Saturday 16 2025

शब्द सत्य है

 शब्द ब्रह्म है , नित्य है , सत्य है अनंत और अविनाशी है।हमें शब्दों को इसलिए धन्यवाद देना चाहिए कि वो बोले जाने के बाद जो अर्थ देते हैं उस अर्थ से हम बात को समझ कर आगे बढ़ते हैं । इस प्रकार हम पहले लड़खड़ा कर फिर चलना उसके बाद दौड़ना सीखते हैं। हमारी जिंदगी शब्दों की उंगलियां पड़कर आगे बढ़ती है, सरपट दौड़ लगाती है। शब्दों की जादूगरी से हम अपनी तमाम समस्याओं के ताले खोलते हैं और कुछ लोग शब्दों के ही बल पर बहुत कुछ पा जाते हैं तो कुछ लोग शब्दों के अभाव में बहुत कुछ हार जाते हैं। हाल कर शांत बैठ जाते हैं। आप ऐसे लोगों से भी मिलेंगे जिनके पास कई भाषाओं के शब्दों की समझ है। ऐसे लोग कई भाषाओं के शब्दों को समझकर बाकियों की तुलना में अधिक दूर तक दौड़ लगा लेते हैं। इससे उनकी दुनिया अन्य की तुलना में अधिक बड़ी हो जाती है। इस प्रकार दुनियावी जिंदगी शब्दों की जादूगरी से एक नट की तरह खेल दिखाती है, हम आगे बढ़ते हैं। यही शब्द जब प्रार्थना बनते हैं तो मंत्र की शक्ति से अभिषिक्त होकर देवताओं को भी मनुष्यों के पीछे भागने के लिए मजबूर कर देते हैं। प्रेम में बोले गए शब्द हमें सब की आंखों का तारा बना देते हैं तो वहीं नफरत, ईर्ष्या और क्रोध में बोले गए शब्द हमें अनंत शत्रुओं के सामने लाकर खड़ा कर देते हैं। शब्दों से दुनिया जीती जा सकती है शब्दों से सब कुछ मनुष्य हार जाता है। इतिहास गवाह है कि महाभारत में शब्दों के कारण ही भयानक नरसंहार हुआ और कितने योद्धा मारे गए।

 ये है शब्द की शक्ति। इसलिए कहा जाता है की जो भी बोलो सोच समझ कर तोलमोल कर बोलो।

वंदे यदुकुलगौरवम् जगद्गुरूम् श्रीकृष्णनारायणम्

 यदुकुल गौरव श्री कृष्ण ही जगद्गुरु हैं। जीवन को संपूर्णता में जी कर साबित कर दिया कि मानवता को संपूर्णता के साथ जिया जा सकता है । इसमें छल कपट का कोई स्थान नहीं है। आमतौर पर ये माना जाता है कि दुनिया में सच्चे प्रेम के लिए जगह नहीं है लेकिन उनका प्रेम उदाहरण है। माता-पिता, मित्र, पत्नी, प्रेमिका सबके लिए मर्यादित हो तो ये संभव है। स्त्री के लिए सम्मान, और मर्यादा हो तो जीवन को उच्चतम आदर्श से गौरवान्वित किया जा सकता है। श्रीराधा रानी को जो गौरव दिया, द्रौपदी का मान रखा वो अनुकरणीय है। गोपियों, ग्वालों, विप्र सुदामा को जिस मित्रता की परिभाषा दी वो सर्वकालिक है। जन्मदात्री, और पालनहार माताओं को जो प्रेम दिया वसुदेव और नंदबाबा के प्रति उनका आदर और समर्पण अनुकरणीय है। द्वरिकाधीश श्री कृष्ण की कथा कहने सुनने के लिए सचमुच की आदर्श कथा है। महाभारत का धर्मयुद्ध कालातीत आदर्श है जहां अन्याय का प्रतीकार करते हुए धर्म को धारण करते हैं। युद्ध में धर्म का जवाब धर्म से छल का जवाब छल से देने में भी नहीं हिचकते। अर्जुन को दिये उनके उपदेश गीता में संग्रहीत हैं जो उनके प्रति उठने वाले हर प्रश्न के उत्तर धारण करते हैं। विश्व के कल्याण के लिए ‌श्रीमद्भगवद्गीता एक आदर्श ग्रंथ है जिसे दुनिया मानती है।

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आयोजित महोत्सव उनके प्रति भक्ति और प्रेम का दिवस है। परमपिता से प्रार्थना है कि वो आप सभी को जीवन में वही ऊंचाइयां प्रदान करें जो उन्होंने स्वयं अपने लिए चुना था। 

वंदे यदुकुलगौरवम् जगद्गुरूम् श्रीकृष्णनारायणम् !

Wednesday 13 2025

खय्याम



इस भागती हुई दुनिया में ठहराव का अर्थ बताता है ख़य्याम का संगीत। उनका संगीत ध्यानावस्था में आती हुई गहरी श्वांस है।पूर्ण सजग,पूर्ण चैतन्य किंतु इतनी धीमी कि उसके होने से चेतना खिल रही हो और किसी को उसकी भनक भी न लगे। 


दुनिया में ऐसे भी इंसान हैं जिन्हें कोई जल्दी नहीं है। उन्हें कहीं नहीं पहुंचना सिवाय खुद के। उनके वक्त को धन भी खरीद नहीं सकता। वे कम काम करेंगे,कम धन कमाएंगे लेकिन जो करेंगे वो सर्वोत्कृष्ट होगा । ये बात अपने काम के प्रति मुहब्बत और जुनून के सिवाय और किसी चीज़ से पैदा नहीं हो सकती। 


ख़य्याम के संगीत में ऐसा क्या है जो बार बार उनके गीतों की चौखट पर ले जाकर खड़ा कर देता है। इसका जवाब तो सिर्फ दिल ही दे सकता है जो उस संगीत की एक छुअन से पिघल उठता है।


बेइंतेहा इश्क़ में हो अगर तो-

 ' ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें' सुनना । 

आंखें यूं मुंदने लगेंगी मानो प्रेमी ने पास खींचकर माथे पर एक बोसा रख दिया हो।


विरह में हो तो सुनना -

' है नाम होंठों पे अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गईं दरारें'


इतने बरसों सख़्ती से रोके गए आंसुओं को ढुलकने देना गालों पर कि ये गीत मुक्ति लेकर आया है एक मज़बूती से बांधे हुए समन्दर की।


उनके संगीत में साज ऐसे बजते हैं जैसे गीत की आत्मा हों। चाहे बांसुरी हो या शहनाई और चाहे पर्बतों से बादलों की तरह उतरता सन्तूर। लाउड होना ख़य्याम की प्रकृति नहीं। 


कहीं देखा है ख़य्याम के संगीत के सिवाय कि साज ऐसे बजें कि गायन को अपनी हथेली पर नाजुकी से उठा लें।


' अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं

चौंकते हैं दरवाज़े,सीढियां धड़कती हैं'


जब लता इसे गाती हैं तो पीछे धीमे-धीमे बजते साज ऐसा प्रभाव जगाते हैं जैसे कोई कवि कविता रच रहा हो और एक दीया टिमटिमा रहा हो बस उतना ही जितना कागज़ पर मद्धम रोशनी गिर सके।यह गीत तिलिस्म और रहस्य का जादू जगाता है। ट्रांस में जाने की सीढ़ी है ये गीत। न्यूनतम साजों में दिल की रगों को छेड़ देना ख़य्याम के ही बस की बात है।


इसी गीत का अंतरा है-

'एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम सी

जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम सी'


इन पंक्तियों में जब लता जी 'कम-कम' गाती हैं तो जैसे सब धुंधलाता जाता है। सब धीमा हो रहा है, धड़कन मन्द पड़ रही है । दिल डूब रहा है। आप चीख के रोना चाहते हैं या फिर एकदम चुप लगा लेना चाहते हैं। बीच का कोई रास्ता नहीं।


एक बार तलत अजीज़ बता रहे थे एक आर्टिकल के ज़रिए कि बेग़म अख़्तर की गाई ग़ज़ल ' वो जो हममें तुममें क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो' की धुन ख़य्याम साब ने बनाई है । जानकर लगा जैसे एक अनमोल खज़ाना हाथ लग गया हो। ये बेशकीमती ग़ज़ल मेरे दिलरुबा संगीतकार की रची हुई है, रोम-रोम सिहर उठा।कैसे-कैसे अद्भुत मोती इस शांत महासागर से निकलकर आये हैं। 


क्या यह छोटी बात है कि ख़य्याम के हर गीत पर एक काव्य लिखा जा सकता है। 


इकलौते ख़य्याम ही तो हैं जिन्होंने ख़ामोशी को भी बजाया है,ख़ामोशी से भी गवाया है।मौन की झंकार ख़य्याम ने ही दुनिया को सुनाई है।


दरअसल 'ये ज़मीं चुप है,आसमां चुप है ' के बाद की वो चुप ही ख़य्याम का संगीत है ।


     क्या कमाल के लोग थे ! वो सृष्टि को सुरीला बनाने आए थे। खय्याम का संगीत सुनें तो ऊंचे पहाड़ों पर परतदार चोटियां या कोई झरना, किसी नई नवेली दुल्हन की तरह सकुचाते शर्माते परतदार झरने सा बह रहा हो ऐसा दृश्य उभरने लगता है। उनके गाने ये दिल और उनकी निगाहों के साए ,आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करें, तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है तेरा गम ही मेरी हयात है जैसे गानों की खूबसूरती बयान किए न बने। खय्याम साहब ने अपने संगीत में गजब के इंस्ट्रूमेंट्स और उसमें भी जल तरंग का प्रयोग किया है । उन्होंने अपने संगीत में सुरीले संतूर का भी भरपूर प्रयोग किया है। शायद खय्याम साहब के बारे में इतने से मन नहीं भरता। वैसे उनके संगीत के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है । एक बार रेखा ने उनके बारे में कहा था कि रेखा को रेखा बनाने वाले खय्याम साहब ही हैं। ये सच भी है उमराव जान का संगीत का नाम लें या फिर कभी-कभी, त्रिशूल, बाजार, आखिरी खत सब एक से बढ़कर एक बेजोड़ संगीत से अमर हो चुके हैं। पर्वतों के पेड़ों पर, वो सुबह कभी तो आएगी, तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो, तुम चली जाओगी तनहाइयां रह जाएगी जैसे गाने फिल्मी संगीत को एक नई परिभाषा देते हैं। वहीं मोहब्बत बड़े काम की चीज है, मेरे घर आई एक नन्ही परी के अलावा चाहे चले छुरिया आदि में तेज बिट्स डालकर आपने अपनी विशिष्ट शैली का भी परिचय दिया है। वही रजिया सुल्तान में अरबी संगीत की 13वीं सदी के जैसा संगीत भी दिया। खय्याम ही ऐसे संगीतकार हैं जिनके हर गीत पसंद किए जाते हैं। उनके संगीत में ऐसा कुछ भी नहीं आया जो पसंद ना आने वाला हो। बेशक खय्याम साहब के सुरीले संगीत से सजे मधुर नगमे कानों में धीमा धीमा सरस घोलते हैं और उस पर सोने में सुहागा ये है कि अगर आवाज लता जी और आशा जी की हो तो सुनने वाला एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाता है ,जहां पहाड़ों का सुकून समंदर सी गहराई और आबशार के बहते हुए पानी की कल कल सुनने वालों को मदहोश कर देती है। फिर इस मीठे-मीठे एहसास के दायरे से काफी देर तक हम चाहकर भी आजाद नहीं हो पाते। रजिया सुल्तान फिल्म का ऐ दिल ए नादान में चुप्पी के बाद का सन्नाटा सुनकर दिल की धड़कन भी थम जाती है । अद्भुत है उनका संगीत!

Monday 28 2025

लड़कियों

 लड़कियों 

खुले आकाश में अगर 

उड़ना चाहती हो

चाहती हो असीमित आसमान, तो -

अपने पिता को भरोसा दो

मां को दो विश्वास 

भाई को आश्वस्ति दो

कि तुम अपने स्वत्व को

स्वाभिमान को

और पारिवारिक मूल्यों को 

लेकर घर से बाहर 

जा तो रही हो

इसे ऐसे ही वापस लाओगी 

तुम आधी अधूरी नहीं 

अपनी संपूर्णता के साथ 

बाबा के घर की दहलीज के अंदर आओगी

तुम नहीं जानती कि

नारी की आजादी के

गुमराह करने वाले 

नारों में लंपटों की साज़िशें शामिल हो जाती हैं धीरे से 

तुम्हारे साथ छल कर के

निकल जाती हैं

शादी, नौकरी, धन दौलत के झांसे

शराफ़त के चोले 

मासूमियत भरे चेहरे 

कई रूपों में 

तुमको मिलेंगे 

तुम भ्रमित न होना

लालच लिए भेड़िए भी 

मिलेंगे 

तुम इन सब से बचते 

बचाते अपने लिए 

उस आकाश की तलाश से डिगना नहीं 

वरना, करे चाहे कोई भी इल्जाम तुम पर ही आएगा 

इसलिए -

लड़कियों तुम 

सावधान रहना!

Tuesday 22 2025

रेडियो और डाकिया

 कभी यूं मुस्कुराई थी जिंदगी तुम्हें देख कर 

कि जैसे दीप कोटिक जल गए हों राह में ।"


मोबाईल से पहले की दुनिया में सपनों के दो वाहक थे । एक डाकिया और दूसरा रेडियो। डाकिया हमारे अपनों की खोज खबर और रोजी-रोटी के पत्र लाता था और रेडियो हमारे सुख दुख के हिसाब से सुंदर सपनों की दुनिया से सजाता था। ये एक खूबसूरत सा इत्तेफाक है कि मुझे भारतीय डाक और रेडियो दोनों महकमों में नौकरी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारतीय डाक में लगभग चार साल और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन में तैंतीस साल नौकरी करके समझ पाया कि हमारे जीवन में इन दोनों की भूमिका कितनी जीवनदायनी संजीवनी रही है। कम से कम हमारे देश में तो रही ही है । समय के बदलने के साथ बहुत कुछ बदला है लेकिन वर्ष 1970 से आसपास जन्म लिए लोग इस बात को महसूस कर सकते हैं कि किस प्रकार रेडियो और डाकिया हमारे घर के एक सम्मानित सदस्य की हैसियत रखता था।

Friday 18 2025

कहानी - लाली

 

मैं साल में तीन चार बार अपनी बुआ के घर जाया करता था। इस बार इंटर की परीक्षा देकर उनके गांव गया। जब मैं वापस आने की बात करता तो मुझे रोकने के बुआ के पास बहुत से बहाने होते थे। पहले कहती ,' अच्छा कल चले जाना '।

कल कहती,' खाना खा लो तब जाओ'।

खाना खा कर जाने की कहते तब कहतीं,'अरे, अब तो धूप बहुत तेज हो गई है, शाम को चले जाना '।

मुझे भी पता होता था कि मुझे वापस आने के लिए इतना सब करना ही होगा ।

इस बार एक नई बात जुड़ गई। जब मैंनै बुआ से कहा कि 'अब बहुत हो गया बुआ अब जाने दीजिए। तब बुआ ने कहा, 'बउआ, इस बार आम खूब आए हैं, कुछ दिन रुक जाओ, आम खा लो तब जाओ। मन भर के आम खा लो, अब तुम पता नहीं कब आओगे । आम तो साल भर के लिए चला जाएगा।' मैं जानता था कि मुझे रुकना तो होगा ही तो मैंने कुछ दिन और रुकने का इरादा कर लिया था। इस बीच मैंने देखा कि बुआ के पड़ोस में रहने वाली एक लड़की जो अक्सर बुआ के पास आती थी, इस बार बहाने - बहाने से बुआ के घर में ही बनी रही और अक्सर मुझसे भी तरह-तरह की बातें करती थी। वो स्कूल नहीं गई थी इसलिए उसे स्कूल कॉलेज, पढ़ाई लिखाई के बारे में कुछ न कुछ जानने की इच्छा रहती थी और इसी से जुड़े कुछ सवाल वह करती रहती थी। उसकी नज़र में पढ़ने वाला लड़का होने के कारण मेरी कुछ अलग अहमियत थी।

एक शाम उसने आकर बताया कि उसकी मां ननिहाल गई है , उसके घर के सब लोग पास के गांव में नौटंकी देखने गए हुए हैं और आज रात को घर में वो अकेली है। इसलिए उसने बुआ से कहा कि वो मुझे उसके घर सोने के लिए भेज दें। बुआ ने उसकी बात मान भी लिया और उन्होंने मुझे उसके घर जाने के लिए कह भी दिया। मैं ना चाहते हुए भी उसके घर गया क्योंकि मुझे उसके हाव-भाव से थोड़ा संदेह सा लग रहा था। मेरा संदेह भी सच निकला। वह रात भर मुझसे तरह-तरह की बातें करती रही। गांव में चलने वाली ऐसी ऐसी कहानियां सुनाती रही जिसमें लड़के लड़कियों के मिलने से क्या-क्या हो जाता है। कुछ इस तरह की कहानियां भी शामिल थी जो उसने लड़के लड़कियों के बारे में सुन रखा था। जो गलत धारणाएं गांव में प्रचलित होती थी और जिनके निराकरण गांव की लड़कियों को खासतौर से कभी नहीं मिल पाया करते थे और वह उन्हीं गलतफहमियों में जीते जीते अपनी जिंदगी गुजार दिया करती हैं।

लेकिन स्त्री सुलभ मर्यादाओं को उसने बराबर बरकरार भी रखा और उसने मुझे किसी असमंजस की स्थिति में नहीं डाला । मैं भी इंटर के विद्यार्थी की उम्र में प्रेम के यूटोपियन अस्तित्व का प्रशंसक होने के कारण उसके प्रति किसी भी तरह का गलत भाव मन में नहीं ला सका। इस प्रकार बातों बातों में सुबह हो गई और अगले दिन मैं अपने घर वापस आ गया।

मैं घर आ तो गया लेकिन इस बार मेरा मन वहीं रह गया। अब मेरा बार-बार मन करता कि मैं बुआ के घर फिर से चला जाऊं। लेकिन कॉलेज के बाद विश्वविद्यालय में एडमिशन की व्यस्तता के बाद , बी ए की पढ़ाई शुरू हो गई थी । इस कारण बुआ के घर जाना नहीं हो पाया। देखते-देखते दिवाली का त्योहार आ गया। दिवाली की छुट्टियों में मैं एक दिन के लिए भाग कर बुआ के घर चला ही गया। बुआ ने मेरी बहुत आव-भगत की क्योंकि बुआ मुझे बहुत प्यार करती थी और उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं दिवाली पर उनके घर आऊंगा। उनकी तमाम आव-भगत में मैं आसपास नजरे दौड़ता रहा। मेरी नजरें पूरे समय लाली को ढूंढती रही। जब शाम हो गई लाली कहीं दिखाई नहीं पड़ी तब मैंने बुआ से पूछ ही लिया । बुआ, वो आपकी प्यारी भतीजी नहीं दिखाई पड़ रही है, कहीं गई है क्या? सुनकर बुआ उदास हो गई। उनके चुप होते ही मुझे किसी अनहोनी की आशंका हो आई क्योंकि जब कभी बहुत अच्छे की अपेक्षा रहती है तो सबसे बुरा होने का डर भी उतना ही बना रहता है। इस बार फिर मेरा डर सच हो गया। बुआ ने बताया, 'लाली अब नहीं रही'। मेरा मन स्तब्ध हो गया! मैंने पूछा , ' क्या हो गया था उसको?' बुआ ने बताया,' धान की लगौनी के समय तेज धूप में काम करते समय उसकी तबीयत खराब हो गई थी। घर लाने पर उसे कॉलरा हो गया और वो नहीं रही'।

मैं कुछ नहीं बोल पाया।

 इस बात को बीते पच्चास वर्ष हो चुके हैं लेकिन मेरी जिंदगी के वो कुछ घंटे अब भी मेरे ज़ेहन में उभरते हैं तो आंखों में नमी तैर जाती है।

Wednesday 09 2025

कविता

 बचपन में 

जिम्मेदारियों का बोझ था 

उन दिनों में 

दादी की सूनी उदास आंखों ने

जब अपने लिए मुझमें 

उम्मीद की किरण देखा,

मुझमें वो समझ न थी ।

अब जब वो सूनी आंखों के चित्र ज़ेहन में उभरते हैं 

एक हूक सी उठती है ।

कुछ कर न सकने का दुख तो अपनी जगह है ,

दादी की उम्मीद भरी आंखों से आंखें नहीं मिला पाता  

इस दुख का क्या करूं ?

 कम समझ

या ना समझी में 

जिम्मेदारियों का पूरा 

न हो पाना

जब खटकता है,

खटकती हैं वो बातें 

जब दोस्तों की नेकियों के बदले

अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके थे,

सोचता हूं कि ईश्वर 

तुमने इतनी समझ तो दी होती ।

और अब जब समय बीत गया है, 

खाली समय ही समय है 

तो ये सभी चित्र 

बारी बारी से आते हैं 

और अपना हिसाब मांगते हैं ,

रीते हाथ हजारों सवाल 

पीछा करते हैं ,

मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है!

Tuesday 17 2025

मैं घर हूं तुम्हारा

 यूं रात रात भर 

जाग जाग कर 

करवटें बदल बदल कर 

जाने क्या बिसूरते रहते हो

कभी मुझसे कहो

मैं घर हूं तुम्हारा

अपनी छत और दीवारों में 

खिड़कियों पर्दों में 

तुम्हारे लिए 

मैंने बचा के रखी हैं

सब से गहरी नींदें

चैन- ओ- सुकून 

तुम सब ले लो और 

सो जाओ 

एक गहरी नींद 

जिसमें सपनों को भी 

आने की इजाज़त न हो

मैं तुम्हें ऐसे अपने पहलू में

देखना चाहता हूं 

आराम की नींद 

सोते हुए 

मैं घर हूं तुम्हारा 

 यूं रात रात भर 

जाग जाग कर 

करवटें बदल बदल कर 

जाने क्या बिसूरते रहते हो

मुझे अच्छा नहीं लगता 

मैं घर हूं तुम्हारा 

कभी मुझसे भी बातें करो

यूं तो मैं बहुत खुश हूं 

तुम्हारे बच्चो की किलकारियों में 

तुम्हारी पत्नी की छनकती पायलों में 

उनके हाथ से बने

पकवानों में 

मैं दिन भर के किस्से 

तुम्हारे बच्चो के खेल, 

शैतानियां,

तुम्हारी मालकिन की

प्यार भरी डांट डपट

मनुहार और प्यार 

बहुत कुछ तुमसे 

बताना चाहता हूं 

तुम कभी मेरी तरफ

देखो, मुझसे बातें करो

तुम्हें मैं बहुत कुछ बताना चाहता हूं 

मेरे पास तुम्हारे लिए 

बहुत सी मुस्कान और 

ठहाके हैं 

तुम्हारी ही अमानत हैं 

तुम्हें ही लौटाना चाहता हूं 

कभी तुम मुझे एक नजर 

देख लिया करो 

मेरे जिस्म के कोने कोने में 

दर्ज हैं तुम्हारे बच्चों की

बदमाशियां 

तुम्हारी पत्नी के हाथों के

कोमल स्पर्श 

मैं वो सब भी तुम्हें देना चाहता हूं 

मैं घर हूं तुम्हारा 

तुम्हारे लिए मैंने 

बचाकर रखी हैं 

निरापद सुरक्षा 

कभी मेरी तरफ देखो

मुझसे बातें करो

तुम्हें मैं अपने आगोश 

में ले कर 

तुम्हारा सब कुछ तुम्हें लौटाना चाहता हूं 

मैं घर हूं तुम्हारा!

Sunday 15 2025

Not everyone

 Every one is blessed with different kind of attributes

Not, every man 

can become 

 a good father, friend, scientist, teacher, officer or

 a doctor,

So is the case with women 

Every woman can not become a good mother, teacher scientist or a doctor.

So I am myself 

as you are you !

No one is less 

no one is extra

Every one is a need to fill his place!

Why eliminate any, one who is a guy or a dude

Gentle man or a shrude

Beauty is that

which live with good or bad

Life is valuable 

dignity is more 

So, let us understand 

here for every woman or a man 

life is precious 

life is grand !!

 अकविता

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एक चुप हर दुख की दवा है




जब उनकी आंखों में दिन - रात 

हैं, या

नहीं हैं ,

रोटियां

ये अंदेशा तैरने लगा था 

चिल्ला चिल्ला कर तब वो चौराहों पर

 हर समारोह में 

कहता जा रहा था

मेरे देश के युवाओं को 

स्वप्नदर्शी होना चाहिए

युवाओं की वाणी में मिठास ,

उनका लहजा 

मर्मस्पर्शी होना चाहिए

उसकी हर बात पर यकीन कर लेंगे 

जनता में भी खूब जोश था

कैसे कह पाओगे कि तब जनता में कुछ होश भी था 

पर जो ये जानते थे वो चुप थे क्योंकि 

अब दुनिया में दुष्यंत कुमार नहीं रहता

 जो सीना ठोक कर कहता था

"मत कहो आकाश में कोहरा घना है 

ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है"

नतीजा साफ था

जनता को 

सपनों के इंतजार में

 नींद आने लगी,

उसके लिए ये वक्त मुफीद था

वो रोटियां, लहज़े,सपने

जनता और युवाओं की

मर्मस्पर्शी बातें 

हर गली, चौक, 

हर चौराहे पर 

जोर जोर से 

करता जा रहा था 

जनता, युवक और खासकर बुद्धिजीवी 

जोर जोर से

तालियां पीटते जा रहे थे

वो बेचारे ये नहीं जानते थे कि जब वे तालियां

और थालियां पीट रहे थे 

वो उनके दिमाग में 

नींद के बीज 

बड़े इत्मीनान से छींट रहा था

अब वक्त लगता ही कितना है!

नींद के बीये अंकुराने लगे हैं 

लोग गहरी नींद में भी गाने लगे हैं 

वो देखो हर गली हर चौक पर रोटियों, सपनों, लहजों में

 मिठास की फसलों में 

फूल और फल 

आने लगे हैं 

हर घर से हर गली

 हर चौक तक जब 

ये गीत सब गाने लगे हैं तब वो समझ गया कि अब समय आ गया है 

और वो अपनी भीड़, चौक, चौराहे 

रोटियां, सपने, जनता और मर्मस्पर्शी लहजों की पोटली बना चुका है 

जनता गीत गा रही है 

बुद्धि को खाकर जो जीवित है 

साफ शब्दों में कहो तो

जो बुद्धिजीवी हैं

वो तालियां बजा रहे हैं 

वो पोटली के साथ 

जाते जाते

 कहता जा रहा है 

जब देश का जवान सीमा पर लड़ रहा हो तो

ये वक्त गीत गाने का नहीं है 

अजब जादू है उसकी बातों में 

जनता अब गीत गाना छोड़ चुकी है 

अब हर गली हर चौक पर जनता 

नारे लगा रही है 

"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले 

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...."

अब वो हर गली 

हर चौक से 

घर चला गया है 

वो मौन हो गया है 

क्योंकि वो ये जानता है कि जब समस्या गहन हो तो एक चुप हर दुख की दवा है।

कविता: उंगलियों पर नचाया है

 दुनिया का हर कोना जहां जाता हूं मैं 

हर वो इंसान जो प्यार से 

मिलता है मुझे 

तो लगता है जैसे 

पूरी दुनिया से 

दुनिया के हर इंसान से 

मेरा कोई नाता है 

इस जनम का

पहले जन्म का

उससे पहले के जन्म का

यूं लगता है जैसे 

जन्म जन्मांतर से 

इस धरती पर 

मैं ही युगों युगों से 

जनमता और तुममें ही समाहित होता रहा हूं

तुमने मुझे अपने 

लीला विधान में एक पात्र बनाया है 

युगों से मुझे अपनी उंगलियों पर नचाया है 

इस बात का धन्यवाद मैं करूं कैसे किन शब्दों में करूं ये नहीं जानता

इस बेहद खूबसूरत कायनात में अपनी 

माया को भोगने जब तुम 

खुद आते हो

फिर अपना रूप दे कर

हमें नचाते हो तो

मैं धन्य धन्य हो जाता हूं 

मुझे बार बार चुनना 

भेजना इस कायनात में 

जिससे मुझको मोहब्बत है 

इससे मुझे मोहब्बत है 

मुझे तुमसे मोहब्बत है 

ऐ खुदा,

ऐ मेरे मालिक,

ऐ मेरे ईश्वर 

मुझे तुमसे मोहब्बत है!!

उसकी बात करता हूं

 मैं उसकी बात करता हूं  -------------------------------- वो एक पल जो तमाम उम्र के बाद शेष है  मैं उसी पल की बात करता हूं, मैं तुम्हारी हमारी...