Friday 30 2024

जावेद अख्तर

 जब आप कोई फिल्म देखते हैं तो क्या आपके मन में भी कभी आता है कि हम भी कोई फिल्म बनाएं ? 

आता तो होगा!

 क्योंकि मैं भी जानता हूं कि जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो प्राय: मेरे दिमाग में ऐसा विचार आता था। लेकिन फिर सवाल होता था कि कहानी क्या होगी?

 तब उसका उत्तर भी होता था कि मेरी अपनी कहानी ही क्या काम है? बना दो तो एक फिल्म ही बन जाए !

जी हां ,ये बिल्कुल सही है। हर व्यक्ति की जिंदगी अपने आप में चलचित्र की एक कहानी होती है और हो सकती है। बस सवाल ये है कि क्या आपके अंदर इतनी हिम्मत है कि आप लिखने के काम को अंजाम दे सकें?

 यही फर्क होता है एक सफल आदमी और एक आम आदमी में!

 आम आदमी विचार करता है हवा में सपने

 देखता है और फिर खाकर सो जाता है। जो खास होता है वह दिन में सपने देखा है और रात दिन कमर तोड़ मेहनत करता है और उस सपने को साकार करता है। अब इतनी बड़ी भूमिका बनाने के बाद हम आपको ये बता ही देते हैं कि फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट के आज के "फिल्मी बातें" में जो मेहमान कलाकार  हैं उनकी कहानी बिल्कुल वैसी ही है। उन्होंने एक आम आदमी के परिवार से निकलकर मुंबई में कहानी लिखने के क्षेत्र में संघर्ष किया और हर किसी संघर्ष करने वाले युवा की तरह मुंबई की हर तकलीफें उठाई और अंत में सफल हुए। उनका नाम है जावेद अख्तर!

 जावेद अख्तर वो सख्शियत है जिन्होंने  शायर, गीतकार और फिल्म के कहानी और संवाद लिखने का कार्य किया और इसी क्षेत्र में अपना नाम कमाया। आप जानते हैं कि सलीम जावेद के नाम से लिखने वाले सलीम  के बाद जावेद वही जावेद अख्तर हैं जिनके बारे में हम आज बात करने जा रहे हैं।

 स्वीकार कीजिए दोस्तों, सीमा शाही का नमस्कार।

जावेद अख्तर कवि और हिन्दी फिल्मों के गीतकार और पटकथा लेखक हैं। वह सीता और गीता, ज़ंजीर, दीवार और शोले की कहानी, पटकथा और संवाद लिखने के लिये प्रसिद्ध है। ऐसा वो सलीम खान के साथ सलीम-जावेद की जोड़ी के रूप में करते थे। इसके साथ वो गीत भी लिखते रहे ।और उनके गीत फिल्म तेज़ाब, 1942: अ लव स्टोरी, बॉर्डर और लगान मैं हमको सुनने को मिले। उन्हें कई फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार, राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2020 में उन्हें धर्मनिरपेक्षता और मुक्त चिंतन को बढ़ावा देने में उनके योगदान के लिए रिचर्ड डॉकिंस अवार्ड से सम्मानित किया गया।

जावेद अख़्तर का नाम देश का बहुत ही जाना-पहचाना नाम हैं। जावेद अख्तर शायर, फिल्मों के गीतकार और पटकथा लेखक तो हैं ही, सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में भी उनकी एक अलग पहचान है। इनका जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था। पिता जाँ निसार अख़्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि और माता सफिया अख्तर मशहूर उर्दु लेखिका तथा शिक्षिका थीं। ज़ावेद प्रगतिशील आंदोलन के एक और सितारे लोकप्रिय कवि मजाज़ के भांजे भी हैं। अपने दौर के प्रसिद्ध शायर मुज़्तर ख़ैराबादी जावेद के दादा थे। पर इतना सब होने के बावजूद जावेद का बचपन विस्थापितों सा बीता। छोटी उम्र में ही माँ का आंचल सर से उठ गया और लखनऊ में कुछ समय अपने नाना नानी के घर बिताने के बाद उन्हें अलीगढ अपने खाला के घर भेज दिया गया जहाँ के स्कूल में उनकी शुरूआती पढाई हुई।


जावेद ने दो विवाह किये हैं। उनकी पहली पत्नी से दो बच्चे हैं- फरहान अख्तर और ज़ोया अख़्तर। फरहान पेशे से फिल्म निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, गायक हैं। जोया भी निर्देशक के रूप में अपने करियर कि शुरुआत कर चुकी हैं। उनकी दूसरी पत्नी फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी हैं।


भारत सरकार ने सन्  2007 में जावेद को पद्म भूषण से सम्मानित किया।

एक गीतकार के रूप में वर्ष 2004 में उन्हें किशोर कुमार सम्मान से सम्मानित किया गया सामाजिक सेवा के क्षेत्र में कार्य करने के लिए उन्हें वर्ष 2020 में रिचर्ड डार्किंस पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया

फिल्म जंजीर से उन्हें पटकथा लेखक के रूप में सफलता मिली। उन्होंने दीवार और शोले फ़िल्में लिखीं , जो 1975 में रिलीज़ हुईं; इन फ़िल्मों ने लोगों का दिल जीत लिया और लोकप्रिय संस्कृति पर इनका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा । बाद में उन्होंने गीतकार के रूप में अपने काम के लिए प्रशंसा अर्जित की । पाँच बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और आठ बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता ।


अख्तर ने 2019 के भारतीय आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और उनके उम्मीदवार के लिए उल्लेखनीय रूप से प्रचार किया और राज्यसभा में संसद सदस्य बने । 

 उनके परदादा फ़ज़ल-ए-हक खैराबादी इस्लाम के एक धार्मिक विद्वान थे, जिन्होंने उपनिवेशों के ख़िलाफ़ 1857 के भारतीय विद्रोह की घोषणा की थी।  जावेद अख्तर का मूल नाम जादू था, जो उनके पिता द्वारा लिखी गई एक कविता की एक पंक्ति से लिया गया था: "लम्हा, लम्हा किसी जादू का फ़साना होगा"। उन्हें जावेद का आधिकारिक नाम दिया गया था क्योंकि यह जादू शब्द के सबसे करीब था ।  उन्होंने अपना अधिकांश बचपन और स्कूली शिक्षा लखनऊ में पूरी की। उन्होंने भोपाल के सैफिया कॉलेज से स्नातक किया । 


 सलीम-जावेद

शुरुआत में, 1970 के दशक में, आमतौर पर पटकथा, कहानी और संवाद के लिए एक ही लेखक होने की कोई अवधारणा नहीं थी, न ही लेखकों को शीर्षकों में कोई श्रेय दिया जाता था। राजेश खन्ना को सलीम खान और जावेद अख्तर को हाथी मेरे साथी में काम देकर पटकथा लेखक बनने का पहला मौका देने का श्रेय दिया जाता है । जावेद अख्तर ने एक साक्षात्कार में कहा कि एक दिन, वह सलीम साहब के पास गए और कहा कि श्री देवर ने उन्हें एक बड़ी साइनिंग राशि दी है जिससे वह उनके बंगले आशीर्वाद का भुगतान पूरा कर सकते हैं। लेकिन फिल्म एक रीमेक थी और मूल की स्क्रिप्ट संतोषजनक होने से बहुत दूर थी। "उन्होंने हमसे कहा कि अगर हम स्क्रिप्ट को सही कर सकते हैं, तो वह सुनिश्चित करेंगे कि हमें पैसा और श्रेय दोनों मिले।" 


उनकी पहली बड़ी सफलता फिल्म अंदाज़  की पटकथा थी जो  वर्ष 1971में रिलीज हुई। उसके बाद हाथी मेरे साथी और सीता और गीता  थी। उन्होंने यादों की बारात , जंजीर , हाथ की सफाई , दीवार  शोले , चाचा भतीजा , डॉन , त्रिशूल  जैसी हिट फिल्में दीं । दोस्ताना , क्रांति , ज़माना  और मिस्टर इंडिया अन्य फिल्में हैं। उन्होंने दो कन्नड़ फिल्मों - प्रेमदा कनिके और राजा नन्ना राजा सहित 24 फिल्मों में एक साथ काम किया है ।


उन्होंने जो 24 फ़िल्में लिखीं, उनमें से 20 हिट रहीं।   जो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रहीं, उनमें वर्ष 1971 में आई फिल्म अधिकार , आखिरी दाव, ईमान धरम,  और शान  शामिल हैं। वर्ष 1982 में कुछ मुद्दों के कारण सलीम जावेद अलग हो गए, लेकिन उनके द्वारा लिखी गई कुछ स्क्रिप्ट बाद में हिट फ़िल्मों में बदल गईं, जैसे ज़माना और मिस्टर इंडिया । सलीम-जावेद, जिन्हें कई बार "अब तक के सबसे सफल स्क्रिप्ट राइटर" के रूप में वर्णित किया गया है,   को भारतीय सिनेमा में स्टार का दर्जा हासिल करने वाले पहले स्क्रिप्ट राइटर के रूप में भी जाना जाता है । 

अपने अनुभव के बारे में बात करती हुई जावेद अख्तर कहते हैं-

"कुछ बातें हैं जो मैं शुरू में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। मेरे नाम से भ्रमित मत हो जाना - जावेद अख्तर। मैं कोई रहस्य नहीं बता रहा हूँ, मैं कुछ ऐसा कह रहा हूँ जो मैंने कई बार लिखा है, टीवी पर, सार्वजनिक रूप से... मैं नास्तिक हूँ, मेरी कोई धार्मिक मान्यता नहीं है। और मैं किसी तरह की आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं करता हूँ"। उन्होंने अपने बच्चों फरहान और जोया अख्तर को भी यही परवरिश दी।

 उनके चाचा अंसार हरवानी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सदस्य और संसद के निर्वाचित सदस्य थे। अख्तर की चाची हमीदा सलीम एक भारतीय लेखिका, अर्थशास्त्री और शिक्षिका भी थीं।


यह था फेयरफ्लिक्स एंटरटेनमेंट की फिल्मी बातें का आज का अंक। अगले अंक में हम फिर किसी सेलिब्रिटी कलाकार की कहानी लेकर हाजिर होंगे। तब तक के लिए अनुमति दीजिए और स्वीकार कीजिए सीमा शाही का नमस्कार।

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