अकविता
----------
एक चुप हर दुख की दवा है
जब उनकी आंखों में दिन - रात
हैं, या
नहीं हैं ,
रोटियां
ये अंदेशा तैरने लगा था
चिल्ला चिल्ला कर तब वो चौराहों पर
हर समारोह में
कहता जा रहा था
मेरे देश के युवाओं को
स्वप्नदर्शी होना चाहिए
युवाओं की वाणी में मिठास ,
उनका लहजा
मर्मस्पर्शी होना चाहिए
उसकी हर बात पर यकीन कर लेंगे
जनता में भी खूब जोश था
कैसे कह पाओगे कि तब जनता में कुछ होश भी था
पर जो ये जानते थे वो चुप थे क्योंकि
अब दुनिया में दुष्यंत कुमार नहीं रहता
जो सीना ठोक कर कहता था
"मत कहो आकाश में कोहरा घना है
ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है"
नतीजा साफ था
जनता को
सपनों के इंतजार में
नींद आने लगी,
उसके लिए ये वक्त मुफीद था
वो रोटियां, लहज़े,सपने
जनता और युवाओं की
मर्मस्पर्शी बातें
हर गली, चौक,
हर चौराहे पर
जोर जोर से
करता जा रहा था
जनता, युवक और खासकर बुद्धिजीवी
जोर जोर से
तालियां पीटते जा रहे थे
वो बेचारे ये नहीं जानते थे कि जब वे तालियां
और थालियां पीट रहे थे
वो उनके दिमाग में
नींद के बीज
बड़े इत्मीनान से छींट रहा था
अब वक्त लगता ही कितना है!
नींद के बीये अंकुराने लगे हैं
लोग गहरी नींद में भी गाने लगे हैं
वो देखो हर गली हर चौक पर रोटियों, सपनों, लहजों में
मिठास की फसलों में
फूल और फल
आने लगे हैं
हर घर से हर गली
हर चौक तक जब
ये गीत सब गाने लगे हैं तब वो समझ गया कि अब समय आ गया है
और वो अपनी भीड़, चौक, चौराहे
रोटियां, सपने, जनता और मर्मस्पर्शी लहजों की पोटली बना चुका है
जनता गीत गा रही है
बुद्धि को खाकर जो जीवित है
साफ शब्दों में कहो तो
जो बुद्धिजीवी हैं
वो तालियां बजा रहे हैं
वो पोटली के साथ
जाते जाते
कहता जा रहा है
जब देश का जवान सीमा पर लड़ रहा हो तो
ये वक्त गीत गाने का नहीं है
अजब जादू है उसकी बातों में
जनता अब गीत गाना छोड़ चुकी है
अब हर गली हर चौक पर जनता
नारे लगा रही है
"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...."
अब वो हर गली
हर चौक से
घर चला गया है
वो मौन हो गया है
क्योंकि वो ये जानता है कि जब समस्या गहन हो तो एक चुप हर दुख की दवा है।