Sunday 01 2024

फिल्म आया सावन झूम के ---



फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के फिल्मी बातें में आज बातें करते हैं फिल्म आया सावन झूम के की सिल्वर स्क्रीन पर धमाकेदार प्रस्तुति , जिसमें एक से एक बेहतरीन कलाकार बेहतरीन संगीत और मन को बांध लेने वाली एक कहानी है जिसे आप सुनकर उसमें डूब जाना चाहेंगे।



इस अंक को लेकर के हाजिर हूं मैं सीमा शाही दोस्तों नमस्कार,

फिल्म आया सावन झूम के नाम सुनते ही मन में कुछ कुछ होने लगता है। अगर आपने यह फिल्म देखा है तब तो आप समझ सकते हैं लेकिन यदि आपने यह फिल्म नहीं देखा है तो मन में क्या-क्या होता है यह समझ पाना मुश्किल है। सावन अपने आप में मन को दीवाना बना देता है और जब झूम कर आता है तब तो दीवानगी की हद पार कर देता है। अब देखिए इस फिल्म का गाना जिसे मोहम्मद रफी ने गया है "आया सावन झूम के" ..... सुनने से आपको भरपेट भोजन कर लेने का आनंद मिलता है। मजे की बात यह है कि अगर इसमें मन पसंदीदा कलाकार भी हों तो फिर सोने में सुहागा है । वर्ष 1969 हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग है और स्वर्ण युग के सितारे धर्मेंद्र आशा पारेख नजीर हुसैन निरूपा राय के अभिनय से सजी फिल्म है। इसकी पटकथा सचिन भौमिक ने लिखी निर्माता जी ओमप्रकाश और निर्देशक रघुनाथ झालानी हैं। देख तो इन कलाकारों की टीम अपने आप में एक परफेक्ट टीम बनाती है। अब इन सब के साथ संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और उनके साथ गीत लिखने वाले आनंद बक्शी की भी परफेक्ट जोड़ी हो तब कमाल तो होना तय है। अब आईए बात करते हैं गानों की। तो लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी का गाया गाना "आया सावन झूम के " दर्शकों को झूम जाने के लिए मजबूर कर देता है और मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर का ही एक गाना "साथिया नहीं जाना की जी ना लगे" अपने आप में पूरी एक फिल्म देखने का सुख दे देता है। वैसे तो इस फिल्म में सात गाने हैं लेकिन इसमें से तीन गाने तो बहुत बेहतरीन है जिनके कारण यह फिल्म सुपर हिट म्यूजिकल ब्लॉकबस्टर फिल्म बनी और बॉक्स ऑफिस पर भी खूब नाम कमाया और पैसे भी । फिल्म की कहानी बहुत साधारण सी कहानी है जिसमें एक नौकरानी है माया और उसका मालिक । अब ये मालिक उसके साथ छेड़छाड़ करता है तो नौकरानी प्रतिरोध करती है। इस दौरान होने वाली झूमा झटकी में गलती से नौकरानी माया के हाथों से मलिक मारा जाता है। माया इस कत्ल के लिए अपने आप को दोषी मानकर डर जाती है और घर छोड़कर भाग जाती है। जब पुलिस उसका पीछा करती है तो माया

    अपने बेटे को एक मंदिर के दरवाजे पर छोड़कर भाग जाती है। बच्चे को मंदिर के पुजारी अपनाते हैं और उसे अपने घर ले जाते है। तभी एक अमीर आदमी (नज़ीर हुसैन) और उसकी पत्नी मंदिर में आते हैं और भगवान से एक औलाद के लिए प्रार्थना करते हैं। उनकी बात सुनकर, मंदिर का पुजारी बच्चे को उन्हें सौंप देता है और उन्हें उसको अपने बच्चे के रूप में पालने के लिए कहता है। दंपती बच्चे का नाम जयशंकर रखते हैं। जयशंकर बड़े होने पर अपने पिता का व्यवसाय संभालने लगता है।


एक दिन जयशंकर की मुलाकात आरती (आशा पारेख) से होती है। वह उसे लुभाने में सफल रहता है और उसके पिता के साथ उनकी शादी की बात करने को राज़ी होता है। जयशंकर आरती के घर जा रहा है इस दौरान गलती से आरती के पिता के ऊपर उसकी गाड़ी चढ़ जाती है। इस दुर्घटना में आरती के पिता की मृत्यु हो जाती है। अचानक घटी इस दुर्घटना से जयशंकर अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। वह आरती, उसके भाई पप्पू और बहन माला की देखभाल करने लगता है। लेकिन इस तथ्य को छुपाता है कि वह उनके पिता की मृत्यु के लिए जिम्मेदार था। लेकिन इस तरह की बातें बहुत लंबे समय तक ढकी नहीं रह सकती। यह भेद एक समय खुल जाता है। जब आरती को सच्चाई का पता चलता है तो इससे आरती के मन में उसके प्रति गुस्से और नफरत का भाव भर जाता है। तभी वह कैबरे डांसर रीटा (लक्ष्मी छाया) के साथ जयशंकर के अंतरंग होने की भी गवाह बनती है। अब हालात और खराब हो जाते हैं। फिर जयशंकर को उसके पिता द्वारा घर से निकाल दिया जाता है। परिवार को पता चलता है कि उसका रीटा के साथ एक बेटा है। फिर बाद में पुलिस रीटा की हत्या के आरोप में जयशंकर को गिरफ्तार कर लेती है । हालांकि, बाद में यह पता चलता है कि वह अपनी बहन के पति राजेश को बचा रहा है और उसे रीटा द्वारा पैसे के लिए ब्लैकमेल किया जा रहा है। अंत में, यह पता चलता है कि रीटा के असली पति ने उसे अन्य लोगों को धोखा देने और पैसे के लालच में गोली मार दी थी।

इस प्रकार फिल्म की कहानी कुछ उलझी हुई सी लगती है लेकिन स्क्रीन पर देखने पर सारी बातें साफ-साफ समझ में आती है और कलाकारों के अभिनय संगीत के कारण फिल्म एक खूबसूरत मोड पर समाप्त होती है। बेहतरीन गानों के साथ बेहतरीन निर्देशन में यह फिल्म एक शानदार संगीत में ड्रामा बन जाती है जो सिल्वर स्क्रीन पर एक सपनीली दुनिया तैयार करती है और सिनेमा घर से निकलने पर दर्शक उसके जादू में खोए हुए गानों के साथ उन्हें गुनगुनाते हुए अपने घर चले जाते हैं ।

फेअरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट पर फिल्मी बातों में आज के अंक में आपने सुना फिल्म आया सावन झूम के की एक संक्षिप्त समीक्षा। अगले अंक में हम कोई अन्य फिल्म या कोई और कलाकार के बारे में जानकारी आपके लिए लेकर आएंगे तब तक सीमा शाही को अनुमति दीजिए नमस्कार

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