Monday 06 2026

लोकगीत

 [27/08/2025, 12:01] mohandhanraj1509: मोरा सईंयां अनारी अब का करी

हाय दिल की बीमारी अब का करी

सोने के थारी में जेवना परोसा

जीमैं ना अनारी अब का करी 

मोरा सईंयां अनारी अब का करी

बार बार हमसे पानी मंगावै

घूंटै ना अनारी अब का करी 

सेजिया पर चंपा की चादर बिछाया 

सोवै ना अनारी अब का करी 

लौंगा इलायची का वीरा लगाया 

चाबै ना अनारी अब का करी 

मोरा सैया अनारी अब का करी

लगी दिल की बीमारी अब का करी।।

[27/08/2025, 12:35] mohandhanraj1509: ई सौतन जिउ के जवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया

रोज-रोज आवे का वादा करत है

हमसे मिलै का इरादा करत है

 नहीं आने का कोई सवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया

रहिया तकत मोरी सूनी नजरिया 

 गुलरी के फुलवा भए सैया संवरिया 

सौतन कै नगरिया गुलजार हो 

मोरी सूनी सेजरिया

हमरी सेजरिया में कांटा लगत है

सौतन कै सेजरिया बवाल हो

 मोरी सूनी सेजरिया

ई सौतन जिउ के जवाल हो 

सूनी होय गई सेजरिया।

जब कोई बद हवासी में जीता है

 कविता: जब कोई बद हवासी में जीता है 

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जब कोई बद हवासी में जीता है 

जिंदगी जो कि अमृत है 

बना के जहर 

 घूंट घूंट पीता है

जब कोई बदहवासी में जीता है ।

ये दुनिया एक सराय है हम सभी मुसाफिर हैं वह इसे घर समझता है जो छूटे तो वही 

जार जार होता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।

 यह रेल का सफर 

मुसल सल है

 हम सभी मुसाफिर हैं हर मुसाफिर को समझकर अपना 

लिपट लिपट के रोता है जब कोई बदहवासी में जीता है ।।

जिंदगी के लिए सब जरुरी है 

इसलिए सब ले आए फिर सबसे ऊब गए छोड़ आए

 हर बार कुछ छोड़ा कुछ रीता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।

बहुत जिद्दी था

 जन्म से पहले मैं बहुत जिद्दी था।

जब ब्रह्मा ने मुझसे कहा 

तुम्हें धरती पर जाना है,

मैंने तुरंत एक शर्त लगा दी,

मैंने कहा मैं धरती पर तभी जाऊंगा जब आप मुझे, ये धरती और पूरा ब्रह्मांड सौ साल की लीज पर दे देंगे!

उन्होंने मुझे आश्चर्य से देखा और पूछा - 

"इन सौ वर्षों का तू क्या करेगा रे?"

मैंने कह दिया 

ये जो आप ने धरती पर 

इतने व्यूह रचा रखें हैं 

मुझे उन सारे तिलिस्मों को तोड़ना है!

वो हंसे और बोले

"तू इतनी सी जान 

कैसे कर पाएगा ऐसे काम?"

मैंने कहा जब आप कहते हैं कि"तू मेरा ही अंश है, तो नन्हीं सी जान मैं कैसे हुआ? 

मैं तो आप की छवि हूं, मैं ब्रह्म हूं!"

और जब आप की शक्ति से सब कुछ है तो, 

मैं वो सब करूंगा जो आप करते हैं।

तब उन्होंने कहा -

"मेरे तिलिस्मों को तोड़ने वाले बहुत मार खाते हैं "

मैंने कहा 

वो भी कर के देख लीजिए 

उन्होंने हंस कर कहा "चल ये भी सही, 

तू कर मैं देखता हूं"

मैंने भी कह दिया मंजूर है 

तब ब्रह्मा बोले

"जा, तुझे ये धरती आकाश और पूरा ब्रह्मांड सौ साल के पट्टे पर दिया !"

तब मैं अपनी जन्मदात्री के गर्भ में समाया

और अब धरती पर मैं वो सब उपद्रव करता हूं, जिसको मैंने मिटाने का वादा किया था,

मैं मनुष्य हूं ,

मुझे धरती पर भेज कर अब ब्रह्मा भी परेशान हैं!!

गंगा में नहाने आए हैं

 गंगा में नहाने आए हैं 

मैया के दीवाने आए हैं 

दिल में हैं उमंगे बड़ी बड़ी

धूप दीपक जलाने आए हैं 

तीरथ पावन है प्रयागराज 

गंगा यमुना सरस्वती के 

संगम में हम 

डुबकी लगाने आए हैं 

एक हररियाली एक धवल धार 

गंगा यमुना सरस्वती को

हम दुग्ध पुष्प और दीपदान कर 

अपना जीवन बनाने आए हैं 

तीरथ प्रयाग के कोतवाल

गंगा मैया पखारे जिनके चरण 

बड़े बजरंगबली के पावन चरणों में

हम माथा झुकाने आए हैं

ये काया है माया

 बचपन में रुई के से फाये से बनी पूरी कलात्मक दुनिया मां-बाप के प्यार से लबालब उफनाती हुई सी, फूलों और तितलियों के पीछे भागते कब की फुर्र से निकल गई ! किशोर वह उससे भी कोमल और थोड़ा-थोड़ा संवेदनशील लेकिन अपने आप को लेकर काफी सजग और उत्साहित! जिंदगी के इंद्रधनुषी रंग इसे बेहद खूबसूरत बना रहे थे। लुका छुपी करते, कभी कोई अच्छा लगने लगता तो उसको आते जाते हुए देखना ही भला लगने लगा था लेकिन कुछ समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। ऐसे ही कुछ सपने देखने के संदेश देकर वह उम्र भी चली गई। जवानी में कदम रखे तो ऐसा लगता था कि पैर जमीन पर और हाथ आसमान में कोई भी तारे कभी भी तोड़ लेंगे ! जल्दी भी क्या है अभी नहीं तो कभी भी !!

इस बहुत खूबसूरत सी जिंदगी में आईने के सामने खड़े होकर अपने आप को टकटकी लगाए देखना, कभी दाहिने से कभी बाएं से , कभी ऊपर से नीचे तक कभी कॉलर टाइट करना, कभी बेल्ट ठीक करना ! क्या गजब जमाना था और हेयर स्टाइल का तो कहना ही क्या! ऐसे झटको कि जुल्फें पीछे की और आकर करीना से लग जाए ! हां, हमारे बड़े बूढ़े यही तो कहते थे कि यह क्या जुल्फी रख लिया है आवारा बनना है क्या ? इसे कटवा क्यों नहीं देते ? वो हमारे सबसे बड़े दुश्मन दिखाई पड़ते थे और अपने को यह कायनात और यह अपना शरीर कुदरत का करिश्मा लगता था।

अब ऐसे ही अचानक एक अजीब सी बात हुई और किसी डॉक्टर ने कहा कि अपने शरीर का सीने का एक्सरे करा कर ले आओ। एक्सरे कराया जब , तो उसमें देखा सीने में पसलियां, दो फेफड़े श्वास नली भोजन नली! यह तो पहचान में आ रही थी इसको देखकर कुछ अच्छा नहीं लगा । ऐसा लगा कि यह शरीर जिससे इतनी मोहब्बत हम करते हैं यह है क्या! मशीनी पुर्जों की तरह से असेंबलिंग की गई एक मशीन ही तो है। बड़ा अच्छा था जब हमने नहीं देखा था कि ये शरीर अंदर से ऐसा होता है । तब ऐसे लगता था जैसे शक्ति, सौंदर्य और बुद्धिमत्ता के साथ बना हुआ यह शरीर दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना है। ऐसा लगा जैसे एक पल के लिए कोई बहुत बड़ा तिलिस्म था जो टूट गया! हो सकता है ऊपर वाले ने हमें इस लायक समझा हो कि अब हम वास्तविकता को समझने के काबिल हो रहे हैं इसलिए इस समय एक्सरे कराने का आदेश दिया। उसके बाद तो फिर धीरे-धीरे शरीर के अंदर फिट किए गए कल पुर्जों की पूरी कहानी देखने और समझने को मिलने लगी। हां कुछ दिन के लिए मन सोच में पड़ गया कि काश यह शरीर ऐसे अंगों पुर्जों की असेंबलिंग ना होती! बस यह जिस्म होता ये कायनात होती , हम होते और हमारी सुंदर कल्पनाएं । लेकिन समय के साथ-साथ परिपक्वता के आने पर अब अत्यंत बुद्धिमानी के साथ संपूर्णता के स्तर तक जाकर बनाए गए इस कल पुर्जे को देख और समझ कर इस बात का एहसास हुआ है कि ये कुदरत का करिश्मा ही तो है ! हर हाल में यही हमारे सपनों की दुनिया देखने का जरिया है, यही हमें कायनात से ईश्वर तक ले जाने का भी माध्यम है।

हां,ऐसा हो सकता है

 हां,ऐसा हो सकता है 

क्यों नहीं हो सकता?

ये ब्रह्माण्ड 

कभी नहीं बना 

ये ना तो कहीं से आरंभ होता है 

ना कहीं खत्म

इसके लिए समय शब्द अर्थहीन है 

क्यों कि इसपर समय 

कोई छाप नहीं छोड़ता 

इसका ना कोई कर्ता है 

ना ही ये किसी की कृति है 

ये अनंत सर्वकालिक सर्वव्यापी है अथाह और अपरिमित 

ऊर्जा का श्रोत जिससे 

सबकुछ संचालित है 

ब्रह्माण्ड में अनंत ग्रह, नक्षत्र, तारे 

आकाश गंगाएं 

इस धरती जैसी कितनी धरती 

उन पर ऐसे ही कितने जीवन 

पलते होंगे जैसे -

इस धरती पर

जिसपर हम रहते हैं ।

हां, ऐसा हो सकता है 

क्यों नहीं हो सकता?

ये अनंत अथाह और अपरिमित 

ब्रह्माण्ड एक धरती 

एक आसमान एक सूरज एक चांद एक धरती पर कुछ लोग वनस्पतियां और ये सौंदर्य की रचना करके , क्या रुक गया होगा? 

मनुष्य का मन मस्तिष्क और उसकी शक्तियां इतनी कैसे हो सकती है जो 

इस तिलिस्म को समझ जाए?

एक फरिश्ता होना होता होगा

 मां होना 

 एक फरिश्ता होना होता होगा।

जैसे ईश्वर मां के पेट में 

मिट्टी से सिरजता है 

फिर कोख को अंवां बना कर

उसी में तपा कर बर्तन पकाता है 

वो मुझे लेकर 

आग से गुजर जाती है 

आग से गुजर जाना

फ़रिश्ता हो जाना होता होगा।

इक नहीं सी जान को

अपने रक्त, मज्जा से निसृत

 दूध से पालती

रोटी के लिए धूप के पहाड़ काटती

सात समंदर पार से

सपने चुन लाती

एक बच्चे की खुशियों खातिर 

चंदा तक जाना होता होगा 

मां होना 

एक फरिश्ता होना होता होगा।

इस दुनिया में सब कुछ नश्वर है 

सच कहते हैं लोग

अंत में बस ईश्वर है 

जब सारे दरवाजे बंद हुए 

तब मां का आंचल छाया है 

जब खिले फूल दिशाएं महकी

जीवन के हर गीत 

पुष्प मकरंद हुए 

हर खुशियों दुख के आलम में 

थैली भर आशीष लिए बस

मां का आना होता होगा 

इस दुनिया में मां का आना

एक फ़रिश्ते का ज़मीं पर 

आना होता होगा।

जिंदगी की सहर

 एक रात की सहर होते होते हो गई 

जिंदगी की सहर

एक मां थी उस पर हो गई जिंदगी की मेहर

रोते-रोते सो गई उसकी याद में वो नहीं आया 

कितना घना था ओ खुदाया उस पर गमों का साया

सियाह चेहरे पे एक मुकम्मल किस्सा था यूं नुमाया

गोया उसकी याद में लिपट कर रोई थी ज़ार ज़ार

जो गुज़र गई ज़िन्दगी न लौटी, दी सदाएं बार बार 

उसका चेहरा था ज़ेहन ओ दिल में 

मुस्कुराता था

एक आरी थी उसका जिस्म था और वो चलाता था

यूं कोई बुरा ख्वाब था कभी आता था चला जाता था

कभी बांहों में लिपट जाता, आता था मुस्कुराता था 

ऐसी कोई रात थी, मां थी, यादें थी वो सब आईं

 मां के बेचैन कानों में बेटा आया ये खबर ना आई !

जैसा कल था आज नहीं है....

 जैसा कल था आज नहीं है....

भारत अब आजाद हो गया 

गोरों का अब राज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है.....

अपनी धरा गगन है अपना 

आंखों में भी सजता सपना 

पंछी सब आजाद हुए हैं 

उनके सिर पर बाज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है .....

सोचा था मधुमास खिलेंगे 

फूलों वाले बाग मिलेंगे 

लेकिन रुत कुछ ऐसे बदली 

अब मौसम है ऋतुराज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है.... 

अपनी एक कहानी लिखो 

बचपन और जवानी लिखो 

लिखो संविधान है वो राजा 

जिसके सिर पर ताज नहीं है 

जैसा कल था आज नहीं है ....

नौजवानों

 नौजवानों गर जवान हो तो

खून में उबाल होना चाहिए 

हर तरफ जवानी का 

जमाल होना चाहिए 

फूलों की तरह हंसो

हर तरफ रचो बसो

बात हो खुशी की तो

धमाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

तुम पढ़ो आगे बढ़ो 

ज्ञान के सूरज बनो

हर अंधेरे के लिए 

जवाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

मुश्किलें होंगी डगर में 

हल भी होंगी मगर वे

 सीनै में उनके लिए 

उबाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए 

हर हार की अब हार होगी

हर सितम से रार होगी 

ज़ुल्म ओ सितम के सामने 

सवाल होना चाहिए 

नौजवानों !

खून में उबाल होना चाहिए

Friday 10 2025

कविता: जब कोई बद हवासी में जीता है ------

 


कविता: जब कोई बदहवासी में जीता है

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जब कोई बदहवासी में जीता है

जिंदगी जो अमृत है 

बना के जहर 

उसको घूंट घूंट पीता है जब कोई बदहवासी में जीता है 

ये दुनिया एक सराय है हम सभी मुसाफिर हैं वह इसे घर समझता है जो छूटे तो वही 

जार जार होता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है

 यह रेल का सफर 

मुसल सल है

 हम सभी मुसाफिर हैं हर मुसाफिर को समझकर अपना 

लिपट लिपट के रोता है जब कोई बदहवासी में जीता है 

जिंदगी के लिए सब जरुरी है 

इसलिए सब ले आए फिर सबसे ऊब गए 

सब कुछ छोड़ आए

 हर बार कुछ छोड़ा कुछ रीता है 

जब कोई बदहवासी में जीता है।।।।।

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...