Monday 06 2026

नौजवानों

 नौजवानों गर जवान हो तो

खून में उबाल होना चाहिए 

हर तरफ जवानी का 

जमाल होना चाहिए 

फूलों की तरह हंसो

हर तरफ रचो बसो

बात हो खुशी की तो

धमाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

तुम पढ़ो आगे बढ़ो 

ज्ञान के सूरज बनो

हर अंधेरे के लिए 

जवाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

मुश्किलें होंगी डगर में 

हल भी होंगी मगर वे

 सीनै में उनके लिए 

उबाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

हर हार की अब हार होगी

हर सितम से रार होगी 

ज़ुल्म ओ सितम के सामने 

सवाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए

Friday 10 2025

कविता: जब कोई बद हवासी में जीता है ------

 


कविता: जब कोई बदहवासी में जीता है

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जब कोई बदहवासी में जीता है

जिंदगी जो अमृत है 

बना के जहर 

उसको घूंट घूंट पीता है जब कोई बदहवासी में जीता है 

ये दुनिया एक सराय है हम सभी मुसाफिर हैं वह इसे घर समझता है जो छूटे तो वही 

जार जार होता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है

 यह रेल का सफर 

मुसल सल है

 हम सभी मुसाफिर हैं हर मुसाफिर को समझकर अपना 

लिपट लिपट के रोता है जब कोई बदहवासी में जीता है 

जिंदगी के लिए सब जरुरी है 

इसलिए सब ले आए फिर सबसे ऊब गए 

सब कुछ छोड़ आए

 हर बार कुछ छोड़ा कुछ रीता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।।।।

Wednesday 10 2025

महुआ के फूल

 महुआ के फूल 

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महुआ के फूल उत्तर प्रदेश के एक आम गांव की कहानी है। जिस प्रकार हर गांव में भोले भाले लोग बसते हैं , इस गांव में भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाकर उनका शोषण करने वाले लोग भी यहीं रहते हैं। इन्हीं लोगों के कारण गांव की जिंदगी नर्क से भी बदतर होती जा रही है और भारी संख्या में लोग गांव से निकलकर शहरों की तरफ जा रहे हैं। महुआ के फूल कहानी की शुरुआत एक शासकीय सेवक के रिटायर होकर गांव में आ कर बसने पर वह क्या-क्या अपनी नजर से देखते हैं यही से शुरुआत होती है। इनका नाम है सतीश वर्मा। सतीश वर्मा रोज की तरह सुबह टहलने जाया करते हैं। इधर गांव में आकर जब उन्होंने अपनी दिनचर्या शुरू की तो पहले दिन ही उनका साक्षात्कार एक घटना से हुआ। मिस्टर वर्मा टहलने के लिए एक बाग से होकर निकलते हैं जहां शालू नाम की एक लड़की सुबह-सुबह महुआ बीनने के लिए आई हुई थी। उससे वह थोड़ी सी बातचीत करके आगे चले जाते हैं लेकिन जब वापस आते हैं तो उस महुआ के पेड़ के नीचे बड़ा उपद्रव हो चुका होता है। आसपास बिखरे महुआ के फूल और उसकी डलिया उसके वहां हो चुके

 उपद्रव की कहानी कह रहे थे। मिस्टर वर्मा गांव में फोन लगाकर अनहोनी की खबर देते हैं जिस पर गांव के लोग इकट्ठा होते हैं । आसपास तलाश की जाती है तो लड़की की मां बगल के खेत में बेहोश मिल जाती है जबकि लड़की का कहीं अता पता नहीं चलता। उसकी मां होश में आने पर गांव के प्रदीप और सुरेंद्र का नाम लेती है और बताती है कि रामबरन और लल्लन ने उसके सिर पर चोट किया था जिससे वह बेहोश हो गई इस प्रकार चारों के खिलाफ नाम जद रिपोर्ट दर्ज होती है लेकिन पुलिस की ढीला ढाली में कुछ हासिल नहीं होता। इसी बीच मिस्टर वर्मा को पता लगता है कि गांव के प्रदीप कुमार और

उसके साथी गांव के बाहर बने फार्म हाउस में छिपे हुए हैं। इस में पुलिस भी मिली हुई है। इस पर वर्मा जी को गुस्सा आ जाता है और वर्मा जी अपने हिसाब से इन लोगों को सबक सिखाना चाहते हैं। उन्होंने शहर से अपने एक वकील मित्र की मदद से इन लड़कों को फार्म हाउस से उठवा लिया । उनको शहर में गुप्त स्थान पर रखा और 5 दिन तक भूखा प्यासा रखकर , चेतावनी देकर गांव के सरहद पर छुड़वा दिया। यह दोनों लड़के बेहोश हालत में गांव वालों को सुबह दिखाई पड़ते हैं। इनका इलाज होने पर ठीक होते हैं तब ये अपना बयान देते हैं लेकिन डर के मारे किसी का नाम नहीं लेते। इस मामले में कोर्ट की कार्यवाही भी आरंभ होती है। तब यह लोग पिछली यातना को भूलकर फिर से गवाहों को धमकाने और दबाने में लग जाते हैं। इसी बीच होली का पर्व पड़ता है तो होली के पर्व पर यह लोग आपसी रंजिश में गांव के एक व्यक्ति को मार कर अधमरा कर देते हैं। इस मामले में भी इनका नाम पुलिस के पास जाता है लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती। यह लोग जमानत पर छूट कर यहां उत्पात मचाते रहते हैं।

यह लोग पिछले दरवाजे से रंजिश निकालने के लिए शादी में भी विघ्न डालने की कोशिश करते हैं।  इसका भी खुलासा हो जाता है तो इन्हें गांव के लोग इनको बहुत बुरी तरह मारते हैं और पुलिस के ऊपर कार्रवाई करने का दबाव बन जाता है लेकिन वो लोग टाल मटोल करते रहते हैं।

अब पुलिस के द्वारा उस मारपीट पर भी कोई कार्यवाही नहीं करने पर मिस्टर वर्मा पुलिस से बात करते हैं जिस पर पुलिस का रुख सहयोगात्मक नहीं रहता और वह सलाह देते हैं कि आप सेवानिवृत्ति के बाद शांति से घर में बैठिए। गांव के पचड़े में क्यों फंस रहे हैं। इस बात पर मिस्टर वर्मा के बच्चे भी आपत्ति करते हैं और कहते हैं कि आप शहर वापस चले जाइए। लेकिन मिस्टर वर्मा अपनी जिद पर अड़ गए और उन्होंने कहा कि यह मेरा गांव है और मैं यहां पर होने वाले हर प्रकार के अन्यान्य का प्रतीकार करूंगा और यही रहूंगा। इस प्रकार मिस्टर वर्मा गांव में रहकर उन लड़कों के खिलाफ कार्यवाही कराते हैं। उन लोगों की जमानत कैंसिल हो जाती है और वह वापस जेल चले जाते हैं। गांव में अमन चैन कायम हो जाता है लेकिन यह अनिश्चय फिर भी बना रहता है कि वो लोग छूट कर आएंगे तो गांव में फिर से उत्पात मचाएंगे। मिस्टर वर्मा इस बात से भी नहीं घबराते और वह गांव के लोगों को बुलाकर उन्हें समझाते हैं कि

 शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करने से ही उन्नति हो सकती है और अशांति से उन्नति की बजाय जीवन में अवनति का प्रवेश हो जाता है और हमारी सुख शांति नष्ट हो जाती है। इस बात पर गांव के लोग मिस्टर वर्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि आपने एक बार इस गांव के प्रति अपना फर्ज पूरा करके बता दिया कि आप इस गांव के एक लायक सुपुत्र हैं।

Saturday 06 2025

शब्द ब्रह्म है।

 शब्द ब्रह्म है। 

क्यों? 

क्योंकि जिस प्रकार ब्रह्मा की पूजा नहीं होती उसी प्रकार शब्द की भी पूजा नहीं होती। शब्द और ब्रह्म दोनों पूजा और प्रार्थना से ऊपर होते हैं। हम मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं लेकिन शब्दों में प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह स्वयं ब्रह्म है, सर्वशक्तिमान है । कभी फूलों को सजाने के लिए दूसरे फूल नहीं लगाए जाते क्योंकि हर फूल ईश्वर की शक्ति से संपन्न अपने रंग, रूप और महक के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अन्य फू। इसी प्रकार शब्द की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अन्य शब्दों की जरूरत नहीं होती क्योंकि हर शब्द की अपनी एक ध्वनि है, सुगंध है, शक्ति है। यह ब्रह्म की तरह सर्वशक्तिमान, कालातीत और सर्वव्यापी है। शब्द शक्ति है। शब्द से ही मंत्र बनते हैं। मंत्र से ईश्वर की पूजा, मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा, दीर्घायु की कामना और दुनियावी जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रार्थना और मोक्ष के लिए साधना की जाती है। शब्द हमें गौरव प्रदान करते हैं। शब्द से ही ज्ञान है । ज्ञान से ही मुक्ति है। शब्दों का प्रयोग हमें मनुष्यों में सिरमौर बनता है वहीं अगर शब्द गलत बोले जाएं तो उनका दुष्प्रभाव भी हमें झेलना पड़ता है। इसलिए शब्द का प्रयोग बहुत ही सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। शब्द प्रार्थना और दुआ के लिए होते हैं । शब्द ही अपशब्द बनते हैं और अपशब्द से अघट की संभावना बनती है । शब्द से ही अप्रिय और अनवांछित परिस्थितियां बनती हैं जो हमारे लिए कहीं भी स्वीकार्य नहीं हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम कल्याणकारी शब्दों का अपनी भाषा में समावेश करें। ऐसे शब्दों का प्रयोग ही ना करें जिनके दुष्प्रभाव किसी के जीवन में पड़ सकें। एक बात तो तय है कि जो शब्द किसी अन्य के जीवन में अप्रिय स्थिति पैदा कर सकते हैं उसका प्रभाव हमारे ऊपर भी पड़ना निश्चित है क्योंकि वो शब्द हमारे द्वारा ही बोले जाते हैं । शब्द की शक्ति को समझना और उसे उसी के अनुरूप व्यवहार करने की सलाह शास्त्र सम्मत है। शब्द से ही ज्ञान है, विज्ञान है, जीत है हार है, गीत है संगीत है, कल्याण है, सुख है, संपत्ति है, शांति है, जीवन है और सुख शांति में जीवन है। जीवन मे ईश्वर का वास होता है । हम जानते हैं कि ईश्वर सर्वशक्ति संपन्न सर्व कल्याणकारी शांत सुरम्य और सुरीला होता है। किसी भी प्रकार की साधना में चाहे कोई अन्य उपकरण हो या ना हो सच्चे मन से भावपूर्ण होकर बोले गए शब्द हमें ईश्वर के नजदीक ले जाते हैं। प्रकृति के सानिध्य में ले जाते हैं। प्रकृति ईश्वर और शब्द इन तीनों के मेल से जीवन में सौंदर्य की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शिव, सत्य और सुंदर होता है। हम जानते हैं कि प्रकृति और ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती। उनके पास कोई शब्द भी नहीं होते। ना वह संस्कृत पढ़ते हैं ,ना हिंदी जानते हैं, ना ही उर्दू अंग्रेजी और फारसी की व्याकरण समझते हैं। मनुष्य ईश्वर ही है। बस क्षिति, जल, पावक गगन और समीर को अलग कर दिया जाए तो वह ईश्वर में ही समाहित हो जाता है । जब तक इन पांच बंधनों में आत्मा का वास होता है तब तक उसे शब्द की आवश्यकता होती है। जीवन काल में ही जो लोग अपने को इन पांच बंधनों से मुक्त कर प्रकृति और ब्रह्म की शक्ति के प्रवाह से जुड़ जाते हैं उन्हें शब्दों के प्रयोग की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि जो अध्यात्म में उतरते जाते हैं उनके शब्द कम होते चले जाते हैं। शब्दों का कम होते चले जाना, शांत होते चले जाना आध्यात्म को उपलब्ध होने के संकेत देता है। इसलिए शब्द अध्यात्म की पहली सीढ़ी है और शब्दों की सीढ़ियां चढ़कर अध्यात्म तक पहुंचने के बाद शब्द पीछे छूट जाते हैं। रह जाता है आत्मा, प्रकृति और ईश्वर का एकात्म। इसीलिए कहा जाता है कि ईश्वर एक है और उसी से विघटित होकर शब्द और शब्द से दुनियावी जीवन की उत्पत्ति होती है। दूसरी सीढ़ी ब्रह्म से प्रकृति की ओर जाती है जिसमें शब्द का कोई स्थान नहीं होता। प्रकृति ईश्वर से बिना किसी शब्द के अपने भावों से संवाद करती है और मनुष्य प्रकृति से शब्दों के माध्यम से जुड़ता है। ईश्वर प्रकृति और मनुष्य के इसी तारतम्य को आध्यात्म माना जाएगा। प्रकृति के बहाव के विरुद्ध खड़े होना इन्हीं अर्थों में ईश्वर के विधान को तोड़ने की तरह होता है। जब-जब प्रकृति से मनुष्य का खिलवाड़ बढ़ जाता है तब तब धरती पर विप्लव होता है। ये विप्लव छोटे-छोटे होते हैं जो हम दुनिया में रोज ही घटित होते हुए देखते हैं। भूस्खलन, बाढ़ का प्रकोप, सूखा, भयंकर तूफान और चक्रवात जैसे प्रकृति के विप्लव मनुष्य का प्रकृति के खिलाफ जाने के कारण है जिसका जिम्मेदार स्वयं मनुष्य है।

सनातन संस्कृति के मूल में महाप्रलय का उल्लेख मिलता है । इस महाप्रलय की जड़ में सभ्यता के उच्चतम स्तर तक पहुंच जाने के बाद मनुष्य के उत्पात से क्रुद्ध होकर धरती पर महा प्रलय हुआ था। उसी महाप्रलय के पश्चात एकमात्र पुरुष बच गए थे मनु । मनु के गंधर्व कन्या श्रद्धा से मिलन के परिणाम स्वरूप कुमार का जन्म हुआ । कुमार से ही सनातन संस्कृति के उत्पन्न होकर अपने चरम पर पहुंचने की गाथा आरंभ होती है। इसी गाथा की पूर्णता का परिणाम है आज की सभ्यता और संस्कृति। लेकिन इन सब बातों को जानने के बाद भी मनुष्य फिर से प्रकृति के अविरल प्रवाह में बाधक बनने की गलतियां कर रहा है जो उसे कभी भी मुश्किल में डाल सकती है। अभी समय है कि हम संभल जाएं और शब्द से चलकर प्रकृति के मार्ग से ईश्वर की सानिध्य में जाने के मार्ग का अनुसरण करते रहें। इसी में हमारा कल्याण है निहित।

Saturday 16 2025

शब्द सत्य है

 शब्द ब्रह्म है , नित्य है , सत्य है अनंत और अविनाशी है।हमें शब्दों को इसलिए धन्यवाद देना चाहिए कि वो बोले जाने के बाद जो अर्थ देते हैं उस अर्थ से हम बात को समझ कर आगे बढ़ते हैं । इस प्रकार हम पहले लड़खड़ा कर फिर चलना उसके बाद दौड़ना सीखते हैं। हमारी जिंदगी शब्दों की उंगलियां पड़कर आगे बढ़ती है, सरपट दौड़ लगाती है। शब्दों की जादूगरी से हम अपनी तमाम समस्याओं के ताले खोलते हैं और कुछ लोग शब्दों के ही बल पर बहुत कुछ पा जाते हैं तो कुछ लोग शब्दों के अभाव में बहुत कुछ हार जाते हैं। हाल कर शांत बैठ जाते हैं। आप ऐसे लोगों से भी मिलेंगे जिनके पास कई भाषाओं के शब्दों की समझ है। ऐसे लोग कई भाषाओं के शब्दों को समझकर बाकियों की तुलना में अधिक दूर तक दौड़ लगा लेते हैं। इससे उनकी दुनिया अन्य की तुलना में अधिक बड़ी हो जाती है। इस प्रकार दुनियावी जिंदगी शब्दों की जादूगरी से एक नट की तरह खेल दिखाती है, हम आगे बढ़ते हैं। यही शब्द जब प्रार्थना बनते हैं तो मंत्र की शक्ति से अभिषिक्त होकर देवताओं को भी मनुष्यों के पीछे भागने के लिए मजबूर कर देते हैं। प्रेम में बोले गए शब्द हमें सब की आंखों का तारा बना देते हैं तो वहीं नफरत, ईर्ष्या और क्रोध में बोले गए शब्द हमें अनंत शत्रुओं के सामने लाकर खड़ा कर देते हैं। शब्दों से दुनिया जीती जा सकती है शब्दों से सब कुछ मनुष्य हार जाता है। इतिहास गवाह है कि महाभारत में शब्दों के कारण ही भयानक नरसंहार हुआ और कितने योद्धा मारे गए।

 ये है शब्द की शक्ति। इसलिए कहा जाता है की जो भी बोलो सोच समझ कर तोलमोल कर बोलो।

वंदे यदुकुलगौरवम् जगद्गुरूम् श्रीकृष्णनारायणम्

 यदुकुल गौरव श्री कृष्ण ही जगद्गुरु हैं। जीवन को संपूर्णता में जी कर साबित कर दिया कि मानवता को संपूर्णता के साथ जिया जा सकता है । इसमें छल कपट का कोई स्थान नहीं है। आमतौर पर ये माना जाता है कि दुनिया में सच्चे प्रेम के लिए जगह नहीं है लेकिन उनका प्रेम उदाहरण है। माता-पिता, मित्र, पत्नी, प्रेमिका सबके लिए मर्यादित हो तो ये संभव है। स्त्री के लिए सम्मान, और मर्यादा हो तो जीवन को उच्चतम आदर्श से गौरवान्वित किया जा सकता है। श्रीराधा रानी को जो गौरव दिया, द्रौपदी का मान रखा वो अनुकरणीय है। गोपियों, ग्वालों, विप्र सुदामा को जिस मित्रता की परिभाषा दी वो सर्वकालिक है। जन्मदात्री, और पालनहार माताओं को जो प्रेम दिया वसुदेव और नंदबाबा के प्रति उनका आदर और समर्पण अनुकरणीय है। द्वरिकाधीश श्री कृष्ण की कथा कहने सुनने के लिए सचमुच की आदर्श कथा है। महाभारत का धर्मयुद्ध कालातीत आदर्श है जहां अन्याय का प्रतीकार करते हुए धर्म को धारण करते हैं। युद्ध में धर्म का जवाब धर्म से छल का जवाब छल से देने में भी नहीं हिचकते। अर्जुन को दिये उनके उपदेश गीता में संग्रहीत हैं जो उनके प्रति उठने वाले हर प्रश्न के उत्तर धारण करते हैं। विश्व के कल्याण के लिए ‌श्रीमद्भगवद्गीता एक आदर्श ग्रंथ है जिसे दुनिया मानती है।

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आयोजित महोत्सव उनके प्रति भक्ति और प्रेम का दिवस है। परमपिता से प्रार्थना है कि वो आप सभी को जीवन में वही ऊंचाइयां प्रदान करें जो उन्होंने स्वयं अपने लिए चुना था। 

वंदे यदुकुलगौरवम् जगद्गुरूम् श्रीकृष्णनारायणम् !

Wednesday 13 2025

खय्याम



इस भागती हुई दुनिया में ठहराव का अर्थ बताता है ख़य्याम का संगीत। उनका संगीत ध्यानावस्था में आती हुई गहरी श्वांस है।पूर्ण सजग,पूर्ण चैतन्य किंतु इतनी धीमी कि उसके होने से चेतना खिल रही हो और किसी को उसकी भनक भी न लगे। 


दुनिया में ऐसे भी इंसान हैं जिन्हें कोई जल्दी नहीं है। उन्हें कहीं नहीं पहुंचना सिवाय खुद के। उनके वक्त को धन भी खरीद नहीं सकता। वे कम काम करेंगे,कम धन कमाएंगे लेकिन जो करेंगे वो सर्वोत्कृष्ट होगा । ये बात अपने काम के प्रति मुहब्बत और जुनून के सिवाय और किसी चीज़ से पैदा नहीं हो सकती। 


ख़य्याम के संगीत में ऐसा क्या है जो बार बार उनके गीतों की चौखट पर ले जाकर खड़ा कर देता है। इसका जवाब तो सिर्फ दिल ही दे सकता है जो उस संगीत की एक छुअन से पिघल उठता है।


बेइंतेहा इश्क़ में हो अगर तो-

 ' ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें' सुनना । 

आंखें यूं मुंदने लगेंगी मानो प्रेमी ने पास खींचकर माथे पर एक बोसा रख दिया हो।


विरह में हो तो सुनना -

' है नाम होंठों पे अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गईं दरारें'


इतने बरसों सख़्ती से रोके गए आंसुओं को ढुलकने देना गालों पर कि ये गीत मुक्ति लेकर आया है एक मज़बूती से बांधे हुए समन्दर की।


उनके संगीत में साज ऐसे बजते हैं जैसे गीत की आत्मा हों। चाहे बांसुरी हो या शहनाई और चाहे पर्बतों से बादलों की तरह उतरता सन्तूर। लाउड होना ख़य्याम की प्रकृति नहीं। 


कहीं देखा है ख़य्याम के संगीत के सिवाय कि साज ऐसे बजें कि गायन को अपनी हथेली पर नाजुकी से उठा लें।


' अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं

चौंकते हैं दरवाज़े,सीढियां धड़कती हैं'


जब लता इसे गाती हैं तो पीछे धीमे-धीमे बजते साज ऐसा प्रभाव जगाते हैं जैसे कोई कवि कविता रच रहा हो और एक दीया टिमटिमा रहा हो बस उतना ही जितना कागज़ पर मद्धम रोशनी गिर सके।यह गीत तिलिस्म और रहस्य का जादू जगाता है। ट्रांस में जाने की सीढ़ी है ये गीत। न्यूनतम साजों में दिल की रगों को छेड़ देना ख़य्याम के ही बस की बात है।


इसी गीत का अंतरा है-

'एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम सी

जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम सी'


इन पंक्तियों में जब लता जी 'कम-कम' गाती हैं तो जैसे सब धुंधलाता जाता है। सब धीमा हो रहा है, धड़कन मन्द पड़ रही है । दिल डूब रहा है। आप चीख के रोना चाहते हैं या फिर एकदम चुप लगा लेना चाहते हैं। बीच का कोई रास्ता नहीं।


एक बार तलत अजीज़ बता रहे थे एक आर्टिकल के ज़रिए कि बेग़म अख़्तर की गाई ग़ज़ल ' वो जो हममें तुममें क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो' की धुन ख़य्याम साब ने बनाई है । जानकर लगा जैसे एक अनमोल खज़ाना हाथ लग गया हो। ये बेशकीमती ग़ज़ल मेरे दिलरुबा संगीतकार की रची हुई है, रोम-रोम सिहर उठा।कैसे-कैसे अद्भुत मोती इस शांत महासागर से निकलकर आये हैं। 


क्या यह छोटी बात है कि ख़य्याम के हर गीत पर एक काव्य लिखा जा सकता है। 


इकलौते ख़य्याम ही तो हैं जिन्होंने ख़ामोशी को भी बजाया है,ख़ामोशी से भी गवाया है।मौन की झंकार ख़य्याम ने ही दुनिया को सुनाई है।


दरअसल 'ये ज़मीं चुप है,आसमां चुप है ' के बाद की वो चुप ही ख़य्याम का संगीत है ।


     क्या कमाल के लोग थे ! वो सृष्टि को सुरीला बनाने आए थे। खय्याम का संगीत सुनें तो ऊंचे पहाड़ों पर परतदार चोटियां या कोई झरना, किसी नई नवेली दुल्हन की तरह सकुचाते शर्माते परतदार झरने सा बह रहा हो ऐसा दृश्य उभरने लगता है। उनके गाने ये दिल और उनकी निगाहों के साए ,आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करें, तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है तेरा गम ही मेरी हयात है जैसे गानों की खूबसूरती बयान किए न बने। खय्याम साहब ने अपने संगीत में गजब के इंस्ट्रूमेंट्स और उसमें भी जल तरंग का प्रयोग किया है । उन्होंने अपने संगीत में सुरीले संतूर का भी भरपूर प्रयोग किया है। शायद खय्याम साहब के बारे में इतने से मन नहीं भरता। वैसे उनके संगीत के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है । एक बार रेखा ने उनके बारे में कहा था कि रेखा को रेखा बनाने वाले खय्याम साहब ही हैं। ये सच भी है उमराव जान का संगीत का नाम लें या फिर कभी-कभी, त्रिशूल, बाजार, आखिरी खत सब एक से बढ़कर एक बेजोड़ संगीत से अमर हो चुके हैं। पर्वतों के पेड़ों पर, वो सुबह कभी तो आएगी, तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो, तुम चली जाओगी तनहाइयां रह जाएगी जैसे गाने फिल्मी संगीत को एक नई परिभाषा देते हैं। वहीं मोहब्बत बड़े काम की चीज है, मेरे घर आई एक नन्ही परी के अलावा चाहे चले छुरिया आदि में तेज बिट्स डालकर आपने अपनी विशिष्ट शैली का भी परिचय दिया है। वही रजिया सुल्तान में अरबी संगीत की 13वीं सदी के जैसा संगीत भी दिया। खय्याम ही ऐसे संगीतकार हैं जिनके हर गीत पसंद किए जाते हैं। उनके संगीत में ऐसा कुछ भी नहीं आया जो पसंद ना आने वाला हो। बेशक खय्याम साहब के सुरीले संगीत से सजे मधुर नगमे कानों में धीमा धीमा सरस घोलते हैं और उस पर सोने में सुहागा ये है कि अगर आवाज लता जी और आशा जी की हो तो सुनने वाला एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाता है ,जहां पहाड़ों का सुकून समंदर सी गहराई और आबशार के बहते हुए पानी की कल कल सुनने वालों को मदहोश कर देती है। फिर इस मीठे-मीठे एहसास के दायरे से काफी देर तक हम चाहकर भी आजाद नहीं हो पाते। रजिया सुल्तान फिल्म का ऐ दिल ए नादान में चुप्पी के बाद का सन्नाटा सुनकर दिल की धड़कन भी थम जाती है । अद्भुत है उनका संगीत!

Monday 28 2025

लड़कियों

 लड़कियों 

खुले आकाश में अगर 

उड़ना चाहती हो

चाहती हो असीमित आसमान, तो -

अपने पिता को भरोसा दो

मां को दो विश्वास 

भाई को आश्वस्ति दो

कि तुम अपने स्वत्व को

स्वाभिमान को

और पारिवारिक मूल्यों को 

लेकर घर से बाहर 

जा तो रही हो

इसे ऐसे ही वापस लाओगी 

तुम आधी अधूरी नहीं 

अपनी संपूर्णता के साथ 

बाबा के घर की दहलीज के अंदर आओगी

तुम नहीं जानती कि

नारी की आजादी के

गुमराह करने वाले 

नारों में लंपटों की साज़िशें शामिल हो जाती हैं धीरे से 

तुम्हारे साथ छल कर के

निकल जाती हैं

शादी, नौकरी, धन दौलत के झांसे

शराफ़त के चोले 

मासूमियत भरे चेहरे 

कई रूपों में 

तुमको मिलेंगे 

तुम भ्रमित न होना

लालच लिए भेड़िए भी 

मिलेंगे 

तुम इन सब से बचते 

बचाते अपने लिए 

उस आकाश की तलाश से डिगना नहीं 

वरना, करे चाहे कोई भी इल्जाम तुम पर ही आएगा 

इसलिए -

लड़कियों तुम 

सावधान रहना!

Tuesday 22 2025

रेडियो और डाकिया

 कभी यूं मुस्कुराई थी जिंदगी तुम्हें देख कर 

कि जैसे दीप कोटिक जल गए हों राह में ।"


मोबाईल से पहले की दुनिया में सपनों के दो वाहक थे । एक डाकिया और दूसरा रेडियो। डाकिया हमारे अपनों की खोज खबर और रोजी-रोटी के पत्र लाता था और रेडियो हमारे सुख दुख के हिसाब से सुंदर सपनों की दुनिया से सजाता था। ये एक खूबसूरत सा इत्तेफाक है कि मुझे भारतीय डाक और रेडियो दोनों महकमों में नौकरी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारतीय डाक में लगभग चार साल और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन में तैंतीस साल नौकरी करके समझ पाया कि हमारे जीवन में इन दोनों की भूमिका कितनी जीवनदायनी संजीवनी रही है। कम से कम हमारे देश में तो रही ही है । समय के बदलने के साथ बहुत कुछ बदला है लेकिन वर्ष 1970 से आसपास जन्म लिए लोग इस बात को महसूस कर सकते हैं कि किस प्रकार रेडियो और डाकिया हमारे घर के एक सम्मानित सदस्य की हैसियत रखता था।

Friday 18 2025

कहानी - लाली

 

मैं साल में तीन चार बार अपनी बुआ के घर जाया करता था। इस बार इंटर की परीक्षा देकर उनके गांव गया। जब मैं वापस आने की बात करता तो मुझे रोकने के बुआ के पास बहुत से बहाने होते थे। पहले कहती ,' अच्छा कल चले जाना '।

कल कहती,' खाना खा लो तब जाओ'।

खाना खा कर जाने की कहते तब कहतीं,'अरे, अब तो धूप बहुत तेज हो गई है, शाम को चले जाना '।

मुझे भी पता होता था कि मुझे वापस आने के लिए इतना सब करना ही होगा ।

इस बार एक नई बात जुड़ गई। जब मैंनै बुआ से कहा कि 'अब बहुत हो गया बुआ अब जाने दीजिए। तब बुआ ने कहा, 'बउआ, इस बार आम खूब आए हैं, कुछ दिन रुक जाओ, आम खा लो तब जाओ। मन भर के आम खा लो, अब तुम पता नहीं कब आओगे । आम तो साल भर के लिए चला जाएगा।' मैं जानता था कि मुझे रुकना तो होगा ही तो मैंने कुछ दिन और रुकने का इरादा कर लिया था। इस बीच मैंने देखा कि बुआ के पड़ोस में रहने वाली एक लड़की जो अक्सर बुआ के पास आती थी, इस बार बहाने - बहाने से बुआ के घर में ही बनी रही और अक्सर मुझसे भी तरह-तरह की बातें करती थी। वो स्कूल नहीं गई थी इसलिए उसे स्कूल कॉलेज, पढ़ाई लिखाई के बारे में कुछ न कुछ जानने की इच्छा रहती थी और इसी से जुड़े कुछ सवाल वह करती रहती थी। उसकी नज़र में पढ़ने वाला लड़का होने के कारण मेरी कुछ अलग अहमियत थी।

एक शाम उसने आकर बताया कि उसकी मां ननिहाल गई है , उसके घर के सब लोग पास के गांव में नौटंकी देखने गए हुए हैं और आज रात को घर में वो अकेली है। इसलिए उसने बुआ से कहा कि वो मुझे उसके घर सोने के लिए भेज दें। बुआ ने उसकी बात मान भी लिया और उन्होंने मुझे उसके घर जाने के लिए कह भी दिया। मैं ना चाहते हुए भी उसके घर गया क्योंकि मुझे उसके हाव-भाव से थोड़ा संदेह सा लग रहा था। मेरा संदेह भी सच निकला। वह रात भर मुझसे तरह-तरह की बातें करती रही। गांव में चलने वाली ऐसी ऐसी कहानियां सुनाती रही जिसमें लड़के लड़कियों के मिलने से क्या-क्या हो जाता है। कुछ इस तरह की कहानियां भी शामिल थी जो उसने लड़के लड़कियों के बारे में सुन रखा था। जो गलत धारणाएं गांव में प्रचलित होती थी और जिनके निराकरण गांव की लड़कियों को खासतौर से कभी नहीं मिल पाया करते थे और वह उन्हीं गलतफहमियों में जीते जीते अपनी जिंदगी गुजार दिया करती हैं।

लेकिन स्त्री सुलभ मर्यादाओं को उसने बराबर बरकरार भी रखा और उसने मुझे किसी असमंजस की स्थिति में नहीं डाला । मैं भी इंटर के विद्यार्थी की उम्र में प्रेम के यूटोपियन अस्तित्व का प्रशंसक होने के कारण उसके प्रति किसी भी तरह का गलत भाव मन में नहीं ला सका। इस प्रकार बातों बातों में सुबह हो गई और अगले दिन मैं अपने घर वापस आ गया।

मैं घर आ तो गया लेकिन इस बार मेरा मन वहीं रह गया। अब मेरा बार-बार मन करता कि मैं बुआ के घर फिर से चला जाऊं। लेकिन कॉलेज के बाद विश्वविद्यालय में एडमिशन की व्यस्तता के बाद , बी ए की पढ़ाई शुरू हो गई थी । इस कारण बुआ के घर जाना नहीं हो पाया। देखते-देखते दिवाली का त्योहार आ गया। दिवाली की छुट्टियों में मैं एक दिन के लिए भाग कर बुआ के घर चला ही गया। बुआ ने मेरी बहुत आव-भगत की क्योंकि बुआ मुझे बहुत प्यार करती थी और उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं दिवाली पर उनके घर आऊंगा। उनकी तमाम आव-भगत में मैं आसपास नजरे दौड़ता रहा। मेरी नजरें पूरे समय लाली को ढूंढती रही। जब शाम हो गई लाली कहीं दिखाई नहीं पड़ी तब मैंने बुआ से पूछ ही लिया । बुआ, वो आपकी प्यारी भतीजी नहीं दिखाई पड़ रही है, कहीं गई है क्या? सुनकर बुआ उदास हो गई। उनके चुप होते ही मुझे किसी अनहोनी की आशंका हो आई क्योंकि जब कभी बहुत अच्छे की अपेक्षा रहती है तो सबसे बुरा होने का डर भी उतना ही बना रहता है। इस बार फिर मेरा डर सच हो गया। बुआ ने बताया, 'लाली अब नहीं रही'। मेरा मन स्तब्ध हो गया! मैंने पूछा , ' क्या हो गया था उसको?' बुआ ने बताया,' धान की लगौनी के समय तेज धूप में काम करते समय उसकी तबीयत खराब हो गई थी। घर लाने पर उसे कॉलरा हो गया और वो नहीं रही'।

मैं कुछ नहीं बोल पाया।

 इस बात को बीते पच्चास वर्ष हो चुके हैं लेकिन मेरी जिंदगी के वो कुछ घंटे अब भी मेरे ज़ेहन में उभरते हैं तो आंखों में नमी तैर जाती है।

Wednesday 09 2025

कविता

 बचपन में 

जिम्मेदारियों का बोझ था 

उन दिनों में 

दादी की सूनी उदास आंखों ने

जब अपने लिए मुझमें 

उम्मीद की किरण देखा,

मुझमें वो समझ न थी ।

अब जब वो सूनी आंखों के चित्र ज़ेहन में उभरते हैं 

एक हूक सी उठती है ।

कुछ कर न सकने का दुख तो अपनी जगह है ,

दादी की उम्मीद भरी आंखों से आंखें नहीं मिला पाता  

इस दुख का क्या करूं ?

 कम समझ

या ना समझी में 

जिम्मेदारियों का पूरा 

न हो पाना

जब खटकता है,

खटकती हैं वो बातें 

जब दोस्तों की नेकियों के बदले

अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके थे,

सोचता हूं कि ईश्वर 

तुमने इतनी समझ तो दी होती ।

और अब जब समय बीत गया है, 

खाली समय ही समय है 

तो ये सभी चित्र 

बारी बारी से आते हैं 

और अपना हिसाब मांगते हैं ,

रीते हाथ हजारों सवाल 

पीछा करते हैं ,

मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है!

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...