईंट भट्ठे में काम करने वाले मजदूर की जिंदगी और उसके घर के लोगों की दो जून की रोटी के लिए जुगत और जुगाड़ की लड़ाई। जैसे हर गांव में होता है, खाए पिए लोगों को गरीब गुरबा की बहू बेटियों में हरदम संभावनाएं दिखती रहती है और उन्हें लूटना, नोचना, खसोटना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। ऐसी स्थिति में वह छोटी जातियों और कमजोर वर्ग के लोगों की बहू बेटियों की इज्जत को तार तार करने में अपनी शान समझते हैं । यही नहीं जो भी व्यक्ति इसके आड़े आता है वह उनका शत्रु बन जाता है। उस व्यक्ति को मार देना, खत्म कर देना, जला देना, काट देना उनके लिए शगल होता है और वह ऐसा करने से चूकते भी नहीं। भेड़ियों का गांव एक वास्तविक गांव की सच-सच की बेबाक बयानी करता है। यहां का रमेश जो रोजी-रोटी के लिए पंजाब में ईंट भट्ठे पर जाकर काम करता है उसके घर का खर्च मुश्किल से चल पाता है। वो भी तब , जब वह साल साल भर लगातार कमर तोड़ मेहनत करता है। यहां उसकी मां और पत्नी बकरियों का चारा और घर के लिए ईंधन का जुगाड़ करने के लिए बाग, जंगल और खेतों की खाक छानती है जहां बेखौफ घूमते सूर्यभान और प्रदीप सिंह जैसे भेड़िए उसकी पत्नी नीलम के सौंदर्य के पीछे घात लगाए घूम रहे हैं। उसका यौवन उनकी आंखों में गड़ता है। वह उनकी तरफ मुड़कर नहीं देखती तो उनको ये लगता है कि इस घमंडी औरत का घमंड चूर करना है। उनके हिसाब से गरीब गुरबा की औरतों, बहू बेटियों का कोई स्वाभिमान हो ही नहीं सकता। अगर है तो उसे चूर करना कुचलना जरूरी है। इसलिए वह उसको अपने नीचे लेटाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। साम दाम दंड भेद जैसे उपाय भी कर डालते हैं। उसके पीछे प्रतिद्वंद्विता कर रहे सूर्यभान और प्रदीप सिंह एक दूसरे को पीछे छोड़ने में लगे हैं। एक तरफ सूर्यभान बिना बात के पूरे गांव में नीलम की बदनामी प्रदीप का नाम लेकर करता है वहीं दूसरी तरफ प्रदीप इसकी बिल्कुल चिंता ना करते हुए नीलम को पाने के लिए साम दाम दंड भेद सब अपनाते हैं । अंत में जगराना उसका मोहरा बनती है और जगराना के माध्यम से प्रदीप सिंह अपना काम साधते हैं। अंततः नीलम उनके झंडे के नीचे आ ही जाती है। जब यह लक्षण पुरानी पीढ़ी के हैं तो नई पीढ़ी के लड़के लड़कियां क्या करेंगे !

अपने माता-पिता की कीर्ति गाथा गांव में जैसे प्रचारित है ,सुनते हैं और देखते हैं कि इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है तो वह भी उन्हीं की नकल करने में लग जाते हैं। दीपेंद्र और।।।।।।। का प्रेम प्रसंग इसी की उपज है। इस चक्कर में लड़की की जान को खतरा भी हो जाता है तब भी दीपेंद्र को कोई फर्क नहीं है। इधर दीपेंद्र जैसी स्थिति उसके छोटे भाई की भी है। यानि, एक परिवार में एक पिता और उसके दो बेटे इस गांव में तीन औरतों की जिंदगी को नर्क बनाने में लगे हुए हैं। चौथे हैं सूर्यभान ।सूर्यभान को भी नीलम ही चाहिए। उसी के लिए वह प्रदीप सिंह की पूरे गांव में बदनामी करते हैं। जिसमें प्रदीप सिंह तो यह सोचकर खुश रहे कि उनकी मर्दानगी की बखान हो रही है वहीं नीलम अपनी मर्यादा का मर्दन होते हुए देख कर भी चुप रहने को मजबूर है। अंततः तक जब उसे यही पता है कि बदनामी झेलना ही है तो फिर करके क्यों नहीं झेला जाए । इस तर्क पर वह अपने आप को प्रदीप सिंह को सुपुर्द करती है और प्रदीप सिंह इसे अपनी विजय मान लेते हैं। लेकिन प्रकृति का न्याय बराबर हिसाब किताब कर रहा होता है। बस उसका फैसला जब आता है इंसान को पता तभी चल पाता है , उसके पहले नहीं। यही प्रकृति के न्याय की खास बात है। यहां पर भी प्राकृतिक न्याय इसी प्रकार होता है। सूर्यभान दीपेंद्र के कत्ल का इंतजाम करते हैं और पुलिस को पैसा देकर केस को कमजोर करा कर केस का रुख मोड़ देते हैं। अपने नौकर बाबूलाल को बलि का बकरा बना देते हैं। उनके इस खेल में बाबूलाल की नाबालिग बेटी जो हर बात से अनभिज्ञ है उसे भी शामिल कर लेते हैं। इस प्रकार सूर्यभान सोच रहे थे कि उन्होंने जीत हासिल कर लिया है और किसी ने देखा नहीं। वह भूल गए थे कि जिसे देखना है वह तो देख ही रहा है । इस प्रकार सूर्यभान के द्वारा प्रदीप सिंह और नीलम की बदनामी किए जाने पर नीलम ने प्रदीप सिंह से जो वादा लिया था उस वादे को निभाने के लिए जब नीलम ने प्रदीप सिंह से कहा तो प्रदीप सिंह घायल सांप की तरह फुफकार उठे क्योंकि दीपेंद्र की मौत के बाद घायल सांप की तरह प्रदीप सिंह सूर्यभान से बदला लेने के लिए तड़प ही रहे थे। इधर घायल सिंहनी पूनम भी सूर्यभान से बदला लेने के लिए तैयार बैठी थी। प्रकृति इन दोनों का साथ दे रही थी और वह अपना बही खाता बराबर कर रही थी । इसी कड़ी में सूर्यभान पूनम के जाल में फंसकर बड़े आराम से कत्ल होने के लिए उसके घर जाकर दूध बादाम और सुहागरात का सुख लेने पहुंच जाते हैं। यह रात उनकी जिंदगी की निर्णायक रात बनती है जिसमें पूनम प्रदीप सिंह और प्रकृति तीनों का हिसाब किताब बराबर हो जाता है । कोई किसी का देनदार नहीं बचता। रह गई बात कि सूर्यभान का क्या हुआ ?

तो पाठक यह जान पाएंगे कि सूर्यभान पूनम के आंगन में बहुत आराम से सदा के लिए सो गए हैं और उस आंगन में उगने वाले प्याज और लहसुन की रखवाली इस तरह करेंगे कि वह लहसुन और प्याज तभी टूटेंगे जब रमेश, उसकी विधवा मां , उसकी पत्नी पूनम और या फिर प्रदीप सिंह चाहेंगे !

एक बेहतरीन और खूबसूरत किस्सा गोई का उदाहरण बनता है यह उपन्यास भेड़ियों का गांव!!

एक गांव का निवासी गांव की इस तरह होती दुर्गति को देखकर मेरे मन में प्रायः ही ये बात उठती थी कि किसी लेखक को इन समस्याओं को उठाना चाहिए। अब यह कैसे उठाया जाएगा इसे कौन करेगा यह मैं नहीं समझ पा रहा था और मैं स्वयं कर नहीं सकता था। इसलिए इंतजार था कि कोई रचनाकार इसे अपने लेखन का विषय जरूर बनाएगा।

 बहुत से लोगों ने गांव के बारे में लिखने का प्रयास किया है लेकिन वह सब समस्या की बारीकियां से दूर ही रहे जो गांव को अंदर तक सड़ाने में मदद कर रही है। राकेश भ्रमर जी ने इस समस्या को बड़ी ही बारीकी से पकड़ा है और तारीफ की बात ये है कि आपकी भाषा ने इस बात को इतनी सफाई से अभिव्यक्त किया है कि कोई बात छूटी नहीं। आरंभ से अंत तक उपन्यास एक पाठक को बांध कर रखता है। अंत आने से थोड़ा पहले दीपेंद्र की मौत के बाद 

 लगता है कि कहानी खत्म हो जाएगी लेकिन वहां पर प्रदीप सिंह और नीलम के वादे का जिक्र जिस कलात्मक ढंग से किया है और कहानी को खूबसूरती से बढ़ाने में जिस विशेषज्ञता का परिचय दिया है वो प्रशंसनीय है। वहां से जब कहानी आगे बढ़ती है तो मन प्रसन्नता से खिल जाता है और पाठक उपन्यास को अंत तक पढ़ लेने के लिए बेताब हो जाता है। कभी-कभी उपन्यासों में अंत आते-आते पाठक अनुमान लगा लेता है कि इसका समापन क्या होगा। लेकिन इस उपन्यास में लेखक ने अपनी लेखकीय दक्षता से पाठक को भनक तक नहीं लगने दिया कि इसका समापन कहां होगा । जब लेखक यह कहते हैं कि अब नीलम के आंगन में लहसुन और प्याज के पौधे बड़े हो रहे हैं तब कहीं जाकर समझ में आता है कि उनके बड़े होने के साथ ही सूर्यभान के कत्ल का किस्सा खत्म हो गया। नीलम के आंगन में प्याज और लहसुन का यह भेद भी तब खुलता है जब उसकी सास कमला मायके से वापस आती है। इस प्रकार उपन्यास में रहस्य उद्घाटन के सटीक मौके का जिस तरीके से प्रयोग किया गया है वह एक तरफ इसको कसाव देता है तो वही पाठक को हरदम यह जिज्ञासा बनी रहती है कि आगे क्या होने वाला है और यही जानने के लिए उपन्यास के अंतिम शब्द तक पाठक पुस्तक से बंधा विस्मित रूप से एक एक शब्द पढ़ना चला जाता है। समापन पर या तो वह संतुष्ट होकर आह भरता है या लेखक की लेखनी पर मुस्कुरा उठना है यह उसके अपने सोच पर निर्भर है।

 पुस्तक की सफलता के लिए मेरी तरफ से अनंत शुभकामनाएं!

आया सावन झूम के

 फिल्म आया सावन झूम के 

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फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें में आज बातें करते हैं फिल्म आया सावन झूम के की सिल्वर स्क्रीन पर धमाकेदार प्रस्तुति , जिसमें एक से एक बेहतरीन कलाकार बेहतरीन संगीत और मन को बांध लेने वाली एक कहानी है जिसे आप सुनकर उसमें डूब जाना चाहेंगे।



इस अंक को लेकर के हाजिर हूं मैं सीमा शाही दोस्तों नमस्कार,

फिल्म आया सावन झूम के नाम सुनते ही मन में कुछ कुछ  होने लगता है। अगर आपने यह फिल्म देखा है तब तो आप समझ सकते हैं लेकिन यदि आपने यह फिल्म नहीं देखा है तो मन में क्या-क्या होता है यह समझ पाना मुश्किल है। सावन अपने आप में मन को दीवाना बना देता है और जब झूम कर आता है तब तो दीवानगी की हद पार कर देता है। अब देखिए इस फिल्म का गाना जिसे मोहम्मद रफी ने गया है "आया सावन झूम के" ..... सुनने से आपको भरपेट भोजन कर लेने का आनंद मिलता है। मजे की बात यह है कि अगर इसमें मन पसंदीदा कलाकार भी हों तो फिर सोने में सुहागा है । वर्ष 1969 हिंदी  सिनेमा का स्वर्ण युग है और स्वर्ण युग के सितारे धर्मेंद्र आशा पारेख नजीर हुसैन निरूपा राय के अभिनय से सजी फिल्म है। इसकी पटकथा सचिन भौमिक ने लिखी निर्माता जी ओमप्रकाश और निर्देशक रघुनाथ झालानी हैं। देख तो इन कलाकारों की टीम अपने आप में एक परफेक्ट टीम बनाती है। अब इन सब  के साथ संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और उनके साथ गीत लिखने वाले आनंद बक्शी की भी परफेक्ट जोड़ी हो तब कमाल तो होना तय है। अब आईए बात करते हैं गानों की। तो लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी का गाया  गाना "आया सावन झूम के " दर्शकों को झूम जाने के लिए मजबूर कर देता है और मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर का ही एक गाना "साथिया नहीं जाना की जी ना लगे" अपने आप में पूरी एक फिल्म देखने का सुख दे देता है। वैसे तो इस फिल्म में सात गाने हैं लेकिन इसमें से तीन गाने तो बहुत बेहतरीन है जिनके कारण यह फिल्म सुपर हिट म्यूजिकल ब्लॉकबस्टर फिल्म बनी और बॉक्स ऑफिस पर भी खूब नाम कमाया और पैसे भी । फिल्म की कहानी बहुत साधारण सी कहानी है जिसमें एक नौकरानी है माया और उसका मालिक । अब ये मालिक उसके साथ छेड़छाड़ करता है तो नौकरानी प्रतिरोध करती है। इस दौरान होने वाली झूमा झटकी  में गलती से नौकरानी माया के हाथों से मलिक मारा जाता है। माया इस कत्ल के लिए अपने आप को दोषी मानकर डर जाती है और घर छोड़कर भाग जाती है। जब पुलिस उसका पीछा करती है तो माया

    अपने बेटे को एक मंदिर के दरवाजे पर छोड़कर भाग जाती है। बच्चे को मंदिर के पुजारी अपनाते हैं और उसे अपने घर ले जाते है। तभी एक अमीर आदमी (नज़ीर हुसैन) और उसकी पत्नी मंदिर में आते हैं और भगवान से एक औलाद के लिए प्रार्थना करते हैं। उनकी बात सुनकर, मंदिर का पुजारी बच्चे को उन्हें सौंप देता है और उन्हें उसको अपने बच्चे के रूप में पालने के लिए कहता है। दंपती बच्चे का नाम जयशंकर रखते हैं। जयशंकर बड़े होने पर अपने पिता का व्यवसाय संभालने लगता है।


एक दिन जयशंकर की मुलाकात आरती (आशा पारेख) से होती है। वह उसे लुभाने में सफल रहता है और उसके पिता के साथ उनकी शादी की बात करने को राज़ी होता है। जयशंकर आरती के घर जा रहा है इस दौरान गलती से आरती के पिता के ऊपर उसकी गाड़ी चढ़ जाती है। इस दुर्घटना में आरती के पिता की मृत्यु हो जाती है। अचानक घटी इस दुर्घटना से जयशंकर अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। वह आरती, उसके भाई पप्पू और बहन माला   की देखभाल करने लगता है। लेकिन इस तथ्य को छुपाता है कि वह उनके पिता की मृत्यु के लिए जिम्मेदार था। लेकिन इस तरह की बातें बहुत लंबे समय तक ढकी नहीं रह सकती। यह भेद एक समय खुल जाता है। जब आरती को  सच्चाई का पता चलता है तो इससे आरती के मन में उसके प्रति गुस्से और नफरत का भाव भर जाता है। तभी वह कैबरे डांसर रीटा (लक्ष्मी छाया) के साथ जयशंकर के अंतरंग होने की भी गवाह बनती है। अब हालात और खराब हो जाते हैं। फिर जयशंकर को उसके पिता द्वारा घर से निकाल दिया जाता है। परिवार को पता चलता है कि उसका रीटा के साथ एक बेटा है। फिर बाद में पुलिस रीटा की हत्या के आरोप में जयशंकर को गिरफ्तार कर लेती है । हालांकि, बाद में यह पता चलता है कि वह अपनी बहन के पति राजेश को बचा रहा है और उसे रीटा द्वारा पैसे के लिए ब्लैकमेल किया जा रहा है। अंत में, यह पता चलता है कि रीटा के असली पति ने उसे अन्य लोगों को धोखा देने और पैसे के लालच में गोली मार दी थी।

इस प्रकार फिल्म की कहानी कुछ उलझी हुई सी लगती है लेकिन स्क्रीन पर देखने पर सारी बातें साफ-साफ समझ में आती है और कलाकारों के अभिनय संगीत के कारण फिल्म एक खूबसूरत मोड पर समाप्त होती है। बेहतरीन गानों के साथ बेहतरीन निर्देशन में यह फिल्म एक शानदार संगीत में ड्रामा बन जाती है जो सिल्वर स्क्रीन पर एक सपनीली दुनिया तैयार करती है और सिनेमा घर से निकलने पर दर्शक उसके जादू में खोए हुए गानों के साथ उन्हें गुनगुनाते हुए अपने घर चले जाते हैं ।

फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट पर फिल्मी बातों में आज के अंक में आपने सुना फिल्म आया सावन झूम के  की एक संक्षिप्त  समीक्षा। अगले अंक में हम कोई अन्य फिल्म या कोई और कलाकार के बारे में जानकारी आपके लिए लेकर आएंगे तब तक सीमा शाही को अनुमति दीजिए नमस्कार

देश भक्ति

 फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट की फिल्मी बातें आज होंगी देशभक्ति पर आधारित फिल्मी गीतों पर ।

स्वीकार कीजिए सीमा शाही का जय हिंद!



दोस्तों,

यह भारत की जमीन है। यहां शीतल मंद सुगंध समीर बहती है। ये धरती सोना उगलती है, फूल खिलते हैं, फलों में मिठास होती है, घरों में रंगोली, पर्व त्यौहार, नाचना गाना चलता रहता है। इस जमीन की महक ही कुछ अलग है, नशा ही कुछ और है। लेकिन इस जमीन की सरहदों पर चिंगारियों का पहरा है। इन सरहदों के पार दुश्मन घुसने की जुर्रत नहीं कर सकता क्योंकि इस धरती पर कदम रखने वाले को आग से गुजरना पड़ता है। यही वह संदेश है जो हिंदी सिनेमा जगत ने पूरी दुनिया को बारहा समझाया है, बताया है। हिंदी सिनेमा में एक से एक खूबसूरत गाने लिखे गए ,एक से एक सुंदर धुने बनी और यहां की कोकिल कंठी आवाजों ने जब उन्हें अपना स्वर दिया तो पूरा समा, पूरा मौसम, पूरी धरती नाचने लगी। अब जब 15 अगस्त जश्ने आजादी का वह पर्व आ रहा है तो बहुत सारे गीत जेहन में उभरते हैं। जिधर जाओ उधर तिरंगे की लहराती पताका हमें उन गानों को गुनगुनाने का जोश भर देती है और बरबस ही मन गा उठता "है मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती" 


अभी देश को आजाद हुए मात्र 20 साल ही हुए थे। इसी बीच पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री हुए। औद्योगिक युग का आरंभ था, हरित क्रांति अभी अपना रंग नहीं दिखा पाई थी। इसी बीच भारत को युद्ध भी लड़ना पड़ गया जिस कारण देश में महंगाई और अन्न की कमी पड़ गई थी। तब शास्त्री जी ने नारा दिया "जय जवान जय किसान"। इसी पृष्ठभूमि पर गीतकार इंदीवर ने ये गीत लिखा जो मनोज कुमार द्वारा फिल्म उपकार में फिल्माया गया।महेन्द्र कपूर ने अपनी दिलकश आवाज़ से इस गीत को अमर कर दिया। गीत को संगीत से सजाया है मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने। मनोज कुमार को जिन चुनिंदा फ़िल्मों की वजह से भारत कुमार कहा जाता था, उनमें उपकार भी एक थी। मनोज कुमार ने इस फ़िल्म को ख़ुद लिखा, अभिनय किया और डायरेक्ट भी किया। गीतकार इंदीवर का लिखा एक और गाना "है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहने वाला हूं भारत की बात बताता हूं ।" यह इत्तेफाक ही है कि यह गीत भी महेंद्र कपूर के द्वारा ही गाया गया और इसे मनोज कुमार द्वारा फिल्म में उपयोग किया गया। फिल्म थी पूरब और पश्चिम। इसकी शूटिंग लंदन के एक बैंक्वेट हॉल में की गई फिल्म में दिखाया गया है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस गाने को मुंबई में ही लंदन के बैंक्वेट हॉल का सेट देकर फिल्माया गया था जो कहीं से भी सेट जैसा नहीं लगता। महेंद्र कपूर के बेटे रोहन कपूर ने अपने एक संस्मरण में लिखा बताया है कि एक बार वह मनोज कुमार जी के साथ बैठे हुए थे तो मनोज कुमार जी ने हंसते हुए कहा कि मेरे पास बहुत से लोग आते हैं और यह बताते हैं कि उन्होंने लंदन में वह बैंक्विट हॉल देखा है जहां आपने वह गाना शूट किया था। वह कहते हैं कि हमने वह टेबल भी देखा है जिस पर आपने यह गाना शूट किया था। लेकिन मैं उन्हें थैंक यू कहता रहा और मन मन में मुस्कुराता रहा। आगे उन्होंने कहा कि किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे लेकिन मैं तुमसे पर्सनली बताता हूं कि यह शूटिंग मुंबई में ही एक सेट पर की गई थी। ऐसी है इस गाने की कहानी और यह गाना स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का अवसर हो पूरे दिन आपको पूरी दुनिया में भारत के चाहने वाले इस गाने को सुनते और गुनगुनाते हैं। इसी प्रकार एक बहुत प्यारा सा गीत है "नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं बोलो मेरे संग जय हिंद जय हिंद जय हिंद" यह गाना फिल्म सन ऑफ इंडिया के लिए शकील बदायूंनी ने लिखा था इसका संगीत तैयार किया था नौशाद ने और शांति माथुर मुख्य कलाकार ने कोरस के साथ इसे गया गया था । इस गाने के बोल बहुत प्यारे हैं जिन्हें बाल कलाकारों पर फिल्माया गया है और बाल मुख से यह बोल सुनकर आनंद आता है। इसकी आगे की लाइने हैं "नया है ज़माना मेरी नई है डगर

देश को बनाऊँगा मशीनों का नगर

भारत किसी से न रहेगा कहीं कम

आगे ही आगे ...


बड़ा हो के देश का सितारा बनूंगा

दुनिया की आँखों का तारा बनूंगा

रखूँगा ऊँचा तिरंगा हरदम

आगे ही आगे ...

भारतीय सिनेमा ने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देने में हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दशकों से राष्ट्रप्रेम की भावना से ओतप्रोत उद्देश्यपूर्ण फिल्में बनाई जा रही हैं। सन्‌ 1940 की फिल्म 'बंधन' से लेकर 'द लीजेंड ऑफ भगतसिंह' तक ऐसी कई फिल्में बनी है जिन्होंने आम जनता की सुप्त देशभक्ति को जागृत करने में अपना योगदान किया है। यहाँ तक कि हमारे श्रेष्ठ देशभक्तिपूर्ण गीत भी फिल्मों से आए हैं। ये गीत आज हमारे राष्ट्रीय लोकाचार के अंग बन गए हैं।


स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वर्ष 1940 में प्रदर्शित फिल्म 'बंधन' का गीत 'चल-चल रे नौजवान/ रुकना तेरा काम नहीं चलना तेरी शान', पहला लोकप्रिय देशभक्तिपूर्ण गीत माना जाता है। इस गीत में विदेशी शासन से मुक्ति हेतु देश के युवाओं से सहयोग का अप्रत्यक्ष आह्वान किया गया था। कवि प्रदीप के इस गीत को अशोक कुमार और लीला चिटनिस ने गाया था।


वर्ष 1943 में राष्ट्रीयता की भावना अपने चरम पर थी। उस वर्ष आई फिल्म 'किस्मत' के प्रदीप लिखित एक गीत ने देश को झकझोर कर रख दिया था। वह गीत था, ' "आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है/ दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है ।' इसके संगीतकार थे अनिल बिस्वास।


स्वतंत्रता के एक वर्ष पश्चात आई फिल्म 'शहीद' के गीत 'वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हो" ने खलबली मचा दी थी। इसे लिखा था राजा मेहँदी अली खाँ ने। मोहम्मद रफी और खान मस्ताना ने इसे गाया था। धुन बनाई थी गुलाम हैदर ने।


1954 में 'जागृति नामक बच्चों की फिल्म आई। इस फिल्म के गीत आज भी सुने जाते हैं। वे हैं-

 ' हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के' और 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की' । सभी गीत प्रदीप ने लिखे थे और संगीतकार थे हेमंत कुमार।

वर्ष 1956 में आई

राजकपूर की बाल फिल्म 'अब दिल्ली दूर नही का गीत- 'ये चमन हमारा अपना है इस देश पे अपना राज है मत कहो कि सर पर टोपी है कहो सर पर हमारे ताज है" आज भी लोकप्रिय है। इसे गाया था आशा भोंसले ने और संगीतकार थे दत्ताराम।


1957 में बनी फिल्म 'नया दौर' जिसे अब रंगीन कर फिर प्रदर्शित किया गया है । इसमें मस्ती भरा गीत 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का' काफी लोकप्रिय है। इसे मो रफी और बलबीर ने गाया था। इसके गीतकार थे साहिर लुधियानवी।


संगीत निर्देशक नौशाद और गीतकार शकील बदायूँनी का गीत हम कैसे भूल सकते हैं- 'इंसाफ की डगर पे बच्चों दिखाओ चल के ..


भारतीय सिनेमा में युद्ध की पृष्ठभूमि पर अनेक फिल्में बनी हैं। फिल्म 'हकीकत' (1964) भारत-चीन युद्ध पर आधारित थी। इसका गीत 'कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियो ं, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो ं देशभक्ति के जज्बे को बखूबी उभारता है। इसके गीतकार थे कैफी आजमी।


बीते जमाने के कुछ और यादगार गीत हैं- 'जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा फिल्म सिकंदर-ए-आजम 'ऐ वतन-ऐ वतन तुझको मेरी कसम' फिल्म प्रेम पुजारी 'ऐ मेरे प्यारे वत न, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझपे दिल कुरबान फिल्म काबुलीवाला और 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा फिल्म हिन्दुस्तान हमारा।

एक ऐसा गीत है जो किसी फिल्म में नहीं फिल्माया गया, लेकिन लोकप्रियता की पायदान पर शीर्ष पर है। वह गीत है ऐ मेरे वतन के लोगो ं, जरा आँख में भर लो पानी । इसे लता मंगेशकर ने अपनी दर्दभरी आवाज में हजारों दर्शकों के बीच पंडित नेहरू के समक्ष गाया था। इसे लिखा था प्रदीप ने और संगीतकार थे सी. रामचंद्र।

पिछले कुछ दशकों से आतंकवाद, सांप्रदायिक दंगे, भ्रष्टाचार और ओछी राजनीति देश के विकास की राह में रोड़ा बने हुए हैं। इन्हें केंद्र में रखकर कई सार्थक फिल्में बनी हैं। लेकिन इन फिल्मों का कोई भी गीत पुराने गीतों जैसी लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाया।


फिर भी इन फिल्मों के लोकप्रिय गीत हैं- 'दिल दिया है जाँ भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए फिल्म कर्मा, 'भारत हमको जान से प्यारा है' फिल्म रोजा, 'वतन वालों वतन ना बेच देना फिल्म इंडियन और 'जिंदगी मौत ना बन जाए संभालो यारो फिल्म सरफरोश। युद्ध आधारित फिल्म 'बॉर्डर' का गीत 'हिन्दुस्तान-हिन्दुस्तान... मेरी आन, मेरी शान, मेरी जान हिन्दुस्तान' भी उल्लेखनीय हैं।


' मेरा रंग दे बसंती चोला ' सरफरोशी की तमन्ना' और 'पगड़ी संभाल जट्टा ऐसे गीत है ं, जो तीन फिल्मों में थोड़े फेरबदल के साथ लिए गए हैं। वे फिल्में हैं- शहीद (1965) / द लीजेंड ऑफ भगतसिंह (2002) और 23 मार्च 1931 शहीद (2002)। द लीजेंड ऑफ भगतसिंह का गीत 'देश मेरे देश मेरे मेरी जान है तू अपेक्षाकृत बेहतर गीत है।


पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के साथ भारतीय सिनेमा में देशभक्तिपूर्ण हल्के-फुल्के गीतों को जगह मिली है। 'ईस्ट या वेस्ट इंडिया इज द बेस्ट' फिल्म जुड़वाँ, 'ये दुनिया इक दुल्हन.... आय लव माय इंडिया फिल्म परदेस और 'जहाँ पाँव में पायल... इट हैपन्स ओनली इन इंडिया परदेसी बाबू कुछ ऐसे ही गीत हैं।

 उम्मीद है कि भारतीय सिनेमा इसी तरह अपनी फिल्मों और गीतों के माध्यम से देशभक्ति की अलख जगाए रखेगा।


ये था फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट का आज की फिल्मी बातें।

 अब सीमा शाही को अनुमति दीजिए, अगली कड़ी में कुछ और देशभक्ति पर आधारित फिल्मों की बातें लेकर फिर हाजिर होंगे।

 तब तक के लिए जय हिंद!

Saturday 10 2024

अमरीश पुरी

 फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें मैं आज मशहूर चरित्र अभिनेता और खलनायक -- अमरीश पुरी!


दोस्तों नमस्कार इस अंक को लेकर हाजिर हूं मैं सीमा शाही।

एक सुदर्शन व्यक्तित्व जिसमें नायक बनने की पूरी संभावना है फिर भी उन्होंने विलेन की भूमिका अपने लिए चुना, एक खनकती हुई आवाज ,मर्दाना अंदाज , बेखौफ चमकती हुई आंखें, जिसके बोलने मात्र से दुश्मनों के कैंप में हड़कंप मच जाता था ऐसे थे फिल्मी दुनिया के खलनायक अमरीश पुरी! सिनेमा हॉल में पात्र परिचय स्क्रीन पर चल रहा हो तो अमरीश पुरी का नाम आने पर दर्शक वैसे ही तालियां बजाया करते थे जैसे फिल्म के पसंदीदा नायक का नाम आने पर तालियां बजती हैं। उनके कई संवाद दर्शक अपने व्यक्तिगत जीवन में दोहराते हुए पाए जाते हैं। मोगैंबो खुश हुआ! यह एक पसंदीदा चुहल रही है जो प्राय: हंसी मजाक में लोग दोहरा ही देते हैं। अच्छाई पर बुराई का प्रतीक के हमारे देश की सभी कहानियों में उन्होंने बुराई का प्रतीक बनकर, बुराई को हद से आगे बढ़कर जाते हुए दिखाया तो वही उसकी हार को भी इस तरह जनता में रखा और यह बताने की कोशिश की कि कितना बुरा अंजाम बुराई का हो सकता है! उनकी भूमिकाओं की सफलता का यह मुकाम है कि अगर खलनायक का नाम आता है तो अमरीश पुरी का नाम आता है! फिल्मों में विलेन के चरित्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को हुआ था । उनके बड़े भाई मदन पुरी फिल्मों के एक चर्चित चरित्र अभिनेता रहे हैं।


अपने करियर के आरंभ में अमरीश पुरी ने

अभिनेता के रूप में निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों से अपनी पहचान बनाई। उसके बाद खलनायक के रूप में उन्हें प्रसिद्धि मिली। उन्होंने 1984 में बनी स्टीवेन स्पीलबर्ग की "इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ़ डूम" अंग्रेजी फिल्म में मोलाराम की भूमिका निभाई जो काफ़ी चर्चित रही। इस भूमिका का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने हमेशा अपना सिर मुँडा कर रहने का फ़ैसला किया। इस कारण उन्हें खलनायक की ही भूमिकाएं मिलने लगी। व्यवसायिक फिल्मों में प्रमुखता से काम करने के बावज़ूद समानांतर या अलग हट कर बनने वाली फ़िल्मों के प्रति उनका प्रेम बना रहा और वे इस तरह की फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। फिर आया खलनायक की भूमिकाओं से हटकर चरित्र अभिनेता की भूमिकाओं वाले अमरीश पुरी का दौर। और इस दौर में भी उन्होंने अपनी अभिनय कला का जादू कम नहीं होने दिया फ़िल्म मिस्टर इंडिया के एक संवाद "मोगैम्बो खुश हुआ" किसी व्यक्ति का खलनायक वाला रूप सामने लाता है तो फ़िल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे का संवाद "जा सिमरन जा - जी ले अपनी ज़िन्दगी" व्यक्ति का वह रूप सामने लाता है जो खलनायक के परिवर्तित हृदय का द्योतक है। इस तरह हम पाते है कि अमरीश पुरी भारतीय जनमानस के नायकत्व और खलनायक दोनों पक्षों को व्यक्त करने के लिए याद किये जाते है।


अमरीश पुरी ने सदी की सबसे बड़ी फिल्मों में कार्य किया। उनके द्वारा शाहरुख खान की हिट फिल्म "दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" में निभाये गए "बाबूजी" के किरदार की भूमिका को बहुत पहचान मिली और दर्शकों की तालियां भी मिली। उन्होंने मुख्यतः फिल्मों में विलेन का पात्र ही निभाए हैं।


1987 में बनी अनिल कपूर की मिस्टर इंडिया में उन्होंने "मोगैम्बो" का किरदार निभाया जो कि फिल्म का मुख्य खलनायक है। इसी फिल्म में अमरीश पुरी का डायलॉग "मोगैम्बो खुश हुआ" फिल्म-जगत मेंं प्रसिद्ध है।


अमरीश पुरी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पंजाब से की। उसके बाद वह शिमला चले गए। शिमला के बी एम कॉलेज(B.M.College ) से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में वह रंगमंच से लगाव होने के कारण बड़े-बड़े रंगमंच के निर्देशकों और कलाकारों के संपर्क में रहकर नाटकों में भाग लिया। रंगमंच से उनको बहुत लगाव था। एक समय ऐसा था जब अटल बिहारी वाजपेयी और स्व. इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां उनके नाटकों को देखा करती थीं। पद्म विभूषण रंगकर्मी अब्राहम अल्काजी से 1961 में हुई ऐतिहासिक मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे बाद में भारतीय रंगमंच के प्रख्यात कलाकार बन गए।

अमरीश पुरी ने 1960 के दशक में रंगमंच की दुनिया से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उन्होंने सत्यदेव दुबे और गिरीश कर्नाड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं। रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय कॅरियर का पहला बड़ा पुरस्कार था।

अमरीश पुरी फिर थिएटर के रास्ते फिल्मी दुनिया की ओर मुड़ गए और उन्होंने साल 1971 में फ़िल्मी करियर की शुरुआत की । उनकी पहली फिल्म थी‘प्रेम पुजारी’। अमरीश पुरी को हिंदी सिनेमा में स्थापित होने में थोड़ा वक्त जरूर लगा, लेकिन फिर कामयाबी उनके कदम चूमती गयी। 1980 के दशक में उन्होंने बतौर खलनायक कई बड़ी फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी। 1987 में शेखर कपूर की फिल्म ‘मिस्टर इंडिया में मोगैंबो की भूमिका के जरिए वे सभी के जेहन में छा गए। 1990 के दशक में उन्होंने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ‘घायल’ और ‘विरासत’ में अपनी सकारात्मक भूमिका के जरिए दर्शकों का दिल जीत लिया।


अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'गांधी', 'कुली', 'नगीना', 'राम लखन', 'त्रिदेव', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि शामिल हैं। दर्शक उनकी खलनायक वाली भूमिकाओं को देखने के लिए बेहद उत्‍साहित रहते थे।


उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म 'किसना' थी जो उनके निधन के बाद वर्ष 2005 में रिलीज़ हुई। उन्‍होंने कई विदेशी फिल्‍मों में भी काम किया। उन्‍होंने इंटरनेशनल फिल्‍म 'गांधी' में 'खान' की भूमिका निभाई थी जिसके लिए उनकी खूब तारीफ हुई थी। गया। उनके अचानक हुए इस निधन से बॉलीवुड के साथ-साथ पूरा देश शोक में डूब गया था। आज अमरीश पुरी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें आज भी फिल्मों के माध्यम से हमारे दिल में बसी हैं।

जैसा कि हमने पहले ही बताया आपको की अमरीश पुरी के फिल्मी करियर में कुल मिलाकर 400 से अधिक फिल्में है। जिनमें से हिट सुपरहिट फिल्मों की भी संख्या काम नहीं है। इन फिल्मों के नाम लेने की बात आए तो सूची खत्म नहीं होती लेकिन फिर भी कुछ बहुत महत्वपूर्ण फिल्में है जिनका इस मौके पर नाम लेना तो बनता है। ऐसी कुछ फिल्मों के नाम है

कच्ची सड़क ,

मुम्बई एक्सप्रेस  

 मुझसे शादी करोगी  

 ऐतराज़, गर्व, हलचल 

 अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, लक्ष्य 

 टार्ज़न: द वण्डर कार  

 खुशी, दिल परदेसी हो गया, सूर्या: द हीरो , 

जाल, आउट ऑफ कन्ट्रोल , शरारत ,

बधाई हो बधाई,

जानीदुश्मन,नायक,ग़दर मुझे कुछ कहना है ,

चोरी चोरी चुपकेचुपके  

ज़ुबेदा , ऑन विंग्स ऑफ फायर ,ढ़ाई अक्षर प्रेम के , बादल ,मोहब्बतें  

सलाखें ,बारूद  

 डोली सजा के रखना  

 झूठ बोले कौआ काटे  

 चाइना गेट, परदेस , कोयला, विरासत  

सरदारी बेगम ,घातक, दिलजले ,गुंडाराज 

दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे  

करन अर्जुन,संग्राम , सूरज का सातवाँ घोड़ा, दामिनी ,वंश तहलका , विश्वात्मा,कोहराम,

सौदागर अज़ूबा , जिगरवाला  

 फूल और काँटे  

 त्रिनेत्र ,घायल,आज का अर्जुन ,निगाहें,त्रिदेव ज़ुर्रत,नाइंसाफी 

इलाका,कमांडो ,लोहा,मिस्टर इण्डिया  

तमस ,नगीना और सलाखें इत्यादि। फिल्मों की इतनी बड़ी स्थिति कि उनका नाम लेते-लेते शाम हो जाएगी ऐसे थे हिंदी सिनेमा के सुपर खलनायक चरित्र अभिनेता अमरीश पुरी। 

अमरीश पुरी का 12 जनवरी 2005 को 72 वर्ष के उम्र में ब्रेन ट्यूमर की वजह से निधन हो गया । हमारा चहेता कलाकार हम सबसे जुदा हो गया। पीछे छोड़ गया एक बहुत बड़ा शून्य लंबा सन्नाटा। फिल्मी दुनिया में अभी भी मोगंबो की सीट खाली है । क्या जाने कब कोई कलाकार आएगा जब उस मुकाम पर फिर कोई झंडा लहराएगा! फिल्मी दुनिया के नायाब सितारे चरित्र अभिनेता और खलनायक हम आपको बहुत याद करेंगे ! बहुत- बहुत याद करेंगे। 



फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें के अंतर्गत आज आप मशहूर चरित्र अभिनेता और विलेन अमरीश पुरी के फिल्मी करियर का सफरनामा सुन रहे थे। आज का अंक यही तक। आगे हम फिर किसी नायक, खलनायक नायिका ,चरित्र अभिनेता के फिल्मी सफर या किसी फिल्म की समीक्षा लेकर फिर आपके साथ होंगे। तब तक के लिए मुझे, यानी सीमाशाही को अनुमति दीजिए नमस्कार।

सलमान खान

 फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट में आज एक ऐसे सितारे की कहानी जो मैं कहती जाऊं आप सुनते जाइए और वह कभी खत्म नहीं होगी। जी हां आज उसी सितारे पर होगी फिल्मी बातें-

स्वीकार कीजिए सीमा शाही का नमस्कार, आदाब


दोस्तों ,

जिसकी कहानी खत्म नहीं होती, जिसके काम की सीमा नहीं है, जिसके फिल्मों की सही संख्या अभी तक नहीं पता, जो जब जवान हुआ तो कभी बूढ़ा नहीं हुआ, कौन है वो ?

कहीं वो सल्लू भाई तो नहीं ?

जी हां, ठीक समझा आपने! वैसे भी इतनी सारी खूबियां लेकर आने वाला कौन हो ही सकता है!

दोस्तों सलमान खान जिन्हें लोग प्यार से सल्लू भाई भी कहते हैं, उनका पूरा नाम अब्दुल रशीद सलीम है। सलमान का जन्म 27 दिसंबर 1965 को फिल्मी दुनिया की एक अजीम शख्सियत सलीम खान और सुशीला चरक के सबसे बड़े पुत्र के रूप में हुआ। उनके दादा अफगानिस्तान से आए थे और भारत के मध्य प्रदेश में बसे। उनकी मां मराठी हिंदू हैं। उनके दो भाई अरबाज खान और सोहेल खान दोनों ही फिल्म स्टार हैं। उनकी बहनें है अलवीरा और अर्पिता। अलवीरा की शादी अभिनेता निर्देशक अतुल अग्निहोत्री से हो चुकी है। सलमान अपने भाइयों अरबाज और सुहैल के साथ बांद्रा में सेंट टेनिस लास्ट हाई स्कूल से अपनी पढ़ाई आरंभ की। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर स्थित सिंधिया स्कूल से हुई थी। उसके बाद मुंबई आकर आगे आपने पढ़ाई को जारी रखा ।

सलमान खान ने सन 1988 में फिल्म बीवी हो तो ऐसी फिल्म से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। सलमान को अपनी पहली बड़ी व्यावसायिक सफलता 1989 में रिलीज़ हुई फ़िल्म मैंने प्यार किया से मिली, जिसके लिए इन्हें फिल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ नवागत पुरूष अभिनेता पुरस्कार भी दिया गया। वे बॉलीवुड की कुछ सफल फिल्मों में स्टार कलाकार की भूमिका करते रहे, जैसे साजन , हम आपके हैं कौन , हम साथ साथ हैं और बीवी नं॰ 1 । ये ऐसी फिल्में थीं जिन्होंने उनके करियर में पाँच अलग वर्षों में सबसे अधिक कमाई की।

 उन्हें फिल्म "कुछ कुछ होता है" में उनकी अतिथि-भूमिका के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार दिया गया और तब से इन्होंने कई आलोचनात्मक और व्यावसायिक फिल्मों में स्टार के रूप में सफलता प्राप्त की है जिनमें "हम दिल दे चुके सनम" , "तेरे नाम" , "नो एन्ट्री" और "पार्टनर" आदि फिल्में शामिल हैं। 2017 में "टाइगर जिंदा है" ने कमाई के मामले मे नया इतिहास बनाया इस तरह ख़ान ने खुद को हिंदी सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं में सबसे महान अभिनेता की छवि बनाई। बाद में बनी फ़िल्में, "वांटेड" , "दबंग" रेड्डी" और "बॉडीगार्ड " उनकी हिन्दी सिने जगत में सर्वाधिक कमाई वाली फ़िल्में रही। सन 2014 में बनी फिल्म "किक" सलमान की पहली फिल्म है जो 200 करोड़ के क्लब में शामिल हुई है। "किक" सलमान की सातवीं फिल्म है जो 100 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस कर चुकी है। इससे पहले 6 फिल्में 100 करोड़ क्लब में शामिल हो चुकी हैं । "एक था टाइगर " "दबंग-1 और दबंग 2" "बॉडीगार्ड " , "रड्डी" और "जय हो" ऐसी फिल्में है जिनकी शुद्ध कमाई एक सौ से डेढ़ सौ करोड रुपए के बीच आंकी गई है। सलमान ख़ान एक भारतीय अभिनेता के साथ एक गायक भी है। वर्ष 1990 में ख़ान की केवल एक फ़िल्म रिलीज़ की गई जिसका नाम था बागी: "अ रिबेल फॉर लव"। इसमें दक्षिण भारत की अभिनेत्री नग़मा मुख्य भूमिका में थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और इसके बाद वर्ष 1991 इनके लिए सफल वर्ष साबित हुआ जब इन्होंने लगातार तीन सफल हिट फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाई । प्रारंभ में ही बॉक्स ऑफिस पर इन फिल्मों की जबरदस्त सफलता के बावजूद 1992-93 में रिलीज हुई इनकी तमाम फिल्में असफल रही

सूरज बड़जात्या के निर्देशन में दूसरी बार रोमांस फिल्म "हम आपके हैं कौन" में सह कलाकार माधुरी दीक्षित के साथ ख़ान ने 1994 में अपनी पहली सफलता का इतिहास दोहराया। उस साल की यह सबसे बड़ी हिट फिल्म थी और बॉलीवुड में सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता के अलावा इस फिल्म को दूर दूर से प्रशंसा मिलती रही और ख़ान को भी उनके प्रदर्शन के लिए तारीफ मिली जिसके चलते उन्हें दूसरी बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए नामांकन मिला। उस वर्ष ख़ान की भूमिका वाली तीन और फिल्में रिलीज़ हुईं लेकिन किसी ने भी इतनी सफलता नहीं दिलाई जितनी कि पहली फिल्म ने दिलाई थी। हालाँकि सह कलाकार आमिर ख़ान के साथ इनकी फिल्म अंदाज अपना अपनाके रिलीज होने के बाद से ही इनके प्रदर्शन के लिए इन्हें प्रशंसा मिल गई थी। 1995 में इन्होंने राकेश रोशन की ब्लॉकबस्टर फिल्म करण अर्जुन से अपनी सफलता को मजबूत किया जिसमें शाहरुख़ ख़ान इनके सह कलाकार थे। यह फिल्म वर्ष की दूसरी सबसे बड़ी हिट फिल्म रही। इसमें करन की भूमिका ने इनके नाम को एक बार फिर फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नामित कर दिया। हालांकि यह पुरस्कार करन अर्जुन के सह कलाकार शाहरूख ख़ान को दिया गया था।

सलमान ने 1999 के बाद दो सफल फिल्में दी हैं। इनमें से पहली संजय लीला भंसाली की "ख़ामोशी: द म्यूज़िकल" थी जिसमें सह कलाकार के रूप में मनीषा कोइराला, नाना पाटेकर और सीमा बिस्वास थीं। वैसे तो फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही फिर भी समीक्षकों द्वारा सराही गई। इनकी अगली सफलता सनी देओल और करिश्मा कपूर के साथ राज कंवर की एक्शन हिट फिल्म "जीत" से रही। 1997 में इनकी दो फिल्में "जुड़वां" और "औजार" रिलीज़ हुई। पहली वाली फिल्म डेविड धवन के निर्देशन वाली एक हास्य फिल्म थी जिसमें जन्म के समय बिछुड़ जाने के कारण दोहरी भूमिका निभाई थी।

ख़ान ने 1998 में पाँच अलग अलग फिल्मों में काम किया जिसमें उनकी पहली रिलीज "प्यार किया तो डरना क्या" वर्ष की सबे बड़ी सफल फिल्म साबित हुई इसमें इनकी सह कलाकार काजोल थीं। इसके बाद साधारण सी सफलता दिलाने वाली इनकी फिल्म "जब प्यार किसी से होता है" आई। ख़ान ने उस युवा पुरूष की भूमिका निभाई थी, जिसे ऐसे बच्चे को संरक्षण में रखना है, जो उसका बेटा होने का दावा करता है। इस फिल्म में ख़ान का प्रदर्शन उनके लिए कई सकारात्मक सूचना एवं उनके आलाचकों से इनके पक्ष में खबरें लेकर आया। वे करन जौहर के निर्देशन वाली पहली फिल्म "कुछ कुछ होता है" के ही चक्कर काटते रहे। शाहरूख ख़ान और काजोल के साथ सह कलाकार के रूप में इन्होंने केवल अमन की भूमिका करने वाले केमियो तक ही बढ़ पाए। लेकिन, यह उसके लिए फायदेमंद सिद्ध हुई क्योंकि उनके प्रदर्शन ने उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता की श्रेणी में फिल्मफेयर पुरस्कार दिला दिया।


1999 में ख़ान ने तीन हिट फिल्मों "हम साथ-साथ हैं" में भूमिका निभाई जिन्होंने तीसरी बार सूरज बड़जात्या के साथ इनके संबंधों को मजबूत किया । "बीवी नं.1" उस साल की सबसे बड़ी फिल्म रही और "हम दिल दे चुके सनम" ने आलोचकों का मुँह बंद कर दिया और इस फिल्म ने इन्हें एक बार फिर सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामित करवा दिया।

वर्ष 2000 में इन्होंने छ: फिल्मों में काम किया जो आलोचकों की दृष्टि में व्यापार करने में असफल रहीं, इनमें से दो फिल्में कुछ सफल रहीं जैसै "हर दिल जो प्यार करेगा'" और "चोरी चोरी चुपके चुपके" और इन दोनों में रानी मुखर्जी और प्रिटी जिन्टा इनकी सह कलाकार थीं। वर्ष 2001 तक देर से रिलीज होने वाली इनकी फिल्म "चोरी चोरी चुपके चुपके", में इनके प्रदर्शन की सराहना की गई। सरोगेट चाइल्ड बर्थ के मुद्दे को सुलझाने वाली बालीवुड की यह पहली फिल्म थी जिसमें ख़ान ने एक धनी उद्योगपति की भूमिका निभाई थी, जो अपनी पत्नी के बांझ होने के बाद एक सरोगेट मदर किराए पर रख लेता है। आलोचकों ने इनके इस रूख को गंभीर भूमिका के प्रति लिया जिसमें इनके पहले की भूमिकाओं की तुलना में अधिक पैनापन दिखाई दिया। वर्ष 2002 में इन्होंने विलंब से रिलीज होने वाली फिल्म "हम तुम्हारें हैं सनम" में काम किया जो बॉक्स ऑफिस पर अर्द्ध हिट रही।

ख़ान की अगली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर तब तक असफल होती रही जब तक उन्होंने 2003 में "तेरे नाम" फिल्म से अपनी वापसी नहीं की। इस फिल्म से बहुत कमाई की गई और इसके आलोचकों ने इसके प्रदर्शन की तारीफ की गई । उनका भावनात्मक रूप से चिल्लाना बेहद शानदार रहा। इन्होंने "मुझसे शादी करोगी" और "नो एन्ट्री" जैसी हास्य फिल्मों के द्वारा बॉक्स ऑफिस पर अपनी सफलता जारी रखी। वर्ष 2006 इनके लिए अत्यधिक असफलता का वर्ष रहा जिसमें इनकी फिल्में "जान-ए-मन" और "बाबुल" दोनों ही बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गईं।

वर्ष 2008 में ख़ान ने अपनी गेम शो दस का दम के साथ छोटे परदे पर उतरे जो अंतरराष्ट्रीय शो पॉवर ऑफ़ टेन पर आधारित था।

ख़ान एक समर्पित बॉडीबिल्डर हैं। वे प्रतिदिन मेहनत करते हैं और मूवी तथा स्टेज शो में अपनी कमीज उतारने के लिए प्रसिद्ध हैं। अमरीका की पीपुल पत्रिका द्वारा वर्ष 2004 में इन्हें दुनिया का 7वां सबसे सुंदर पुरूष और भारत के सबसे सुंदर पुरूष का खिताब मिला। अपने कैरियर में ख़ान विभिन्न धर्मार्थ संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। बॉलीवुड में उनके रोमांस के बहुत से किस्से सुनने को मिलते रहे। इनमें ऐश्वर्या राय, सोमी अली और संगीता बिजलानी के साथ संबंधों के चर्चे भारतीय मीडिया जगत में खूब रहे। उन्हें बालीवुड का सबसे चहेता कुंवारा अभिनेता होने का रुतबा प्राप्त है। वे 2003 से ही मॉडल से अभिनेत्री बनी कैटरीना कैफ के साथ डेटिंग करते आ रहे थे।

15 जनवरी 2008 को लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय में ख़ान की आदमकद मोम की प्रतिमा स्थापित की गई और इस प्रकार संग्रहालय में मोम की प्रतिमा के रूप में दिखाई देने वाले वे चौथे भारतीय अभिनेता बन गए।

सलमान खान के द्वारा सिल्वर स्क्रीन पर जीवंत किए गए पात्र

फिल्म "दबंग वन" और "दबंग 2" का इंस्पेक्टर चुलबुल पांडे फिल्म "बजरंगी" में बजरंगी भाईजान, फिल्म "सुल्तान" में सुल्तान अली खान

"ट्यूबलाइट" में लक्ष्मण सिंह विष्ट सहित बहुत से किरदार हैं जिन्हें सलमान खान ने अपने अभिनय से चांदी के परदे पर उकेरा है निखारा है। आपने बिग बॉस, तारक मेहता का उल्टा चश्मा जैसे कई नाम - चीन धारावाहिकों में भी बतौर एंकर और अन्य भूमिकाओं में भाग लिया और इन धारावाहिकों को प्रसिद्धि की बुलंदियों तक पहुंचाया।




अपने जीवन को पूरी सहजता से जी रहे हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार सलमान खान अपनी कुछ खास अदाओं के लिए प्रशंसकों में बहुत प्रिय हैं। उनके फॉलोअर्स की संख्या मिलियन्स में है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में युवा उन्हें प्रेम करते हैं ,उनकी फिल्में देखते हैं, उनसे मिलना चाहते हैं, उनके ऑटोग्राफ के दीवाने हैं। सलमान खान फिल्मी दुनिया में अभी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ सक्रिय है और हम आशा करते हैं कि एक से एक बेहतरीन फिल्में हिंदी सिनेमा जगत को उनकी ओर से मिलने वाली है। फेयरफ्लिक्स परिवार उनके लिए दुआ करता है कि उनकी प्रसिद्धि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहे ,एक से एक अच्छी फिल्में करते रहे , श्रोताओं के दिल पर राज करें और सितारों की तरह जगमगाते रहे। इन्हीं दुआओं के साथ हमारी यह भी दुआ है कि हमारे दर्शक खुश रहे प्रसन्न रहे और सुनते रहे यूं ही हमारे यूट्यूब चैनल की "फिल्मी बातें" जो कि आपके लिए लेकर आता है फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट ।

तो अब सीमा शाही को दीजिए इजाजत नमस्कार, शब्बा खैर!!

जितेंद्र

 फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के साज़ पर फिल्मी बातें एक राग है और आज का नगमा है फिल्म स्टार जितेंद्र!

 इस साज़ पर यह नगमा लेकर हाजिर हूं मैं सीमा शाही ।

दोस्तों नमस्कार,

 आदाब 



साथियों,

रवि कपूर यानी हिंदी सिनेमा के मशहूर सुपरस्टार जितेंद्र !

 07 अप्रैल 1942 को पंजाब के अमृतसर में जन्मे जितेंद्र का हिंदी सिनेमा में प्रवेश से पहले नाम रवि कपूर था। बाद में यही रवि कपूर जितेंद्र के नाम से फिल्मों में मशहूर हुए। उनके पिता अमरनाथ और माता कृष्णा कपूर थी जिनका नकली आभूषणों का व्यवसाय था। ये आभूषण फिल्म उद्योग को आपूर्ति किए जाते थे। जितेंद्र की पढ़ाई मुंबई में सैंट सेबास्टियन हाई स्कूल में और फिर मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में हुई जहां इनके दोस्त राजेश खन्ना भी साथ साथ पढ़ते थे। 

जीतेन्द्र अपनी पत्नी शोभा से तब मिले थे जब वह सिर्फ 14 साल की थीं। उन्होंने स्कूल पूरा किया, कॉलेज गईं और ब्रिटिश एयरवेज में एयर होस्टेस के रूप में कार्यरत थीं । जब जीतेन्द्र 1960-66 के बीच खुद को एक अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब वह शोभा के साथ रिश्ते में थे और वह 1972 तक उनकी प्रेमिका थीं। बिदाई की रिलीज़ तक जीतेन्द्र और शोभा ने शादी करने का फैसला नहीं किया था। 

 बाद में 18 अक्टूबर 1974 को उन्होंने जानकी कुटीर में एक सादे समारोह में केवल कुछ परिवार के सदस्यों और दोस्तों की उपस्थिति में अपना विवाह संपन्न कराया था। अपनी अधिकृत जीवनी में, हेमा मालिनी ने दावा किया है कि वे लगभग शादी करने वाले थे, लेकिन वह पीछे हट गईं। 

जीतेन्द्र और शोभा के विवाह से दो बच्चे हैं। उनमें से बड़ी बेटी एकता कपूर बालाजी टेलीफिल्म्स चलाती हैं जबकि उनके बेटे तुषार कपूर भी एक अभिनेता हैं। जीतेन्द्र ने अपनी बेटी द्वारा निर्मित फिल्मों में से एक 'कुछ तो है' में संक्षिप्त भूमिका निभाई , जो 2003 में रिलीज़ हुई। ये एक थ्रिलर फिल्म थी, जिसमें वे अपने बेटे तुषार के साथ दिखाई दिए।

पारिवारिक जीवन में घटने वाली इन महत्वपूर्ण घटनाओं के समानांतर जितेंद्र फिल्मों में लगातार सक्रिय रहे। वर्ष 1964 में फिल्म "गीत गाया पत्थरों ने" रिलीज हुई जिसमें जितेंद्र को डबल रोल में लिया गया। इसके बाद उनका करियर आगे बढ़ता चला गया। जितेंद्र फिल्मी दुनिया में अपने लंबे करियर के लिए जाने जाते हैं । इस समय वो बालाजी टेलिफिल्म्स और बालाजी मोशन पिक्चर्स के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर रहे हैं।

फिल्म "गीत गया पत्थरों ने" घरेलू स्तर पर असफल साबित हुई फिल्मों से कुछ समय की अनुपस्थिति के बाद उन्होंने 1967 में रविकांत नागेश के द्वारा बनाई जासूसी थ्रिलर फिल्म "फर्ज" के साथ एक मजबूत वापसी किया उसी के बाद उन्होंने तेलुगू फिल्म की एक रिमेक बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर बनकर उभरी और जितेंद्र को स्टार बना दिया। फिल्म "फर्ज" का संगीत 1960 के दशक की सबसे अधिक बिकने वाली हिंदी फिल्म की एल्बम बनी इसके अधिकांश गाने "मस्त बहारों का मैं आशिक", "बार-बार यह दिन आए हैप्पी बर्थडे टू यू"", " हम तो तेरे आशिक हैं" काफी लोकप्रिय हुए जिनमें से कुछ गाने मोहम्मद रफी द्वारा एकल और कुछ में मुकेश और लता का युगल गायन है लेकिन यह फिल्म अपने म्यूजिकल परफॉर्मेंस के लिए प्रशंसकों में बहुत पसंद की गई। वर्ष 1968 में उनकी तीन फिल्में रिलीज हुई "सुहागरात" "औलाद" और "मेरे हुजूर"। इनमें से सुहागरात और औलाद आलोचनात्मक और व्यावसायिक रूप से असफल रही । राजकुमार और माला सिन्हा की सह कलाकार वाली बाद की फिल्म को समीक्षकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और उसने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कारोबार किया। 1969 में जितेंद्र को "जीने की राह" फिल्म में काम करने का मौका मिला जिसका प्रोडक्शन एलवी प्रसाद ने किया था। यह फिल्म अच्छी रही ।उसके बाद टीवी रमन्नातर रमणा की फिल्म "वारिस" रविकांत नागेश की "जिगरी दोस्त" के साथ तीन व्यावसायिक फिल्में मिली जो पूरी तरह से सफल रही । फिर 1970 के दशक की शुरुआत में उन्होंने चंद्र बोहरा की फिल्म "खिलौना" की जिसमें संजीव कुमार और मुमताज भी मुख्य भूमिका में थे यह फिल्म बड़ी हिट साबित हुई और तीनों मुख्य कलाकारों को उनके अभिनय के लिए प्रशंसा मिली । उन्होंने उसे वर्ष तर रमणा की "हमजोली" के साथ एक और सुपरहिट फिल्म दी जो ब्लॉकबस्टर तमिल फिल्म "पैनाकारा कुडमबम" की रीमिक्स थी ।


 1970 के नए दशक की सफलतापूर्वक शुरुआत करने के बावजूद, जीतेन्द्र ने 1971 से 1973 तक एक खराब दौर देखा क्योंकि इस दौरान उनकी अधिकांश फिल्मों ने खराब प्रदर्शन किया। इन फिल्मों में नासिर हुसैन की क्राइम थ्रिलर "कारवां" , आशा पारेख के साथ एकमात्र अपवाद थी। ये घरेलू स्तर पर सुपरहिट रही और विदेशी बाजारों में ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर रही , खासकर चीन में जहां इसे ऑल टाइम ग्रेट "आवारा" और "नूरी" के साथ गिना जाता है । "कारवां" 1970 के दशक की सबसे ज्यादा बिकने वाली हिंदी फिल्म एल्बमों में से एक थी। आर.डी. बर्मन द्वारा रचित इसका संगीत केक पर चेरी साबित हुआ क्योंकि अधिकांश गाने - "चढ़ती जवानी मेरी चाल मस्तानी", "कितना प्यारा वादा है" और "पिया तू अब तो आजा" तुरंत हिट हो गए और फिल्म की मेगा सफलता में प्रमुख भूमिका निभाई। इस दौरान, उन्हें गुलज़ार के हल्के-फुल्के नाटक परिचय में एक दयालु ट्यूशन शिक्षक की भूमिका के लिए भी प्रशंसा मिली। परिचय का गीत "मुसाफ़िर हूँ यारों" बिनाका गीतमाला वार्षिक सूची 1973 में 25वें स्थान पर सूचीबद्ध किया गया था और इसे अब तक के सबसे पसंदीदा फ़िल्मी गीतों में से एक माना जाता है । 

अगले वर्ष, "खुशबू" और "उमर कैद" के साथ 1975 में दो और हिट फिल्में देने के बाद , उन्होंने तीन बड़ी सफल फिल्मों में अभिनय किया, हॉरर फिल्म "नागिन" और पारिवारिक ड्रामा "उधार का सिंदूर" और "संतान" । जहां "संतान" सुपरहिट रही, वहीं "नागिन" और "उधार का सिंदूर" एक कदम आगे निकल गए और ब्लॉकबस्टर बनकर उभरे। 

1977 जीतेन्द्र के लिए बड़ा साल साबित हुआ जब मनमोहन देसाई की महान कृति "धरम वीर" ने बड़ी ब्लॉकबस्टर कमाई की, जिसमें धर्मेंद्र , जीनत अमान और नीतू सिंह भी थे । यूनाइटेड किंगडम में, फिल्म के 5 शहरों में 23 शो कराए गए। मोहम्मद रफी के गानों की सफलता से प्रेरित होकर, फिल्म ने यूके में £5०,००० की रिकॉर्ड शुरुआती कमाई की। इसके अलावा, फिल्म ने सोवियत संघ में 32 मिलियन टिकट बेचे । धरम वीर की बड़ी सफलता के बाद जे. ओम प्रकाश की तीसरी निर्देशन वाली फिल्म "अपनापन" सुपरहिट रही । उसी वर्ष, गुलज़ार के साथ उनका अंतिम सहयोग हेमा मालिनी के साथ रोमांटिक ड्रामा "किनारा" में हुआ । यह फिल्म अपने दिल को छू लेने वाले कथानक और लता मंगेशकर और भूपिंदर द्वारा गाए गए गीत "नाम गुम जाएगा" के लिए व्यापक रूप से याद की जाती है। जीतेन्द्र का अच्छा दौर 1978 में दसारी नारायण राव की पारिवारिक ड्रामा फिल्म "स्वर्ग नरक" में एक और ब्लॉकबस्टर के साथ जारी रहा, जो निर्देशक की अपनी तेलुगु फिल्म "स्वर्ग नरकम" की रीमेक थी । उन्होंने राम माहेश्वरी की "कर्मयोगी" में राज कुमार के साथ और के. बापैया की "दिल और दीवार" में अशोक कुमार के सह-कलाकार के रूप में भी बड़ी हिट फिल्में दीं । उन्होंने राजकुमार कोहली की हॉरर थ्रिलर "जानी दुश्मन" में एक और ब्लॉकबस्टर और अनिल गांगुली की ड्रामा फिल्म "खानदान" में एक हिट के साथ दशक का समापन शानदार तरीके से किया ।

1974 से 1979 तक लगातार हिट फ़िल्मों के ज़रिए जीतेन्द्र ने अपनी स्टार-स्थिति को मज़बूत किया।

जीतेन्द्र 80 के दशक की शुरुआत में अपने चरम पर पहुंचे और पूरे दशक में एक मजबूत पारी का आनंद लिया। 1990 में उनकी पहली रिलीज़ जे ओम प्रकाश की ड्रामा फिल्म "आशा" थी जो एक बड़ी ब्लॉकबस्टर बन गई और आज तक उनकी सबसे बड़ी एकल हिट बनी हुई है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल द्वारा रचित इसका साउंडट्रैक संगीत चार्ट पर हावी रहा और यह दशक की सबसे अधिक बिकने वाली हिंदी फिल्म एल्बमों में से एक थी। उनकी अगली रिलीज़ रवि चोपड़ा की बड़े बजट की एक्शन थ्रिलर "द बर्निंग ट्रेन थी" जिसमें उन्होंने धर्मेंद्र, विनोद खन्ना , हेमा मालिनी , परवीन बाबी और नीतू सिंह के साथ सह-अभिनय किया। फिल्म ने रिलीज के समय औसत कारोबार किया। "टक्कर" के रूप में एक और मध्यम सफलता प्राप्त करने के बाद , उन्होंने "ज्योति बने ज्वाला" , "जुदाई" और "माँग भरो साजना" में तीन बैक-टू-बैक हिट के साथ वर्ष का समापन किया । 1981 में, जीतेन्द्र ने एसवी राजेंद्र सिंह बाबू की एक्शन क्राइम फिल्म "मेरी आवाज़ सुनो" में अभिनय किया । कन्नड़ हिट अंता की रीमेक , यह फिल्म अपने बोल्ड विषय के कारण विवादों में रही, लेकिन दर्शकों की उत्कृष्ट प्रतिक्रिया के साथ खुली और बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। उसी वर्ष, उन्होंने "एक ही भूल" में सुपरहिट और "ज्योति" में मध्यम सफलता हासिल की , जो भारत में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई, लेकिन विदेशों में एक बड़ी सफलता थी। अपनी पिछली कुछ फिल्मों के टिकट काउंटरों पर बहुत अच्छा प्रदर्शन करने के बाद, जीतेन्द्र ने अपने होम बैनर तिरुपति फिल्म्स के तहत एचएस रवैल की रोमांटिक ड्रामा "दीदार-ए-यार" का निर्माण और अभिनय करने का फैसला किया। इस फिल्म में रेखा , ऋषि कपूर और टीना मुनीम भी थे।मुख्य भूमिका में, उम्मीदों पर खरा उतरने में विफल रही और निवेश की न्यूनतम वसूली के साथ एक प्रमुख बॉक्स ऑफिस फ्लॉप साबित हुई। इस अप्रत्याशित पराजय के बाद, जीतेन्द्र ने फिर कभी फिल्म निर्माण में वापस नहीं आने की गंभीर प्रतिज्ञा की। 

   

1998 में उजाला अवार्ड्स में गेस्ट ऑफ ऑनर अवार्ड ,

2002 न्यूयॉर्क में ज़ी गोल्ड बॉलीवुड मूवी अवार्ड्स में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड।

2003 में फ़िल्मफ़ेयर लाइफ़टाइम अचीवमेंट पुरस्कार

2004 में अटलांटिक सिटी (संयुक्त राज्य अमेरिका) में "लीजेंड ऑफ इंडियन सिनेमा" पुरस्कार ।

2005 में स्क्रीन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड

2008 में सैंसुई टेलीविज़न लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड 

2012 में लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए ज़ी सिने अवार्ड

2012 में लायंस गोल्ड अवार्ड्स: सबसे सदाबहार रोमांटिक हीरो 

स्वागत और विरासत

जीतेन्द्र को भारतीय सिनेमा के सबसे महान अभिनेताओं में से एक माना जाता है। वह अपने अभिनय, शैली और नृत्य के लिए जाने जाते हैं। फ़र्ज़ में अपनी ऊर्जावान नृत्य शैली के कारण , उन्होंने "जंपिंग जैक" की उपाधि अर्जित की। 

1970 और 1980 के दशक के सबसे सफल अभिनेताओं में से एक, जीतेन्द्र बॉक्स ऑफिस इंडिया की "शीर्ष अभिनेताओं" की सूची में सात बार दिखाई दिए। 

2022 में, उन्हें आउटलुक इंडिया की "75 सर्वश्रेष्ठ बॉलीवुड अभिनेताओं" की सूची में रखा गया।




फेयरफ्लिक्स के साज़ पर फिल्मी बातें के राग पर ये था आज का नगमा सुपरस्टार जितेंद्र। आपको कैसा लगा यह हमें कमेंट में बताइएगा। दोस्तों, हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करें और इसी के साथ मुझे अनुमति दीजिए और स्वीकार कीजिए सीमा शाही का नमस्कार,

 आदाब

Friday 02 2024

 याद ए माज़ी में शामिल है मोहम्मद रफी का नाम : (मो० रफी की पुण्यतिथि पर विशेष)

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फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें के अंतर्गत आज याद ए माज़ी में मोहम्मद रफी शामिल है किस तरह! दिल के उन्हीं कोनों को टटोलने की कोशिश करेंगे । हिंदी, पंजाबी, उर्दू सहित कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में 28000से अधिक और अकेले हिंदी में 7000 से अधिक गाने रिकॉर्ड करने वाले अज़ीम शख्सियत के मालिक मोहम्मद रफी एक सामान्य इंसान तो नहीं थे । भारत की किस्मत में हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग जब ईश्वर ने लिखा था तब उन्होंने इसे पूरा करने के लिए मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, मुकेश आशा भोसले ,मन्ना डे, सुरेश वाडकर और महेंद्र कपूर जैसे गायक कलाकारों को भी भेजा। गीतकार और संगीतकारों की जोड़ियां भी धरती पर आई और यह बात आकस्मिक नहीं लगती कि इस समय सारे चोटी के गायक गीत लिखने वाले संगीत संयोजन करने वाले एक साथ मौजूद थे। हम में से जो लोग 50 से 60 के दशक तक जन्मे हैं उन्होंने मोहम्मद रफी को अपनी जिंदगी में अपनी धड़कनों में महसूस भी किया है।उन्होंने उनको गानों को रिकॉर्ड करते हुए सुना है। फिर उन्होंने उन्हें यह भी कहते हुए सुना है कि "तुम मुझे यूं भुला न पाओगे"... और तब क्या वो जानते थे कि इस तरह अपनी यादों को देकर ये महान गायक 31 जुलाई 1980 को चुपचाप हमें अलविदा कर जाएगा! भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लोग 31 जुलाई 1980 के दिन उनके जाने की मनहूस खबर सुनकर सन्न रह गए थे। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि इतने खूबसूरत गाने अभी तो शुरू ही हुए थे, इन्हें किसी मुकाम तक जाना था, यह अभी कैसे खत्म हो सकते हैं? यह सही हो सकता है कि हम अपनी उम्मीद से ज्यादा पाने की हसरत रखते हैं लेकिन देने वाले के लिए यही मोहम्मद रफी का मुकाम था। यही मुकाम था हमारी हसरतों का! क्योंकि हसरतें तो कभी खत्म नहीं होती। जो हम जानते तो क्या मोहम्मद रफी को यूं ही जाने देते! जो हमारे वश में होता तो क्या हम मोहम्मद रफी को यूं ही अपने से जुदा होने देते!

 बहरहाल आज दिन है उनकी यादों को फिर से स्मरण करने का, तो हम उनके सफर की शुरुआत से अपनी बात शुरू करेंगे। मोहम्मद रफी ने हिंदी फिल्मों का जो सबसे पहला गाना गया था वह था "अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी" । यह समय वर्ष 1945 था और फिल्म का नाम था गांव की गोरी । यहां से शुरू होकर हिंदी फिल्मों के गानों के उनके सफर में बहुत से मुकाम आए और जो गाने उन्होंने गाए वह सब एक से बढ़कर एक रहे हैं। भाषा भाव और सीन की जरूरत और कलाकार के नाम के हिसाब से जिस तरह उन्होंने गाने गए वह सुनने में और परदे पर देखने में दोनों ही स्तरों पर मन को बांध लेते हैं। उनके द्वारा गाये भजन "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" सुनने से ऐसा लगता है कि इस भजन को गाने के लिए ही मोहम्मद रफी की आवाज बनी थी। सोच कर देखें कि यह गाना कोई और गाता तो कैसा होता! ज़ेहन में नहीं समाता कि ये गाना कोई और गा सकता था। इसी से ऐसा लगता है कि नियति ने गायकों गीतकारों और संगीतकारों की जोड़ी को भारत में हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग का सृजन करने के लिए ही भेजा था। यह जरूर है कि उस समय की पीढ़ी ने इसको अपने सामने घटित होते हुए देखा था लेकिन विज्ञान और तकनीक ने इसे हर पीढ़ी के लिए उपलब्ध बना दिया। हम सब का सौभाग्य ही है कि हवाओं के रास्ते हमारी इंद्रियों को स्पर्श करके हमारी आत्मा में उतर जाने वाले गीतों के गायक मोहम्मद रफी बहुत से मायनों में सबसे अलग हैं। मोहम्मद रफी 55 वर्ष तक जीवित रहे इस दौरान उन्होंने अपने समय के सभी कलाकारों के साथ काम किया और सभी से उनके रिश्ते बहुत अच्छे ही रहे। मोहम्मद रफी सादा जीवन जीते हुए बेहद संजीदा इंसान थे । एक बेहतरीन कलाकार के रूप में जो उनकी पहचान है वह उनके गाये गानों की खूबसूरती से मिलकर उनकी जो इमेज हमारे मानस पटेल पर बनाती है वह अमिट है। उनकी गायकी में कुछ ऐसे पड़ाव भी है जो चीजों बातों और लोगों को एक अलग प्रभाव दे जाते हैं। अमर अकबर एंथोनी जो कि लगभग वर्ष 1980 के आसपास बनी थी इस फिल्म में एक गाना है "हमको तुमसे हो गया है प्यार" इस गाने में मोहम्मद रफी के साथ किशोर कुमार लता मंगेशकर और मुकेश ने एक साथ गाया और हम सभी जानते हैं कि यह तीनो शख्सियतें अपने आप में बॉलीवुड की सबसे महान गायक गायिका हैं और जब ये तीनों एक साथ मिले तब वह गाना रिकॉर्ड हुआ जो अमर अकबर एंथोनी फिल्म का यादगार गाना बन गया। ऐसा माना जाता है कि यह एकमात्र ऐसा मौका था जब इन सभी महान कलाकारों ने मिलकर कोई एक गाना रिकॉर्ड किया। मोहम्मद 

रफ़ी दो फ़िल्मों में परदे पर भी नजर आए थे। वो फ़िल्में थी लैला मजनू जो वर्ष 1945 में बनी और गाना था "तेरा जलवा जिस ने देखा वह तेरा हो गया" और दूसरी फिल्म थी जुगनू जो वर्ष 1946 में बनी और गाना था "वो अपनी याद दिलाने को"।

वर्ष 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद हुस्नलाल भगतराम-राजेंद्र कृष्ण-रफ़ी की टीम ने रातों-रात "सुनो सुनो ऐ दुनियावालों, बापूजी की अमर कहानी" गीत तैयार किया था। उन्हें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने घर पर गाने के लिए आमंत्रित किया था। 1948 में, मो रफ़ी को भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर जवाहरलाल नेहरू ने रजत पदक देकर सम्मानित किया।

उन्हें छह फिल्मफेयर पुरस्कार और एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला । 1967 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया 2013 में, रफ़ी को सीएनएन - आईबीएन के सर्वेक्षण में हिंदी सिनेमा में सबसे महान आवाज़ के लिए वोट दिया गया था। 

उन्होंने एक हज़ार से ज़्यादा हिंदी फ़िल्मों और कई भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कुछ विदेशी भाषाओं में भी गाने रिकॉर्ड किए।

मोहम्मद रफी ने

नौशाद, एसडी बर्मन, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, ओपी नैय्यर लक्ष्मीकांत ,प्यारेलाल और कल्याण जी आनंद जी सहित उस समय के सभी सिद्ध हस्त और मशहूर संगीतकारों के साथ उनके संगीत निर्देशन में गाने गए।

उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मी गानों की रॉयल्टी में गायक कलाकारों के हिस्से की बात चली थी। जिसे मोहम्मद रफी ने अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि फिल्म का प्रोड्यूसर अपने पैसे लगाता है और रिस्क लेकर काम करता है। फिल्म के चलने पर उसे पैसे मिलते हैं और अगर फिल्म नहीं चलती तो उसके पैसे भी डूब जाते हैं तब उसे कौन सहायता करता है ? व्यावसायिक दुनिया में भी उनके इस मानवतावादी विचारों के लिए हम उन्हें याद करते हुए सलाम करते हैं।1970 के दशक में, मो रफ़ी लंबे समय तक गले के संक्रमण से पीड़ित रहे। हालांकि इस अवधि मैं उन्होंने अपेक्षाकृत कम गाने गाए फिर भी अपने कुछ बेहतरीन और सबसे लोकप्रिय गाने भी इसी दौरान गाए, जैसे "ये दुनिया ये महफिल", "गुलाबी आंखें", "झिलमिल सितारों का आंगन होगा","तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे", "रे मामा रे मामा रे", "नफरत की दुनिया को", "ये जो चिलमन है", "कुछ कहता है ये"। सावन'', ''कितना प्यारा वादा'', ''चलो दिलदार चलो'', ''आज मौसम बड़ा बे-ईमान है'', ''चुरा लिया है तुमने'', आदि ।


बाद के वर्षों में

1970 के दशक के मध्य में रफ़ी ने एक प्रमुख गायक के रूप में वापसी की। वर्ष 1974 में बनी फिल्म हवस में उन्होंने उषा खन्ना द्वारा रचित गीत "तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद" के लिए फिल्म वर्ल्ड पत्रिका में सर्वश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार जीता । 


वर्ष 1976 में, रफ़ी ने ब्लॉकबस्टर फिल्म लैला मजनू में ऋषि कपूर के लिए सभी गाने गाए । रफ़ी ने बाद की हिट फिल्मों में ऋषि कपूर के लिए कई और गाने गाए, जिनमें हम किसी से कम नहीं और अमर अकबर एंथनी शामिल हैं। १९७७ में, उन्होंने आरडी बर्मन द्वारा रचित फिल्म हम किसी से कम नहीं के गीत "क्या हुआ तेरा वादा" के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कार दोनों जीते। अमर अकबर एंथनी की कव्वाली " पर्दा है पर्दा " के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ गायक के रूप में नामित किया गया था।


रफ़ी ने 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक के आरम्भ में कई सफल फ़िल्मों के लिए गाया जिनमें से कई हिट गीत 1970 के दशक के अंत में विविध भारती, बिनाका गीतमाला और रेडियो सीलोन जैसे रेडियो कार्यक्रमों के चार्ट पर छाये रहे। 1978 में, रफ़ी ने रॉयल अल्बर्ट हॉल में एक प्रदर्शन दिया और 1980 में उन्होंने वेम्बली सम्मेलन केंद्र में प्रदर्शन किया। 1970 से अपनी मृत्यु तक उन्होंने बड़े पैमाने पर दुनिया भर का दौरा किया और खचाखच भरे हॉलों में संगीत कार्यक्रम पेश किये।मोहम्मद रफ़ी का 31 जुलाई 1980 को रात 10:25 बजे दिल का दौरा पड़ने से 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। रफ़ी द्वारा गाया गया अंतिम गीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म आस पास के लिए था । जानकारों का कहना है कि यह "शाम फिर क्यों उदास है दोस्त/तू कहीं आस पास है दोस्त" था, जो उनकी मृत्यु से कुछ घंटे पहले रिकॉर्ड किया गया था।

बातें तो बहुत है कहने को लेकिन समय की एक सीमा है । इस लिए आज इन्हीं बातों के साथ सदी के महान गायक मोहम्मद रफी की यादों को संजोते हुए उन्हें सलाम करते हैं। दोस्तों

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नमस्कार

धर्मेन्द्र भी आशा पारेख से बात करने से डरते थे तब कैसे शूट हुई फिल्म: आए दिन बहार के? +++++++++++++++

 धर्मेन्द्र भी आशा पारेख से बात करने से डरते थे तब कैसे शूट हुई फिल्म: आए दिन बहार के?

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फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट की प्रस्तुति फिल्मी बातें

कार्यक्रम को लेकर हाजिर हूं मैं आपकी दोस्त सीमा शाही।


दोस्तों नमस्कार,

कोई एक फिल्म जिसमें सात गाने, सातों में से सभी सुपरहिट, एक गाना ठीक ठीक और.... अगर वह फिल्म पाक़ीज़ा, मुग़ल-ए-आज़म या उमराव जान नहीं है तो फिर कई और फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं। लेकिन सबसे ऊपर जो नाम होगा उसके बारे में आप भी सोचिए और अभी मैं बताती हूं कि मैं आज किस फिल्म के बारे में आपसे बात करने वाली हूं। रेडियो श्रोताओं के पसंदीदा कार्यक्रम में मेरी जानकारी के अनुसार कई साल तक हर बार सबसे ज्यादा फरमाइश जिस फिल्म के गानों की आती रही है वो फिल्म भी इसमें शुमार है। अब सवाल है कि वह गाने कौन से हैं तो उसमें से एक गाना है जिसे लता मंगेशकर ने गया है "सुनो सजना पपीहे ने कहा है ये पुकार के" अगला गाना है "मेरा महबूब है बेमिसाल" यह लता मंगेशकर की आवाज में ।

जिसको लता मंगेशकर और महेंद्र कपूर ने गया है "ये कली फूल बनकर जब तक खिले इंतजार.. इंतजार करो" फिर अगला गाना आशा भोसले की आवाज "खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू" फिर मोहम्मद रफी साहब का गाया गाना "मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे" और हां , सबसे ऊपर वह गाना जिसे लता मंगेशकर और आशा भोंसले दोनों ने गाया है "ऐ काश किसी दीवाने को हमसे भी मोहब्बत हो जाए" ।

 अब आपको समझ में आ ही गया होगा कि मैं आपसे जिस फिल्म के बारे में बात कर रही हूं उसका नाम है "आए दिन बहार के।"

 जी हां दोस्तों, यह एक ऐसी म्यूजिकल सुपरहिट फिल्म है जिसके गाने जब-जब रेडियो पर बजते हैं तब तब हम यूट्यूब पर सर्च करके उस गाने को दोबारा सुनते हैं ।ऐसी इन गानों की लत है कि आप इनसे बच नहीं सकते ।अब चलिए इन सुपरहिट गानों की फिल्म के बारे में कुछ और भी बातें करते हैं । बड़ी उत्सुकता होगी आपको कि इतने सुपरहिट गीत लिखने वाले गीतकार का नाम क्या है तो मैं आपको बता दूं कि इस फिल्म के सारे गाने आनंद बक्शी जी ने लिखे हैं और आनंद बक्शी जी की जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ खूब जमी है । और इसी जोड़ी ने उनके गानों को संगीत बद्ध किया है फिल्म आए दिन बहार के लिए। फिल्म में जिन कलाकारों ने भाग लिया उसमें धर्मेंद्र आशा पारेख , बलराज साहनी, नजमा, राजेंद्र नाथ मुख्य कलाकार रहे हैं। यह फिल्म वर्ष 1966 में 6 ओम प्रकाश ने बनाया।

फिल्म आए दिन बहार के फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है कि

 रवि एक योग्य नौज़वान है जो अपनी माँ के साथ रहता है लेकिन अपने पिता के बारे में नहीं जानता। उसे एक अमीर लड़की कंचन से प्रेम हो जाता है कंचन के अभिभावक भी रवि की योग्यता को देंखते हुय उसे स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन सगाई के दिन यह राज़ उजागर होता है कि वह एक कुँवारी माँ का बेटा है, उस पर पहाड़ टूट पड़ता है तथा उसकी सगाई भी टूट जाती है। रवि अपनी माँ का त्याग कर देता है।

तब वह अपने बाप से बदला लेने उसकी ख़ोज में निकलता है, दूसरे शहर में पहुँचकर लडाई-झगड़े के विवाद में फंसकर वह अदालत में पेश होता है। अदालत के न्यायाधीश शुक्ला को उसकी सारी कहानी सुनने के बाद यह आभास होता है कि रवि उन्ही का बेटा है, लेकिन वे अभी ये राज़ उसे नहीं बतलातें बल्कि उसे अपनी माँ के पास वापस जाकर पश्चाताप करने को कहते हैं, जब रवि वापस घर पहुँचता है तो पाता है कि उसकी माँ मर चुकी है। तब न्यायाधीश शुक्ला रवि को उसके पिता को ढूँढने में सहायता करने के बहाने अपने साथ ले जाते हैं।

कुछ समय पश्चात उसे सत्य का पता चलता है और वह अपनी माँ को भी ढूँढ लेता है। एक बार फिर उसके जीवन में कंचन भी वापस आ जाती है और वह दोनों विवाह के बंधन में बँध जाते हैं।

इस प्रकार एक छोटी सी सुखांत कहानी के ताने-बाने में संगीत को इस तरह पिरोया गया है कि यह कहानी संगीत के साथ चल पड़ती है और पूरी दुनिया की सैर करके सब का दिल जीत लेती है। फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर बडी हिट साबित हुई। और जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि इसका संगीत भी बहुत लोकप्रिय हुआ।

फिल्म ‘आए दिन बहार के’ में आशा पारेख और धर्मेंद्र पहली बार साथ नजर आए थे. इसके बाद, उन्होंने कई फिल्मों में साथ काम किया, जिनमें ‘आया सावन झूम के’, ‘बंटवारा’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ जैसी फिल्में शामिल हैं. एक्ट्रेस ने धर्मेंद्र के साथ पहली फिल्म से जुड़ा मजेदार किस्सा सुनाया और बताया कि क्यों ऋतिक रोशन के नाना और फिल्म प्रोड्यसूर जे. ओम प्रकाश एक रोमांटिक शूट से पहले टेंशन में थे!

आशा पारेख ने एक बातचीत में उन दिनों को याद किया जब वे धर्मेंद्र के साथ फिल्म ‘आए दिन बहार के’ की शूटिंग कर रही थीं. वे कहती हैं, ‘जब मैं पहली बार धर्मेंद्र के साथ फिल्म में काम कर रही थी, तब हम दोनों शूट खत्म होने के बाद अपने-अपने रास्ते निकल लेते थे.’ एक दिन जब वे एक सीक्वंस की शूटिंग के लिए दार्जलिंग जा रहे थे, तब प्रोड्यूसर ओम प्रकाश ने एक्ट्रेस को बताया कि वह काफी तनाव में हैं. आशा ने जब उनके तनाव की वजह के बारे में पूछा, तो प्रोड्यूसर बोले, ‘आप दोनों शूट के बाद अलग-अलग रास्ते चले जाते हो, तो फिर साथ में रोमांटिक सीन कैसे शूट करोगे?’

आशा पारेख ने ओम प्रकाश को भरोसा दिलाया कि वे सीन को अच्छे से शूट कर लेंगे, हालांकि प्रोड्यूसर एक्ट्रेस से बार-बार कहते रहे कि उन्हें धर्मेंद्र से बात करनी चाहिए, ताकि उनका तनाव कम हो जाए. एबीपी की रिपोर्ट के अनुसार, जब एक्ट्रेस से पूछा गया कि क्यों मेल एक्टर्स उनसे डरे-सहमे रहते थे, तो आशा पारेख कहती हैं, ‘शायद मेरी शक्ल ही ऐसी थी कि लोग मुझसे डरते थे. वे घबराते थे और मुझसे बात करने से कतराते थे.’ हालांकि बाद में धर्मेंद्र ने आशा पारेख के साथ कई शानदार फिल्में की हैं.

 आशा पारेख ने किसी इंटरव्यू में बताया था कि उनकी मां काफी सख्त थीं, जिसकी वजह से मेल एक्टर उनसे दूर रहते थे. मशहूर एक्टर जीतेंद्र भी सेट पर उनके साथ बात करने से कतराते थे. ‘तीसरी मंजिल’ की एक्ट्रेस ने यह भी बताया कि जीतेंद्र और वह अपनी पहली फिल्म के सेट पर बात नहीं करते थे. वे कहती हैं, ‘मुझे वह दिन याद हैं जब मैं जीतेंद्र के साथ काम कर रही थीं. मैं अपना शॉट देकर बाहर चली जाती थी और फिर जीतेंद्र आते थे और अपना शॉट देकर चले जाते थे. उनके जाने के बाद मैं अपना शॉट देने के लिए लौटती थी. ऐसा कई बार हुआ, लेकिन जब हमें एक साथ शॉट देना पड़ा था, तो हमारे बीच बातें होने लगीं. फिर धीरे-धीरे चीजें सामान्य हो गई।


यह थी फिल्म आए दिन बहार के बारे में कुछ रोचक जानकारी। इसे आपके लिए फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट ने प्रस्तुत किया फिल्मी बातें के अंतर्गत । इसे आप सुन रहे थे सीमा शाही के साथ ।

दोस्तों हमारे इस चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा , अब मुझे दीजिए इजाजत, नमस्कार।

अभिनेत्री तनुजा



साथियों , फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट द्वारा प्रस्तुत फिल्मी बातें लेकर मैं हाजिर हूं सीमा शाही।



आज हम बातें करेंगे सन 60 से 80 के दशक की कुछ-कुछ चर्चित कुछ गुमनाम लेकिन सिद्धहस्त अभिनेत्री तनुजा के बारे में।

कुछ-कुछ चर्चित कहने से आशय ये है कि उनकी फिल्मों के नाम के साथ उनका नाम चर्चा में हरदम रहा है लेकिन आमतौर पर फिल्मी बातचीत या किसी भी तरह की गॉसिप में या समाचार पत्रों में वह लाइमलाइट में रहने से दूर रही है। उनका स्वभाव ही ऐसा कुछ रहा है।

तनुजा मुखर्जी अपने दौर की जानी-मानी एक्ट्रेस  हैं। आपका जन्म 23 सितंबर 1943 को मुंबई में हुआ था। तनुजा की मां शोभना समर्थ भी अपने जमाने की मशहूर एक्ट्रेस थीं. तनुजा जब छोटी थीं तभी उनके माता-पिता एक दूसरे से अलग हो गए. 

उस समय वो स्विट्जरलैंड के सेंट जॉर्ज स्कूल में पढ़ती थीं। तब तनुजा के घर की माली हालत ठीक नहीं रही और उन्हें घर वापस आना पड़ा। उनकी मां ने उन्हें कहा कि या तो वो इसका दुख मना सकती हैं या फिर हिंदी सिनेमा में काम कर सकती हैं। यह सुनकर तनुजा ने हिंदी फिल्मों को चुना।  

 तनुजा ने अपने करियर की शुरूआत बतौर बाल कलाकार साल 1950 में आई फिल्म 'हमारी बेटी के जरिए की थी. शुरुआत में तो वे ज्यादातर अपनी मां द्वारा प्रोड्यूस की गई फिल्मों में ही नजर आती थीं. बतौर लीड एक्ट्रेस तनुजा पहली बार फिल्म ‘छबीली’ में नजर आईं. 1961 में आई फिल्म 'हमारी याद आएगी' उनके करियर में टर्निंग प्वॉइंट साबित हुई.

हाथी मेरे साथी, बहारें फिर भी आएंगी, एक बार मुस्कुरा दो, प्रेम रोग, पैसा या प्यार, हमारी बेटी समेत कई सुपरहिट फिल्में कर चुकीं हैं।  

अभिनेत्री तनुजा मुखर्जी किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। अपने दौर की बेहतरीन अदाकाराओं में शुमार तनुजा एक्ट्रेस काजोल की मां भी हैं। तनुजा खुद भी एक फिल्मी बैकग्राउंड से ताल्लुक रखती हैं. तनुजा की मां शोभना समर्थ भी एक अभिनेत्री थीं और उनके पिता प्रोड्यूसर कुमारसेन समर्थ थे।  तनुजा को 16 साल की उम्र में ही  पहली फिल्म मिल गई थी।

 फिल्म 'छबीली' के दौरान का उनका एक किस्सा काफी मशहूर है। दरअसल, फिल्म के एक सीन में तनुजा को रोना था लेकिन वो बार-बार हंस रही थीं। तनुजा ने केदार शर्मा से कहा कि आज मेरा रोने का मूड नहीं है। इसी बात से नाराज होकर केदार शर्मा ने तनुजा को जोरदार तमाचा जड़ दिया। ये देखकर पूरी टीम सन्न रह गई। तनुजा ने पूरी बात मां को बताई तो उल्टा तनुजा को एक और थप्पड़ जड़ दिया। क्योंकि वो तनुजा के व्यवहार से अच्छी तरह वाकिफ थीं। फिर शोभना, तनुजा को वापस सेट पर लेकर गईं और केदार शर्मा से कहा कि अब ये रो रही है, शूटिंग शुरू कर दीजिए। इसके बाद तनुजा ने परफेक्ट शॉट दिया।

तनुजा ने कई बंगाली फिल्में भी की हैं। वहीं तनुजा के हिसाब से बंगाली फिल्में उन्हें ज्यादा संतुष्टि देती थीं। शोमू मुखर्जी से तनुजा की मुलाकात फिल्म 'एक बार मुस्कुरा दो' के सेट पर हुई थी। दोनों को एक दूसरे का साथ अच्छा लगा और दोनों ने साल 1973 में शादी कर ली। उसके बाद दो बेटियों काजोल और तनीषा का जन्म हुआ। 10 अप्रैल 2008 को दिल का दौरा पड़ने से 64 वर्ष की आयु में शोमू का निधन हो गया।

अभिनेत्री तनुजा को वर्ष 1961 में बनी फिल्म  दीदी और 1963 में बनी मराठी फिल्म दीया नेया के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार प्रदान किए गए । इस समय उनका करियर उठान पर था। वर्ष 1960 से 1972 तक का समय उनके लिए बहुत अच्छा रहा जिसमें चांद और सूरज, बहारें फिर भी आएंगी, ज्वेल थीफ, नई रोशनी,   कदम फूल , तीन भुबन जैसी हिंदी और बंगाली फिल्मों में उनकी भूमिकाओं के लिए उन्हें जाना  जाता है। इसके पश्चात जीने की राह, राजकुमारी, हाथी मेरे साथी , अनुभव, जीवन साथी ,और दो चोर फिल्मों के नाम लिए जाते हैं जो अपने तौर पर बॉक्स ऑफिस पर अच्छी फिल्में साबित हुई। अभिनेता संजीव कुमार , उत्तम कुमार , राजेश खन्ना और धर्मेंद्र के साथ उनकी जोड़ी 1960 से 1970 के दशक के अंत तक लोकप्रिय थी।

तनुजा को जासूसी फिल्म ज्वेल थीफ  में उनके प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए पहला नामांकन मिला । उनकी अगली फिल्म धर्मेंद्र के साथ इज्जत (1968) हाथी मेरे साथी (1971) की सफलता के बाद , उन्होंने दूर का राही , मेरे जीवन साथी , दो चोर और एक बार मुस्कुरा दो  काम चोर , याराना , खुद्दार और मासूम में अभिनय किया । उन्होंने जिन अन्य फिल्मों में अभिनय किया है उनमें पवित्र पापी , भूत बांग्ला और अनुभव शामिल हैं । उनकी कुछ मराठी फिल्में ज़ाकोल , उनाद मैना और पितृरून हैं ।

1960 के दशक के मध्य में, तनुजा ने कोलकाता में बंगाली फिल्मों में समानांतर करियर शुरू किया , जिसकी शुरुआत  से हुई, जिसमें उनके साथ उत्तम कुमार थे । इसके बाद उन्होंने एंथनी-फ़िरिंगी  और राजकुमारी  में काम किया। तनुजा की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री सौमित्र चटर्जी के साथ थी, जिनके साथ उन्होंने तीन भुवनेर परे (1969) और प्रथम कदम फूल जैसी कुछ फ़िल्में कीं। इन बंगाली फ़िल्मों में तनुजा ने अपने संवाद खुद बोले।

इसके बाद, तनुजा ने कई सालों तक फिल्मों से संन्यास ले लिया, लेकिन जब उनकी शादी टूट गई तो वे वापस आ गईं। अब उन्हें अक्सर पूर्व नायकों द्वारा अभिनीत सहायक भूमिकाएँ दी जाने लगीं। उनके प्यार की कहानी के नायक अमिताभ बच्चन को खुद्दार (1982) में उन्हें "भाभी" कहना पड़ा। उन्होंने राज कपूर की प्रेम रोग (1982) में भी सहायक भूमिका निभाई। 1986 में, उन्हें विजया कुमारतुंगा के साथ सिंहली फिल्म पेरालीकारियो में अभिनय करने के लिए श्रीलंका से निमंत्रण मिला, जहाँ उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। [5]


इसके बाद वह साथिया  रूल्स: प्यार का सुपरहिट फॉर्मूला  और खाकी  जैसी फिल्मों में सहायक अभिनेत्री के रूप में नजर आईं। 2008 में, तनुजा ने अपनी बेटी काजोल और दामाद अजय देवगन के साथ ज़ी टीवी की पारिवारिक डांस सीरीज़ रॉक-एन-रोल फ़ैमिली में जज की भूमिका निभाई। 2013 में, तनुजा ने नितीश भारद्वाज द्वारा बनाई गई मराठी फ़िल्म पितृरूण में एक विधवा का किरदार निभाया । विधवा की भूमिका के लिए, तनुजा ने अपने किरदार को प्रामाणिक बनाने के लिए अपना सिर मुंडवा लिया है।

यह थी अभिनेत्री तनुजा जिनकी मां फिल्म अभिनेत्री ठीक और उनकी अपनी बेटी ने भी अभिनय के क्षेत्र को करियर के लिए चुनाव इस प्रकार इस परिवार की तीन पीढियां का संबद्ध फ़िल्मी दुनिया से हो चुका है और हो सकता है कि भविष्य में भी यह परिवार हिंदी सिनेमा के लिए अपना योगदान देता रहेगा।


 हम फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट की तरफ से अभिनेत्री तनुजा को उनके योगदान के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। 


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 नमस्कार।

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...